aashad puja in Hindi Fiction Stories by राज बोहरे books and stories PDF | आषाढ़ पूजा

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आषाढ़ पूजा

कहानी- आषाढ़ पूजा

'सुनो दिव्या आज हम सब माता वाली टेकरी पर चल रहे हैं। अपने गांव के लोग आज आषाढ़ी पूजा कर रहे हैं। सो आज दिन भर हम सब वहीं रहेंगे, मिलजुल कर खाना बनाएंगे और भोग लगाकर सारे गांव के लोग माता की पूजा में नाचते गाते हुए एक दूसरे को भोजन बांट कर खाएंगे।' मां ने दिव्या को बड़े भोर ही तैयार होने का निर्देश दे दिया।

      विभांशु और दिव्या तो मां की बात सुनकर बहुत खुश हो गए, क्योंकि वे गांव में पहली बार बच्चों को लेकर आए थे। उनके जुड़वा बेटे टोनी और मोनू  अब तक गांव को अलग नजर से देखते थे , कॉन्वेंट में पढ़ने, शहर की हाई सोसाइटी में रहने और वहां एक दूसरे के स्कूल बैग, शो, वॉटर बॉटल तथा वेकेशन में हिल्स पर जाने के प्रोग्राम की अवधि, दूरी और वहाँ के संस्मरण में ही एक दूसरे से खुद को श्रेष्ठ करने के वातावरण में पल रहे थे। वहीं उनकी दुनिया थी और वहीं पर सब कुछ समझते थे। गाय के गोबर को गाय की पोटी कहते हुए कण्डो को नाक सिकोड़ कर देखते थे।

 दिव्या और विभांशु ने मुस्काते हुए एक दूसरे को देखा। दिव्या बोली 'सुनो जी यह तो माता का वरदान मिल गया हमारे पापा भी बताते हैं कि जब गांव जाते थे तो आषाढ़ी पूजा देते थे '

 देवांशु बोला 'हां मैं तो नौकरी लगने के पहले तक ध्यान से गांव आता था और इस आषाढी पूजा में शामिल होता था!"

टोनी और मोनू तब तक जाग कर बैठक में ही आ गए थे । दोनों ने जिज्ञासा के भाव से पूछा 'मां यह आषाढ़ी  पूजा क्या होती है?'

 दिव्या बोली 'गांव वाले सब लोग वर्ष में एक दो बार अपने गांव के प्रमुख देवता को मनाने, उनकी पूजा करने के लिए इकट्ठा होते हैं इस वक्त हमारे भारतीय बारहमासी मौसम के हिसाब से आषाढ़ का महीना चल रहा है , इस आषाढ़ के महीने में गाँव के लोग देवी पूजा को महत्व देते हैं।'

' देवी पूजा और आषाढी पूजा आप तो दो नाम ले रही हैं?'टोनी ने पूछा।

 दिव्या मुस्कराई । बोली' क्योंकि यह आषाढ़ के मौसम में की जा रही है तो यह  आषाढी पूजा कहलाती है और पूजन देवी की होगी, इसलिए देवी पूजा नाम हुआ। हमारे गांव की कुलदेवी व ग्राम देवी उस मन्दिर में बैठी है न जो हमको शहर से आते समय रास्ते में ऊंचे पहाड़ी पर दिखता है '

 मोनू बोल 'तो यह तो एक तरह की पिकनिक ही हुई।'

 विभांशु मुस्कुराया 'हां यह हम ग्रामीण लोगों की पिकनिक ही हुई। सब लोग अपने-अपने घर से खाना लेकर जाते हैं बल्कि कच्चा खाना लेकर जाते हैं -आटा, दाल, चावल, घी, गुड!  सब वहां मिल जुल कर खाना बनाते हैं। वहीं लकड़ी कंडा बीनते हैं , अलाव पर वहीं खाना बनता है।'

'क्या खाना?' मोनू ने पूछा।

' दाल बाटी और बाटीयों को पिस कूटकर गुड़ मिला के बनाया गया चूरमा।' दिव्या बोली ।

'हां लेकिन सब लोग दाल के साथ बाटी नहीं बनाते,  कुछ लोग  खूब मोटी रोटियां  कंडों पर सेक लेते हैं।'

