MTNL ki ghanti - 21 in Hindi Drama by kalpita books and stories PDF | MTNL की घंटी - 21

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MTNL की घंटी - 21

महक के दिमाग़ मे देव जी का NGO घूम रहा था  
क्योकि उसने देव का एक काल्पनिक चित्र अंकित किया था अपने मन मे
सोचा था —
"अगर देव जी देहरादून में हैं... तो जरूर टूटे-बिखरे होंगे। शायद एकदम साधारण कपड़ों में, जैसे कोई सन्यासी… शायद लंबे बाल, चुपचाप निगाहें झुकाए... जैसे वक्त ने उनसे सब छीन लिया हो।"

पर महक की सोच… पूरी तरह से गलत निकली।

............

शाम के 4 बज चुके थे महक और सबको 5 बजे तक एंट्री लेनी थी
रिसोर्ट के हॉल की ओर जाते हुए, ठीक सामने से एक तेज़ चाल में कुछ लोग आते दिखे आलोक जी के साथ

सबसे आगे  थे— देव।

काले सूट में, हाथो मे डायरी और पेन, माथे पर हल्की शिकन और आँखों में वही पुराना तेज़।
साफ दिख रहा था — वो आज के कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हैं, और साथ ही आयोजन् की ज़िम्मेदारी भी उनके कंधों पर है। उनकी NGO के बच्चो का एक प्रोग्राम है स्टेज पर

चलते-चलते देव अपनी टीम को निर्देश दे रहे थे,
"बच्चों के पीछे वॉल स्टैंड नहीं हटेगा, साउंड क्लियर होना चाहिए — मैं भाषण छोटा रखूँगा पर इन बच्चों के लिए कुछ खास बोलूंगा।"

महक का दिल… अजीब सी उलझन में था।

वो वहीं खड़ी रही —
और देव, एक हवा के तेज झोंके की तरह उसके पास से निकल गए... बिना देखे, बिना ठहरे।

“मम्मा! आपको पता है जो पास से गए, वो कौन थे?”
परी की उत्साहित आवाज़ ने महक को चौंकाया।

महक ने अनजान बनते हुए कहा,
“नहीं… मुझे नहीं पता।”

परी मुस्कुराई, आँखों में चमक,
“अरे मम्मा! वो देव जी हैं! कान्हा फाउंडेशन चलाते हैं। बहुत अच्छे इंसान हैं! और आज के प्रोग्राम के चीफ गेस्ट भी वही हैं।”

महक चुप रही।
परी बोलती रही —
“आपको पता है, मेरे सारे फ्रेंड्स उनके बारे में बात कर रहे थे। मेरे फ्रेंड्स हर साल प्रकाश पब्लिकेशन के प्रोग्राम में आते हैं, अपने माता-पिता के साथ। लेकिन देव जी किसी से बात नहीं करते।वो किसी से नही मिलते बहुत रिजर्व रहते है । काश… हम मिल पाते। मैं उनका ऑटोग्राफ लेकर सबको दिखाती ।"

महक ने हल्की सी मुस्कान के साथ परी का हाथ थामा और आगे चलने लगी।

अभी कुछ ही कदम चले होंगे… कि अचानक…

देव सामने से लौटकर आ गए — इस बार सीधा उनके सामने खड़े।

परी की आँखों में चमक थी —
जैसे सपना हकीकत बन गया हो।

महक की चाल रुक गई। थोड़ा सरक गई पीछे।

देव कुछ नहीं बोले। बस एक नजर महक पर डाली…
फिर बिना कोई भूमिका बांधे… घुटनों पर झुक गए।

“माधव…”

और फिर देव ने माधव को गले से लगा लिया 

महक का दिल… थम सा गया ।

माधव कुछ पल तक देव की बाँहों में चुपचाप था। लेकिन फिर उसने अपने नन्हें हाथों से देव के कंधे को हल्के से पीछे किया और मासूमियत से पूछा —

"क्या हुआ अंकल? आप किसी को ढूंढ़ रहे हैं? आपने मुझे हग क्यों किया? आप जानते हैं मुझे?"

देव कुछ नहीं बोले। बस एक हल्की मुस्कान के साथ अपनी कोट की जेब में हाथ डाला… और एक छोटी सी चॉकलेट निकालकर माधव की तरफ बढ़ा दी।

माधव की आँखों में लालच तो था — लेकिन ज़ुबान पर संस्कार पहले आए।

"नहीं नहीं… मैं नहीं ले सकता। मम्मी मना करती हैं — किसी अनजान से कुछ नहीं लेते… है ना मम्मा?"
उसने चॉकलेट से नजरें हटाई नहीं, पर अपनी मम्मी की तरफ मुड़कर भोलेपन से बोला।

देव अब मुस्कुरा रहे थे —
"बेटा, क्या मैं अनजान हूँ? एक बार मम्मी से पूछो…"

महक का दिल जाने क्यों भीग गया। बिना कुछ कहे, उसने हल्के से सिर हिलाया —
"ले लो माधव, चॉकलेट ले लो।"

बस इतना सुनना था —
माधव ने चॉकलेट देव के हाथ से खींच सी ली और फिर झेंपते हुए "Thank you" कहकर फिर से देव से लिपट गया।

वो एक गले मिलना नहीं था… वो एक रिश्ता था, जो बिना कहे भी जुड़ रहा था।

परी हैरानी से माँ और देव को देख रही थी।
"मम्मा… आप जानती हो इनको?"

