Jab Rishta pyaar ban jaye - 12 in Hindi Love Stories by Priyam Gupta books and stories PDF | जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 12

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 12

Episode 12 – जब एहसास नाम माँगने लगे 



कुछ एहसास ऐसे होते हैं
जो अचानक नहीं आते,
धीरे-धीरे जगह बनाते हैं।
Priyam अब यह समझने लगी थी।
पहले वह खुद से भागती थी,
अब खुद से बातें करने लगी थी।
सुबह की हवा आज कुछ अलग लग रही थी।
खिड़की से आती हल्की ठंडक
उसके चेहरे को छू रही थी।
Priyam खिड़की के पास खड़ी थी,
हाथ में चाय का कप लिए।
पहले सुबहें
सिर्फ़ जल्दी उठने,
काम निपटाने
और दिन काटने का नाम थीं।
अब सुबह
सोच लेकर आती थी।
“मैं कहाँ खड़ी हूँ?”
और फिर वही सवाल—
“क्या मैं खुश हूँ?”
वह जानती थी,
इस सवाल का जवाब
अब पहले जैसा आसान नहीं रहा।
पिछले कुछ दिनों से
उसे खुद में बदलाव साफ़ दिख रहा था।
वह छोटी-छोटी बातों पर
रुकने लगी थी।
अगर Yaman देर से जवाब देता,
तो उसका मन
बार-बार फोन की तरफ़ चला जाता।
अगर उसका नाम स्क्रीन पर दिखता,
तो दिल
बिना पूछे खुश हो जाता।
वह खुद को समझाती—
“इतना react करना ठीक नहीं।”
पर दिल
तर्क नहीं मानता।
दोपहर में
वह बाहर निकली।
कोई ज़रूरी काम नहीं था।
बस खुद के साथ रहने की ज़रूरत थी।
बुकस्टोर में
किताबों की खुशबू
हमेशा उसे सुकून देती थी।
वह एक शेल्फ़ के सामने
काफ़ी देर तक खड़ी रही।
एक जोड़ा पास ही खड़ा था।
वे किसी किताब को लेकर
बहस कर रहे थे।
फिर अचानक
दोनों हँस पड़े।
कोई खास पल नहीं था,
कोई फिल्मी सीन नहीं।
लेकिन Priyam का दिल
अचानक भारी हो गया।
“क्या मैं भी किसी के साथ
इतनी सहज हो पाऊँगी?”
उसका मन
बिना पूछे
Yaman की तरफ़ चला गया।
वह चौंक गई।
“मैं क्यों उसकी तुलना
हर जगह ढूँढ रही हूँ?”
उसने किताब उठाई,
पर पढ़ नहीं पाई।
शाम को
उसकी सहेली का कॉल आया।
कुछ इधर-उधर की बातें हुईं।
फिर सहेली ने सीधा पूछा—
“तू बदल गई है।”
Priyam चुप रही।
“पहले तू हर बात में
खुद को दोष देती थी,”
सहेली बोली।
“अब तू सोचती है,
पर टूटती नहीं।”
Priyam ने धीमे से कहा—
“क्योंकि अब कोई है
जो मुझे चुप नहीं कराता।”
“Yaman?”
सहेली ने पूछा।
Priyam ने जवाब नहीं दिया।
लेकिन चुप्पी
काफ़ी थी।
“ये प्यार है?”
सहेली ने फिर पूछा।
Priyam ने कहा—
“शायद…
पर डर के साथ।”
“तो ये सही है,”
सहेली ने कहा।
“गलत प्यार में डर होता है,
सही प्यार में
डर के बावजूद ठहराव होता है।”
उस रात
Priyam बहुत देर तक जागती रही।
कमरा अंधेरे में था,
लेकिन उसके मन में
बहुत कुछ साफ़ हो रहा था।
उसने खुद से सवाल किया—
“अगर यह रिश्ता न हुआ,
तो क्या मैं उसे याद करूँगी?”
जवाब आया—
हाँ।
“अगर वह दूर चला गया,
तो क्या मैं ठीक रहूँगी?”
कुछ देर चुप्पी।
फिर जवाब—
रहूँगी…
पर खाली।
यही एहसास
उसे सबसे ज़्यादा डराने वाला था।
उसने फोन उठाया।
इस बार सिर्फ़ हालचाल के लिए नहीं।
उसने कॉल किया।
Yaman उस वक़्त अकेला था।
फोन देखा—
Priyam
उसका दिल
एक पल के लिए तेज़ धड़का।
“हाँ?”
उसने शांत स्वर में कहा।
“मैं आपको disturb तो नहीं कर रही?”
Priyam ने पूछा।
“आप कभी disturb नहीं होतीं,”
Yaman ने बिना सोचे कहा।
कुछ पल चुप्पी रही।
फिर Priyam बोली—
“मैं आज थोड़ा confused हूँ।”
Yaman ने कहा—
“तो बोलिए।”
“मुझे डर लगता है,”
Priyam ने कहा।
“लेकिन अब डर के साथ
एक और चीज़ जुड़ गई है।”
“क्या?”
Yaman ने पूछा।
उसने आँखें बंद कर लीं।
“आपकी कमी।”
फोन के उस सिरे पर
कुछ सेकंड की खामोशी थी।
फिर Yaman बोला—
“मैं भी यही महसूस कर रहा हूँ।”
उस एक वाक्य में
कोई वादा नहीं था।
पर सच्चाई थी।
कॉल खत्म होने के बाद
Priyam देर तक
फोन हाथ में लिए बैठी रही।
उसे लगा
जैसे उसने
अपने दिल की बात
पहली बार बिना घबराए कही हो।
अगले दिन
माँ ने उसे बुलाया।
“एक रिश्ता आया है,”
उन्होंने बस इतना कहा।
पहले Priyam ऐसे मौकों पर
घबरा जाती थी।
आज वह शांत थी।
“मैं किसी और को नहीं देख सकती,”
उसने साफ़ कहा।
माँ ने उसे ध्यान से देखा।
“अब तुम किसी से बच नहीं रही,”
उन्होंने कहा।
“अब तुम किसी की तरफ़
धीरे-धीरे बढ़ रही हो।”
Priyam की आँखें नम हो गईं।
शाम को
Priyam और Yaman मिले।
कोई तय बात नहीं थी।
बस साथ चलना था।
कुछ देर बाद
Priyam ने कहा—
“अगर कभी
मैं बहुत ज़्यादा सोचने लगूँ…”
Yaman ने बात पूरी की—
“तो मैं आपको याद दिलाऊँगा
कि आप अकेली नहीं हैं।”
“और अगर आप
बहुत practical हो गए?”
Priyam ने पूछा।
Yaman मुस्कुराया।
“तो आप मुझे
थोड़ा emotional बना देना।”
दोनों हँस पड़े।
उस हँसी में
कोई डर नहीं था।
रात को
Priyam ने डायरी में लिखा—
आज मैंने डर के साथ
खुशी को भी स्वीकार किया।
शायद यही प्यार है—
जहाँ मैं खुद को खो नहीं रही,
बल्कि पा रही हूँ।