 मां भी वहां आ गई थी वह बोली 'अरे बच्चों को अधूरा क्यों बताते हो? सुनो बच्चों, कुछ लोग पूरी सीरा भी तो बनाते हैं।'

'सीरा ?' टोनी ने पूछा फर दोनों बच्चों ने चकित होकर दादी की तरफ जिज्ञासा से देखा। दादी मुस्कुराई बोली 'इसके लिए पहले पूरी बनाते हैं और  उन पुरियों में से ऐसी पूरी मोटी औऱ थोड़ी कच्ची जैसी हो, उनके हाथों से छोटे-छोटे टुकड़े करके एक थाली में रख लेते हैं । फिर एक कराही में गुड़ का पानी डालकर उबाल के पूड़ी मिलाते हैं, जिसका एक गाड़ा सा मीठा लेप बनता है। जो खाने में बड़ा स्वादिष्ट होता है। इसमें पुरी के घी की महक और गुड़ का स्वाद होता है। इसी को सीरा कहते हैं।'

 बच्चों को अब इस आषाढ़ी  पूजा की तरफ आकर्षण बढ़ गया था, उंन्हे बातों में मज़ा आने लगा था।

 सुबह के दस बजते-बजते सब लोग अपने घरों से निकल पड़े थे। अधिकांश लोग झोले-थैले और पोटलियों में समान लिए थे। दिव्यांश ने शहर से ले एक बड़े से बैग को खाली कर लिया था और उसमें मां द्वारा किचन में पवित्र करके रखे गए सारे राशन पानी आता दाल चावल गुड़ को रख लिया था यह बागवे कंधे पर रखे थे पता लगा पहाड़ी पर ना लग गया है नीचे नलकूप में एक मोटर बैठा दी गई है और इस बिजली की मोटर को चलकर पानी पंप करके पाइप के सहारे ऊपर देवी मंदिर तक पहुंचा जाने लगा है।

 वे सब लोग आहिस्ता आहिस्ता चलते हुए ऊपर टेकरी की तरफ बढ़ने लगे ।

गांव वालों ने मिलकर टेकरी पर ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां भी बनवा दी थी जबकि पुरुष लोग उसे सीधे पगडंडी से ऊपर जा रहे थे । जो जाने कितने दिन पुरानी थी और ऊबड़ खाबड़  होने से उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने में अलग मजा देती थी।

 वे लोग पहाड़ी पर जब पहुंचे तब 11:00 बज रहे थे।

 सबसे पहले मन्दिर के चबूतरे पर सब लोग बैठ गए तो मन्दिर के वृद्ध पुजारी मानकराम महाराज ने कहा कि 'चलो घर से लाए हुए खाने का देवी को भोग लगाओ और पहले बच्चों को कलेऊ करा के सब लोग पूजा का खाना बनाना शुरू करें ।'

फिर क्या था घर-घर से आई पोटलिया खुली । कोई मीठे पुए बना लाया था, किसी की पोटली में पकौड़ी थी। मंदिर के पुजारी ने बड़े-बड़े थाल निकाल कर रख दिए। भोग लगा लगाकर घर-घर से आया गया सामान थालों में पलट दिया गया।

 पुजारी जी ने इशारा किया तो सब लोग उन थालों में से प्रसाद पाने के लिए सिमट आए।

 पुजारी जी ने बड़े-बड़े दोने उठाये और एक दोने में मालपुआ का टुकड़ा, पुरी का टुकड़ा , पकौड़ी का टुकड़ा या जलेबी का टुकड़ा लेकर रखके बच्चों को बांटना शुरू कर दिया।

 दिव्या टोनी को बता रही थी ' गोष्ट जैसी इस आषाढ़ी पूजा में सब एक दूसरे का खाना अपना ही समझते हैं ।'

बच्चों को प्रसाद बंट गया तो फिर बड़ों को बांटा जाने लगा।

 सब ने प्रसाद के दोने ले लिए तो जिसको जहां जगह मिली वहीं बैठकर खाने लगा ।

खाने के बाद बच्चे तो पहाड़ी पर  चारों तरफ उगी झाड़ियां में सूखी लकड़ियों  और गाय भैंस के सूखे पड़े गोबर के कंडे बीनने निकल गए जबकि महिलाएं आटा गूथने और दूसरे कामों में लग गई।

