घड़ी में तीन बजे थे जब जाई बिस्तर से उठ कर बैठ ली थीं।
“पानी चाहिए?” मैं ने पूछा।
“सोती नहीं क्या तू?” जाई ने हैरानी जतलाई, “इधर मैं हिलती भी हूं तो तू चौकन्नी होकर मेरे पास लपक आती है….”
पिछले माह जब हमारे पिता की मृत्यु हुई थी तो हम तीन बहनों ने तय किया जाई बारी- बारी से अब तीन- तीन महीनों के लिए हमारे पास रहा करेंगी। न उधर लंदन में स्थायी रूप से बसे भाई के पास जांएगी और न ही कस्बापुर के हमारे पैतृक मकान में अकेली।
इन दिनों जाई की टिकान मेरे घर पर थी।
“मेरी जाईं नहीं आप?” जब से जाई का बांया भाग फ़ालिज की चपेट में आया है उन पर लाड़ उंडेलने का कोई भी अवसर मैं हाथ से जाने देना नहीं चाहती, “पानी दे रही हूं।”
जाई को सहारा दे कर मैं ने उन्हें पानी पिला दिया।
“मैं तो तेरी जाई हूं ही, लेकिन मेरी जाई बचपन में मुझ से छूट गई रहीं,” जाई के चेहरे पर एक फ़ासला आ बैठा। वह अपने को दूरी पर रख कर बोल रहीं थीं।
“और भाभी जी?” जाई की देखादेखी हम अपने नाना और नानी को ‘भाभी जी’ और ‘भाई जी’ ही पुकारते।
“सब यही जानते थे, मैं भी तेरी सुमित्रा मौसी की तरह उन की सगी बेटी थी।”
“आप ने भी नहीं बतलाया?” मेरे नाना राजनैतिक नेता रह चुके थे और उन्हीं के संसर्ग में रहीं हमारी जाई सक्रिय समाजसेवी। ऐसे में हम भाई- बहनों को दादी ने बड़ा किया था और जाई के साथ हम फ़ुरसत में कम ही बैठ पाए थे।
“आज बताती हूं। पहले तू यह पानी वापस रख आ….”
“असली मेरी जाई कटखनी थीं। बदनसीब थीं। बावली थीं।”
जाई के पास लौटने पर मैं ने पाया उन के चेहरे पर वही अजनबी भाव अभी भी व्याप्त थे।
“वह ऊपर वाली मंज़िल पर रहती थीं और उन्हें पागलपन की वजह से ताले के पीछे रखा जाता था। ताले की चाभी हमारी नौकरानी,मेहरां,के पास रहती थी जो ऊपर उन के पास रात में सोती थी ही, दिन में भी उन के खाने- पीने और डाक्टर के इंजेक्शन की व्यवस्था करने में लगी रहती।
“भाभी जी इतवार के इतवार मीहरां को नीचे अपनी मदद के लिए ज़रूर बुलवा लिया करतीं। सब से ज़्यादा मदद उन्हें मेरे बाल धुलाने में चाहिए होती। बाल मेरे लंबे बहुत थे।तिस पर खूब घने भी।और उन की धुलाई व कंघी- पट्टी वाकई एक जल- परीक्षा।
“‘मैं आज बाल न धोऊंगी,’ उस इतवार के दिन मैं ने अपने बाल धुलाने को टाल जाना चाहा। सन उन्नीस सौ इकतीस के उन दिनों मैं ग्यारह- बारह की थी।
“‘इस के बाल कटवा दीजिए,’ मोहरां हंसी, ‘एन्नी बीसेंट की तरह।’
“हमारे भाई जी की एक तस्वीर में एन्नी बीसेंट भी साथ में खड़ी थीं….”
“एन्नी बीसेंट को आप साक्षात देखें भी रहीं?” उत्साहित हो कर मैं ने जाई से पूछा।
“हां। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वह पहली महिला अध्यक्ष चुनीं गईं थीं, सन उन्नीस सौ सोलह में। तब से पन्द्रह साल पहले।”
“आप के बाल सन इकतीस के उसी दिन पहली बार काटे गए,जाई?” मैं उन के किस्से पर लौट आई।
“हां। उसी दिन बहुत बड़ा बवाल खड़ा हुआ फिर….”
