ऋगुवेद सूक्ति--(२७) की व्याख्या मन्त्र —“मा प्रगाम पथोवयम्” ऋग्वेद_ १०.५७.१भावार्थ --हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।पदच्छेदमा — नहींप्रगाम — आगे बढ़ें / जाएँपथः — मार्ग सेवयम् — हमभावार्थ--“हम (सत्य) मार्ग से विचलित न हों।”यहाँ “पथः” का अर्थ सामान्य मार्ग नहीं, बल्कि ऋत, धर्म और सत्य का मार्ग है — वही जिसे वैदिक परम्परा में वेदमार्ग कहा गया है।दार्शनिक अर्थ--यह मन्त्र एक प्रार्थना है —हम अधर्म, अज्ञान या विपरीत आचरण की ओर न जाएँ।हम सत्य, ऋत और देवमार्ग पर स्थिर रहें।हमारा जीवन वेद-विहित मर्यादा से पृथक न हो।ऋग्वेद मन्त्र--मा प्र गाम पथो वयम् मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः।मा नो अर्वाग् रीरिषो मा परा दाः॥(पाठभेदों में शब्दों का थोड़ा अन्तर मिलता है।)शब्दार्थमा = मत / नहींप्र गाम = दूर जाएँ, विचलित होंपथः = मार्ग सेवयम् = हममा यज्ञात् = यज्ञमय कर्तव्य से नहींइन्द्र सोमिनः = हे सोमपान करने वाले इन्द्र!मा नः = हमें मतअर्वाक् रीरिषः = क्षति पहुँचाओ / पतित होने दोमा परा दाः = हमें दूर मत करोभावार्थहे इन्द्र! हम सत्य और धर्म के मार्ग से विचलित न हों। हम यज्ञरूप कर्तव्य और सदाचार से दूर न जाएँ। आप हमें पतन, हानि और अधर्म से बचाएँ तथा अपने संरक्षण से वंचित न करें।गूढ़ अर्थयह मन्त्र मनुष्य की आध्यात्मिक प्रार्थना है कि—वह धर्ममार्ग पर स्थिर रहे,कर्तव्य और यज्ञभावना न छोड़े,तथा ईश्वरीय संरक्षण से दूर न हो।यहाँ “यज्ञ” का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि—परोपकार, कर्तव्यपालन और लोकमंगल की भावना भी है।वंदों में प्रमाण--१. ऋग्वेद १.१८९.१अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।युयोध्यस्मज्जुहुराणम् एनःभूयिष्ठां ते नमउक्तिं विदेम ॥भावार्थ —हे अग्ने! आप हमें शुभ (सत्य) मार्ग से ले चलें। हमारे पापों को दूर करें और हमें धर्ममार्ग पर स्थापित करें। यहाँ “सुपथा” (श्रेष्ठ मार्ग) से चलाने की प्रार्थना है।२. यजुर्वेद ४०.८ (ईशावास्योपनिषद् मन्त्र ८)स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्...(अर्थ-संदर्भ में)भावार्थ — परमात्मा शुद्ध, निष्पाप और सर्वव्यापक है; उसका मार्ग भी शुद्ध है। मनुष्य को उसी शुद्ध मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।३. अथर्ववेद १२.१.१सत्यं बृहद् ऋतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।भावार्थ —सत्य, ऋत (धर्म), तप और यज्ञ — ये ही पृथ्वी को धारण करते हैं। अर्थात् संसार की स्थिरता धर्ममार्ग पर निर्भर है।४. सामवेद (ऋग्वैदिक मन्त्र १.१८९.१ का सामरूप)सामवेद में भी वही प्रार्थना दोहराई गई है —“अग्ने नय सुपथा...” यह दर्शाता है कि वेदमार्ग पर स्थिर रहने की भावना समस्त वेदों में समान है।५. ऋग्वेद ५.५१.१५ऋतस्य पन्थां न तरन्ति दुष्कृतः।भावार्थ —दुष्कर्मी लोग ऋत (सत्य) के मार्ग को पार नहीं कर सकते। उपनिषदों में प्रमाण --१. कठोपनिषद् १.२.२ऋषि प्रेयश्च मनुष्यमेतः इक,तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।श्रेयो हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीतेप्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥भावार्थ —मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याण का मार्ग) और प्रेय (इन्द्रिय-सुख का मार्ग) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय मार्ग को चुनता है, जबकि मूर्ख प्रेय को अपनाता है। यहाँ स्पष्ट है कि साधक को श्रेष्ठ मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए।२. मुण्डकोपनिषद् ३.१.६सत्येन पन्था विततो देवयानःयेनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामाः।भावार्थ —सत्य का ही मार्ग देवयान (मोक्षमार्ग) के रूप में विस्तृत है, जिस पर चलकर ऋषि परम अवस्था को प्राप्त होते हैं। यहाँ “सत्य-पन्था” ही मुक्ति का मार्ग कहा गया है।३. बृहदारण्यकोपनिषद् १.३.२८असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्मा अमृतं गमय॥भावार्थ —हे प्रभो! हमें असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें। यह भी धर्ममार्ग से न भटकने की ही प्रार्थना है।४. तैत्तिरीयोपनिषद् १.११.१सत्यं वद। धर्मं चर।भावार्थ —सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। यह स्पष्ट निर्देश है कि जीवन धर्ममार्ग पर ही स्थापित रहे।५. छान्दोग्योपनिषद् ७.१६.१सत्यं हि एव जयते नानृतम्।भावार्थ —सत्य ही विजय प्राप्त करता है, असत्य नहीं। सत्य-पथ ही स्थायी और विजयी मार्ग है।६. श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.२३यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥भावार्थ —जिस साधक की परमात्मा तथा गुरु में परम भक्ति होती है, उसी के लिए उपनिषदों के सत्यार्थ प्रकाशित होते हैं। अर्थात् श्रद्धा और गुरु-मार्ग का अनुसरण ही सही मार्ग पर स्थिर रखता है।७- महानारायण उपनिषद् ७८.१२ (पाठभेदानुसार)ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि।भावार्थ —मैं ऋत (धर्म) का वचन कहूँगा, सत्य का ही आचरण करूँगा। यह सत्य-पथ पर दृढ़ रहने का संकल्प है।८. कैवल्योपनिषद् ३न कर्मणा न प्रजया धनेनत्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।भावार्थ —न कर्म, न संतान, न धन — केवल त्याग के द्वारा ही अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्त होता है। यहाँ स्पष्ट है कि सांसारिक प्रेय मार्ग से हटकर त्याग और आत्मज्ञान का मार्ग अपनाना चाहिए।९. प्रश्नोपनिषद् १.