 कुछ ही देर में लकड़ी  कंडे

 का ढेर मंदिर के आंगन में इकट्ठा हो गया था।

 मंदिर देवी का था आसपास हनुमान जी और शिव जी के चबूतरे भी थे  । सामने  छोटा सा मैदान था जिसमें सब लोग बिखर के बेठे हुए थे।  लकड़ी  कंडे  के ढेर में से अलग-अलग छोटे-छोटे अलाव बनाए जाने लगे।

 दिव्या ने मोनू टोन को समझाया 'आषाढ़ पूजा में मोटे अनाज,गांव की मोटी  सब्जियों और लकड़ी कंडा  से ही खाना बनाया जाता है।' 'मोटे अनाज यानी क्या हुआ मम्मी' दिव्या मुस्कराई 'मोटे अनाज यानी यानी  ज्वार, मक्का बाजरा और चना,मसूर जैसा अनाज इसे मोटा कहा जाता है ।:

दोनों ने कुछ नहीं समझा। टोनी  बोला 'ऐसा क्यों ?'

विभांशु ने कहा 'ऐसा इसलिए कि जिन दिनों यह आषाढी पूजा आरंभ हुई थी, तब शायद हमारे देश में गेहूं नहीं आया था। ना कोई इस तरह बारीक आटा पीसा जाता होगा और तो और सब्जियां भी गांव में ही उगने वाली होंगी जैसे तोरई, लौकी, बैगन और तरह-तरह की भाजियाँ  इसमें शामिल की जाती हैं।'

 मोनू बोला ' ठीक वैसी ही जैसी ही दीपावली के दूसरे दिन जब हम अन्नकूट यानी गोवर्धन पूजा करते हैं और बाजार में आई हर तरह की नई सब्जी लाकर काटकर ठाकुर जी को चढ़ा देते हैं!'

 दादी ने यह बात सुनी तो बड़ी खुश हुई ' वाह बच्चों, तुम्हे हमारी संस्कृति की जानकारी है। तुम लोगों को अन्नकूट की गोवर्धन पूजा ठीक याद आई। बिल्कुल वैसी ही होती है गांव की देवी की  आषाढ़ी पूजा। लेकिन गोवर्धन पूजा-घर के लोग अलग-अलग अपने-अपने घरों में करते हैं, जबकि आषाढी पूजा गांव भर के लोग मिलजुल कर करते हैं।कितने लोग यहां आए हैं काउंट करो ?'

टोनी ने यहां वहां जाकर किसी को नमस्ते कर, किसी के पाँव छू कर हलो हाय किया  और 5 मिनट के भीतर आकर बोला 'पापा लगभग 100 लोग होंगे!'

 दिव्या ने बताया 'यह वे लोग हैं जो स्थाई रूप से गांव में रहते हैं! इन सबके परिवार के अनेक लोग शहर में जाकर रहने लगे हैं और वे आषाढ़ पूजा के वक्त गांव नहीं आ पाए हैं । इसलिए जो आज यहां हैँ वे ही इस आषाढ़ पूजा में सम्मिलित हो जाते हैं। यह हमारी हजारों साल पुरानी परंपरा है।'

वे लोग   बात ही कर रहे थे कि उनके पास में एक बूढ़े अंकल पड़ोसी आए तो सब ने हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया और बच्चों ने चुपचाप बड़ों की ओर देखा। दादी ने इशारा किया तो मोनू टोनी ने उन पड़ोसी दादू को पाँव छू कर प्रणाम किया ।

कुछ देर जगह-जगह सुलग रहे छोटे-छोटे अलाव में गांव का पारंपरिक भोजन जैसे दाल बाटी या दाल टिक्कर अथवा दादी ने जैसा बताया था पूरी सीरा  जैसे व्यंजन बन रहे थे।

 तभी सब चौके मंदिर के भीतर से पुजारी जी एक झोला उठा लाए थे।

 फिर सबको चौंकाते हुए उन्होंने बच्चों से कहा था 'आओ तुम बच्चा लोग, तुम्हारे मतलब की चीज मैं कल शहर से ले आया हूं!'

