Shri: Struggle and Love - Chapter 3 in Hindi Spiritual Stories by Janshi Saroha books and stories PDF | श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 3

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श्री: संघर्ष एवं प्रेम - पाठ 3

हरि अब गाड़ी स्टार्ट कर देता है । वो वहां  से अपने घर की और गाड़ी घुमा लेता है।  और रेडियो में  गाने चलाता है ।लेकिन श्री रेडियो बंद कर देती है। क्यूंकि श्री भजन के शिवाय किसी प्रकार का गाना पसंद नहीं करती थी। 
हरि कहता है आपने रेडियो  बंद क्यों किया ।
श्री ने कहा कि उसे गाने सुनना पसंद नहीं ।
हरि बोला तुम कितनी बोरिंग हो ।यार।
उसके यार बोलने पर श्री उसे घूरती है और बोलती है कि मैं आपकी कोई यार नहीं हु आगे से मुझे यार मत कहना । समझे। और रही बात की मैं बोरिंग हु तो मैं जैसे भी हु वैसे ही ठीक हु आपसे मतलब । 
श्री की बात सुन कर हरि चुप चाप गाड़ी चला रहा था।
श्री ने आंखे बंद की हुई थी ।
हरि उसे देख रहा था वो सोचता है कैसी लड़की है ये । इसे गाने पसंद नहीं ये क्या बात हुई भला ।
और बस यार ही तो कहा था इतनी सी बात में ये सब बोल दिया इसने  । 😔
हरि अपने घर आ चुका था । श्री  सो चुकी थी हरि सोचता है अब इसे कैसे उठाऊं 🤔। तब श्री अपनी आंख खोलती है । देखती है कि हरि का घर आ गया है वो कार से उतरती है । घर की तरफ जाने लगती है। हरि उसे पीछे से आवाज देता है और कहता है ओह मिस श्री आपका इतना सारा सामान मुझे अकेले लेकर आना है क्या। 
श्री, हरि की ये बात सुनकर वापिस कार की तरफ आ कर अपना सामान उठा लेती है और सीता जी के घर की तरफ बढ़ती है । 
हरि उसके पीछे आता है ।
श्री बेल बजाती है । तभी हरि का छोटा भाई( शेष) दरवाजा खोलता है। श्री को अपने सामने देख कर खुश हो जाता है क्यूंकि श्री और शेष बचपन से ही बहुत अच्छे दोस्त थे ।
श्री तो शेष को अपने छोटे भाई की तरह मानती थी । शेष भी उसे दीदी कहता था । 
शेष खुशी से श्री के गले लग जाता है तब श्री भी अपना स्नेह उस पर लुटा रही थी। शेष श्री से 3 वर्ष छोटा था । लेकिन फिर भी उसकी श्री के साथ बहुत बनती थी। 
सीता जी अंदर से ही आवाज लगाती हुई बोली कि अब क्या बाहर खड़े खड़े ही बात करोगे अंदर ले आओ श्री को। 
शेष अपना सिर पीट लेता है और श्री को अंदर ले कर आता है हरि भी उनके पीछे अंदर आता है । 
हरि की दादी तो श्री को देख कर खुश हो जाती है उसे गले से लगा लेती है ।

क्यूंकि वो तो श्री को बचपन से ही उसे अपने पोते की बहु के रूप में देखती थी लेकिन श्री के शरीर की वजह से तो उन्होंने भी अपनी मन की इच्छा को मार दिया अब भला कौन दादी होगी जो अपने पोते के लिए किसी कुरूप को ले कर आये।

(खैर छोड़ो ये तो लोगों के विचार है जिन्हें हम कभी भी बदल नहीं सकते इस संसार में तन की बनावट को ही देखा जाता है । किसी को क्या फर्क पड़ता है कि सामने वाले का शरीर भले ही कुरूप हो लेकिन मन से वो कितनी सुंदर थी )।

सीता जी ने जब श्री को देखा तो उसे एक तरफ ले कर आई उन्होंने श्री से कहा । बेटा ये क्या हाल बना रखा है अपना माथे पर त्रिपुंड गले में रुद्राक्ष सर पर इतनी बढ़ी चुनी क्या है ये सब तुम एक आम लड़की हो साध्वी की तरह क्यो रह रही हो । मैने तुम्हे पिछली बार समझाया था न फिर भी अब तो पहले से भी ज्यादा तुमने अपने आप को भक्ति में लगा दिया सीता जी बोली कि ये क्या कोई उमर है भक्ति करने की अभी तो तुम बस 23 साल की हो अपनी जिंदगी क्यूं बरबाद कर रही हो तुम अपनी जिंदगी जियो बेटा नहीं तो बाद में क्या होगा तुम्हारा । 