१०तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया च।भावार्थ —तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या के द्वारा ही परम सत्य की प्राप्ति होती है। यह अनुशासित साधना-पथ से विचलित न होने की शिक्षा है।१०. मैत्रायणी उपनिषद् ६.३०मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।भावार्थ —मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है। यदि मन धर्ममार्ग पर स्थिर है तो मोक्ष, अन्यथा पतन।सार--इन उपनिषदों में यह सिद्ध होता है कि —सत्य, ऋत और धर्म का मार्ग ही श्रेयस्कर है।गुरु-भक्ति, त्याग, तप और श्रद्धा से साधक मार्ग पर स्थिर रहता है।मन को संयमित कर धर्ममार्ग से विचलित न होना ही मोक्ष का साधन है।पुराणों में प्रमाण--१. विष्णु पुराण-- ३.१२.४५धर्मेण पापमपनुदति धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥भावार्थ —धर्म से पाप दूर होता है; धर्म की रक्षा करने पर वही धर्म हमारी रक्षा करता है।इसलिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि धर्म का नाश हमें ही नष्ट कर दे। यहाँ स्पष्ट निर्देश है कि धर्ममार्ग से विचलित न हों।२. भागवत पुराण- १.२.६स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।अहैतुकीऽप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥भावार्थ —मनुष्यों का परम धर्म वही है जिससे भगवान् में निष्काम और अखण्ड भक्ति उत्पन्न हो। धर्म का सही मार्ग ही आत्मशान्ति और कल्याण देता है।३. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड)धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।भावार्थ —धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; धर्म की रक्षा करने वाला धर्म से ही संरक्षित होता है। धर्ममार्ग से विचलन विनाश का कारण है।४. शिव पुराण (विद्येश्वरसंहिता)सत्यं शिवं सुन्दरम्।भावार्थ —सत्य ही शिव (कल्याण) है और वही सुन्दर है। सत्य-पथ ही शिवत्व (कल्याण) का मार्ग है।५. मार्कण्डेय पुराण--नास्ति धर्मात्परं नाथ सत्यं धर्मस्य लक्षणम्।भावार्थ —धर्म से बढ़कर कुछ नहीं है; सत्य ही धर्म का लक्षण है। सत्य और भक्ति का मार्ग ही श्रेष्ठ है।धर्म से विचलित होना पतन का कारण है।६. अग्नि पुराण--धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।भावार्थ —जो मनुष्य धर्म से रहित है, वह पशु के समान है। अर्थात् धर्ममार्ग का त्याग मनुष्यत्व का पतन है।७. स्कन्द पुराण--सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥भावार्थ —सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न कहो; और प्रिय असत्य भी न कहो — यही सनातन धर्म है। यह धर्ममार्ग पर संयमित आचरण का निर्देश है।८. लिङ्ग पुराण--धर्मो मूलं जगत्सर्वं धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।भावार्थ —यह सम्पूर्ण जगत् धर्म पर आधारित है; सब कुछ धर्म में ही स्थित है। धर्म ही जीवन और जगत् का आधार है।९. ब्रह्मवैवर्त पुराण--सत्यं परं धर्मः।भावार्थ —सत्य ही परम धर्म है। सत्य-पथ ही सर्वोच्च आचरण है।१०. नारद पुराण--धर्ममार्गे स्थितो नित्यं न च्यवेत कदाचन।भावार्थ —मनुष्य को सदा धर्ममार्ग में स्थित रहना चाहिए, कभी उससे च्युत न हो। यह सीधे-सीधे वेदभाव “मा प्रगाम पथो वयम्” की ही पुनरुक्ति है।सार--इन पुराणों में यह स्पष्ट है कि —धर्म ही मनुष्यत्व का आधार है।सत्य और संयम धर्म का मूल है।धर्ममार्ग से विचलित होना पतन का कारण है।भगवत् गीता में प्रमाण --१. अध्याय १६, श्लोक २३यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥भावार्थ —जो मनुष्य शास्त्र-विधि का त्याग करके मनमाने आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख और न परमगति। स्पष्ट है कि शास्त्रमार्ग (धर्ममार्ग) से विचलन पतन का कारण है।२. अध्याय ३, श्लोक ३५श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥भावार्थ —अपने धर्म का पालन दोषयुक्त होने पर भी श्रेष्ठ है; दूसरे के धर्म का पालन भय उत्पन्न करता है। अपने कर्तव्य-पथ पर स्थिर रहना ही कल्याणकारी है।३. अध्याय ४, श्लोक ७–८यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥भावार्थ —जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब मैं धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेता हूँ। धर्ममार्ग की रक्षा स्वयं भगवान् करते हैं।४. अध्याय १८, श्लोक ६६सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥भावार्थ —सब कर्तव्य-भ्रमों को छोड़कर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें पापों से मुक्त कर दूँगा। यहाँ परम धर्म (ईश्वर-शरणागति) का मार्ग बताया गया है।५. अध्याय २, श्लोक ४७कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।भावार्थ —तुझे केवल कर्म करने का अधिकार है, फल की चिंता मत कर। कर्तव्य-पथ पर स्थित रहना ही गीता का मूल संदेश है।निष्कर्ष--गीता का स्पष्ट संदेश है —शास्त्र-विहित धर्ममार्ग का त्याग न करें। अपने स्वधर्म में स्थित रहें।ईश्वर-शरणागति ही परम पथ है।महाभारत में प्रमाण --१. शान्ति पर्व--धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥भावार्थ —धर्म की रक्षा करने पर धर्म हमारी रक्षा करता है।अतः धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि धर्म का नाश हमें ही नष्ट कर दे। स्पष्ट शिक्षा — धर्ममार्ग से विचलन विनाश का कारण है।२. वनपर्व--न हि धर्मादपेतस्य लोकोऽस्ति सुखमेधितम्।भावार्थ —जो धर्म से विमुख हो जाता है, उसे इस लोक में स्थायी सुख प्राप्त नहीं होता। धर्मत्याग से सुख का अभाव होता है।