 सचमुच झोले में से उन सबके मतलब की चीज थी । जिनमें थी 'रेडी टू ईट नूडल्स'  'जैम लगे कटलेट'  बेकरी के बिस्कुट और जैम के पाउच! सब बच्चे अपने रुचि अनुसार चीज लेने लगे 

पुजारी जी ने फिर दोने उठाये और पूछ पूछ कर जिसको जो अच्छा लग रहा था दोने में रखकर देने लगए।

 कुछ ही देर में वहां एक तरफ पारंपरिक भोजन दाल बाटी, टिक्कर- रायता और पूरी -सीरा बन रहा था तो दूसरी तरफ आधुनिक खान की आदत वाले बच्चे फास्ट फूड और पश्चिमी व्यंजन खा रहे थे ,एक अजीब संतुलन रोचक संतुलन वहां दिखाई दे रहा था।

 तब जब लगभग भोजन बन चुका था । दोपहर के तो बज रहे थे कि दिव्या ने कहा 'सुनो सब लोग  क्यों ना हम अपने घर के बच्चों से कहें कि वे भी हमारे गांव की महिलाओं की तरह माता के सम्मान में  आषाढ़ पूजा पर अपने-अपने  नृत्य प्रस्तुत करें ।'

यह बात  दिव्यांशु को जच गई उसने पुजारी जी से बात की तो पुजारी जी उठकर खड़े हो गए और सब लोग सुने इतनी ऊंची आवाज में वे बोल पड़े 'मेरे गांव के प्यारे भाइयों मेरी बात सुनो आज संयोग से इस आषाढ़ पूजा में दिव्यांशु अपने बच्चों के साथ आए हैं , तो उधर आकलंक भी अपनी बेटी को ले आए हैं ।'

तब तक रामलाल बोले 'मेरे भी नाती नातिन  शहर से आए हैं, वे भी बस 5 मिनट में यहां पहुंचने वाले होंगे।'

 यह सुनकर सब खुश हो गए।

 10 मिनट के भीतर ही जो लोग गांव से आने वाले थे वह आ पहुंचे ।

 सब ने पाया कि मंदिर के चौथे पर 12- 13 साल के कुछ बच्चे और दो तो लगभग कॉलेज में पढ़ने वाले युवक युवती मंदिर के चबूतरे पर खड़े नजर आ रहे थे।

 पुजारी जी फिर खड़े हुए और बोले 'आप लोग इस बार बस केवल देवी की आरती में नाचेंगे, क्योंकि आप लोग सैकड़ो वर्षों से देवी पूजा में अपनी खुशी नृत्य करके जाहिर करती रही हैं, तो बस एक भजन बजेग और आप माता बहनें नाच लेना। फिर यहां होगा सांस्कृतिक समारोह इसमें हमारे गांव के यह लाडले बच्चे जो शहर में रह रहे हैं अपना सांस्कृतिक कार्यक्रम अपने तरीके से प्रस्तुत करेंगे ।'

मोनू ने देखा शहर से आए किंशुक  भैया ने पुजारी जी की जगह खड़े होकर कहा 'हां तो अब शुरू होता है भजन प्लीज चाचा आंटी ताई दादी आप लोग आए और माता जी के प्रार्थना में स्थिति में अपना नृत्य प्रस्तुत करें '

गांव की तमाम स्त्रियां अपना काम छोड़ चबूतरे पर चढ़ गई ।

पुजारी जी ने अपना टेप शुरू किया वहां भजन घूमने लगा और हर महिला अपने-अपने अंदाज में माता की स्तुति करते उसे जीत के साथ नाचने लगी ।

मोनू दोनों को अचरज हुआ कि उसकी मम्मी जो अपने सोसाइटी में फिल्मी गीतों पर अलग-अलग अंदाज में नृत्य करती थी ,यहां दूसरी महिलाओं को देखकर ठुमके लगा रही थी और कभी नीचा सिर कर झुकती हुई गोल-गोल घूमती ताली बजाकर माता को प्रणाम करती हुई, अलग अंदाज में नाच रही थी। कुल 5-7 मिनट का महिलाओं का समूह नृत्य हुआ। इसके बाद किंतु भैया ने कहा 'अब बारी है लड़कों की लड़के एक नृत्य करेंगे । '

