brahmarakshas ka saya in Hindi Horror Stories by Raj books and stories PDF | ब्रह्मराक्षस का साया

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ब्रह्मराक्षस का साया

सुखपुर नाम का वह गाँव कभी अपनी असीम हरियाली, लहलहाते खेतों और आपस में मिल-जुलकर रहने वाले सीधे-सादे लोगों के लिए जाना जाता था। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की कतारें और गाँव के मुहाने पर फैला घना, डरावना जंगल इस जगह को खूबसूरत बनाते थे। प्रकृति की गोद में बसे इस गाँव को देखकर कोई बाहरी इंसान यह अंदाजा नहीं लगा सकता था कि यहाँ की रातों में मौत का सन्नाटा पसरा रहता है। गाँव के लोग एक अजीब और रोंगटे खड़े कर देने वाले डर के साए में जी रहे थे, और वह साया था ब्रह्मराक्षस का। गाँव के बुजुर्ग बताते थे कि वह ब्रह्मराक्षस उसी घने जंगल के बीचों-बीच स्थित एक सदियों पुरानी, खंडहर हो चुकी बावड़ी के पास रहता है। उसकी ताकत और खौफ की शुरुआत कुछ साल पहले हुई थी, जिसने इस हंसते-खेलते गाँव की तकदीर ही बदल कर रख दी। वह दिन आज भी सुखपुर के लोगों के जहन में एक खौफनाक दुःस्वप्न की तरह जिंदा था जब गाँव के सबसे बड़े और रसूखदार जमींदार, ठाकुर विरेंद्र सिंह की इकलौती बेटी रूपमती की शादी का दिन था। पूरा गाँव रोशनी से जगमगा रहा था, शहनाइयों की गूंज थी और शादी का आलीशान मंडप सजा हुआ था। लेकिन जैसे ही फेरों का वक्त आया, अचानक मौसम ने करवट ली और तेज हवाएं चलने लगीं, मानो कोई बड़ा तूफान आने वाला हो। देखते ही देखते, मंडप के चारों तरफ लगे दीये और मशालें एक झटके में बुझ गईं। तभी, घने अंधेरे को चीरती हुई एक विकराल और गगनभेदी गर्जना गूंजी। लाल-अंगारे जैसी आँखें, इंसानी कद से दोगुना लंबा शरीर और हाथों में नुकीले नाखून लिए वह ब्रह्मराक्षस यानी एक साक्षात शैतान मंडप के बीच आ खड़ा हुआ। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता या रक्षा के लिए आगे बढ़ता, उस भयानक साए ने मंडप पर हमला कर दिया और बड़ी बेरहमी से दुल्हन रूपमती को सबके सामने मौत के घाट उतार दिया। चीख-पुकार और भगदड़ के बीच वह शैतान रूपमती के कीमती गहने लेकर वापस उसी घने जंगल की ओर गायब हो गया।
उस काली रात के बाद सुखपुर के लोगों के दिलों में ऐसा खौफ बैठा कि गाँव का पूरा माहौल ही बदल गया। लोगों ने अपनी बेटियों की शादियाँ धूमधाम से करना पूरी तरह बंद कर दिया। धीरे-धीरे एक अजीब सा रिवाज बन गया कि अगर गाँव में किसी की शादी होती भी, तो वह बेहद सादगी से, बिना किसी शोर-शराबे के की जाती थी। शादियों में सुहाग की निशानियाँ जैसे लाल सिंदूर, भारी मांग टीका, और खनकती हुई सुहाग की चूड़ियाँ दुल्हन से कोसों दूर रखी जाती थीं। लोगों का अटूट मानना था कि ब्रह्मराक्षस सुहाग के इन गहनों और लाल रंग की तरफ ही सबसे ज्यादा आकर्षित होता है। दुल्हनें सफेद या साधारण सूती कपड़ों में, बिना किसी श्रृंगार के, चुपचाप विदा कर दी जाती थीं और सुखपुर जैसे अपनी रौनक ही भूल चुका था। वक्त बीतता गया, और सालों बाद उसी डरे-सहमे गाँव में एक नया मोड़ आया जब गाँव के छोर पर स्थित एक विशाल, पुरानी हवेली को शहर से आए एक संपन्न राठौर परिवार ने खरीद लिया। इस परिवार के मुखिया दिग्विजय सिंह राठौर एक स्वाभिमानी, तार्किक और पुरानी रूढ़ियों को न मानने वाले इंसान थे। उनके साथ उनकी पत्नी सुमित्रा और उनकी बेहद खूबसूरत