Mafia King - 8 in Hindi Love Stories by Sah Ankita books and stories PDF | Mafia King - 8

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Mafia King - 8

उधर, रणविजय का गुस्सा दिन-ब-दिन और ज्यादा बढ़ता जा रहा था। सात महीने, आठ महीने, नौ महीने बीत चुके थे, लेकिन उसका पूरा नेटवर्क नाकाम साबित हो रहा था। अंकिता का कोई सुराग नहीं मिल पा रहा था। जिस लड़की को उसने एक हफ्ते में अपना गुलाम बनाने की कोशिश की थी, आज वही उसके हाथ से रेत की तरह फिसल गई थी। उसका पारा हर दिन और हाई होता जाता। वो दफ्तर के उस कमरे में घंटों बैठा रहता, जहाँ उसने अंकिता को कैद रखा था। वह स्क्रीन पर वही पुरानी वीडियो देखता रहता और गुस्से में कांच के गिलास दीवार पर दे मारता। उसे अंकिता से ज्यादा उस 'हार' का बदला लेना था जो उसे चुभ रही थी।
देखते ही देखते वक्त का पहिया घूमा और चार साल बीत गए।
बनारस के उस छोटे से गाँव में अंकिता की जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी। उसकी बेटी, जिसे उसने 'आरोही' नाम दिया था, अब चार साल की हो चुकी थी। आरोही बिल्कुल अंकिता की तरह दिखती थी—वही मासूमियत और वही मुस्कान। लेकिन जब आरोही कभी गौर से देखती या गुस्सा करती, तो उसकी आँखों में रणविजय की वही गहरी और खतरनाक झलक दिखाई देती थी।
अंकिता ने अब खुद को बहुत संभाल लिया था। सिलाई के काम में उसने महारत हासिल कर ली थी और अब वह गाँव की सबसे कुशल दर्जी बन गई थी। उसके घर में अब कोई डर नहीं था, बस आरोही की चहक थी। उसे लगता था कि रणविजय अब उसे कभी नहीं ढूँढ पाएगा। लेकिन वह नहीं जानती थी कि नियति ने कुछ और ही खेल रचा था।
अंकिता ने तो अपने अतीत को दफन कर दिया था, पर क्या चार साल बाद भी रणविजय ने हार मान ली थी?
अंकिता को जिस कंपनी ने हायर किया था, उसका नाम था 'रेवेरा डिजाइन्स' (Riviera Designs)। यह मुंबई की सबसे बड़ी फैशन कंपनी थी, जिसे रणविजय ने ही एक अलग नाम से खड़ा किया था। अंकिता के लिए सब कुछ परफेक्ट था। उसे रहने के लिए एक आलीशान फ्लैट मिला था और काम का माहौल भी बहुत शानदार था। वह अपने काम में इतनी डूब गई थी कि उसे यह अंदाजा भी नहीं था कि वह अनजाने में उसी 'शेर' की मांद में काम कर रही है जिसका डर उसे चार साल से सता रहा था। रणविजय उस ऑफिस में कम ही आता था, क्योंकि उसके दर्जनों दफ्तर थे, इसलिए अंकिता फिलहाल सुरक्षित थी।
एक दिन, अंकिता अपनी चार साल की बेटी आरोही के लिए शॉपिंग करने मॉल गई थी। वह काफी खुश थी। तभी, भीड़ में चलते हुए वह अचानक एक लड़की से टकरा गई। दोनों के हाथ से शॉपिंग बैग्स गिर गए।
"आई एम सो सॉरी," अंकिता ने अपना सिर झुकाकर माफी मांगी और जैसे ही अपना चेहरा ऊपर उठाया, वह जड़ होकर रह गई।
सामने खड़ी लड़की की आंखें फटी की फटी रह गईं। वह लड़की थी 'परी'। परी, जो रणविजय की सगी बहन थी, लेकिन अंकिता के लिए वह सिर्फ एक नाम नहीं थी। बचपन में, जब अंकिता ने अपनी मेहनत और स्कॉलरशिप के दम पर शहर के सबसे बड़े स्कूल में दाखिला लिया था, तो परी उसकी सबसे गहरी और पक्की दोस्त बनी थी। उन दोनों की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। अंकिता ने तो परी के भाई (रणविजय) के बारे में तब कुछ नहीं सुना था, क्योंकि तब तक रणविजय का माफिया वाला रूप सामने नहीं आया था।
परी ने अंकिता को पहचान लिया था। उसकी आंखों में हैरानी और खुशी का मिश्रण था। उसने धीरे से अंकिता का हाथ पकड़ा और धीरे से फुसफुसाई, "अंकिता? क्या ये तुम हो? मैं तो सोच रही थी कि तुम हमेशा के लिए गायब हो गई हो!"
