एपिसोड - 7 तंत्र, मंत्र और यंत्र का ज्ञान
“किसी भी देवता को मारने का सबसे अच्छा तरीका है
कि उस पर विश्वास करना बंद कर दो”
ये लाइन मैं क्यों कह रहा हूँ? क्योंकि आज मैं उस ज्ञान के परदे खोल रहा हूँ जो आपको या तो देवताओ से मिलवा सकता है या खुद देवता बना सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि हमें बचपन से इस ज्ञान के नाम पर सिर्फ डराया गया है। अक्सर जब हम 'तंत्र-मंत्र और यंत्र' शब्द सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में काली रात, नींबू-मिर्ची, खोपड़ी या कोई भूत-प्रेत भगाने वाले इंसान का चेहरा आता है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश ने दुनिया को योग और ध्यान दिया, वो क्या इतना मूर्ख था कि ऐसी फालतू चीजों को अपने सबसे ऊंचे ज्ञान का हिस्सा बनाता? असल में, तंत्र वो सीक्रेट सुपर-साइंस है जिसे जानबूझकर हमसे छुपाया गया, ताकि हम कभी अपनी असली ताकत को पहचान ही न पाएं।
इस कहानी की शुरुआत होती है उस अंधेरे और रहस्यमयी रास्ते से, जिसके सेंटर में खड़ी हैं वो गुप्त देवियां और छिपे हुए देवता, जिनके बारे में समाज में कभी खुलकर बात ही नहीं की गई। आपने लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के नाम तो सुने होंगे, लेकिन क्या आपने कभी दस महाविद्याओं—जैसे मां धूमावती, छिन्नमस्ता या मातंगी के बारे में सुना है? इनकी तस्वीरें आम घरों में नहीं मिलतीं। क्यों? क्योंकि ये सिर्फ मूर्तियां नहीं हैं, ये आपके दिमाग और चेतना (Consciousness) की वो चरम सीमाएं हैं जिन्हें छूने से आम इंसान थर-थर कांपता है। जहां बाकी धर्म इंसान को सिर्फ सीधा-साधा, डरा हुआ और 'अच्छा' बच्चा बनना सिखाते हैं, वहीं तंत्र की ये गुप्त शक्तियां कहती हैं कि इस दुनिया की हर एनर्जी, चाहे वो श्मशान की राख हो, कामुकता हो या भयंकर गुस्सा, सब उसी एक सच का हिस्सा हैं। इन छिपे हुए देवताओं का काम आपको डराना नहीं है, बल्कि आपके चेहरे से समाज का नकली मुखौटा उतारकर आपको आपके असली और नग्न रूप से रूबरू कराना है।
अब कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट आता है। लोग सोचते हैं कि यह तंत्र-मंत्र सिर्फ हिंदुओं की बपौती है, लेकिन इतिहास के पन्नों को पलटेंगे तो आपका दिमाग घूम जाएगा। एनर्जी के इस साइंस को दुनिया के लगभग हर बड़े धर्म ने चोरी-छिपे अपनाया है। बौद्ध धर्म को हम बहुत शांत और अहिंसक मानते हैं, लेकिन उसकी 'वज्रयान' शाखा को देखिए - वहां तारा और महाकाल जैसे भयंकर तांत्रिक रूप पूजे जाते हैं, जो बिल्कुल हमारे शिव और शक्ति का रिप्लिका हैं। तिब्बत के बौद्ध भिक्षु आज भी जिन गुप्त मंत्रों और 'मंडला' यानी ज्यामितीय आकृतियों का इस्तेमाल करते हैं, वो हमारे मंत्र और यंत्र का ही दूसरा नाम हैं। बात यहीं खत्म नहीं होती। जब आप सूफी संतों को एक ही शब्द को बार-बार दोहराकर झूमते हुए देखते हैं, जिसे वो 'ज़िक्र' कहते हैं, तो वो असल में कुछ और नहीं बल्कि हमारा मंत्र विज्ञान ही है जो एक खास वाइब्रेशन पैदा करता है। यहाँ तक कि वेस्टर्न देशों के रहस्यवाद (Occult) में जो सीक्रेट सिम्बल्स और सील्स इस्तेमाल होती हैं, उनका सीधा कनेक्शन हमारे यंत्रों की ज्योमेट्री से है। रास्ते बदले, भाषाएं बदलीं, पर ब्रह्मांड की एनर्जी को हैक करने का हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पूरी दुनिया में एक ही रहा।
