Holy Love or Curse 2 - 4 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 4

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पवित्र प्रेम या अभिशाप Season 2 - 4

पूरे दिन सिद्धिदात्री का मन उलझा रहा।

उसने सोचा -
वह नहीं जानता कि वह क्या है। लेकिन जब जान जाएगा...
तब क्या होगा?

उसने अपनी माँ की बात याद की जो उसे बचपन से सुनाई जाती थी—

उसकी मां बोलतीं थीं -
राक्षस पहले भोले लगते हैं। फिर अपना रूप दिखाते हैं।
तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

उसने फैसला कर लिया। आज रात वो उसे खत्म कर देगी।

🌕 पूर्णिमा

रात के दो बज रहे थे। चाँद पूरा था। आसमान साफ था। घर में सब सो रहे थे। सिद्धिदात्री उठी। उसने खंजर उठाया। धार परखी। उसके हाथ नहीं काँपे। वर्षों की साधना थी। वर्षों का प्रशिक्षण।
वह दरवाज़े की तरफ बढ़ी। दरवाज़ा धीरे से खुला। कमरे में चाँदनी आ रही थी। खिड़की का पर्दा हिल रहा था । रितांश सो रहा था।
सिद्धिदात्री ने एक पल उसे देखा।

वो बोली - 
कितना शांत लग रहा है।

उसने सोचा -
लेकिन शांति धोखा देती है।

उसने खंजर मज़बूती से पकड़ा। एक कदम आगे। दूसरा कदम।बिस्तर के पास पहुँची। उसने हाथ ऊपर उठाया और उसी पल—
रितांश की आँखें खुलीं। लाल। पूरी तरह लाल। जैसे खून हों।
उसने बिजली की तरह उसकी कलाई पकड़ ली। एक झटका।
खंजर फर्श पर गिरा। खनन। और इससे पहले कि सिद्धिदात्री कुछ समझती वह बिस्तर पर थी। रितांश ने उसे पूरी तरह दबा लिया था।
दोनों के चेहरे बस कुछ इंच की दूरी। सिद्धिदात्री ने उसकी आँखें देखीं। लाल। पूरी तरह। जैसे इंसान की नहीं रहीं। और दाँत बाहर आ रहे थे। तेज़। नुकीले। वैम्पायर। वह शब्द उसके दिमाग में चमका।

रितांश की साँसें तेज़ थीं। उसकी पकड़ लोहे जैसी थी। सिद्धिदात्री हिल नहीं सकती थी। और पहली बार वह डरी। रितांश उसे देख रहा था। लेकिन उसकी नज़र अजीब थी। जैसे दो चीज़ें एक साथ लड़ रही हों उसके भीतर। एक जो उसे खींच रही थी। गर्दन की तरफ। खून की तरफ। और दूसरी—

जो चिल्ला रही थी—
नहीं।

उसके जबड़े भिंचे।

वो बोला - 
तुम...!

उसकी आवाज़ भारी थी। गहरी। इंसानी नहीं लग रही थी।

वो बोला - 
तुम मुझे मारने आई थी।

यह सवाल नहीं था। बयान था। सिद्धिदात्री डरी थी। लेकिन उसने डर को चेहरे पर नहीं आने दिया।

उसने सीधे उसकी लाल आँखों में देखकर कहा -
हाँ।

रितांश रुक गया। उसे उम्मीद नहीं थी यह जवाब।

वो बोला - 
क्यों?

वो बोली - 
क्योंकि तुम राक्षस हो।

एक पल की चुप्पी। फिर कुछ अजीब हुआ। रितांश की आँखों में वह लाली धीरे-धीरे कम होने लगी। जैसे उसके शब्दों ने कुछ तोड़ा हो।

उसने वह शब्द दोहराया -
राक्षस...

धीरे से। जैसे पहली बार सुना हो। उसकी पकड़ थोड़ी ढीली हुई।

वो बोला - 
क्या मैं सच में...

वह पूरा नहीं बोल पाया। उसकी आँखें अब लाल नहीं थीं। काली थीं।बगहरी। और उनमें कुछ था दर्द। वह उठ गया। पीछे हट गया।
सिद्धिदात्री उठी। खंजर फर्श पर था। लेकिन उसने उसे नहीं उठाया। रितांश खिड़की के पास चला गया। पूर्णिमा का चाँद उसके चेहरे पर था।

उसने कहा -
जाओ।

पीठ उसकी तरफ।

वो बोला - 
अपना खंजर लो। और जाओ।
अभी मैं खुद पर काबू रख सकता हूँ। लेकिन ज़्यादा देर नहीं।

सिद्धिदात्री खड़ी रही। उसे जाना चाहिए था। यही सही था।

लेकिन उसने पूछा—
तुम्हें पता है तुम क्या हो?