मॉल में पुरानी दोस्त को देखकर अंकिता की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने परी को गले लगा लिया और वे दोनों काफी देर तक बातें करती रहीं। परी बहुत चंचल स्वभाव की थी, वह अंकिता से मिलकर बेहद एक्साइटेड थी। उसने अंकिता से जिद की, "अंकिता, तू आज ही मेरे घर चल, मम्मी-पापा भी तुझे देखकर बहुत खुश होंगे।"
अंकिता ने प्यार से उसे मना कर दिया, "परी, अभी बहुत काम है, ऑफिस की जिम्मेदारियां हैं और घर पर भी काम है। मैं अभी नहीं आ सकती, फिर कभी पक्का चलेंगे।"
परी ने हार नहीं मानी। वह अपनी चंचलता में बोली, "ठीक है, अगर तू नहीं आ सकती, तो मैं खुद तेरे घर आ जाऊँगी! मुझे तुझसे अभी बहुत सारी बातें करनी हैं।"
अंकिता मुस्कुरा दी और उन दोनों ने अपने फोन नंबर एक-दूसरे के साथ एक्सचेंज कर लिए। परी से मिलकर अंकिता का मन बहुत खुश था। उस रात जब अंकिता अपने घर पहुँची, तो उसने अपनी नन्ही बेटी आरोही को सीने से लगा लिया और उसे ढेर सारा प्यार किया। उसने अपनी माँ को भी बताया कि आज का दिन कितना अच्छा रहा और कैसे उसे उसकी बचपन की दोस्त मिल गई। घर के माहौल में एक अलग ही सुकून था।
सब कुछ सामान्य लग रहा था। लेकिन अगले दिन रात के वक्त अंकिता के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर परी का नाम था।
अंकिता ने फोन उठाया, "हाँ परी, कैसे फोन किया?"
परी की आवाज में वही पुरानी एक्साइटमेंट थी, "अंकिता! मैं कल तेरे घर आ रही हूँ। मैंने तय कर लिया है! तू जल्दी से मुझे अपने घर का एड्रेस भेज, मैं सुबह निकल जाऊँगी।"
अंकिता को थोड़ा अजीब तो लगा, लेकिन अपनी दोस्त की खुशी के आगे वह मना न कर सकी। उसने सोचा कि घर पर तो सब ठीक है, तो परी के आने में क्या हर्ज है। उसने मुस्कुराते हुए अपने घर का पता मैसेज में भेज दिया। उसे क्या पता था कि वह अपनी खुशी से खुद ही अपने घर का दरवाजा रणविजय की परछाईं के लिए खोलने जा रही है।
अगले दिन परी अंकिता के घर पहुँची। वह बहुत खुश थी। घर में कदम रखते ही उसने अंकिता की माँ को सम्मान से प्रणाम किया। लेकिन जैसे ही उसकी नजर आरोही पर पड़ी, वह ठिठक गई। परी की आँखें आरोही के चेहरे को गौर से निहारने लगीं। उसे लगा कि यह छोटी सी बच्ची बिल्कुल उसके भाई रणविजय की याद दिला रही है। उसके चेहरे के कुछ नैन-नक्श, वो गहरी आँखें... सब कुछ बिल्कुल उसके भाई जैसा था। परी के मन में एक अजीब सी हलचल हुई, उसने सोचा, "ये बच्ची इतनी बड़ी कैसे हो गई और बिल्कुल भैया जैसी क्यों दिख रही है?"