“शुरू से बताइए, जाई….जब आप की मीहरां ने आप के बाल काटने की बात की….”
“‘बाल काटने ही होते तो पहले ऊपर वाली के न काट देते जिस के बाल इस से भी दुगुने लंबे और भारी हैं?’ मोहरां की बात पर भाभी जी बोलीं थीं।
“‘और जो नहाते समय इस से भी दुगुना हल्ला करती हैं?’मोहरां फिर हंस पड़ी।
“ऊपर वाली को बुद्ध के बुद्ध नहलाया जाता था। सुमित्रा को और मुुझे भी साथ लिवा कर। एक मुहिम में भाग लेने की तरह। भाभी जी और मोहरां मिल कर पहले उन का मुंह बांधतीं। हाथ बांधतीं। पैर बांधतीं। और फिर हम चार जनी मिल कर उन्हें साबुन लगातीं। रगड़तीं। मांजतीं। तेल लगातीं।और चमका देतीं। प्रतिक्रियास्वरूप यदि वह अपने अंग अकड़ा लेतीं या झटक देतीं तो उन का स्नान रोक कर हम थोड़ी देर के लिए कुछ दूरी पर जा खड़ी होतीं। पशुवत ज़ोर उन में बला का रहा। बंधे मुंह ही से गाली- गलौज और बंधे हाथ-पैर ही से उठा-पटक ऐसी उग्रता से विस्फोटित करतीं कि उन का स्वर उतारने में और हाथ- पैर काबू में लाने में डाक्टर का बताया हुआ मौरफ़ीन इंजेक्शन ही फिर काम में लाया जाता।
“‘आज मैं बाल कटवा ही लूंगी,’ मैं ने कहा और दालान पार कर भाई जी की बैठक में जा दाखिल हुई।
“सड़क की तरफ़ से बैठक का दरवाज़ा बंद था और केसर चाचा के साथ भाई जी उसी साल रिलीज़ हुई हिंंदी की पहली टौकी फ़िल्म ‘आलम आरा’ का एक गाना गुनगुना रहे थे : रूठा है आसमान…..
“‘मेरे बाल काट दीजिए भाई जी,’ उन की कुर्सी पर उन की गुनगुनाहट धीमे पड़ते ही मैं पहुंच ली।
“‘बच्ची ठीक कह रही है,” केसर चाचा उत्साह से भर लिए, ‘अपने देशवासियों की गुलामी मिटानी हमारे वश में हो न हो, इस बच्ची को तो इस की बेड़ियों से आज़ाद किया ही जा सकता है।’
“चार चार शाखाओं में बांधी गई अपने बालों की दोनों वेणियों के रिबन खोल कर उस समय मैं उन्हें अपनी बाहों में अपनी बेड़ियों की तरह ही लपेटे खड़ी थी।
“‘हां,चाचा जी, इन्हें स्नान कराने में मेरा बहुत सा समय बरबाद हो जाता है,’ मैं ने मुंह बिसूरा।
“अपने को आज़ाद- ख्याल दिखलाने का भाई जी को एक सनक की हद तक शौक रहा।
“डींग- डींग में उन्हों ने अपनी मेज़ की दराज़ से अपनी कैंची निकाली और मेरी दोनों वेणियां सिरे से काट डालीं।
“मेरा सिर पंख की तरह हल्का महसूस करने लगा।
“दोनों वेणियों को हाथों में घुमाती हुई मैं दालान में लौटी तो मोहरां की चीख निकल ली।
“‘सिर मुणीए,’भाभी जी चिल्ला उठीं, ‘क्या कुफ्र तोल कर आयी है?’
“उन दिनों साधारणजन के परिवारों में स्त्रियों के बालों पर कैंची नहीं चलाई जाती थी। बल्कि गाली में भी किसी लड़की को ‘सिरमुणी’ कहने से हमेशा बचा जाता था। केवल विधवाओं ही के बाल मूंडे जाते थे। और वह भी जबरन।
“भाभी जी मुझे मारने दौड़ीं तो भाई जी की बैठक में मैं उसी पैर लौट आयी, ‘भाभी जी मुझे पीटने जा रही हैं….’
