डॉक्टर भारी कदमों से अपने केबिन में आकर कुर्सी पर बैठ गई।
आँखों में अब भी रेशमा की चीखें तैर रही थीं।
उन्होंने गहरी सांस ली और सामने खड़े वार्ड बॉय से कहा —
“रेशमा के पति आसिफ को बुला लाओ…
डिस्चार्ज फॉर्म पर साइन करने हैं।
उसे घर ले जाना होगा।”
वार्ड बॉय चुपचाप बाहर चला गया।
करीब दस मिनट बाद
वह वापस लौटा।
लेकिन इस बार उसके चेहरे पर अजीब सी घबराहट थी।
“मैडम…” उसने हिचकिचाते हुए कहा,
“बाहर… रेशमा के घर से कोई भी नहीं है।”
डॉक्टर ने चौंककर सिर उठाया —
“क्या मतलब?”
“मैडम… उसका पति, सास, नंद…
सब चले गए।”
एक पल के लिए डॉक्टर को लगा
शायद उसने गलत सुना है।
“व्हाट नॉनसेंस?!”
उनकी आवाज़ अचानक ऊँची हो गई।
“अभी कुछ देर पहले तो सब यहीं थे!”
वार्ड बॉय ने धीरे से कहा —
“मैडम… शायद बच्चे के बारे में सुनने के बाद…
सब बिना बताए चले गए।”
कमरे में अचानक एक अजीब सा सन्नाटा फैल गया।
डॉक्टर की उंगलियाँ टेबल पर रखी फाइल पर कस गईं।
उन्हें पहली बार रेशमा के मृत बच्चे से ज्यादा डर
उसके जिंदा भविष्य से लगने लगा था।
बाहर अस्पताल के कॉरिडोर में लोग अब भी आ-जा रहे थे…
लेकिन एक औरत,
जो अभी-अभी माँ बनकर भी खाली रह गई थी,
इस दुनिया में पूरी तरह अकेली छोड़ दी गई थी।
रेशमा की आँख खुली तो कुछ पल उसे समझ ही नहीं आया
कि वह कहाँ है।
फिर अचानक उसकी हथेलियाँ अपने खाली सीने पर चली गईं…
और सब याद आ गया।
उसकी आँखों से चुपचाप आँसू बहने लगे।
कुछ देर बाद उसने धीमे से पूछा —
“आसिफ कहाँ है…?”
डॉक्टर एक पल के लिए ठिठक गई।
सच उनके गले में आकर अटक गया।
उन्होंने झूठ बोल दिया —
“वो बाहर है… तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”
यह सुनते ही
बुरी तरह टूटी हुई रेशमा के चेहरे पर हल्की सी राहत उतर आई।
जैसे डूबते इंसान को कहीं दूर कोई तिनका दिख गया हो।
सरकारी अस्पताल के लिए यह कोई नई बात नहीं थी।
अक्सर दूसरी या तीसरी लड़की पैदा होने पर
घरवाले माँ और नवजात को छोड़कर भाग जाते थे।
फिर पुलिस को बीच में आकर समझाना, धमकाना पड़ता,
तब जाकर वे औरतें अपने ससुराल लौट पाती थीं।
लेकिन इस बार मामला अलग था।
यहाँ बच्चे लड़की नहीं थे…
चारों लड़के थे।
फिर भी रेशमा ठुकरा दी गई थी।
शाम होते-होते पुलिस
आसिफ के घर पहुँच गई।
“नहीं लाना उस कर्मजली कोख वाली को घर!”
सास पुलिस पर गुर्राकर बोली।
“एक वंश तक तो दे नहीं पाई…
सात साल हो गए शादी को।
बस मरे हुए बच्चे पैदा करती है!”
पुलिस वाले ने डंडा ज़मीन पर पटका —
“अम्मा, यह तुम्हारे घर का मामला है।
घर लाकर सुलझाओ।”
“उसके मायके वाले लखनऊ से आने वाले हैं,”
नंद ने नाक-मुँह सिकोड़ते हुए कहा,
“आकर ले जाएँगे उसको।
हम उस मनहूस को घर नहीं लाने वाले।”
कमरे में कुछ पल सन्नाटा रहा।
फिर पुलिस वाले की नजर आसिफ पर गई।
वह सिर झुकाए खड़ा था।
ना आँखों में विरोध,
ना होंठों पर अपनी बीवी के लिए एक शब्द।
जिस आदमी ने कभी रेशमा से
साथ जीने-मरने की कसमें खाई थीं,
वह आज अपनी माँ और बहन के सामने
एक वाक्य तक नहीं बोल पाया।
पिता न बन पाने का दर्द
उसके भीतर के पति पर भारी पड़ चुका था।
आसिफ ने धीमी मगर ठंडी आवाज़ में पुलिस से कहा —
“आप लोग जाइए…
यह हमारा घर का मामला है।”
इतने में दरवाज़े पर हलचल हुई।
सबकी नज़र एक साथ उधर मुड़ गई।
दरवाज़े पर रेशमा खड़ी थी।
....to be continued