तो अब अच्छे नंबर 12वीं में आ जाने के बाद, अब श्री ने इग्नू मे एडमिशन ले लिया, आगे की पढ़ाई उसने ओपन से की थी, और UPSC की तैयारी शुरू कर दी थी। हां श्री को अब IAS बनना था दिखाना था सब को कि वो कमजोर नहीं है। उसने अपना स्कूल ख़त्म होने के बाद अपनी मम्मी का एक प्राइमरी स्कूल खुलवाया। ज्यादा तर समय अब श्री अपनी पढ़ाई और भक्ति को देती थी और समय निकाल कर अपनी मम्मी के स्कूल में पढ़ाती भी थी।
अपनी मां के विद्यालय में पढ़ाना। अपनी पढ़ाई करना । शाम को ट्यूशन पढ़ाना। एकादशी व्रत करना। हर सोमवार को शिवजी महाराज का कठोर व्रत करना और फिर भागवत पाठ करके 9 बजे तक सो जाना। )। श्री का नियम था ।
ऐसे कोठर नियमों के कारण 1 वर्ष के भीतर ही श्री के अंदर एक चमक आनी शुरू हुई । कहते है ना कि जब हम भगवान की पूजा करते है तब उनका रूप हमारे में दिखने लगता है । ऐसा ही श्री के साथ भी हुआ।
शरीर तो उसका ठीक नहीं हुआ लेकिन उसका चेहरे का आकर्षण अवश्य बढ़ गया था। कोई उसे देखता तो श्री से बात किए बिना नहीं रह सकता था । ऐसा ही चलता रहा फिर श्री 2nd year के फाइनल एग्जाम दे रही थी उसने अपनी मां से कह दिया कि वो अब विद्यालय मे नहीं पढ़ा पाएगी। क्यूंकि अब उसके पास बस 2 साल है । Upsc कि तैयारी के लिए । अब 2 सालों में श्री ने अपनी पढ़ाई और भक्ति पर ही फोकस करा। अब श्री का एग्जाम प्रीलिम्स था । किस्मत में एक खेल खेला।
उसका एग्जाम सेंटर सीता अंटी के घर के पास पढ़ा । मेरठ में ..... श्री के पापा ने upsc के इंटरव्यू तक उसे उनके घर में रुकने को कहा।
श्री का मन बिल्कुल नहीं मान रहा था कि वो उनके घर जाए । क्यूंकि श्री को डर था कि उसने इतनी मेहनत से सब ख्यालों को मिटा कर अपना जीवन ईश्वर को सोपा है और अब भगवान ही उसे वहां भेज रहे है वो दुबारा से अपनी दफन इच्छाओं को नहीं जगाना चाहती थी। क्यूंकि इच्छा करने से कौन सा वो इच्छा पूरी हो जाती ऐसा संभव ही नहीं था पर नियति को तो कुछ और ही मंजूर था 😌...
मन मार कर श्री को वहां जाना पड़ा क्यूंकि उसका एग्जाम सेंटर ही वहां पढ़ा था फिर क्या ।
वो बस स्टैंड पर खड़ी थी सर पर बड़ी से चुनी ओढ़े। माथे पर त्रिपुंड लगाए । गले में रुद्राक्ष की माला पहने । मानो कोई बहुत बड़ी साध्वी हो। वहां खरे सब लोग उससे घूर–घूर कर देख रहे थे । क्यूंकि इतनी कम उम्र में उसने तपस्या का मार्ग जो चुन लिया था। शरीर तो कपड़ों से धक जाता है चेहरे पर तो ईश्वर की कृपा का आकर्षण है। जिसे देख कर सब मोहित हो जाते ।
सीता जी ने अपने बेटे हरि को बस स्टैंड भेजा श्री को ले आने के लिए ।
वो जैसे ही बस स्टैंड पहुंचता है । उसकी नजर श्री पर आ कर रुक जाती है वो सोचता है कि ऐसी भी लड़की होती है क्या आज के जमाने की तो नहीं लगती। कोई देवी है क्या या कोई भक्त ? कोई लड़की भी त्रिपुंड लगाती है इतनी कम उम्र में ईश्वर को क्यों पाना चाहती है । श्री की नजर हरि की तरफ गई । और वहीं आंखों ही आंखों में दोनों एक दूसरे में दूर से ही खो गए। श्री ने जज्बातों पर काबू पाते हुए अपने भगवान नारायण का नाम जपा। और उनसे माफी मांगी । और कहा हे त्रिलोकी नाथ मेरे पिता मेरी सहायता करे मेरे हृदय में ऐसे भावनाएं प्रकट न करे (हरि ॐ) मंत्र को बोलकर श्री ,हरि की तरफ बढ़ी। हरि अभी भी उसे ही देख रहा था ।
श्री ने अपना सामान हरि को पकड़ाया और कहा कृपा कर के मेरा सामान गाड़ी में रख दीजिए । हरि उसकी बात सुन कर होश में आया श्री का सामान गाड़ी में रखा ।
इतने में श्री पीछे शीट पर जा कर बैठ गई अपनी आंखें बंद कर ली। हरि ड्राइविंग शीट पर आया लेकिन कार स्टार्ट नहीं करी । श्री ने आंखे खोली घूर कर हरि की तरफ देखा और कहा की गाड़ी स्टार्ट क्यों नहीं कर रहे आप। हरि ने कहा मैं आपका कोई ड्राइवर नहीं हु मिस श्री आगे आ कर बैठिए ।तभी मैं कार स्टार्ट करूंगा । श्री चुप चाप आगे आ कर बैठ गई । कमर पीछे कर आंखे बंद कर ली ।
लेकिन हरि ने अब भी कार स्टार्ट नहीं की
श्री ने कहा अब क्यों नहीं चल रहे आप।
हरि ने कहा मिस श्री यह शीट बेल्ट नहीं बांधेगी तो पुलिस को अच्छा खासा चलान देना पड़ेगा और अभी आप ias नहीं बनी है । मुस्कुराकर कहा । श्री शीट बेल्ट बांधने का प्रयास करती है लेकिन विफल रहती है क्यूंकि वो कार की front शीट पर पहली बार ही बैठी थी। उसे शीट बेल्ट बांधना नहीं आता था।
हरि श्री को ही देख रहा था वो कहता है मैं कुछ मदद करु । 😊
श्री बिना कुछ बोले हाँ में सर हिला देती है ।
हरि उसके करीब आ कर शीट बेल्ट बांधने लगता है श्री की सांस उसे महसूस हो रही थी । वो हलका सा मुस्कुराने लगता है । श्री अभी भी भगवान का नाम जप रही थी । वो किसी भी कीमत पे अपने मन में कोई भाव नहीं लाना चाहती थी.
वही भावनाएं जो उसके मन में अपनी माँ की बात सुन कर चढ़ चुकी थी । उसने भी एक साधारण लड़की की तरह सपनो के राजकुमार के बारे में सोचा था पर अब उन सब का उससे कोई मतलब नहीं था । ईश्वर से बस उसकी यही प्राथना थी कि उसके सभी विकारों का नाश हो और वो अपनी पढाई और भक्ति पर ध्यान दे सके ।
अब आगे देखते है क्या श्री को सारी उम्र एक ब्रह्मचारिणी जीवन जीना होगा या हरि जिससे वो बचपन में प्यार करती थी वो उसे मिलेगा अब तो सब ईश्वर के हाथों है ।
धन्यवाद 🙏