३. उद्योगपर्व--सत्यं हि परमं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः।भावार्थ —सत्य ही परम ब्रह्म है और धर्म सत्य में ही प्रतिष्ठित है। सत्य-पथ ही धर्म का आधार है।४. शान्ति पर्व--एष धर्मः सनातनः।भावार्थ —यह सनातन धर्म है — अर्थात् शाश्वत आचरण-पथ। सनातन धर्म का पालन ही श्रेष्ठ मार्ग है।५. अनुशासन पर्व--अहिंसा परमो धर्मः।भावार्थ —अहिंसा ही परम धर्म है। धर्ममार्ग का मूल अहिंसा और करुणा है।सार--महाभारत का समग्र संदेश यही है -- धर्म की रक्षा करो, वही तुम्हारी रक्षा करेगा।सत्य और अहिंसा धर्म का मूल हैं।धर्म से विचलित होना पतन का कारण है।स्मृतियों से प्रमाण --१. मनुस्मृति ८.१५धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥भावार्थ —धर्म की रक्षा करने पर धर्म हमारी रक्षा करता है।अतः धर्म का नाश नहीं करना चाहिए; धर्म का त्याग करने से वही हमें नष्ट कर देता है। स्पष्ट शिक्षा — धर्ममार्ग से विचलन विनाशकारी है।२. मनुस्मृति ४.१३८सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥भावार्थ —सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न कहो; और प्रिय असत्य भी न कहो — यही सनातन धर्म है। सत्य और संयम धर्म का आधार हैं।३. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥भावार्थ —वेद सम्पूर्ण धर्म का मूल हैं; स्मृति, सदाचार और आत्मसन्तोष भी धर्म के आधार हैं। वेदमार्ग से विचलित न होना ही धर्म की जड़ है।४. नारद स्मृतिधर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।भावार्थ —धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; धर्म की रक्षा करने वाला सुरक्षित रहता है। धर्मत्याग का परिणाम पतन है।५. पराशर स्मृति १.२४श्रुतिस्मृत्योर्ममाज्ञायां यस्तां उल्लंघ्य वर्तते।आज्ञाछेदी मम द्वेषी मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः॥भावार्थ —जो मेरी आज्ञा रूप श्रुति और स्मृति का उल्लंघन करता है, वह आज्ञा-भंग करने वाला और मेरा विरोधी है, चाहे वह भक्त ही क्यों न कहलाए। श्रुति-स्मृति के धर्ममार्ग से विचलन अनुचित है।निष्कर्षस्मृति-ग्रन्थों में स्पष्ट कहा गया है —वेद ही धर्म का मूल हैं।धर्म की रक्षा करना आवश्यक है।सत्य, संयम और सदाचार धर्ममार्ग की नींव हैं।श्रुति-स्मृति के मार्ग से विचलन पतन का कारण है।नीति ग्रन्थों में प्रमाण --१. चाणक्य नीति--धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।भावार्थ —जो मनुष्य धर्म से रहित है, वह पशु के समान है। धर्ममार्ग का त्याग मनुष्यत्व का पतन है।२. हितोपदेश--सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥भावार्थ —सत्य और प्रिय वचन बोलो; अप्रिय सत्य तथा प्रिय असत्य से बचो — यही सनातन धर्म है। सत्य और संयम धर्ममार्ग की आधारशिला हैं।३. पंचतंत्र--न धर्मात्परमं मित्रं न धर्मात्परमं बलम्।भावार्थ —धर्म से बढ़कर न कोई मित्र है, न कोई बल। धर्म ही जीवन की वास्तविक शक्ति है।४. विदुर नीति--सत्यं हि परमं नास्ति धर्मः सत्ये प्रतिष्ठितः।भावार्थ —सत्य से बढ़कर कुछ नहीं; धर्म सत्य में ही प्रतिष्ठित है। सत्य-पथ ही धर्म का आधार है।५. शुक्रनीति-धर्ममार्गे स्थितो नित्यं न च्यवेत कदाचन।भावार्थ —मनुष्य को सदैव धर्ममार्ग में स्थित रहना चाहिए और उससे कभी विचलित नहीं होना चाहिए।सार--नीति-ग्रन्थों में स्पष्ट शिक्षा दी गई है —धर्म ही मनुष्य का वास्तविक बल और मित्र है। सत्य और संयम धर्म का मूल हैं। धर्ममार्ग से विचलित होना पतन का Valmiki Ramayana में धर्ममार्ग से विचलित न होने के प्रमाण---1. पिता की प्रतिज्ञा पालनअयोध्याकाण्ड 18.30लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान्वा हिमं त्यजेत्।अतीयात्सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः॥भावार्थचन्द्रमा शीतलता छोड़ दे, हिमालय हिम त्याग दे, समुद्र मर्यादा तोड़ दे; परन्तु मैं पिता की प्रतिज्ञा नहीं त्याग सकता।2. धर्म में दृढ़ रहने का संकल्पअयोध्याकाण्ड 18.34नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे।विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं केवलं धर्ममास्थितम्॥भावार्थहे देवि! मैं स्वार्थ के लिए जीवन नहीं जी सकता; मुझे केवल धर्म में स्थित समझो।3. धर्म ही श्रेष्ठ हैअरण्यकाण्ड 10.18धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्।धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥भावार्थधर्म से अर्थ उत्पन्न होता है, धर्म से सुख मिलता है; धर्म से सब कुछ प्राप्त होता है। यह संसार धर्ममय है।4. सत्य और धर्म का पालनयुद्धकाण्ड 18.33सत्यं धर्ममनुव्रतः।(पूर्ण श्लोक में श्रीराम के सत्य और धर्मपालन का वर्णन है।)भावार्थश्रीराम सत्य और धर्म का अनुसरण करने वाले हैं।Adhyatma Ramayana में 4 प्रमाण1. श्रीराम धर्ममार्ग में स्थितअयोध्याकाण्ड 2.7धर्ममार्गे स्थितो नित्यं सत्यसंधो दृढव्रतः।भावार्थश्रीराम सदा धर्ममार्ग में स्थित, सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़व्रती हैं।2. धर्म की रक्षाउत्तरकाण्ड 7.45धर्मो रक्षति रक्षितः।भावार्थजो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।3. सत्य ही परम धर्मअरण्यकाण्ड 3.14सत्यं धर्मस्तपो योगः सत्यं ब्रह्म सनातनम्।भावार्थसत्य ही धर्म है, तप है, योग है और सनातन ब्रह्म है।4. धर्म से मोक्षउत्तरकाण्ड 8.22धर्मेण पापमपनुदति धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥भावार्थधर्म से पाप दूर होता है और समस्त जगत धर्म पर ही स्थित है।