हॉस्पिटल से बाहर निकलते ही ऐसा लग रहा था जैसे अंकिता और उसकी माँ की दुनिया एक ही पल में उजड़ गई हो। दोनों की आँखें खुली थीं, लेकिन होश कहीं खो चुके थे। सड़क पर लोग आ-जा रहे थे, गाड़ियाँ दौड़ रही थीं, लेकिन उन्हें न किसी की आवाज़ सुनाई दे रही थी और न ही अपने आसपास की कोई चीज़ दिखाई दे रही थी। बस दोनों चुपचाप एक-दूसरे का सहारा लेकर चलते जा रही थीं।
काफी देर तक यूँ ही भटकने के बाद किसी तरह वे अपने घर पहुँचीं। घर का दरवाज़ा बंद होते ही अंकिता फूट-फूटकर रो पड़ी। उसकी माँ ने उसे गले से लगा लिया, लेकिन आज एक माँ भी अपनी बेटी का दर्द कम नहीं कर पा रही थी। उस घर में सिर्फ़ सिसकियों की आवाज़ गूँज रही थी।
अगले दो दिन तक घर में न ढंग से खाना बना, न किसी ने ठीक से कुछ खाया। अंकिता अपने कमरे में बंद रहती और उसकी माँ दरवाज़े के बाहर बैठी भगवान से बस एक ही सवाल करती—"मेरी बेटी के साथ ही ऐसा क्यों हुआ?"
तीसरे दिन सुबह, बहुत देर तक खामोशी छाई रही। फिर काँपती आवाज़ में उसकी माँ बोली,
"बेटा... अगर ये बच्चा इस दुनिया में आया, तो हर पल हमें उस दर्द की याद दिलाएगा जिससे हम कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।"
अंकिता की आँखों से फिर आँसू बहने लगे। उसने अपने पेट पर हाथ रखा। उसके अंदर एक मासूम ज़िंदगी पल रही थी, जिसकी कोई गलती नहीं थी। लेकिन हालात इतने बेरहम थे कि उसके सामने कोई आसान रास्ता नहीं बचा था। बहुत देर तक सोचने के बाद उसने भारी मन से सिर झुका दिया। फैसला हो चुका था।
अगले ही दिन माँ-बेटी अस्पताल पहुँचीं। डॉक्टर ने अंकिता की पूरी बात ध्यान से सुनी। उसकी मानसिक और शारीरिक हालत देखकर डॉक्टर भी कुछ पल के लिए चुप हो गईं। सारी ज़रूरी जाँच और सलाह के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी होने लगी।
उधर, शहर के दूसरे कोने में रणविजय अपनी ही दुनिया में व्यस्त था। उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच उससे छिपा हुआ है। उसे यह भी नहीं मालूम था कि उसके नाम से जुड़ी एक नन्ही-सी ज़िंदगी इस दुनिया में आने से पहले ही खत्म होने वाली है।
अस्पताल की उस ठंडी और सफेद दीवारें, उस सर्जिकल कमरे की गंध—सब कुछ अंकिता के लिए किसी सजा जैसा था। उसकी माँ शालिनी ने बहुत हिम्मत जुटाकर एक डॉक्टर का इंतज़ाम किया था, जो शालिनी की अपनी पुरानी सहेली थी। सब कुछ ऑपरेशन के लिए तैयार था। अंकिता ऑपरेशन टेबल पर लेटी हुई थी, उसकी आंखों से आँसू लगातार बह रहे थे। वह बार-बार कांपते हाथों से अपने पेट को छू रही थी।
डॉक्टर ने शालिनी की ओर देखा और धीरे से सिर हिलाया कि अब प्रक्रिया शुरू करनी होगी। लेकिन तभी, अंकिता के भीतर कुछ बदल गया। उसने महसूस किया कि यह नन्ही सी जान, जिसका कोई दोष नहीं, वह इस दुनिया में आना चाहती है। उसने सोचा कि रणविजय ने उसके साथ जो भी किया, वह उसका गुनाह था, लेकिन यह बच्चा तो उसकी अपनी आत्मा का हिस्सा है।