“भाई जी ने मुझे अपनी गोदी में उठा लिया और दालान में आ पहुंचे, ‘खबरदार जो मेरी बेटी को ज़रा भी झिड़का या डपटा। उस के बाल मैं ने काटे हैं। जो कहना है मुझे कहो….’
“‘ऊपर जा कर इस की मां के बाल भी काट आओ,’ गुस्से में भरी भाभी जी उबल पड़ीं।
“‘क्या बोली तू?’ मेरे भाई जी ने मुझे गोदी से उतारा और भाभी जी के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा दे मारा, ‘क्या बोली?’
“भाभी जी की बोलती बंद हो गई।
“‘इसे अब नहला दो, मोहरां,’ मेरे भाई जी ने आदेश दिया और बैठक की ओर अपने डग बढा ले गए।
“नहाते समय मैं ने मोहरां से पूछा, ‘ऊपर वाली मौसी मेरी मां कैसे हुई?’
तो उस का जवाब मिला, ‘हम कुछ नहीं जानतीं। अपने भाई जी से पूछना….’
“शाम को भाई जी घर के अंदर आए तो मैं ने उन से भी जा पूछ देखा, ‘ऊपर वाली मौसी मेरी मां कैसे हुईं?’
“तो उन्हों ने भी मुझे टाल दिया, ‘तेरी मां तेरी भाभी जी ही हैं। गुस्से में वह ऐसे ही अंट- शंट बकने लगती है। तू देखना, सुमित्रा पर गुस्सा होगी तो मेहरां को उस की मां बना देगी….’
“भाभी जी से तो मैं ने कुछ नहीं पूछा लेकिन जब बुद्ध आया और ऊपर वाली मौसी को नहलाने हम ऊपर पहुंचीं तो बहाने बहाने से मैं ने उन के मुंह की पट्टी खोल डाली , ‘आप मेरी मां हो?’
“जवाब में उन्हों ने मेरे लिए, भाभी जी के लिए, भाई जी के लिए इतनी गाली बकी कि तत्काल उन का मुंह बांधना ज़रूरी हो गया। इंजेक्शन देना ज़रूरी हो गया। यहां तक कि डाक्टर को बुलाना ज़रूरी हो गया।
“और उस के तीसरे दिन वह कूच भी कर गईं। लेकिन जब उन्हें सजाया गया तो सभी ने दांतों तले अपनी उंगलियां दबाकर दबी आवाज़ में यही कहा, ‘बड़ी लड़की से इस की सूरत ऐसी मिलती है मानो उस की मां ही हो।’
“एक वह दिन है और एक आज का दिन है। तभी से एक दिन ऐसा नहीं गुज़रा जब मैं ने उन्हें स्मरण न किया हो। नमन न किया हो। या फिर उन्हों ने मुझे दर्शन न दिए हों। मुझे परेशान न किया हो। मुझे व्याकुल न किया हो….”
“भाई जी ने उन्हें उन के पागलपन की वजह से छोड़ा था?” मैं ने पूछा।
“हां। और भाभी जी की भाई जी से इस शर्त पर शादी हुई थी कि वह मुझे कभी पता नहीं लगने देंगी कि मैं एक पागल मां की बेटी हूं….”
“लेकिन वह पागल हुईं कब और कैसे? उन के मायके वालों ने भाई जी से कुछ नहीं पूछा? कुछ नहीं कहा?”
“उन दिनों लड़की वाले दामाद से कोई सवाल नहीं पूछते थे। कोई जवाबदेही नहीं मांगते थे। उन के लिए इतना ही काफ़ी था दामाद अपनी नातेदारी निभा रहा था। लड़की को अपने मकान मैं रहने दे रहा था। नातिनी की पूरी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रहा था।”
“लेकिन आप तो पूछ सकतीं थीं, भाई जी मेरी मां कब पागल हुईं? कैसे पागल हुईं? उन की खुशियां भाभी जी के पल्ले में आप के बांधने से पहले हुईं या बाद में? या फिर इसी ही वजह से पागल हुईं?”
“भाई जी के लिए मेरे मन में बहुत लिहाज़ था। और उसी लिहाज़दारी की खातिर मैं उन्हें शर्मिंदगी से बचाना चाहती थी जो उन्हें मेरे सवाल उठाने पर हुई होती…..”