MTNL ki ghanti in Hindi Drama by kalpita books and stories PDF | MTNL की घंटी - 28

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MTNL की घंटी - 28

महक चबूतरे पर बैठी थी, पैरों के पास फैली रजनीगंधा की खुशबू हवा में घुल रही थी।
उसके होंठों पर धीमे-धीमे शब्द बह रहे थे—
" जो  ख़तम हो किसी जगह, यह ऐसा सिलसिला नही
यही कहोगे तुम सदा...के दिल अभी भरा नही..."

पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई,
"अभी-अभी आई हो… अभी न जाओ छोड़कर…"
महक ने पलटकर देखा—देव वहाँ खड़ा था, आँखों में वही पुराना अपनापन, वही बिन कहे वादा।

देव उसके पास आकर बैठा, और बिना कुछ कहे उसे अपनी बाहों में खींच लिया। दोनो अपना अपना एक बुरा दौर छोड़ कर नयी मोहबत की दुनिया मे कदम रख रहे थे।
उस पल में कोई आवाज़ नहीं थी—बस उसकी धड़कनों का संगीत और चाँदनी का सन्नाटा।
महक ने महसूस किया जैसे सालों से बिखरी हुई उसकी रूह, देव की गिरफ्त में आकर फिर से जुड़ गई हो।

वक़्त की रफ़्तार रुक सी गई थी।
ऐसा लग रहा था कि दुनिया में बस दो ही लोग हैं, और बाकी सब जैसे किसी और ज़माने में खो गए हों।
दोनों की निगाहें चाँद पर थीं—सफेद, गोल, मासूम—जैसे वह भी उनकी कहानी सुन रहा हो।
मन ही मन दोनों सोच रहे थे—
काश, यह पूर्णिमा का चाँद कहीं न जाए… हमारी मासूम मोहब्बत का गवाह बनकर ताउम्र यहीं ठहरा रहे।

देव ने धीरे से उसके बालों को सहलाया,
"तुम जानती हो, महक… कुछ पल पूरे जीवन से भी लंबे होते हैं… और मैं चाहता हूँ, यह पल कभी खत्म न हो।"
महक की आँखों से एक नमी की लकीर उतरी,
लेकिन होंठों पर हल्की सी मुस्कान थी—
वो मुस्कान जो सिर्फ सच्चे प्यार में आती है, जब डर और खुशी दोनों एक साथ दिल में जगह बना लें।

महक कुछ देर चाँद को देखती रही।
देव ने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा,
"महक… कुछ बात करो।"

महक ने हल्की मुस्कान दी,
"मैं क्या बात करूँ… आप ही कुछ कहिए।"

देव हँसा—
"अरे, तुम तो लेखिका हो… कुछ भी कह दो, कोई कहानी, कोई ख़्वाब…"

महक उसकी आँखों में देखते हुए धीरे-धीरे और क़रीब आ गई।
देव ने अपना कोट उतारकर आधा महक की पीठ पर रखा, आधा अपनी पीठ पर—
ठंड अपने पूरे शबाब पर थी, लेकिन उस पल में दोनों को सिर्फ एक-दूसरे की गर्माहट महसूस हो रही थी।

"अच्छा," महक ने धीमे स्वर में कहा,

महक ने अचानक देव की ओर देखा,
"मैं एक प्रश्न पूछती हूँ… बताइये देव जी, चाँद का रंग क्या है?"

देव ने हल्की हँसी में सिर हिलाया,
"अच्छा, मैं भूल गया कि तुम टीचर भी हो…"
फिर शरारती अंदाज़ में बोला,
"जवाब दीजिये, देव जी।"

देव ने मुस्कुराते हुए कहा,
"इतना तो आसान है… चाँद का रंग सफ़ेद होता है… दूधिया, चमकीला सफ़ेद।"

"आसमान का रंग कैसा होता है?" महक ने अगला सवाल किया।
"नीला," देव ने तुरंत कहा।

"और सूरज?"
"कभी पीला… कभी लाल," देव ने जवाब दिया, जैसे ये किसी खेल का हिस्सा हो।
"तो बताइए, टीचर जी, मेरे कितने नंबर आये?"
देव ने मुस्कुराकर पूछा,