रितांश चुप रहा।

उसने धीरे से कहा -
आज पहली बार...पहली बार लगा कि हाँ।

सिद्धिदात्री ने खंजर उठाया। दरवाज़े की तरफ बढ़ी। दरवाज़े पर रुकी।

पलटे बिना बोली—
कल बात करेंगे।

रितांश ने कोई जवाब नहीं दिया। वह चली गई। कमरे में बस चाँदनी रही।और रितांश खिड़की के पास खड़ा। अकेला। उसने अपनी हथेली देखी। वह हथेली जिसने आज उसे रोका था।

वो फुसफुसाया -
कौन हूँ मैं...

बाहर हवा थम गई। और पूर्णिमा की रात गवाह बन गई उस पल की—जब दो दुश्मन पहली बार एक-दूसरे की सच्चाई के सामने खड़े हुए थे।

सुबह हो चुकी थी। लेकिन रितांश की आँखों में नींद नहीं थी। पूरी रात वह खिड़की के पास बैठा रहा।

उसके दिमाग में बस एक ही शब्द घूम रहा था—
राक्षस...

पहली बार किसी ने उसके सामने यह शब्द कहा था। और सबसे बुरी बात...उसे खुद भी डर लगने लगा था कि शायद यह सच हो।

नीचे हॉल में सब नाश्ता कर रहे थे। राधा पराठे बना रही थी। रितांशी हमेशा की तरह हँस-बोल रही थी। लेकिन आज दो लोग असामान्य रूप से चुप थे। रितांश और सिद्धिदात्री। दोनों एक-दूसरे से नज़रें चुरा रहे थे।

रितांशी ने हँसते हुए कहा—
क्या बात है? आप दोनों की लड़ाई हो गई क्या?

दोनों एक साथ बोले—
नहीं!

और फिर दोनों एक-दूसरे को देखने लगे। राधा हँस पड़ी।

वो बोली - 
अरे वाह। जवाब भी एक साथ।

लेकिन किसी को नहीं पता था कि रात में क्या हुआ था।

कॉलेज के बाद शाम को...रितांश अकेला कॉलेज की छत पर बैठा था। हवा तेज़ चल रही थी। तभी पीछे से कदमों की आहट आई।
सिद्धिदात्री थी। वह उसके पास आकर खड़ी हो गई।बकुछ देर तक दोनों चुप रहे।

फिर सिद्धिदात्री बोली—
कल रात तुम मुझे मार सकते थे।

रितांश हल्का सा हँसा।

वो बोला - 
तुम भी तो मुझे मारने आई थी।

दोनों फिर चुप हो गए।

कुछ देर बाद रितांश बोला—
मुझे नहीं पता मैं क्या हूँ। लेकिन मैं इतना जानता हूँ...मैंने आज तक किसी निर्दोष को नुकसान नहीं पहुँचाया।

सिद्धिदात्री उसकी तरफ देखने लगी। उसकी आँखों में झूठ नहीं था।

दूसरी तरफ उसी समय...कॉलेज के पीछे पुराने जंगल में। तीन काले कपड़ों वाले लोग खड़े थे। उनकी आँखें भी लाल चमक रही थीं।

उनमें से एक ने कहा—
रक्तवंश का वारिस जाग चुका है।

दूसरा बोला—
और देवकन्या भी उसके पास पहुँच चुकी है।

तीसरा मुस्कुराया और बोला - 
अब खेल शुरू होगा।

उसने अपनी हथेली खोली। उसमें कृष्णा की एक पुरानी तस्वीर थी।

और तस्वीर के पीछे लिखा था—
उसे ढूँढो। वह अभी जीवित है।

उधर कॉलेज की छत पर...रितांश ने कृष्णा की डायरी का आख़िरी बंद पन्ना खोला।

वहाँ सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—
अगर तुम यह पन्ना पढ़ रहे हो...तो समझ लो कि मैं मरा नहीं हूँ।

रितांश की साँस रुक गई।
नीचे हस्ताक्षर थे—
                                            — तुम्हारा पिता, कृष्णा।