अंकिता अचानक बेड से नीचे उतर गई। शालिनी और डॉक्टर हैरान होकर उसे देखती रह गईं। अंकिता ने रोते हुए लेकिन बहुत मजबूती से कहा, "नहीं माँ, मैं यह नहीं कर सकती। मैं एक निर्दोष की जान नहीं ले सकती। यह बच्चा मेरा है। मैं इसे किसी भी हाल में मार नहीं सकती। मैं इसकी पूरी जिम्मेदारी उठाऊंगी, चाहे पूरी दुनिया मेरे खिलाफ क्यों न हो जाए।"
शालिनी की आँखों से भी आँसू छलक आए। उसे समझ आ गया कि उसकी बेटी अब टूट चुकी थी, लेकिन उसने एक नई हिम्मत पैदा कर ली थी। उस दिन अंकिता ने सिर्फ अपने बच्चे को नहीं बचाया, बल्कि उसने अपने अंदर के डर को भी मार गिराया। उसने उसी दिन तय कर लिया था कि वह अब और नहीं भागेगी।
उसी दिन अंकिता का एक नया सफर शुरू हुआ। उसने उसी छोटे से गाँव में रहकर सिलाई के काम के साथ-साथ खुद को और अपने आने वाले बच्चे के लिए मजबूत बनाना शुरू किया।
अंकिता ने जैसे ही ये फैसला लिया, उसके चेहरे पर एक अलग ही शांति आ गई है। वो समझ चुकी है कि अब ये बच्चा ही उसकी दुनिया है। शालिनी भी अब अपनी बेटी के इस फैसले के साथ खड़ी है। माँ-बेटी ने मिलकर ये ठान लिया है कि वो अब उस खौफ के साये में नहीं जिएंगी।
दिन बीतने लगे हैं। अंकिता के पेट में पल रही वो जान अब धीरे-धीरे बड़ी हो रही है। अंकिता अब सिलाई के काम में और ज्यादा मन लगाने लगी है ताकि वो अपने बच्चे के भविष्य के लिए कुछ पैसे जोड़ सके। वो अब गाँव में सबको यही कहती है कि वो एक विधवा है, ताकि कोई उसके बच्चे के पिता के बारे में सवाल न उठाए।
उधर, शहर में रणविजय का पागलपन और बढ़ता ही जा रहा है। उसे अभी भी यकीन नहीं है कि अंकिता इतनी दूर निकल गई है। वो अब भी उन पुराने वीडियो को देख-देख कर अपनी सनक को हवा दे रहा है। उसे ये तो पता है कि अंकिता शहर छोड़ चुकी है, लेकिन उसे ये बिल्कुल भी अंदाजा नहीं है कि अंकिता के साथ उसकी अपनी एक 'निशानी' भी है।
समय का पहिया घूम रहा है। अंकिता अब काफी बदल गई है, वो पहले से कहीं ज्यादा निडर और सख्त हो गई है।
दिन बीतते गए और शालिनी अपनी बेटी और आने वाली नन्हीं सी जान के आने का बेसब्री से इंतज़ार करती रही। प्रेगनेंसी के दौरान अंकिता की खूबसूरती और भी निखर गई थी, उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गई थी। देखते ही देखते समय का पहिया आगे बढ़ा। एक रात, अचानक अंकिता को पेट में बहुत तेज दर्द उठा। शालिनी घबरा गई और आनन-फानन में उसे अस्पताल ले गई।
उस रात अस्पताल में एक नन्ही सी परी का जन्म हुआ। बच्ची बहुत ही प्यारी थी, बिल्कुल अपनी माँ अंकिता की फोटोकॉपी जैसी। उसका पूरा चेहरा अंकिता से मिलता था, बस उसकी आँखें और चेहरे की बनावट में रणविजय की हल्की सी झलक थी। शालिनी ने जब उस बच्ची को पहली बार गोद में लिया, तो उसकी आँखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। अंकिता ने जैसे ही अपनी बेटी को अपनी गोद में लिया, उसने उस नन्हीं सी जान को देखकर अपने सारे दुख और दर्द को भुला दिया। उसे लगा कि उसकी दुनिया अब पूरी हो गई है।
लेकिन, उस नन्हीं सी बच्ची के चेहरे में छिपा रणविजय का वो अंश, क्या कभी अंकिता की शांति को खतरे में डालेगा? अंकिता को क्या पता था कि उसकी ये बेटी एक दिन उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच बनकर सामने आएगी।