गुरु गोविंद सिंह का सचित्र जीवन - 1 in Hindi Motivational Stories by Sapna Badh books and stories PDF | गुरु गोविंद सिंह का सचित्र जीवन - 1

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गुरु गोविंद सिंह का सचित्र जीवन - 1

सिख धर्म के प्रणेता गुरू नानक देव जी का जन्म १४६९ इन, में हुआ था। 1496 ई, मे उन्होने ना केवल हिन्दू ना कोई मुसलमान,का उपदेश दिया।उनका सारा जीवन मानवता और न्याय के लिए, अत्याचारी और अन्याय के खिलाफ संघर्ष को बढ़ावा देने में ही बीता।

अपने जीवन काल में गुरू नानक देव जी ने चार उदासियों (यात्राओं) के दौरान एशिया महाद्वीप के लगभग सभी देशों में जाकर धर्म के नाम पर भ्रम में पड़े लोगों को सत्य की राह दिखाई।

गुरू नानक देव जी सिख धर्म के पहले  नेता ( पिता) थे जिन्होंने जन सधारण की पीड़ा और वेदना को वाणी 

(वचनों)के माध्यम से प्रकट किया। धर्म के नाम पर होने वाली लूट खसोट का विरोध किया। शासकों के अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए उन्होंने कहा राजे चुली,नियाव की, अर्थात् न्याय करना राजा धर्म और कर्तव्य है।

समाज में नारी जाति के साथ होने वाले भेद भाव पूर्ण व्यवहार का विरोध किया और नारी जाति के लिए अपमान जनक शब्दों के व्यवहार का निषेध किया और कहा, मुनष्य को पैदा करने वाली जननी -नारी की नींदा करने वाले भी नारी की ही कोख से पैदा हुए हैं ।

ऊंच नीच,जात पात, जन्म और धर्म के बंधनों में पड़ी मनुष्यता को वरीयता देकर श्री गुरु नानक देव जी ने एक आकाल पुरुष की पूजा का उपदेश दिया।

सारे मनुष्यों के हृदय में एक ही ज्योति प्रकाशमान है। इसलिए ना तो कोई ऊंचा है ना ही कोई नीचा।

श्री गुरु नानक देव जी ने सभी मनुष्यों के बीच जाति पाति और धार्मिक भेद भाव से ऊपर उठकर साझे भाईचारे की नींव रखी,जो बाद में सिख धर्म के रूप में प्रकट हुई।

दूसरे गुरु अंगद देव जी 1539 में गुरू गद्दी पर बैठे। उन्होंने अपने गुरू काल में सिख मत का प्रचार करने के लिए संस्कृत के देववाणी होने के भ्रम को तोडा।

लोक भाषा (पंजाबी)की लिपि गुरूमुखी के रूप को संवार और सुधार कर पंजाबी भाषा में श्री गुरु नानक देव जी की वाणी और जीवन वृत्तांत को लिखवा कर प्रचारित किया।लोक भाषा में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर जन सधारण को पंडितों के बंधनों से मुक्त किया।

पंजाबी बोली,सिख धर्म के प्रचार का एक बहुत ही सशक्त माध्यम बन गई।

तीसरे गुरू अमर दास जी ने अपने काल में (1522- 1575) में सिख धर्म को एक संस्था का रूप और आकार देकर उसमें निखार पैदा किया। उन्होंने भारत भर में मुख्य मुख्य स्थानों पर सिख धर्म के प्रचार केंद्र (मंजिया) स्थापित किए सिखों में ऊंच नीच का भेदभाव मिटाने के लिए लंगर एक साथ बैठकर भोजन करने और संगत ( एक साथ बैठकर सत्संग करने की पंरपरा कायम की, सिखों के बीच सती प्रथा को खत्म कर दिया।


चौथे गुरू रामदास जी 1574मे गुरू गद्दी पर विराजमान हुए।सिख शक्ति को केंद्रित करने के लिए, उन्होंने अमृतसर शहर की स्थापना 1577 में की जो आज कल श्री अमृतसर साहब के नाम से प्रसिद्ध है। (अमृत सरोवर ) पहला सुधा सर (अमृतसर) बनवाया जिसमें डुबकी लगा कर मनुष्य अपनी क्षुद्रता और हीन भावना भूल जाते थे।

यही अमृतसर बाद में सिखों का प्रमुख केन्द्र बना।

श्री गुरु रामदास जी ने आंनद कारज ( सिख विवाह पद्धति ) की परम्परा आरंभ की,

पांचवें गुरू,,,,

क्रमशः ✍️