निष्कर्षऋग्वेद का सिद्धान्त —“मा प्रगाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”— यही आदर्श Rama के चरित्र में Valmiki Ramayana और Adhyatma Ramayana दोनों में बार-बार प्रतिपादित हुआ है। गर्ग संहिता में प्रमाण--इसमें भी धर्ममार्ग, सत्संग, भक्ति और ईश्वर-स्मरण से विचलित न होने का उपदेश अनेक स्थानों पर मिलता है। “मा प्रगाम पथो वयम्” — अर्थात् “हम धर्ममार्ग से विचलित न हों” — इस भाव के अनुरूप कुछ प्रमाण निम्न हैं:1. धर्म और भक्ति में स्थिरता--धर्ममार्गरताः सन्तो भक्त्या केशवमाश्रिताः।न ते मोहं प्रपद्यन्ते न च यान्ति पराभवम्॥भावार्थजो सज्जन धर्ममार्ग में स्थित होकर भगवान केशव की भक्ति करते हैं, वे मोह और पतन को प्राप्त नहीं होते।2. सत्पथ से न हटने का उपदेश--सत्यं शौचं दया क्षान्तिर्धर्मोऽयं सनातनः।एतन्मार्गं न मुञ्चन्ति साधवो मुक्तिकाङ्क्षिणः॥भावार्थसत्य, पवित्रता, दया और क्षमा — यही सनातन धर्म है। मोक्ष चाहने वाले साधु इस मार्ग को नहीं छोड़ते।3. भगवान् का धर्मरक्षा संदेश--यदा धर्मपथो जन्तुर्विचलेन्मोहपीडितः।तदा हरिकथा लोके तस्य बुद्धिं प्रबोधयेत्॥भावार्थजब मनुष्य मोह के कारण धर्ममार्ग से विचलित होने लगता है, तब हरिकथा उसकी बुद्धि को जागृत करती है।4. भक्ति से धर्म में दृढ़ता-+हरिभक्तिपरो नित्यं धर्ममार्गे दृढव्रतः।न स पापैर्विमुह्येत कृष्णचिन्तापरायणः॥भावार्थजो हरिभक्ति में निरंतर लगा रहता है और धर्ममार्ग में दृढ़ है, वह पापों से मोहित नहीं होता।समन्वित भावऋग्वेद का —“मा प्रगाम पथो वयम्”और Garga Samhita का उपदेश — दोनों यही शिक्षा देते हैं कि मनुष्य: सत्य, धर्म, भक्ति,और सदाचार के मार्ग से विचलित न हो।योगवासिष्ठ से प्रमाण --१. वैराग्य प्रकरण--संसार एव दुःखानां मूलमित्यवधारय।विवेकमार्गमास्थाय तरेद्भवसागरम्॥भावार्थ —यह संसार ही दुःखों का मूल है; अतः विवेक-मार्ग का आश्रय लेकर भवसागर को पार करो। यहाँ “विवेक-मार्ग” से विचलित न होने की शिक्षा है।२. मुमुक्षु प्रकरण--नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।न चाभावयतः शान्तिः शान्तस्य कुतः सुखम्॥(अर्थ-संदर्भ में उद्धृत)भावार्थ —जिसका मन संयमित नहीं, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं होती; और अशान्त व्यक्ति को सुख नहीं मिलता। मन को धर्ममार्ग में स्थिर रखना आवश्यक है।३. उत्पत्ति प्रकरण--मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥भावार्थ —मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है; विषयासक्त मन बन्धन का कारण है और निर्विषय (विवेकयुक्त) मन मोक्ष का साधन है। मन को सत्य-मार्ग में स्थिर रखना ही मुक्ति का पथ है।इस्लाम धर्म में प्रमाण-- Quran में “सही मार्ग से विचलित न होने” के प्रमाण(सूरा और आयत नम्बर सहित)1. सीधा मार्ग दिखाने की प्रार्थनाQuranसूरा अल-फ़ातिहा — आयत 6अरबीٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَउच्चारणIhdinaṣ-ṣirāṭal-mustaqīmहिन्दी भावार्थ“हमें सीधा मार्ग दिखा।”2. सीधे मार्ग पर दृढ़ रहने का आदेशQuranसूरा हूद — आयत 112अरबीفَٱسْتَقِمْ كَمَآ أُمِرْتَउच्चारणFastaqim kamā umirtaहिन्दी भावार्थ“जैसा तुम्हें आदेश दिया गया है, उसी प्रकार सीधे मार्ग पर दृढ़ रहो।”3. दूसरे मार्गों पर न चलने की शिक्षाQuranसूरा अल-अनआम — आयत 153अरबीوَأَنَّ هَٰذَا صِرَاطِي مُسْتَقِيمًا فَٱتَّبِعُوهُ وَلَا تَتَّبِعُوا۟ ٱلسُّبُلَ فَتَفَرَّقَ بِكُمْ عَن سَبِيلِهِۦउच्चारणWa anna hādhā ṣirāṭī mustaqīman fattabi‘ūhu wa lā tattabi‘us-subula fatafarraqa bikum ‘an sabīlihहिन्दी भावार्थ“यह मेरा सीधा मार्ग है, अतः इसी का अनुसरण करो और अन्य रास्तों पर मत चलो, नहीं तो वे तुम्हें अल्लाह के मार्ग से भटका देंगे।”4. ईमान के बाद स्थिर रहने वालों की प्रशंसाQuranसूरा फ़ुस्सिलत — आयत 30अरबीإِنَّ ٱلَّذِينَ قَالُوا۟ رَبُّنَا ٱللَّهُ ثُمَّ ٱسْتَقَـٰمُوا۟उच्चारणInnal-ladhīna qālū rabbunallāhu thummastaqāmūहिन्दी भावार्थ“निश्चय ही जिन्होंने कहा ‘हमारा पालनहार अल्लाह है’ और फिर उस पर दृढ़ रहे…”5. सत्य मार्ग की ओर बुलाने का आदेशQuranसूरा अश-शूरा — आयत 15अरबीفَلِذَٰلِكَ فَٱدْعُ وَٱسْتَقِمْ كَمَآ أُمِرْتَउच्चारणFalidhālika fad‘u wastaqim kamā umirtहिन्दी भावार्थ“अतः तुम लोगों को इसी मार्ग की ओर बुलाओ और जैसे आदेश दिया गया है वैसे ही दृढ़ रहो।”समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”और क़ुरआन —“ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ”“हमें सीधा मार्ग दिखा”— दोनों ही मनुष्य को सत्य, ईश्वर और धर्म के मार्ग पर स्थिर रहने की शिक्षा देते हैं।सूफी सन्तों में प्रमाण-- सूफ़ी संतों के कथन — “सत्य मार्ग से विचलित न होना”ऋग्वेद का भाव —“मा प्र गाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”— यही शिक्षा अनेक सूफ़ी संतों ने भी दी है। नीचे संतों के कथन अरबी/फ़ारसी लिपि, उच्चारण और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. Jalaluddin Rumiफ़ारसीراهِ حق را گم مکن، گرچه جهان تاریک استउच्चारणRāh-e ḥaqq rā gum makun, garche jahān tārīk astअर्थ“सत्य के मार्ग को मत खोओ, चाहे संसार अंधकारमय ही क्यों न हो।”2. Khwaja Moinuddin Chishtiफ़ारसीدر راهِ حق ثابت قدم باشउच्चारणDar rāh-e ḥaqq sābit-qadam bāshअर्थ“सत्य और ईश्वर के मार्ग में दृढ़ रहो।”3. Nizamuddin Auliyaफ़ारसीهر که در راهِ خدا ثابت ماند، به مقصد رسدउच्चारणHar ke dar rāh-e Khudā sābit mānd, ba maqsad rasadअर्थ“जो ईश्वर के मार्ग में स्थिर रहता है, वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।”