Karmjali Kokh - 1 in Hindi Women Focused by kalpita books and stories PDF | कर्मजली कोख... - 1

The Author
Featured Books
Categories
Share

कर्मजली कोख... - 1

कलावती हॉस्पिटल के लेबर रूम में प्रसव पीड़ा को चुपचाप सहन कर रही थी रेशमा…
ना कोई चीख, ना चित्कार…
बस चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
पीला पड़ा चेहरा और सफेद होती आँखें किसी और ही दर्द की गवाही दे रही थीं —
यह दर्द केवल प्रसव का नहीं था,
यह उस तकलीफ़ का था जो शायद खुदा ने उसकी किस्मत में लिख दी थी।
रेशमा की कोख से चौथा बेटा जन्मा।
वह भी अपनी माँ की तरह बिल्कुल शांत था।
फर्क बस इतना था कि माँ के सीने में अभी धड़कन बाकी थी,
और उस नवजात के भीतर… कुछ भी नहीं।
उसके पहले तीनों बच्चों की तरह
यह बच्चा भी मृत पैदा हुआ था।
डॉक्टर ने उसे जोर से हिलाया,
उसकी नन्ही छाती पर हाथ रखकर धड़कन तलाशने की कोशिश की,
मुंह से ऑक्सीजन दी,
हर संभव प्रयास किया उस बेजान शरीर में जान डालने का…
परन्तु सब व्यर्थ।
कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा भर गया।
अब तो डॉक्टरों की आँखें भी नम हो चुकी थीं।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि रेशमा से कैसे कहें —
कि इस बार भी उसकी कोख हरी होकर खाली रह गई…
कि उसने फिर एक बार नौ महीने उम्मीद को सींचा था,
सिर्फ उसे अपनी बाहों में निर्जीव पाने के लिए।
रेशमा को शायद पहले पता था क्योंकि बच्चा कुछ दिन से हिल नहीं रहा था गर्भ में...
तभी उसका यह दर्द प्रसव के दर्द से बड़ा था।
......
बाहर बरामदे में बेचैनी से टहलते उसके पति, नंद और सास की निगाहें हर बार प्रसव कक्ष के दरवाज़े पर जाकर ठहर जाती थीं।
जैसे ही अंदर से किसी ने कहा — “बेटा हुआ है…”
पूरा चेहरा खिल उठा।
सास ने तुरंत दोनों हाथ आसमान की तरफ उठा दिए —
“या अल्लाह, तेरा लाख-लाख शुक्र है…”
नंद खुशी से उछल पड़ी,
और आसिफ की आँखों में महीनों बाद चमक लौट आई।
चारों तरफ जैसे उम्मीद की एक रोशनी फैल गई थी।
लेकिन अगले ही पल दरवाज़ा खुला।
सफेद कपड़ों में खड़ी सिस्टर ने धीमी मगर भारी आवाज़ में कहा —
“बेटा पैदा हुआ था…”
बस “था” शब्द सुनते ही
मानो सारी खुशियाँ वहीं दम तोड़ गईं।
सास का उठता हुआ हाथ धीरे-धीरे नीचे गिर गया।
नंद की मुस्कान होंठों में ही जम गई।
और आसिफ…
वो कुछ पल तक सिस्टर का चेहरा देखता रह गया,
जैसे उसके कानों ने सुनने से इंकार कर दिया हो।
अभी जो घर में किलकारी की उम्मीद जागी थी,
वह एक पल में मातम में बदल गई।
लोग धीरे-धीरे फुसफुसाने लगे —
“कैसी किस्मत लेकर आई है…”
“चार-चार लड़के… और चारों…”
“अल्लाह किसी को ऐसी कोख ना दे…”
कर्मों वाली बनते-बनते
अब लोग उसे “कर्मजली” कहने लगे थे।

वह पूरे घर की सबसे चहेती लड़की थी।
नाज़ों से पली, मासूम सी रेशमा…
जिसकी हँसी सुनकर लगता था जैसे घर में चिड़ियाँ चहक रही हों।
सात साल पहले जब रेशमा की शादी आसिफ से हुई थी,
आसिफ भी उसे बेपनाह मोहब्बत करता था।
निकाह के वक़्त दोनों ने साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं।
छोटा सा मगर खुशहाल संसार था उनका।
उन्हें क्या पता था
कि उनकी मोहब्बत की सबसे बड़ी परीक्षा
औलाद की ख़ामोशी बनकर आएगी…


रेशमा ने सूखे होंठों को मुश्किल से खोला और बहुत धीमी आवाज़ में कहा —
“मुझे… एक बार शक्ल दिखा दो मेरे बच्चे की…
मेरे शरीर के टुकड़े की…”
उसकी आवाज़ इतनी टूटी हुई थी
कि कमरे में खड़े हर इंसान का सिर झुक गया।
सिस्टर ने एक पल डॉक्टर की तरफ देखा।
डॉक्टर ने भारी आँखों से धीरे से हामी भर दी।
कुछ क्षण बाद
सफेद कपड़े में लिपटा एक छोटा सा जिस्म
रेशमा की झोली में रख दिया गया।
मानो खुदा का कोई मासूम फ़रिश्ता
थोड़ी देर के लिए ज़मीन पर उतरा हो।
रेशमा के काँपते हाथ उस कपड़े को ऐसे सहला रहे थे
जैसे छूने भर से बच्चा सांस लेने लगेगा।
उसने उसे अपने सीने से कसकर लगा लिया।
उस पल वह माँ थी…
सिर्फ माँ।
ना बदनसीब, ना कर्मजली, ना अधूरी औरत।
बस एक माँ…
जो पहली और आखिरी बार
अपने बच्चे को महसूस कर रही थी।
सिस्टर ने धीरे से बच्चा वापस लेने के लिए हाथ बढ़ाया।
लेकिन जैसे ही वह नन्हा जिस्म रेशमा की बाँहों से दूर होने लगा —
पूरा लेबर रूम उसकी चीखों से काँप उठा।
वह चीख सिर्फ दर्द की नहीं थी…
वह एक माँ के भीतर टूटते हुए संसार की आवाज़ थी।
इतनी गहरी, इतनी असहनीय…
कि शायद उस वक्त
खुदा भी काँप गया होगा।
उसका बच्चा उससे दूर जा रहा था…
हमेशा… हमेशा के लिए।
रेशमा अपने दोनों हाथ हवा में फैलाकर रोती रही,
जैसे अब भी उसे वापस पकड़ लेना चाहती हो।
डॉक्टर ने काँपते हाथों से उसे नींद का इंजेक्शन दिया।
फिर एक औरत होने के नाते
वह उसके सिरहाने खड़ी रही।
धीरे-धीरे उसके माथे पर हाथ फेरती रही…
जब तक रेशमा की सिसकियाँ धीमी होकर
नींद की आगोश में खो नहीं गईं।
.....to be continued