जब इस सुपर-साइंस के सबसे बड़े साइंटिस्ट और इनवेंटर की बात आती है, तो इतिहास की सुई एक ऐसे किरदार पर आकर रुकती है जिसे समाज ने सिर्फ एक विलेन माना—वो था लंकन नरेश रावण। रावण के लिए तंत्र कोई अंधविश्वास या जादू-टोना नहीं था, उसके लिए यह प्योर एडवांस फिजिक्स था। वह जानता था कि यह पूरा ब्रह्मांड सिर्फ दो चीजों पर चल रहा है—फ्रिक्वेंसी और ज्योमेट्री। रावण ने 'रावण संहिता' और 'उड्डीश तंत्र' जैसे ग्रंथ लिखकर इस विज्ञान को उस लेवल पर पहुंचा दिया जहां लोग उसे चमत्कारी समझने लगे। उसका सबसे बड़ा इन्वेंशन था 'शिव तांडव स्तोत्र'—यह सिर्फ एक कविता नहीं है, यह साउंड वेव्स (ध्वनि तरंगों) का एक ऐसा खतरनाक कॉम्बिनेशन है जो अगर सही फ्रिक्वेंसी पर गाया जाए, तो प्रकृति के तत्वों में हलचल मचा सकता है। उसने यंत्र विज्ञान का इस्तेमाल करके लंका को इस तरह डिजाइन किया था कि पूरा शहर एक मैग्नेटिक एनर्जी शील्ड में बदल गया था, जिसे भेदना किसी के बस की बात नहीं थी। रावण के लिए यंत्र एक रिसीवर की तरह थे और मंत्र उस रिसीवर को चालू करने का सीक्रेट पासवर्ड।
लेकिन अब सवाल उठता है कि इस पूरे विज्ञान की गंगोत्री, इसकी शुरुआत कहां से हुई? इसके लिए हमें समय के चक्र को थोड़ा पीछे घुमाना होगा और चलना होगा आदिगुरु शिव और सप्तर्षियों की उस महान घटना की तरफ। केदारनाथ के कांति सरोवर के किनारे, जब आदिगुरु शिव महासमाधि से जागे, तो उनके सामने सात खोजी बैठे थे जिन्हें हम सप्तर्षि कहते हैं। शिव ने वहां बैठकर उन्हें कोई धर्म या संप्रदाय नहीं सिखाया। उन्होंने तो इस मानव शरीर की सात लाख बहत्तर हजार नाड़ियों और चक्रों का पूरा ब्लूप्रिंट उन ऋषियों के सामने रख दिया। उन्होंने पहली बार दुनिया को समझाया कि यह इंसानी शरीर ब्रह्मांड का सबसे बड़ा कंप्यूटर है, और कैसे मंत्रों की आवाज से इसके भीतर के केमिकल्स और न्यूरॉन्स को बदला जा सकता है। सप्तर्षियों ने इसी महाज्ञान को वेदों में संहिताबद्ध किया। वेदों के 'अथर्ववेद' में इस तंत्र और यंत्र की बेसिक तकनीकों का खुलकर जिक्र है, जिसे अक्सर हमारे पोंगा-पंडित समझ ही नहीं पाए। वेदों में छिपे ये सूक्त असल में वो साइंटिफिक फॉर्मूले हैं जो बताते हैं कि मैटर (पदार्थ) को एनर्जी में और एनर्जी को मैटर में कैसे कनवर्ट किया जाए।
आज जब मॉडर्न साइंस थक-हारकर क्वांटम फिजिक्स और स्ट्रिंग थ्योरी पर पहुंचता है, तो वो अनजाने में इसी तंत्र-मंत्र के सामने घुटने टेक रहा होता है। आज का विज्ञान कहता है कि इस दुनिया में कुछ भी ठोस यानी सॉलिड नहीं है, सब कुछ सिर्फ वाइब्रेशन है—यही तो हमारा मंत्र विज्ञान सदियों पहले कह चुका है। जब न्यूरोसाइंस कहता है कि खास तरह के सिम्बल्स या आकृतियों को देखने से हमारे दिमाग के न्यूरॉन्स एक स्पेशल पैटर्न में फायर करते हैं—तो यह हमारे यंत्र विज्ञान का ही जीता-जागता सबूत है। तंत्र कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक ऐसी सुपर-टेक्नोलॉजी है जो आपके सबकॉन्शियस माइंड (अवचेतन मन) के उस बंद ताले को खोलती है जिसके पीछे असीमित शक्तियां सोई हुई हैं। आखिर में, जब आप समाज के बनाए डर और नियमों के पिंजरे को तोड़कर इस तंत्र के विज्ञान को समझ लेते हैं, तो ब्रह्मांड का हर सीक्रेट आपके सामने खुद-ब-खुद खुल जाता है। तब आपकी आंखें खुलती हैं और आपको समझ आता है कि जिस भगवान को तुम जिंदगी भर बाहर ढूंढते रहे, वो अनंत शक्ति तो तुम्हारे ही भीतर सोई हुई थी—बस तुम्हें उसका पासवर्ड नहीं पता था।