बेटी अंजलि आई थी, जिसकी शादी शहर के ही एक प्रतिष्ठित परिवार के लड़के मानव से तय हो चुकी थी। दिग्विजय सिंह अपनी इकलौती बेटी की शादी उसी विशाल हवेली से पूरे धूमधाम और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ करना चाहते थे। जब यह बात गाँव के लोगों को पता चली, तो पूरे गाँव में हड़कंप मच गया और गाँव के सरपंच कुछ बुजुर्गों के साथ तुरंत राठौर जी की हवेली पहुंचे। सरपंच ने हाथ जोड़कर कहा कि राठौर साहब, आप बाहर से आए हैं, इसलिए आप इस गाँव के इतिहास और उस अभिशप्त साए से वाकिफ नहीं हैं। यहाँ धूमधाम से शादी करना सीधे मौत को दावत देना है, इसलिए कृपया अंजलि बेटी की शादी बिना तामझाम के, बिना सिंदूर, मांग टीके और चूड़ियों के बिल्कुल साधारण तरीके से करवाइए वरना अनर्थ हो जाएगा। दिग्विजय सिंह ने उनकी बात सुनी और हंसते हुए कहा कि सरपंच जी, हम आधुनिक युग में जी रहे हैं और यह सब अंधविश्वास और मनगढ़ंत कहानियाँ हैं। हो सकता है सालों पहले कोई डाकू आया हो, जिसे आप लोगों ने ब्रह्मराक्षस मान लिया, लेकिन मैं अपनी बेटी के सबसे बड़े दिन को किसी झूठे डर के कारण बर्बाद नहीं होने दूँगा और अंजलि की शादी पूरे ठाठ-बाठ, लाल जोड़े, सिंदूर और गहनों के साथ ही होगी।
गाँव वाले निराश होकर और एक अनहोनी की आशंका से कांपते हुए वापस लौट आए और उन्होंने तय कर लिया कि वे इस शादी से दूर ही रहेंगे। शादी का दिन आ गया और राठौर हवेली को दुल्हन की तरह सजाया गया, लेकिन पूरा गाँव सन्नाटे में डूबा था। अंजलि बेहद खूबसूरत लग रही थी, उसने गहरे लाल रंग का भारी लहँगा पहना था, उसकी मांग में सोने का भव्य मांग टीका चमक रहा था, और हाथों में हरी-लाल चूड़ियों का सेट था। दूल्हा मानव भी अपनी बारात के साथ हवेली पहुंच चुका था और रात के ठीक बारह बजे फेरों का शुभ मुहूर्त शुरू होते ही पंडित जी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। हवेली के भीतर का माहौल खुशनुमा था, लेकिन हवेली के ठीक बाहर, हवा की सरसराहट डरावनी होती जा रही थी। तभी, अचानक वही हुआ जिसका पूरे गाँव को डर था। तेज, बर्फीली हवा का एक झोंका हवेली के बड़े दरवाजों को तोड़ता हुआ अंदर दाखिल हुआ और एक झटके में पूरी लाइटें गुल हो गईं, यहाँ तक कि हवेली के जनरेटर ने भी काम करना बंद कर दिया। घने अंधेरे में सिर्फ मंडप की आग जल रही थी और तभी एक रोंगटे खड़े कर देने वाली, भारी आवाज पूरी हवेली में गूंज उठी। हवेली के आंगन में एक विशाल, काली परछाईं प्रकट हुई जिसकी आंखें अंधेरे में चमक रही थीं और उसके लंबे, नुकीले नाखून साफ देखे जा सकते थे। वह सीधे मंडप की तरफ बढ़ा, जहाँ अंजलि बैठी थी। सुमित्रा चीख पड़ी और मानव अंजलि के आगे ढाल बनकर खड़ा हो गया, लेकिन उस भयानक जीव ने एक ही झटके में मानव को दूर फेंक दिया और अंजलि का हाथ पकड़कर उसके गले से भारी नौलखा हार और सिर से मांग टीका खींचने लगा।
लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ जिसकी उम्मीद उस ब्रह्मराक्षस को भी नहीं थी। जैसे ही उस जीव ने अंजलि को पूरी तरह पकड़ने की कोशिश की, अंजलि ने अचानक अपनी कमर में छुपाया हुआ एक छोटा, तीखा खंजर निकाला और पूरी ताकत से उस जीव के कंधे में घोंप दिया। वह जीव दर्द से चिल्ला उठा और उसकी आवाज किसी राक्षस की नहीं, बल्कि एक आम इंसान की तरह निकली। उसी पल, दिग्विजय सिंह ने ताली बजाई और अचानक पूरी हवेली तेज फ्लड लाइट्स की रोशनी से जगमगा उठी क्योंकि यह कोई बिजली जाना नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी योजना का हिस्सा था। चारों तरफ से पुलिस की एक पूरी टीम हथियारों के साथ हवेली के कोनों से बाहर निकल आई और उस जीव को घेर लिया। कंधे से बहते खून को दबाते हुए वह जीव भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन पुलिस के जांबाज अफसरों ने उसे दबोच लिया। दिग्विजय सिंह आगे बढ़े और उन्होंने उस राक्षस के चेहरे पर लगा भयानक, सिलिकॉन और रबर से बना मुखौटा झटके से खींचकर उतार दिया। मुखौटा उतरते ही वहाँ खड़े हर शख्स के होश उड़ गए क्योंकि वह कोई ब्रह्मराक्षस या भूत नहीं था, बल्कि उसी गाँव का पंडित रमाकांत था, जो गाँव के मंदिर में पूजा-पाठ कराता था और जिसे लोग भगवान का रूप मानते थे। पूरा गाँव, जो हवेली के बाहर दूर खड़ा तमाशा देख रहा था, रोशनी होते ही अंदर भागकर आया और पंडित रमाकांत को इस हालत में देखकर सरपंच के पैरों तले जमीन खिसक गई। सरपंच ने लड़खड़ाती आवाज में पूछा कि पंडित जी? आप ब्रह्मराक्षस? लेकिन क्यों? सालों पहले जमींदार की बेटी को किसने मारा था? तब पुलिस इंस्पेक्टर ने पंडित के मुंह पर एक जोरदार तमाचा जड़ा और कहा कि इसने ही मारा था, और यहाँ कोई ब्रह्मराक्षस नहीं है बल्कि यह सब इसकी और इसके गैंग की एक सोची-समझी साजिश थी।
दिग्विजय सिंह ने गाँव वालों को समझाते हुए पूरा सच सामने रखा कि सरपंच जी, जब मैंने यह हवेली खरीदी, तो मुझे इस गाँव की अजीब कहानियों पर शक हुआ और मैंने शहर से अपने एक दोस्त, जो पुलिस में सीनियर सीआईडी अफसर हैं, को बुलाया। हमने गुपचुप तरीके से जांच शुरू की तो हमें पता चला कि जब भी इस गाँव में धूमधाम से शादी होती थी, तो दुल्हन के कीमती जेवरात गायब हो जाते थे और दुल्हन की हत्या कर दी जाती थी। इंस्पेक्टर ने आगे बताया कि पंडित रमाकांत असल में एक शातिर लुटेरा और हत्यारा है, जिसने सालों पहले जमींदार की बेटी की शादी के वक्त उसके करोड़ों के जेवरात पर नजर होने के कारण लूट को अंजाम देने के लिए ब्रह्मराक्षस का यह ढोंग रचा था और बदनामी से बचने के लिए उस मासूम की जान ले ली थी। उसके बाद, उसने गाँव में ऐसा खौफ फैलाया कि लोग शादियों में गहने और श्रृंगार ही न करें, और अगर कोई छिपकर गहने पहनता, तो यह पूजा के बहाने सब जान लेता और रात में राक्षस बनकर उन्हें लूट लेता। जंगल की वह पुरानी बावड़ी इसका ठिकाना थी, जहाँ इसने सालों से लूटा हुआ सोना और कीमती सामान छुपा रखा था। पंडित रमाकांत ने पुलिस के डर से अपना गुनाह कबूल कर लिया और रोते हुए कहा कि ब्रह्मराक्षस के डर के कारण गाँव वाले कभी पुलिस के पास नहीं गए और मेरा धंधा सालों से आराम से चल रहा था। गाँव वालों की आँखों से अंधविश्वास का वह काला चश्मा उतर चुका था और जिस ढोंगी को वे रक्षक समझते थे, वही भक्षक निकला। पुलिस पंडित रमाकांत और उसके साथियों को हथकड़ियों में जकड़कर ले गई और अगले दिन, सुखपुर गाँव में एक नया सवेरा हुआ। अंजलि और मानव की शादी उसी मंडप में, पूरे रीति-रिवाजों, लाल जोड़े, खनकती चूड़ियों और पूरे गाँव की मौजूदगी में धूमधाम से संपन्न हुई। गाँव के लोगों के चेहरों पर सालों बाद सच्ची मुस्कान थी और सुखपुर अब उस ब्रह्मराक्षस के काल्पनिक साए से हमेशा के लिए मुक्त होकर फिर से पुरानी खुशहाली और हरियाली की ओर लौट आया था।