Bisat Ka Aakhri Mohra in Hindi Thriller by Aarti Garval books and stories PDF | बिसात का आखिरी मोहरा - 6

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बिसात का आखिरी मोहरा - 6

बगीचे की उस भीगी खुदाई के पास छाई खामोशी में अचानक एक बिजली का झटका सा महसूस हुआ। रसोइए आर्यन के हाथ में रखी उस प्राचीन डायरी पर सबकी नजरें टिकी हुई थीं।

​इंस्पेक्टर समीर ने सावधानीपुर्वक हाथ से वह डायरी अपने हाथ में ली। पन्ने पीले पड़ चुके थे और उनसे पुराने सड़े हुए कागज की बदबू भी आ रही थी।

​समीर ने अगला पन्ना पलटा, "इस डायरी में सिर्फ २० साल पहले हुए कत्ल का जिक्र नहीं है... बल्कि इसमें कुछ और भी है।"

​समीर ने पढ़ना शुरू किया, और जैसे-जैसे एक एक शब्द बाहर आते गए, वहाँ खड़े हर शख्स के पैरों तले से मानों जमीन ही खिसकने लगी थी।

​"आर्यन के पिता के साथ खेली गई वह बाजी सिर्फ मेरी नहीं थी। मुझे यह खेल खेलने पर मजबूर करने वाला इंसान मेरे बहुत करीब था... वही शख्स जिसने इस विक्टोरिया पुस्तकालय के नीचे से निकलने वाली गुप्त सुरंग का इस्तेमाल किया था।"

​"सुरंग?" अद्वैत ने हैरान होकर पूछा, "क्या इस पुस्तकालय के नीचे कोई गुप्त सुरंग भी है?"

​"हाँ," प्रोफेसर अय्यर ने धीमी आवाज में कहा,

"इतिहास कहता है कि इस पहाड़ी पर ब्रिटिश जमाने में एक गुप्त तहखाना बनाया गया था, जो पहाड़ के पीछे मौजूद एक गुफा में खुलता है। लेकिन उसका नक्शा सालों पहले ही खो गया था।"

​डॉक्टर मीरा ने अचानक आर्यन की तरफ उंगली उठाई,और उस तरफ देखने लगी"अगर आर्यन बोल नहीं सकता, तो वह इस डायरी तक कैसे पहुँचा? और हमें इस खुली हुई तिजोरी के पास लाने के पीछे उसका क्या मकसद है?"

​आर्यन ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपनी जेब से एक छोटी सी लकड़ी निकाली और जमीन की भीगी मिट्टी में कुछ उकेरना शुरू किया। उसने बनाया—एक सांप और एक ताज।

​तारा की चीख निकल गई, "वह सांप... वही निशान शायद मैंने कल रात दीवान साहब के केबिन की खिड़की के शीशे पर देखा था!"

​समीर समझ गए थे कि कहानी का असली खिलाड़ी अभी भी पर्दे के पीछे रहकर यह सब चला रहा है। उन्होंने तुरंत ही पूछा लीया"शर्मा जी! क्या यह सांप का प्रतीक दीवान साहब के खानदान में कोई इस्तेमाल करता था?"

​शर्मा जी के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। वे कांपती आवाज में बोले, "साहब... वह निशान दीवान साहब का नहीं, बल्कि उनके दिवंगत भाई साहब का था, जो २५ साल पहले इन्हीं पहाड़ियों से रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए थे!"

​सब सन्न रह गए थे। क्या दीवान साहब का भाई अभी भी जिंदा था? या फिर यह किसी भटकती आत्मा का न्याय था?सब असंजस मे पडे हुये थे।​ठीक उसी पल, पहाड़ के पीछे से एक खौफनाक आवाज आई—मानो कोई भारी पत्थर या धातु का दरवाजा खुला हो! धुंध के बीच से एक काला धुआँ हवा में ऊपर उठने लगा।

​समीर ने अपनी पिस्तौल कसकर पकड़ी, "खेल का दूसरा पड़ाव शुरू हो चुका है। वह गुप्त तहखाना खुल गया है। अगर हमें असली कातिल और 'काली रानी' का रहस्य जानना है, तो हमें उस अंधेरे तहखाने में उतरना ही होगा!"

​सब एक-दूसरे को शक की नजरों से देखने लगे थे, क्योंकि वे सब जानते थे कि उस तहखाने में उतरने के बाद शायद सब लोग जिंदा वापस ही न लौट सकें।