महक ने शरारती अंदाज़ में भौंहें उठाईं,
"ज़ीरो मिले हैं, देव जी आपको… लगता है आपको रंगों से प्यार नहीं है।"

देव ने तुरंत जवाब दिया,
"अभी तो सिर्फ तुमसे प्यार हो रहा है… और सिर्फ तुम्हारे रंग में ही रंगना चाहता हूँ मैं।"

महक हल्की हँसी के साथ बोली,
"शादी के बाद रंगना… अभी नहीं।"

देव ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा,
"तुम बस आ जाओ , महक… फिर देखना, मेरी ज़िंदगी के हर रंग में तुम्हारा नाम होगा।"

महक की मुस्कान गहरी हो गई, पर उसने नज़रे चुरा लीं।
चाँदनी में उनके चेहरों पर फैली वो हल्की शर्म और अपनापन, रात को और भी मोहब्बत से भर रहा था।

महक ने मुस्कुराते हुए कहा,
"देव जी… अब आप कुछ पूछिए।"

देव ने थोड़ी देर उसे देखा, फिर गंभीर स्वर में पूछा,
"मोहब्बत क्या है, महक?… दो शरीरों का मिलन?"

महक ने तुरंत सिर हिलाया,
"नहीं… बिल्कुल नहीं।
जब एक इंसान दूसरे इंसान के दिल की धड़कन सुने… और उसे  धड़कन मे   अपना नाम सुनाई दे… उसे मोहब्बत कहते हैं।
जैसे… MTNL की घंटी ‘ट्रिन-ट्रिन’ की जगह ‘देव जी… देव जी’ कहती थी।"

देव इस पर इतना ज़ोर से हँसा, जैसे इस जन्म में पहली बार हँसा हो।
उसकी हँसी पहाड़ों से टकराकर पूरे देहरादून की वादियों में गूँज उठी।
महक भी हँस पड़ी—दोनों की हँसी जैसे रात की ठंडी हवा में घुलकर एक गीत बन गई हो।

देव ने उसकी आँखों में गहराई से देखते हुए कहा,
"तुम सच में बहुत बड़ी लेखिका हो… तुम्हारी बातें मेरी समझ से बाहर हैं… पर  सच में बहुत प्यारी हो।"

इतना कहकर उसने अपनी बाहों की गिरफ्त कस दी—
मानो इस बार छोड़ने का कोई इरादा ही न हो।

वादियों में उनकी हँसी कुछ देर तक गूंजती रही, फिर धीरे-धीरे सन्नाटा लौट आया।
सिर्फ हवा की सरसराहट और दूर कहीं से आती झींगुरों की आवाज़ बची थी।

महक का चेहरा अचानक थोड़ा गंभीर हो गया।
देव ने महसूस किया, उसकी हथेलियाँ हल्की-सी ठंडी हो गई हैं।
"क्या हुआ, महक? इतनी चुप क्यों हो गई?"

महक ने चाँद से नज़रें हटाकर उसकी आँखों में देखा,
"बस… सोच रही थी… अगर ये पल कभी खत्म हो गया, तो क्या हम फिर ऐसे हँस पाएँगे?"

देव ने उसकी ठंडी उंगलियों को अपने हाथों में समेटते हुए कहा,
"ये पल कभी खत्म नहीं होगा… क्योंकि ये अब सिर्फ वक़्त में नहीं है, ये हमारी यादों में है… और यादों से कोई हमें अलग नहीं कर सकता।"

महक की आँखों में नमी तैर आई, लेकिन होंठों पर एक सुकून भरी मुस्कान थी।
देव ने उसके आँसू की बूँद को अंगूठे से मिटाया,
"लेखिका जी, ये कहानी हमारी है… और इसका अंत सिर्फ मैं और तुम तय करेंगे।"

और फिर उसने उसे और कसकर अपने सीने से लगा लिया—
जैसे पूरी दुनिया से कहना चाहता हो, "ये मेरी है कुछ भी हो जाए ..कही जाने नही दूंगा इसे"
                        _____________
काश देव की सोच सच हो जाये. ..क्या सच हो पायेगी? 
पढ़ना जारी रखे
.....to be continued