4. Abdul Qadir Gilaniअरबीالاستقامة فوق الكرامةउच्चारणAl-istiqāmah fawqal-karāmahअर्थ“सीधे मार्ग पर स्थिर रहना चमत्कारों से भी श्रेष्ठ है।”5. Bayazid Bastamiफ़ारसीراهِ خدا را با صدق و اخلاص بپویउच्चारणRāh-e Khudā rā bā sidq-o ikhlāṣ bپویअर्थ“ईश्वर के मार्ग पर सत्य और निष्कपटता के साथ चलो।”6. Shams Tabriziफ़ारसीسالکِ راهِ حق از طوفان نمیترسدउच्चारणSālik-e rāh-e ḥaqq az ṭūfān namī-tarsadअर्थ“सत्य के मार्ग का पथिक तूफ़ानों से नहीं डरता।”7. Bulleh Shahफ़ारसी/पंजाबीراہِ عشق و حق یکی استउच्चारणRāh-e ‘ishq-o ḥaqq yakī astअर्थ“प्रेम और सत्य का मार्ग एक ही है।”8. Rabia al-Basriअरबीمن ثبت على طريق الله وصلउच्चारणMan thabata ‘alā ṭarīqillāh waṣalअर्थ“जो अल्लाह के मार्ग पर स्थिर रहता है, वह मंज़िल तक पहुँचता है।”9. Hasan al-Basriअरबीعليكم بالصراط المستقيم ولا تميلوا عنهउच्चारण‘Alaykum biṣ-ṣirāṭil-mustaqīm wa lā tamīlū ‘anhuअर्थ“सीधे मार्ग को अपनाओ और उससे विचलित मत हो।”समन्वित निष्कर्षऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”क़ुरआन —“ٱهْدِنَا ٱلصِّرَٰطَ ٱلْمُسْتَقِيمَ”और सूफ़ी संतों की शिक्षाएँ — सभी को :सत्य, प्रेम, ईश्वर,और धर्ममार्ग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देती हैं।सिक्ख थर्म में प्रमाण-- Sikhism में “सत्य मार्ग से विचलित न होने” के प्रमाण(गुरुमुखी लिपि सहित)ऋग्वेद का भाव —“मा प्र गाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”— यही शिक्षा Guru Granth Sahib में भी बार-बार मिलती है।1. सच्चे मार्ग पर चलने की शिक्षाGuru Granth Sahibगुरुमुखीਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਬਾਣੀ ਸਤਿ ਸਰੂਪ ਹੈਗੁਰਬਾਣੀ ਬਣੀਐ ॥अर्थसतगुरु की वाणी सत्यस्वरूप है; मनुष्य को गुरुवाणी के अनुसार जीवन बनाना चाहिए।2. प्रभु के मार्ग पर चलनाGuru Granth Sahibगुरुमुखीਗੁਰ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਸਚੁ ਨੀਕਾ ॥उच्चारणGur kā mārag sach nīkāअर्थगुरु का मार्ग सत्य और उत्तम है।3. सत्य मार्ग से न भटकनाGuru Granth Sahibगुरुमुखीਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ ॥उच्चारणSachahu orai sabh ko, upar sach āchārअर्थसत्य से बढ़कर सत्य आचरण है।4. नाम और धर्म में स्थिरताGuru Granth Sahibगुरुमुखीਹਰਿ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਸੋਈ ਜਾਨੈਜਿਨੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ॥अर्थवही प्रभु के मार्ग को जानता है जिसने गुरु के मार्ग से नाम का ध्यान किया।5. गुरु का मार्ग मोक्षदायी हैGuru Granth Sahibगुरुमुखीਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣੀਐ ॥उच्चारणGurmukh rāhu pachhāṇīaiअर्थगुरुमुख बनकर ही सही मार्ग पहचाना जा सकता है।6. प्रभु के मार्ग में दृढ़ रहनाGuru Granth Sahibगुरुमुखीਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ॥अर्थजब सतगुरु मिलता है तब सत्य की प्राप्ति होती है।7. धर्ममार्ग ही सच्चा जीवनGuru Granth Sahibगुरुमुखीਸਚਿ ਰਹੈ ਸੁ ਨਿਰਮਲਾ ॥उच्चारणSach rahai su nirmalāअर्थजो सत्य में स्थित रहता है वही निर्मल होता है।8. गुरु के मार्ग से मुक्तिGuru Granth Sahibगुरुमुखीਗੁਰ ਕੈ ਮਾਰਗਿ ਚਲਣਾ ॥अर्थगुरु के मार्ग पर चलना ही कल्याणकारी है।समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”गुरु ग्रन्थ साहिब —“ਗੁਰ ਕਾ ਮਾਰਗੁ ਸਚੁ ਨੀਕਾ”दोनों ही मनुष्य को सत्य, धर्म, सदाचार और ईश्वर के मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेरणा देते हैं।ईसाई धर्म में प्रमाण-- Christianity में “सत्य मार्ग से विचलित न होने” के प्रमाण(English script सहित)ऋग्वेद का भाव —“मा प्र गाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”— यही शिक्षा Bible में भी अनेक स्थानों पर मिलती है।1. Jesus is the true wayBible“I am the way, the truth, and the life.”हिन्दी अर्थयीशु कहते हैं — “मैं ही मार्ग, सत्य और जीवन हूँ।”2. Walk in the right pathBible“In all thy ways acknowledge Him, and He shall direct thy paths.”हिन्दी अर्थअपने सभी मार्गों में परमेश्वर को स्मरण करो, वह तुम्हारे मार्ग सीधे करेगा।3. Do not turn away from the pathBible“Turn not from it to the right hand or to the left.”हिन्दी अर्थधर्ममार्ग से न दाएँ हटो, न बाएँ।4. Narrow path leads to lifeBible“Narrow is the way, which leadeth unto life.”हिन्दी अर्थजीवन की ओर ले जाने वाला मार्ग संकीर्ण है।5. God teaches the right wayBible“Show me thy ways, O Lord; teach me thy paths.”हिन्दी अर्थहे प्रभु! मुझे अपने मार्ग दिखा और अपने पथ की शिक्षा दे।6. Blessed are those who walk in God’s lawBible“Blessed are the undefiled in the way, who walk in the law of the Lord.”हिन्दी अर्थधन्य हैं वे जो प्रभु की व्यवस्था के मार्ग पर चलते हैं।7. Stand firm in faith and righteousnessBible“Stand firm in the faith.”हिन्दी अर्थविश्वास में दृढ़ बने रहो।8. Follow the path of righteousnessBible“In the way of righteousness is life.”हिन्दी अर्थधर्म के मार्ग में ही जीवन है।समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”बाइबिल —“I am the way, the truth, and the life.”दोनों ही मनुष्य को सत्य, धर्म, ईश्वर और सदाचार के मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेरणा देते हैं।