फ्लैश बैक:–
एक दिन नए साल पर सीता जी और उनके पति राम जी
गीता जी के घर आए । जब वो उनके घर पहुंचे तब श्री लड्डू गोपाल जी को खाना पवा रही थी । 
रूप वही माथे पर त्रिपुंड गले में रुद्राक्ष सर पर ओढ़नी  पहने श्री किसी साध्वी से कम नहीं लग रही थी उस समय वो बस 19 वर्ष की थी ।

सीता जी ने जब श्री को ऐसे देखा तो उन्हें श्री के लिए बुरा लग रहा था । और सीता जी सोच रही थी कि कहां वो श्री को अपने बेटे हरि ले लिए सोचती थी जब श्री का जन्म भी नहीं हुआ था । लेकिन सीता जी को क्या पता था कि श्री एक कुरूप शरीर के साथ उत्पन होगी ।
खैर लेकिन थी तो श्री उनकी दोस्त गीता की बेटी ही इसलिए वो श्री से हमेशा बेटी जैसा प्यार  करती। 
सीता जी ने उसे अपने पास बुला कर समझाना चाहा 

सीता जी श्री से कहती है कि  – श्री अभी तो तुम्हारे मां पिता तुम्हारे साथ है पर वो हमेशा तो तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे न एक न एक दिन तो तुम अकेली हो जाओगी तब क्या करोगी बेटा कहा जाओगी जीवन बहुत बड़ा है बेटा ऐसे नहीं चलता जीवन अभी तुम छोटी हो इतनी कम उम्र में दिन रात मेहनत करती हो ये कोई छोटी बात नहीं है पर अभी तो ये सब आसान है लेकिन बढ़ती उमर तुम्हारा साथ न देगी तो क्या करोगी 
बेटा अपने आने वाले जीवन के बारे में सोचो दुनिया में कोई तो होगा जो तुम्हे भी अपनाएगा...
तुम्हारे समस्या के साथ  तन से भले ही नहीं लेकिन मन से तो तुम बहुत सुंदर हो कोई तो ऐसा होगा जो तुम्हे तुम्हारे मन से चाहेगा। उसे तुम्हे देख कर घृणा नहीं होगी जो तुम्हे चाहेगा।

(श्री लगभग सोच में डूब गई सीता जी की बातों पर विचार करने लगी । लेकिन फिर श्री मन में सोचती है कि आंटी जी आप मेरी माँ जैसी है मुझे वही शिक्षा देना चाहती है जो एक माँ अपने बच्चों को देती है लेकिन आंटी जी ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला जैसा आपने अभी कहा  इस पूरे संसार में ऐसा कोई भी नहीं है जो किसी के मन को देखकर उससे प्रेम करे । इस संसार में तो केवल तन का ही आकर्षण सर्वप्रथम है। क्या आप मेरे जैसी किसी कुरूप लड़की से अपने बेटे की शादी कर सकती है नहीं न तो फिर कोई और क्यूं कराएगा अपने बेटे की शादी मेरे जैसी कुरूप लड़की से 
और वैसे भी मैने अपनी सारी ख्वाईशों का गला घोट दिया है अब तो मैं ये जीवन अपने ईश्वर को समर्पित कर चुकी हु अब मुझे इस जीवन से कुछ भी नहीं चाहिए । बस एक बार ias जरूर बनना चाहती हु ताकि उन लोगों को thank you बोल सकू जिन्होंने मेरे शरीर का अपमान किया Thank you isliye क्यूंकि उन्हीं लोगों के कारण तो कुछ बनने का जुनून मुझ में आया है । )


श्री अपनी सोच से बाहर आती हुई सीता जी की और देख कर बातों पर हाँ में सर हिला देती है मानो श्री सीता जी की बात से सहमत थी। उसे उस समय यही सही लगा । लेकिन मन से तो वो वही कर रही थी जो वो करना चाहती थी । 

फ्लैश बैक end:- 


धन्यवाद
🙌🏻🙏🏻🕉️