किंशुक ने पुजारी जी को इशारा किया तो गीत गूंजने लगा और लड़के चमकते हुए मंच पर खड़े हो गए । वहां सब लोग अपने-अपने तरीके से स्टेप लेने लगे।

 दूसरे नृत्य की बारीबलड़कियों की थी और तीसरा गीत बजते बजते दोनों युवक किन-शक और निर्झर तथा गांव के सारे किशोर उम्र के बच्चे पूजा पर नृत्य कर रहे थे।

 गांव के लोग प्रसन्न भाव से देख रहे थे। जब नृत्य  समाप्त हो गया तो पुजारी जी ने बताया कि आप सबका परिचय करों की 'अशोक मेरा नाती है बेटे का बेटा है। कॉलेज की परियोजना में बच्चों ने पार्षद तकनीक अपनाई थी लेकिन टीम भावना और सहयोग की भारतीय परंपरा नहीं छोड़ी थी इसलिए इसे यूनिवर्सिटी के स्तर पर बड़ा पुरस्कार मिला है।'

 गांव के सब लोगों ने तालियां बजाई और छोटे बच्चों ने किनसुक भैया के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया ।

 

अब तक महिलाओं ने अलाब जलाने के लिए सुलगाय गए कंडे की ठंडी पड़ी राख उठाकर टेकरी के पीछे फेंक दी थी और अलाव की जगह झाड़ू भी लगा दी थी ।

तब लगभग 3:30 बज चुके थे जब सब लोग मंदिर के कैंपस में पहले छोटे से मैदान में पंक्तिबद्ध होकर बैठ गई थी जमीन पर बैठे सब लोगों के सामने शव लेकर पत्तों से बनी पतले और दोने परस दिए गए थे

फिर क्या था गांव भर की महिलाओं द्वारा तैयार किए गए भोजन (बल्कि यूँ कहें अब भोग लगाने के बाद बन चुके प्रसाद) को सब पत्तलों में परसा जाने लगा।

 एक अलग ही प्रकार का स्वाद, अलग ही प्रकार का आनंद और अलग ही प्रकार का बफे सिस्टम का खाना वहां दिखाई दे रहा था।

 शाम होते-होते जब मोनू और टोनी  घर लौटे तो खूब चहक रहे थे ।

विभांशु ने कहा 'तुम लोग आज थक गए होंगे।'

 मोनू बोल 'पापा ऐसी थकान रोज हो तो हम हर बार गांव आने को तैयार हैं ।'

टोनी बोला 'यह असर पूजा हमें हमेशा याद रहेगी ।'

मोनू ने कहा 'इसलिए भी याद रहेगी कि हम अपने स्कूल में सबको यह फनी और फैंटास्टिक पिकनिक का बड़ा डिटेल बताएंगे।'

 टोनी बोला 'मैं तो इस पर एक ऐसे भी लिखूंगा।'

 लगभग यही बात दिव्या सो रही थी कि समिति की आधुनिक स्त्रियों के बीच में इस बार अपने गांव की असर पूजा का साक्षात विवरण बताएगी जो संयोग से उसने पहली बार देखा, जबकि वह 15 साल पहले इस गांव में रहकर आ चुकी थी।

 उधर पुजारी पंडित हरदेव प्रसाद बड़े प्रफुल्ल भाव से हर घर के सामने से गुजरते हुए सबके पहुंच जाने की सूचना प्राप्त कर रहे थे । क्योंकि आखिर टेकरी पर बुलाना और वहां से सुरक्षित सबका लौट आना वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते थे।

 देर रात जब गांव के मंदिर की शंकर झालर बजाकर आरती हो गई,तब घरों में भोजन के नाम पर हल्का दलिया खाया गया और सब सो गए । अगले दिन शहर जाने वालों को वापस जाना था तो स्त्रियां बैग अटैची में कपड़े जमाते हुए अपनी तैयारी कर रही थी ।