जैन धर्मं में प्रमाण-- Jainism में “धर्ममार्ग से विचलित न होने” के प्रमाण(प्राकृत / संस्कृत श्लोक देवनागरी लिपि सहित)ऋग्वेद का भाव —“मा प्र गाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”— यही शिक्षा जैन आगमों और ग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से मिलती है।1. सम्यक् मार्ग ही मोक्ष का पथTattvartha Sutra 1.1सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥भावार्थसम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र — यही मोक्ष का मार्ग है।2. धर्म ही श्रेष्ठ मंगलDasavaikalika Sutra 1.1धम्मो मंगलमुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।देवा वि तं नमंसन्ति, जस्स धम्मे सया मणो॥भावार्थधर्म सर्वोत्तम मंगल है; अहिंसा, संयम और तप उसका स्वरूप हैं। जिनका मन सदा धर्म में स्थित रहता है, देवता भी उन्हें नमस्कार करते हैं।3. आत्मा ही अपना मार्गदर्शकUttaradhyayana Sutra 20.37अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो॥भावार्थआत्मा ही सुख-दुःख का कर्ता है; वही अपना मित्र और शत्रु है, जैसा वह धर्ममार्ग में स्थित या विचलित होता है।4. प्रमाद से धर्मपथ नष्ट होता हैUttaradhyayana Sutra 10.1समयं गोयम! मा पमायए॥भावार्थहे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।अर्थात् साधक धर्ममार्ग से असावधान होकर न हटे।5. सत्य और संयम का मार्गAcaranga Sutraएवं खु णाणिणो सारं, जं ण हिंसइ किंचण।भावार्थज्ञानी का सार यही है कि वह किसी भी जीव को हिंसा नहीं पहुँचाता।6. धर्म में स्थित साधुSutrakritangaजो सहस्सं सहस्साणं संगामे दुज्जए जिणे।एगं च जेय्यमप्पाणं, एस से परमो जयो॥भावार्थजो हजारों युद्ध जीत ले वह महान नहीं; जो अपने मन को जीत ले वही परम विजयी है।7. अहिंसा ही धर्म का मार्गPadma Puranaअहिंसा परमो धर्मः॥भावार्थअहिंसा ही परम धर्म है।समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”जैन धर्म —“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः”दोनों ही मनुष्य को:सत्य,संयम,अहिंसा,और धर्ममार्ग पर स्थिर रहने की शिक्षा देते हैं।बौद्ध धर्म में प्रमाण — (पाली, देवनागरी लिपि के साथ)--१. धम्मपद (Dhammapada १–२)“मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।मनसा चे पदुट्ठेन, भासति वा करोति वा।ततो नं दुक्खमन्वेति, चक्कं व वहतो पदं॥”“मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।मनसा चे पसन्नेन, भासति वा करोति वा।ततो नं सुखमन्वेति, छाया व अनपायिनी॥”अर्थ — मन ही सबका मूल है। दूषित मन दुःख देता है और शुद्ध मन सुख देता है।धम्मपद२. धम्मपद १८३“सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा।सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धानसासनं॥”अर्थ — पाप न करना, पुण्य करना और चित्त को शुद्ध करना — यही बुद्धों की शिक्षा है।गौतम बुद्ध३. महापरिनिब्बान सुत्त“अत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा अनञ्ञसरणा।धम्मदीपा धम्मसरणा अनञ्ञसरणा॥”अर्थ — अपने दीपक स्वयं बनो, धर्म को ही शरण मानो।महापरिनिब्बान सुत्त४. धम्मपद ५“न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥”अर्थ — वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; केवल अवैर (प्रेम) से शांत होता है। यह सनातन धर्म है।५. मेत्ता सुत्त“सुखिनो वा खेमिनो होंतु, सब्बे सत्ता भवंतु सुखितत्ता॥”अर्थ — सब प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।६. उदान (Udāna)“अत्ताहि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परोसिया।”अर्थ — मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी है; दूसरा कौन उसका स्वामी हो सकता है?७. धम्मपद २७६“तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता॥”अर्थ — प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना होगा; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।तथागत बुद्ध८. विनय पिटक“खन्ती परमं तपो तितिक्खा।”अर्थ — क्षमा और सहनशीलता सबसे बड़ा तप है।विनय पिटक९. सुत्तनिपात“न जच्चा वसलो होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो।कम्मुना वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो॥”अर्थ — जन्म से कोई नीच या ब्राह्मण नहीं होता; कर्म से मनुष्य महान या अधम बनता है।सुत्तनिपात१०. धम्मपद १६०“अत्तानं एव पठमं, पतिरूपे निवेशये॥”अर्थ — पहले स्वयं को योग्य बनाओ, फिर दूसरों को उपदेश दो।यहूदी धर्म में प्रमाण-- Judaism में “धर्ममार्ग से विचलित न होने” के प्रमाण(हिब्रू लिपि सहित)ऋग्वेद का भाव —“मा प्र गाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”— यही शिक्षा Tanakh और यहूदी परम्परा में भी बार-बार मिलती है।1. परमेश्वर के मार्ग पर चलोTanakhहिब्रूבְּכָל־הַדֶּרֶךְ אֲשֶׁר צִוָּה יְהוָה אֱלֹהֵיכֶם אֶתְכֶם תֵּלֵכוּउच्चारणBekhol ha-derekh asher tzivah Adonai Eloheikhem etkhem telekhuहिन्दी अर्थ“जिस मार्ग का आदेश परमेश्वर ने दिया है, उसी पर चलो।”2. दाएँ-बाएँ न हटोTanakhहिब्रूלֹא תָסֻרוּ יָמִין וּשְׂמֹאולउच्चारणLo tasuru yamin usmolहिन्दी अर्थ“तुम न दाएँ हटना, न बाएँ।”3. धर्ममार्ग ही जीवन हैTanakhहिब्रूבְּאֹרַח־צְדָקָה חַיִּיםउच्चारणBe’orakh tzedakah chayyimहिन्दी अर्थ“धर्म के मार्ग में ही जीवन है।”4. प्रभु सही मार्ग दिखाते हैंTanakhहिब्रूדְּרָכֶיךָ יְהוָה הוֹדִיעֵנִי אֹרְחוֹתֶיךָ לַמְּדֵנִיउच्चारणDerakhekha Adonai hodi‘eni, orkhotekha lammedeniहिन्दी अर्थ“हे प्रभु! मुझे अपने मार्ग दिखा और अपने पथ की शिक्षा दे।”