Bayaan - Part 12 in Hindi Love Stories by Radha rani Jha books and stories PDF | Bayaan - Part 12

Featured Books
Categories
Share

Bayaan - Part 12

Part 12

डायरी का अगला पन्ना...

डायरी बंद करने का मन ही नहीं कर रहा था। हर पन्ने के साथ ऐसा लग रहा था कि मैं किसी की कहानी नहीं, बल्कि उसकी धड़कनों को पढ़ रही हूँ। पता नहीं क्यों, राधा रानी की हर छोटी-सी खुशी पढ़कर मेरे होंठों पर भी मुस्कान आ जाती थी और उसकी उदासी मेरे मन को भी भारी कर देती थी। मैंने गहरी साँस ली और अगला पन्ना पलट दिया।

"15 अक्टूबर 2025 से पहले की बातें..."

उस दिन के बाद जैसे एक नया सिलसिला शुरू हो गया था।

आनंद का लगभग रोज़ ही अभिन्नव के घर जाना होने लगा। कभी किसी काम के बहाने, तो कभी बिना किसी काम के। कई बार वह खुद ही चला जाता और कई बार मैं ही उसे ज़बरदस्ती भेज देती।

शायद...

मैं अभिन्नव के बारे में सब कुछ जानना चाहती थी।

उनकी पसंद, उनकी आदतें, उनका स्वभाव...

यहाँ तक कि वे हँसते कैसे हैं, गुस्सा कैसे करते हैं और किस बात पर मुस्कुराते हैं।

आनंद जब भी वापस आता, मैं सबसे पहले उसे अलग कमरे में ले जाती और एक ही साँस में ढेर सारे सवाल पूछने लगती।

"आज क्या बातें हुई?"

"उन्होंने क्या कहा?"

"क्या कर रहे थे?"

"क्या पढ़ रहे थे?"

लेकिन हर बार आखिर में मेरा सबसे ज़रूरी सवाल एक ही होता था...

"क्या आज उन्होंने मेरे बारे में पूछा?"

और हर बार आनंद मुस्कुराते हुए सिर हिलाकर कह देता—

"नहीं..."

उसका "नहीं" सुनकर मैं मुस्कुरा तो देती, लेकिन अंदर कहीं न कहीं थोड़ा-सा मन उदास हो जाता।

फिर भी अगले दिन वही उम्मीद लेकर मैं फिर आनंद का इंतज़ार करती।

धीरे-धीरे मुझे लगने लगा था कि मैं अभिन्नव को समझने लगी हूँ।

मुझे लगता था कि वह बहुत शांत स्वभाव के हैं।

बहुत शर्मीले हैं।

सिर्फ़ पढ़ाई में ध्यान देने वाले लड़के हैं।

और दुनिया की किसी बात से उन्हें कोई मतलब नहीं।

लेकिन...

असलियत मेरी सोच से बिल्कुल अलग थी।

आनंद रोज़-रोज़ उनसे बातें करके नई-नई बातें बताता था।

तब पता चला कि अभिन्नव पढ़ाकू बिल्कुल नहीं थे।

हाँ...

टॉपर ज़रूर थे।

वो घंटों किताब लेकर बैठने वालों में से नहीं थे।

कम पढ़कर भी हर परीक्षा में सबसे आगे निकल जाते थे।

और जहाँ तक उनकी शांति की बात थी...

वह भी मेरा भ्रम निकला।

आनंद ने एक दिन हँसते हुए बताया—

"दीदी, वो बहुत गुस्से वाले हैं। जब उन्हें गुस्सा आता है न, तब कोई भी उनके सामने बोलने की हिम्मत नहीं करता।"

मैंने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा।

मुझे यकीन ही नहीं हुआ।

जिस लड़के को मैं इतना शांत समझती थी...

वह इतना गुस्सैल भी हो सकता है?

फिर एक दिन आनंद ने एक और राज़ खोल दिया।

"और हाँ दीदी... वो शर्माते भी नहीं हैं।"

"कितनी लड़कियों का उन पर क्रश रह चुका है।"

"बस देखने में भोले लगते हैं।"

मैं कुछ पल के लिए चुप रह गई।

मेरी बनाई हुई अभिन्नव की तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी थी।

लेकिन अजीब बात यह थी कि...

उन्हें जानने के बाद भी मेरे मन में उनके लिए जो एहसास था...

वह ज़रा भी कम नहीं हुआ।

शायद...