परी ने तुरंत अंकिता से पूछा, "अंकिता, तूने शादी कर ली? ये किसकी बेटी है? क्या ये तेरी ही बेटी है?"
अंकिता का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह समझ गई थी कि खतरा अब उसके दरवाजे पर खड़ा है। उसने न तो 'हाँ' कहा और न ही 'ना', बस खामोश खड़ी रही। तभी आरोही दौड़ती हुई आई और अपनी माँ के पैरों से लिपट गई। उसने मासूमियत से पूछा, "मम्मा, ये कौन है?"
अंकिता ने कांपती आवाज में कहा, "बेटा, ये तेरी मौसी है, मेरी बचपन की दोस्त।"
आरोही ने बहुत ही प्यार से परी को देखा और कहा, "हेलो आंटी, आपका नाम क्या है?"
परी ने मुस्कुराते हुए कहा, "मेरा नाम परी है बेटा, तुम बहुत सुंदर हो।"
आरोही ने फौरन जवाब दिया, "हाँ, मैं सुंदर हूँ क्योंकि मैं अपनी मम्मा जैसी दिखती हूँ!
अंकिता ने गहरी सांस ली और परी का हाथ अपने हाथों में थाम लिया। उसकी आवाज में एक अजीब सी घबराहट थी। अंकिता ने फिर से कहा, "परी, तू पहले मेरी बात सुन। तुझे जो दिख रहा है या जो तू सोच रही है, वैसी बात नहीं है। मैं तुझे बाद में सब विस्तार से बताऊँगी, लेकिन अभी कुछ ऐसी बातें हैं जो मुझे तुझे बतानी बहुत जरूरी हैं। मेरे अतीत में कुछ ऐसा हुआ है जो बहुत ही..."
अंकिता अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाई थी कि परी फिर से चहकते हुए बोली, "अरे बाबा, तू इतनी सीरियस क्यों हो रही है? क्या हुआ? क्या जीजू बहुत सख्त हैं? या फिर तू अभी भी वही पुरानी शर्मीली अंकिता है? तूने तो बताया ही नहीं कि तू शादीशुदा है, इतने साल कहाँ थी तू? और आरोही... वो तो बिल्कुल किसी राजघराने की शहजादी जैसी लग रही है।"
परी की ये बातें अंकिता को और बेचैन कर रही थीं। अंकिता जानती थी कि अगर उसने अभी सच नहीं बताया, तो बाद में चीजें और भी उलझ जाएंगी। उसने परी की आँखों में देखते हुए कहा, "परी, मैं तुझे कुछ बहुत जरूरी बताना चाहती हूँ, लेकिन पहले वादा कर कि तू मेरी पूरी बात सुनेगी और मुझे बीच में नहीं टोकेगी।"
परी ने अपना हाथ अंकिता के होंठों पर रख दिया और शरारत भरी मुस्कान के साथ बोली, "अच्छा बाबा, ठीक है! पहले तू अपना वो 'इंपॉर्टेंट' काम निपटा ले, फिर मैं सुनूँगी। वैसे भी आज तो मैं पूरा दिन तेरे साथ ही रहने वाली हूँ, कहीं नहीं जा रही।"
अंकिता को लगा कि शायद यही सही वक्त है। वह अपने कमरे की खिड़की की ओर मुड़ी और मन में हिम्मत जुटाने लगी। उसे डर था कि अगर उसने अपनी कहानी शुरू की, तो उसका वह छुपा हुआ अतीत—वो काला साया—कहीं उसके इस खूबसूरत पल को खराब न कर दे।