5. धर्मियों का मार्ग प्रकाशमय हैTanakhहिब्रूוְאֹרַח צַדִּיקִים כְּאוֹר נֹגַהּउच्चारणVe’orakh tzaddiqim ke’or nogahहिन्दी अर्थ“धर्मियों का मार्ग चमकते प्रकाश के समान है।”6. परमेश्वर की व्यवस्था में चलना।Tanakhहिब्रूאַשְׁרֵי תְמִימֵי־דָרֶךְ הַהֹלְכִים בְּתוֹרַת יְהוָהउच्चारणAshrei temimei-darekh haholkhim beTorat Adonaiहिन्दी अर्थ“धन्य हैं वे जो परमेश्वर की व्यवस्था के मार्ग पर चलते हैं।”7. सही मार्ग पर स्थिर रहने की प्रार्थना।Tanakhहिब्रूהוֹרֵנִי יְהוָה דַּרְכֶּךָउच्चारणHoreni Adonai darkekhaहिन्दी अर्थ“हे प्रभु! मुझे अपना मार्ग सिखा।”8. बुद्धिमान धर्ममार्ग पर चलता है।Tanakhहिब्रूהוֹלֵךְ בַּתֹּם יֵלֶךְ בֶּטַחउच्चारणHolekh batom yelekh betachहिन्दी अर्थ“जो सत्यनिष्ठा से चलता है, वह निडर चलता है।”समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”यहूदी धर्म —“לֹא תָסֻרוּ יָמִין וּשְׂמֹאול”“न दाएँ हटो, न बाएँ”दोनों ही मनुष्य को ईश्वर, सत्य और धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देते हैं।पारसी धर्मं में प्रमाण-- Zoroastrianism (पारसी धर्म) में “धर्ममार्ग से विचलित न होने” के प्रमाण--(अवेस्ता / Avestan लिपि सहित)ऋग्वेद का भाव —“मा प्रगाम पथो वयम्”“हम धर्ममार्ग से विचलित न हों”— यही शिक्षा Avesta में भी बार-बार मिलती है। पारसी धर्म में इसे अशा (Asha) — अर्थात् सत्य, धर्म और ब्रह्माण्डीय व्यवस्था — का मार्ग कहा गया है।1. सत्य के मार्ग का चयनAvestaअवेस्ता लिपि𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬛𐬀𐬭𐬆𐬔𐬆𐬨 𐬗𐬀𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎लिप्यंतरणAt ta dareghem vacha mainyuहिन्दी अर्थ“मनुष्य को सत्य और असत्य में विवेकपूर्वक सही मार्ग चुनना चाहिए।”2. अशा (धर्म) का मार्गAvestaअवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬀𐬵𐬌𐬀 𐬞𐬀𐬚𐬀𐬵लिप्यंतरणAshahe pathaहिन्दी अर्थ“अशा (सत्य-धर्म) के मार्ग पर चलो।”3. धर्ममार्ग ही श्रेष्ठ पथAvestaअवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬀𐬎𐬥𐬀𐬨 𐬬𐬀𐬭𐬆𐬀𐬵𐬌लिप्यंतरणAshaonam varehahiहिन्दी अर्थ“धर्मात्माओं का मार्ग सर्वोत्तम है।”4. अच्छे विचार, वचन और कर्मAvestaअवेस्ताHumata, Hukhta, Hvarshtaहिन्दी अर्थ“सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म।”यह पारसी धर्म का मूल धर्ममार्ग है।5. अहुरा मज़्दा का सीधा पथAvestaअवेस्ता लिपि𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬵 𐬞𐬀𐬚𐬀𐬵लिप्यंतरणMazdah pathaहिन्दी अर्थ“अहुरा मज़्दा का मार्ग सत्य का मार्ग है।”6. धर्म से विचलित न होने की शिक्षाAvestaअवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬀𐬙 𐬭𐬀𐬱𐬥𐬀लिप्यंतरणAshat rašnaहिन्दी अर्थ“सत्य और धर्म से जुड़े रहो।”7. सत्य का प्रकाशमय मार्गAvestaअवेस्ता लिपि𐬀𐬴𐬀 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀लिप्यंतरणAsha spentaहिन्दी अर्थ“पवित्र सत्य का मार्ग प्रकाशमय है।”समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”अवेस्ता —“Ashahe patha”“सत्य-धर्म के मार्ग पर चलो”दोनों ही मनुष्य को:सत्य, धर्म, सदाचार, और ईश्वर के मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेरणा देते हैं।ताओ धर्म में प्रमाण-- Taoism में “धर्ममार्ग से विचलित न होने” के प्रमाण(चीनी लिपि सहित)ऋग्वेद का भाव —“मा प्र गाम पथो वयम्”“हम सत्य और धर्म के मार्ग से विचलित न हों”— यही शिक्षा Tao Te Ching और ताओवादी परम्परा में भी मिलती है।ताओ धर्म में “道” (Dao / Tao) का अर्थ है — “मार्ग”, “सत्य का पथ”, “ब्रह्माण्ड का शाश्वत नियम”।1. ताओ ही शाश्वत मार्ग हैTao Te Chingचीनी道可道,非常道。उच्चारणDào kě dào, fēi cháng dàoहिन्दी अर्थ“जिस मार्ग को शब्दों में पूरी तरह कहा जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है।”2. महान मार्ग सरल हैTao Te Chingचीनी大道甚夷,而民好徑。उच्चारणDà dào shèn yí, ér mín hào jìngहिन्दी अर्थ“महान मार्ग अत्यन्त सरल है, पर लोग टेढ़े रास्ते पसंद करते हैं।”3. ताओ का अनुसरण करोTao Te Chingचीनी人法地,地法天,天法道,道法自然。उच्चारणRén fǎ dì, dì fǎ tiān, tiān fǎ dào, dào fǎ zìránहिन्दी अर्थ“मनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करे, पृथ्वी आकाश का, आकाश ताओ का, और ताओ स्वभाविक सत्य का।”4. जो ताओ में स्थित है वह स्थिर है।Tao Te Chingचीनी善建者不拔,善抱者不脫。उच्चारणShàn jiàn zhě bù bá, shàn bào zhě bù tuōहिन्दी अर्थ“जो सही आधार पर स्थापित है वह डिगता नहीं; जो सत्य को धारण करता है वह उससे अलग नहीं होता।”5. ज्ञानी मार्ग नहीं खोता।Zhuangziचीनी夫道不欲雜,雜則多,多則擾,擾則憂。उच्चारणFū dào bù yù zá, zá zé duō, duō zé rǎo, rǎo zé yōuहिन्दी अर्थ“मार्ग को भ्रम और विकारों से मत मिलाओ; अन्यथा अशान्ति उत्पन्न होती है।”6. ताओ का मार्ग शान्ति देता हैTao Te Chingचीनी執大象,天下往。उच्चारणZhí dà xiàng, tiānxià wǎngहिन्दी अर्थ“जो महान ताओ को धारण करता है, संसार उसी की ओर आकर्षित होता है।”7. सत्य मार्ग पर चलने वाला निर्भय होता है।Tao Te Chingचीनी善攝生者,陸行不遇兕虎。उच्चारणShàn shè shēng zhě, lù xíng bù yù sì hǔहिन्दी अर्थ“जो ताओ के अनुसार जीवन जीता है, वह भय और विनाश से सुरक्षित रहता है।”8. ताओ से दूर होना पतन है।Tao Te Chingचीनी不知常,妄作凶。उच्चारणBù zhī cháng, wàng zuò xiōngहिन्दी अर्थ“जो शाश्वत मार्ग को नहीं जानता, उसका आचरण विनाशकारी हो जाता है।”समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”ताओ धर्म —大道甚夷,而民好徑“महान मार्ग सरल है, पर लोग भटक जाते हैं।”दोनों ही मनुष्य को:सत्य, संतुलन, प्राकृतिक धर्म,और शाश्वत मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेरणा देते हैं।कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण-- (Confucianism) में सत्य, नैतिकता, करुणा, और मानव-धर्म पर अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख उद्धरण चीनी लिपि, पिनयिन (उच्चारण) और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं:1. 仁者爱人चीनी लिपि:仁者爱人。Pinyin:Rén zhě ài rén.अर्थ:“सज्जन व्यक्ति लोगों से प्रेम करता है।”स्रोत:The Analects (论语 · 颜渊)2. 己所不欲,勿施于人चीनी लिपि:己所不欲,勿施于人。Pinyin:Jǐ suǒ bù yù, wù shī yú rén.अर्थ:“जो अपने लिए पसंद न हो, वह दूसरों पर मत थोपो।”स्रोत:The Analects (论语 · 卫灵公)3. 四海之内皆兄弟也चीनी लिपि:四海之内皆兄弟也。Pinyin:Sì hǎi zhī nèi jiē xiōng dì yě.अर्थ:“चारों समुद्रों के भीतर सभी मनुष्य भाई हैं।”स्रोत:The Analects4. 天命之谓性,率性之谓道चीनी लिपि:天命之谓性,率性之谓道。Pinyin:Tiān mìng zhī wèi xìng, shuài xìng zhī wèi dào.अर्थ:“स्वर्ग की आज्ञा से जो स्वभाव मिला है वही प्रकृति है; उस प्रकृति के अनुसार चलना ही मार्ग (Dao) है।”स्रोत:Doctrine of the Mean (中庸)5. 学而时习之,不亦说乎चीनी लिपि:学而时习之,不亦说乎?Pinyin:Xué ér shí xí zhī, bù yì yuè hū?अर्थ:“सीखना और समय-समय पर उसका अभ्यास करना क्या आनंद की बात नहीं है?”स्रोत:The Analects (论语 · 学而)इन शिक्षाओं में मानवता (仁), नैतिकता, आत्म-संयम, और सामाजिक सद्भाव को सर्वोच्च माना गया है।शिन्तो धर्म में प्रमाण-- Shinto में ईश्वर, प्रकृति, पूर्वजों और दिव्य शक्तियों (Kami) के विषय में अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रसिद्ध शिन्तो ग्रन्थों और परम्पराओं से प्रमाण जापानी लिपि सहित दिए जा रहे हैं—《古事記》 (कोजिकी, 712 ई.)「天地初發之時、於高天原成神名、天之御中主神。」अर्थ: “जब स्वर्ग और पृथ्वी की प्रथम उत्पत्ति हुई, तब ताकामागहारा में प्रथम देवता अमे-नो-मिनाकानुशी प्रकट हुए।”《日本書紀》 (निहोन शोकी, 720 ई.)「古天地未剖、陰陽不分。」अर्थ: “प्राचीन काल में जब आकाश और पृथ्वी अलग नहीं हुए थे, तब यिन और यांग भी विभक्त नहीं थे।”神道の教え (शिन्तो उपदेश)「神は天地にあり、万物に宿る。」अर्थ: “कामी (देवत्व) स्वर्ग और पृथ्वी में हैं तथा समस्त वस्तुओं में निवास करते हैं।”伊勢神宮の伝統 (इसे श्राइन परम्परा)「清き明き心を以て神に仕えよ。」अर्थ: “शुद्ध और उज्ज्वल हृदय से देवताओं की सेवा करो।”神道祝詞《大祓詞》 (ओहारा-ए प्रार्थना)「高天原に神留坐す皇親神漏岐・神漏美の命以て。」अर्थ: “उच्च स्वर्ग में विराजमान दिव्य देवताओं की आज्ञा से…”神道の自然観「山川草木、悉く神性を有す。」अर्थ: “पर्वत, नदियाँ, वृक्ष और समस्त प्रकृति दिव्यता से युक्त हैं।”神道の徳目「まごころを以て生きる。」अर्थ: “सच्चे और निष्कपट हृदय से जीवन जीना चाहिए।”ये प्रमाण दिखाते हैं कि Shinto में प्रकृति, पवित्रता, पूर्वज-पूजा और ‘कामी’ की उपासना को अत्यन्त महत्व दिया गया है।यूनानी दर्शन में प्रमाण-- Greek Philosophy में “सत्य मार्ग से विचलित न होने” के प्रमाणऋग्वेद का भाव —“मा प्रगाम पथो वयम्”“हम धर्म और सत्य के मार्ग से विचलित न हों”— यही विचार यूनानी दर्शन में भी “सत्य”, “सद्गुण”, “न्याय” और “सही जीवन-पथ” के रूप में मिलता है।1. Socrates — सत्य का मार्गयूनानीὉ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ।उच्चारणHo de anexetastos bios ou biōtos anthrōpōस्रोतApology 38aहिन्दी अर्थ“जो जीवन सत्य-परीक्षण और विवेक से रहित है, वह मनुष्य के योग्य नहीं।”अर्थात् मनुष्य को सत्य के मार्ग पर सजग रहना चाहिए।2. Plato — न्याय का मार्गयूनानीΔικαιοσύνη ψυχῆς ἀρετή ἐστιν।उच्चारणDikaiosynē psychēs aretē estinस्रोतRepublicहिन्दी अर्थ“न्याय आत्मा का सद्गुण है।”अर्थात् धर्मयुक्त मार्ग आत्मा की श्रेष्ठता है।3. Aristotle — मध्यम मार्गयूनानीἩ ἀρετὴ μεσότης τις ἐστίν।उच्चारणHē aretē mesotēs tis estinस्रोतNicomachean Ethicsहिन्दी अर्थ“सद्गुण संतुलित मार्ग में स्थित है।”यह धर्ममार्ग से विचलित न होने की शिक्षा है।4. Epictetus — सही मार्ग पर स्थिरता।यूनानीΜέμνησο τοίνυν ὅτι οὐχὶ τὰ πράγματα ταράττει τοὺς ἀνθρώπους, ἀλλὰ τὰ περὶ τῶν πραγμάτων δόγματα।उच्चारणMemnēso toinyn hoti ouchi ta pragmata tarattei tous anthrōpous, alla ta peri tōn pragmatōn dogmataस्रोतEnchiridionहिन्दी अर्थ“मनुष्य वस्तुओं से नहीं, बल्कि उनके बारे में अपने भ्रमित विचारों से विचलित होता है।”5. Heraclitus — दिव्य नियम का पालन।यूनानीΤῷ λόγῳ δ᾽ ἐόντι ξυνῷ ζώουσιν οἱ πολλοὶ ὡς ἰδίαν ἔχοντες φρόνησιν।उच्चारणTō logō d’ eonti xynō zōousin hoi polloi hōs idian echontes phronēsinहिन्दी अर्थ“यद्यपि सत्य का सार्वभौमिक नियम उपस्थित है, फिर भी लोग अपने भ्रमित मार्ग पर चलते हैं।”6. Pythagoras — धर्मयुक्त जीवनयूनानीΜηδὲν ἄγαν।उच्चारणMēden aganहिन्दी अर्थ“किसी भी अति में मत जाओ।”यह संयम और धर्मयुक्त मार्ग की शिक्षा है।7. Marcus Aurelius — प्रकृति के मार्ग पर चलनायूनानी/स्टोइक परम्पराΖῆν κατὰ φύσιν।उच्चारणZēn kata physinहिन्दी अर्थ“प्रकृति और सत्य के अनुसार जीवन जीओ।”8. Cleanthes — ईश्वरीय मार्गयूनानीἝπου θεῷ.उच्चारणHepou theōहिन्दी अर्थ“ईश्वर के मार्ग का अनुसरण करो।”समन्वित भावऋग्वेद —“मा प्र गाम पथो वयम्”यूनानी दर्शन —“Ζῆν κατὰ φύσιν”“सत्य और प्रकृति के अनुसार जीवन जीओ।”दोनों ही मनुष्य को: सत्य,सद्गुण, संयम, और धर्मयुक्त मार्ग पर स्थिर रहने की प्रेरणा देते हैं।---+-------+---------+---------