गाँव के बाहर एक पुराना और सुनसान मकान था। लोग कहते थे कि उस मकान में वर्षों पहले एक परिवार रहस्यमय तरीके से गायब हो गया था। उसके बाद से हर रात ठीक 3:03 बजे उस मकान के मुख्य दरवाज़े पर तीन बार दस्तक सुनाई देती थी।
ठक... ठक... ठक...
गाँव के बुज़ुर्ग हमेशा चेतावनी देते थे, "तीसरी दस्तक के बाद कभी दरवाज़ा मत खोलना। जो खोलता है, वह वापस तो आता है... लेकिन पहले जैसा नहीं रहता।"
आदित्य शहर से पढ़ाई करके गाँव लौटा था। उसे ऐसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था। उसने अपने दोस्तों से कहा, "अगर सच में वहाँ कोई भूत है, तो आज रात मैं उससे मिलकर ही लौटूँगा।"
वह अपना मोबाइल, टॉर्च और कैमरा लेकर रात को उस मकान में पहुँचा। मकान के अंदर चारों तरफ़ धूल जमी थी। टूटी हुई खिड़कियों से हवा की सीटी जैसी आवाज़ आ रही थी। दीवारों पर मकड़ी के जाले लटके थे और ऐसा लग रहा था जैसे कोई उसे लगातार देख रहा हो।
समय धीरे-धीरे बीतने लगा।
जैसे ही घड़ी में 3:03 बजे, अचानक दरवाज़े पर तीन तेज़ दस्तक हुई।
ठक... ठक... ठक...
आदित्य की साँसें तेज़ हो गईं।
उसने हिम्मत करके पूछा, "कौन है?"
बाहर से एक धीमी और डरावनी आवाज़ आई—
"मैं... तुम हूँ।"
आदित्य ने बिना सोचे दरवाज़ा खोल दिया।
बाहर कोई नहीं था।
लेकिन दरवाज़े के सामने एक पुरानी डायरी रखी थी। उसने उसे उठाया और आख़िरी पन्ना खोला।
उस पर लिखा था—
"जो भी यह पढ़ रहा है, वह अब असली नहीं है। असली इंसान दरवाज़ा खोलते ही बाहर चला गया... और उसकी जगह मैं अंदर आ गया।"
आदित्य के हाथ काँपने लगे। तभी उसका मोबाइल बजा।
माँ का फ़ोन था।
"बेटा... तुम अभी घर आए थे ना?"
आदित्य घबराकर बोला, "नहीं माँ... मैं तो अभी भी पुराने मकान में हूँ।"
कुछ पल तक सन्नाटा रहा।
फिर माँ काँपती हुई आवाज़ में बोलीं—
"तो... जो अभी हमारे घर में बैठा है... वह कौन है?"
इतना कहते ही फ़ोन कट गया।
आदित्य पूरी ताकत से घर की ओर भागा। जब वह घर पहुँचा, तो खिड़की से अंदर झाँककर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
सोफ़े पर वही बैठा था।
वही चेहरा...
वही कपड़े...
लेकिन उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
वह धीरे-धीरे मुस्कुराया और बोला—
"तुम देर से आए... अब यह ज़िंदगी मेरी है।"
अचानक पूरे घर की लाइटें बुझ गईं। चारों तरफ़ अंधेरा फैल गया। उसी अंधेरे में फिर वही दस्तक सुनाई दी।
ठक... ठक... ठक...
इस बार आवाज़ घर के अंदर से आ रही थी।
आदित्य डर के मारे पीछे हटने लगा। तभी उसने देखा कि घर की हर दीवार पर उसकी ही परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं। लेकिन उन परछाइयों की हरकतें उससे अलग थीं। वे सभी एक साथ उसकी ओर बढ़ने लगीं।
उसने आँखें बंद कीं और ज़ोर से दरवाज़ा खोलकर बाहर भाग गया।
सुबह गाँव वाले उसे पुराने मकान के सामने बेहोश पड़े मिले।
जब उसे होश आया, तो उसने सारी बात बताई। गाँव वाले उसके साथ उस मकान में गए।
अंदर कोई नहीं था।
न डायरी...
न काली आँखों वाला आदमी...
सब कुछ पहले जैसा था।
लेकिन दीवार पर एक नई तस्वीर लगी हुई थी।
उस तस्वीर में आदित्य खड़ा मुस्कुरा रहा था।
तस्वीर के नीचे सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—
"अगला इंतज़ार... तीसरी दस्तक का।"
उस दिन के बाद आदित्य कभी पहले जैसा नहीं रहा। हर रात ठीक 3:03 बजे उसके दरवाज़े पर तीन बार दस्तक सुनाई देती थी।
लेकिन उसने दोबारा कभी दरवाज़ा नहीं खोला।
गाँव के लोग आज भी कहते हैं...
अगर किसी रात तुम्हारे दरवाज़े पर ठीक 3:03 बजे तीन दस्तक सुनाई दें...
तो भूलकर भी दरवाज़ा मत खोलना।
क्योंकि बाहर कोई भूत नहीं खड़ा होता...
बाहर तुम्हारा दूसरा रूप तुम्हारी ज़िंदगी लेने का इंतज़ार कर रहा होता है।
— समाप्त —