Guru Govind Singh ka Sachitra Jivan in Hindi Motivational Stories by Sapna Badh books and stories PDF | गुरु गोविंद सिंह का सचित्र जीवन - 5

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गुरु गोविंद सिंह का सचित्र जीवन - 5

बाल गोविन्द जी उस वक्त तक हाथ पैर चलाने लाएक हो ग‌ए थे उन्होंने अपने हाथों से मिश्री और स्वर्ण मुद्राएं के घड़े पकड़ लिए थे।बाल गोविन्द की मजबूत पकड़ देखकर,पीर जी बहुत खुश हुए उन्होंने आगे बढ़ कर अपनी छाती से लगा लिया, फिर उसका माथा चूम कर आशिर्वाद दिया। खुदाबंद करीम मेहर करे और दोनों लोकों में तेरी पकड़ मजबूत हो।

बाल गोविन्द का पालन पोषण राजकुमार की तरह हुआ,बाल गोविन्द की देखभाल के लिए सेवकों की कोई कमी नहीं थी।

ज्यों ज्यों बाल गोविन्द थोड़ा थोड़ा संज्ञान होता गया,तो उन्हें गुरू घर की परम्पराओं को समझाने का प्रयास किया जाने लगा। उन्हें संगत के बीच ले जाना माथा टेकने, दरबार साहिब में पलाथी मारकर बैठने और गुरुवाणी को कंठस्थ करने अभ्यास काराया जाने लगा।

बाल गोविन्द जी की स्मरण शक्ति और हर कार्य को सीखने की उत्सुकता को देखकर लोगों को ताजुब करने लगते थे।जब वह अपनी तोतली जुबान में जपुजी साहिब का पाठ करने लगे उनकी दादी मां ननकी जी बहुत प्रसन्न हूई और  लोगों में मिठाईयां बांटी गई।

बहुत दिनों की इच्छा के बाद प्राप्त अपने पोते के बिना दादी नानकी पल भर भी रह नहीं करती थी।

सिख सेवकों को आदेश था ।  कि वे सब बाल गोविन्द जी की पूरी देखभाल करें।


(गुरू गोविन्द जी ने मांस क्यों बनाया)


भाई माधो दास जी कहने लगे उससे पूछूंगा नहीं उसे ऐसे ही पंलग पर बैठे बैठे मै यहां लेकर आऊंगा।अपनी शक्तियों के साथ उसे पंलग समेत यहां लेकर आऊंगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

और माधो दास जी को एक आवाज सुनाई दी वो आवाज ने कहा हे माधो दास अंधकार के अंधेरे से निकलकर सच्चाई के आकाश में जा और जे बातें सुनकर माधो दास जी ने अपने सेवकों से पूछा क्या मैने सुना वह तुम्हें भी सुनाई दिया तो सेवकों ने कहा नही हमें तो कुछ सुनाई नहीं दिया और उसके बाद फिर आवाज सुनाई दी कि हे माधो दास परमात्म की आवाज केवल आत्मा ही सुन सकती है। और आत्मा की आवाज केवल परमात्मा ही सुन सकता है केवल मंत्र के साथ मन की शांति नहीं मिलती मन टिका करके भी रखना जरूरी है आज तेरे सभी मंत्र तेरे काम नहीं आए और सुनकर माधो दास जी सोचने लगे कि मेरे डेरे तक पहुंचने वाला कोई आम व्यक्ति नहीं है।

जब माधो दास जी अपनी कुटिया में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि की सतगुरु महाराज जी उसके पलंग पर विराजमान हैं और चार सिंह सतगुरु के पीछे सजे खड़े है । और फिर जब उसकी मुलाकात सतगुरु महाराज जी से हुई तो उनमें से एक सिंह ने कहा कि माधो दास तू यहीं सोच रहा है कि हमने तेरी कुटिया में 


क्रमशः ✍️ 

इसलिए बाल गोविन्द जी के आगे पीछे दो सेवक घूमते  ही रहते थे। दादी नानकी की यही कोशिश रहती, की बाल गोविन्द जी सदा उनकी नजरों के सामने ही रहे।

लेकिन बाल गोविन्द जी सब की नजरें बचाकर अपने बाल सखाओं के साथ खेलते खेलते दुर तक निकल जाते थे। कभी कभी तो सारा सारा दिन घर के बाहर ही रहते थे। सांय काल ही घर पहुंचते।

दादी नानकी की गोद में बैठने के बाद,बाल गोविन्द जी जोर जोर से बोलने लगते ।


क्रमशः ✍️