इस बार जवाब महक ने नहीं दिया… देव ने दिया।

"हाँ परी बेटा… मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ तुम्हारी मम्मी को। देवी प्रसाद जी की वजह से हमारी मुलाकात हुई थी। तब जब तुम्हारे घर पर MTNL का फोन लगा करता था।"
देव की आवाज़ में एक पुरानी मुस्कान तैर रही थी — एक बीते ज़माने की सौंधी सी याद।

परी की आँखें और गोल हो गईं —
"अंकल… आप मुझे ऑटोग्राफ दोगे? और एक फोटो भी खिंचवाओगे मेरे साथ? प्लीज़?"
उसकी आवाज़ में विनती थी — जैसे कोई सपना टूट न जाए।

देव झिझकते हुए बोले —
"मैं कोई हीरो नहीं हूँ परी बेटा…"

लेकिन परी रुकने वालों में से नहीं थी।
"पर आप किसी हीरो से कम भी नहीं हो! सब आपको हीरो मानते हैं यहाँ। आपको पता है मेरी दोस्त सुहानी के पापा लेखक हैं — वो आपकी जीवनी लिखना चाहते हैं। आपसे मिलने के लिए बहुत कोशिश की पर आप किसी से नहीं मिलते। पर अब… मैं उनको आपका ऑटोग्राफ और फोटो दिखाऊंगी!"

देव मुस्कुराए, शायद सालों बाद दिल से।

उन्होंने परी की छोटी सी डायरी ली, उसमें साइन किया —
"तुम हमेशा ऐसे ही सपनों से भरी रहो — देव।"

फिर परी और माधव के साथ एक प्यारी सी तस्वीर खिंची।

और बच्चे जैसे पंख लगाकर हॉल की ओर भागे।

पीछे रह गए —
महक और देव… और उनके बीच वो खामोशी, जो शायद शब्दों से कहीं ज्यादा कह गई थी।

"महक... आज सिर्फ तुम्हारा दिन है। अपने लिए जीओ। तुम्हारी पहचान... तुम्हारा अस्तित्व... सबकुछ। लेखिका बनकर दुनिया जीत लो।"
देव की आँखों में आत्मविश्वास था और आवाज में अपनापन।

महक ने हल्की सी मुस्कान के साथ नज़रें झुका लीं। "जी..." सिर्फ इतना ही कह पाई।

"ग्यारह साल पहले एक सवाल पूछा था तुमने... उसका जवाब ढूंढने में थोड़ा वक़्त लगा... अब बता दूँ?"
देव ने उसकी आँखों में सीधा झाँकते हुए पूछा।

महक का चेहरा गुलाबी पड़ गया, ठीक उसकी गुलाबी साड़ी जैसा। "पता नहीं..." बस इतना ही निकला होंठों से।

"यार देव, चलो... देर हो रही है!"
मिस्टर गुप्ता की आवाज़ हॉल में गूँजी।

"देव भैया, कल दोपहर के बाद आपकी महक जी भी फ्री हो जाएंगी... जी भर के बातें कर लेना," सुधा ने चुटकी ली।

देव हल्का सकपका गया। महक की ओर देखा और धीमे से "सॉरी..." कहा — उन दोनों की ओर से।

महक बस मुस्कुरा दी... आँखें नीची करके मुड़ने लगी।

तभी पीछे से देव की आवाज़ आई —
"महक जी... बाल खुले ही रखना, बहुत अच्छी लग रही हो..."

देव तेज़ी से हॉल की ओर बढ़ गया, पर महक वहीं ठिठक गई — दिल की धड़कन थोड़ी तेज़ हो गई थी।

काश…
कोई वक़्त का रिमोट होता — वो दोनों कॉलेज के दिनों में लौट जाते... अधूरी बातों को पूरा करते... उस मासूम सी दोस्ती को एक नाम देते। आज वो अपने और देव जी के रिश्ते को कोई नाम नही देना चाहती थी बस उनकी मौजूदगी ही उसकी दिल की धड़कन बढ़ाने के लिए काफ़ी थी...बस सिर्फ वो भावनाए महसूस करना चाहती थी... उसने फैसला कर लिया ....देव जी के लिए जो भावनाए है  उन्हे सहेज कर दिल्ली ले जाएगी..बाकी उम्र उन के साथ काट लेगी ।

MTNL की घंटी
......to be continued