अब मैं उन्हें पसंद नहीं, बल्कि समझने लगी थी।

इसी बीच मेरी एक और आदत बन गई।

अभिन्नव के घर के ठीक बगल में मेरी सहेली आयुषी का घर था।

अब मैं ट्यूशन से लौटते ही शाम को सीधे आयुषी के घर चली जाती।

हम दोनों उसकी छत पर बैठते।

लेकिन सच कहूँ...

मैं वहाँ आयुषी से मिलने कम और किसी और को देखने ज़्यादा जाती थी।

क्योंकि लगभग हर शाम अभिन्नव अपनी छत पर आते थे।

कभी टहलते।

कभी फोन चलाते।

कभी आसमान देखते।

और मैं...

दूर खड़ी बस उन्हें देखती रहती।

उन्होंने शायद कभी मेरी तरफ़ ध्यान भी नहीं दिया होगा।

लेकिन मेरी शामें अब उन्हीं को देखकर पूरी होने लगी थीं।

देखते ही देखते पाँच महीने बीत गए।

अब अक्टूबर का महीना चल रहा था।

14 अक्टूबर 2025

उस दिन आनंद फिर अभिन्नव के घर गया था।

मैं पूरे दिन उसके लौटने का इंतज़ार करती रही।

जैसे ही वह घर आया...

मैं बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़कर दूसरे कमरे में ले गई।

दरवाज़ा बंद किया और हमेशा की तरह पूछा—

"बताओ... आज क्या-क्या बातें हुईं?"

और फिर...

वही सवाल।

"क्या आज उन्होंने मेरे बारे में पूछा?"

इस बार आनंद कुछ पल तक मुझे देखता रहा।

फिर मुस्कुराकर बोला—

"आज तो पूरे समय तेरे बारे में ही बात हुई।"

मेरे कानों को जैसे विश्वास ही नहीं हुआ।

मैं बिल्कुल चुप रह गई।

दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसकी आवाज़ मुझे साफ़ सुनाई दे रही थी।

तभी आनंद ने अपना फोन मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये उनका नंबर है।"

मैंने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा।

फिर उसने व्हाट्सऐप पर अभिन्नव की फोटो भी भेज दी।

जिसे देखने की इच्छा मैं जाने कब से अपने मन में छिपाए बैठी थी।

फोटो देखकर मैं मुस्कुरा तो रही थी...

लेकिन अगले ही पल उसे डाँटने लगी।

"पागल है क्या?"

"उनका नंबर लाकर मैं क्या करूँगी?"

"अगर किसी को पता चल गया तो?"

आनंद मेरी डाँट सुनकर हँस पड़ा।

फिर उसने जो कहा...

उसे सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई।

"दीदी... मैंने उन्हें बता दिया कि तू उन्हें पसंद करती है।"

मेरे चेहरे का रंग उड़ गया।

"क्या...? तू पागल हो गया है?"

मैंने उसे मारने के लिए हाथ उठाया।

लेकिन उसने तुरंत मेरा हाथ पकड़ लिया।

"रुक... पहले पूरी बात सुन।"

मैं डरते-डरते बोली—

"फिर... उन्होंने क्या कहा?"

आनंद मुस्कुराया।

"उन्होंने कहा— किस तरह पसंद करती है?"

"मैंने कहा— उन्हें बस आपको देखना अच्छा लगता है।"

"तब वो मुस्कुराए और बोले..."

"ठीक है... मैं भी उसे पसंद करता हूँ।"

बस...

इतना सुनना था कि मुझे लगा जैसे समय वहीं रुक गया हो।

उस रात मेरी आँखों में नींद नहीं थी।

सिर्फ़ सपने थे।

मैं बार-बार उनकी फोटो देखती रही।

बार-बार उनकी वही बात याद करती रही।

मुझे लग रहा था जैसे भगवान ने मेरी हर दुआ सुन ली हो।

जैसे मेरी ज़िंदगी अब किसी खूबसूरत कहानी की शुरुआत करने वाली हो।

लेकिन...

डायरी के अगले पन्ने पर आख़िरी पंक्तियाँ पढ़ते ही मेरे हाथ काँप गए।

उसमें लिखा था—

"15 अक्टूबर 2025..."

"जिस दिन मुझे अपनी पसंद पर सबसे ज़्यादा रोना पड़ा..."

"और उसी दिन मैंने फैसला कर लिया था कि अब अभिन्नव को हमेशा-हमेशा के लिए अपने दिल से निकाल दूँगी..."

लेकिन आखिर अगले ही दिन ऐसा क्या हुआ था... जिसने राधा को यह फैसला लेने पर मजबूर कर दिया?

जारी रहेगा... ✍️📖