Is initiation necessary? in Hindi Spiritual Stories by prem chand hembram books and stories PDF | क्या दीक्षा आवश्यक है ?

Featured Books
Categories
Share

क्या दीक्षा आवश्यक है ?

जयगुरु 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
क्या दीक्षा आवश्यक है? — शास्त्र, संत और मानवता की दृष्टि से एक विचार
भारतीय सनातन आध्यात्मिक परंपरा में "दीक्षा" केवल एक धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि जीवन के रूपांतरण का आरंभ मानी गई है। दीक्षा का वास्तविक अर्थ है—अज्ञान से ज्ञान की ओर, असंयम से संयम की ओर तथा ईश्वर-विमुखता से ईश्वराभिमुखता की ओर अग्रसर होना।
आज अनेक लोग प्रश्न करते हैं—क्या केवल भगवान का नाम लेना पर्याप्त है या आध्यात्मिक जीवन में दीक्षा भी आवश्यक है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें शास्त्रों, संतों और मानव जीवन के अनुभव की ओर देखना होगा।
सबसे पहले उपनिषदों का मत देखते हैं। मुण्डक उपनिषद कहता है—
"तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्।"
अर्थात् परम सत्य के ज्ञान के लिए तत्त्वदर्शी गुरु का आश्रय ग्रहण करना चाहिए।
इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता (4.34) में कहते हैं—
"तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥"
अर्थात् तत्त्वदर्शी गुरु के पास विनम्रता, जिज्ञासा और सेवा-भाव से जाओ; वे तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे।
तांत्रिक तथा अनेक भक्ति परंपराओं में भी दीक्षा को साधना का प्रवेश-द्वार माना गया है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु और दीक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
परंतु यह भी समझना आवश्यक है कि दीक्षा केवल कान में मंत्र फूँक देना नहीं है। यदि मंत्र मिल जाए, पर जीवन में सत्य, सदाचार, संयम, सेवा और साधना का प्रवेश न हो, तो वह दीक्षा अपने उद्देश्य को पूरा नहीं करती। वास्तविक दीक्षा मनुष्य के भीतर नए संस्कार, नई चेतना और नए जीवन का संचार करती है।
इतिहास भी इस सत्य का साक्षी है कि अनेक महापुरुषों ने गुरु के मार्गदर्शन में अपने जीवन को धन्य बनाया। स्वामी विवेकानन्द ने श्री रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में आध्यात्मिक जागरण पाया। श्रील ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए श्रीकृष्ण भक्ति का संदेश विश्वभर में पहुँचाया।
सत्संग परंपरा के अनुसार परमदयाल श्री श्री ठाकुर अनुकूलचन्द्र ने अपनी पूज्य माता परमाराध्या जगजननी मनमोहिनी देवी से दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने दीक्षा को केवल मंत्र-प्रदान नहीं, बल्कि मनुष्य-निर्माण की वैज्ञानिक और व्यावहारिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुयायियों की मान्यता है कि वर्तमान युग में आचार्यदेव के दिशा-निर्देश और आशीर्वाद से लाखों ऋत्विक एवं सह-ऋत्विकों के माध्यम से प्रतिदिन असंख्य लोग दीक्षा ग्रहण कर आध्यात्मिक जीवन की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
सत्संग की मान्यता के अनुसार, दीक्षा के माध्यम से प्राप्त बीज-नाम साधक के जीवन में ईश्वर-स्मरण का आधार बनता है। परमदयाल श्री श्री ठाकुर ने बाल्यकाल से ही संस्कार निर्माण पर विशेष बल दिया और पाँच वर्ष की आयु में बीज-नाम तथा बारह वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण करने की व्यवस्था का उल्लेख किया।
वास्तव में दीक्षा का उद्देश्य केवल मंत्र देना नहीं, बल्कि दक्षता बढ़ाना है। जैसा कि श्री श्री ठाकुर की वाणी में कहा गया है—
"দীক্ষায় বাড়ায় দক্ষতা, কে নিষ্ঠা যেমন যার।
মন্ত্র হলো তপস্যা তুক সাধনা যেমন যার॥"
अर्थात् दीक्षा से दक्षता बढ़ती है; निष्ठा और साधना जितनी होगी, उतना ही उसका फल प्राप्त होगा।
मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व दया और करुणा पर आधारित है। ये किसी एक धर्म, जाति या संप्रदाय की संपत्ति नहीं, बल्कि समस्त मानवता के मूल गुण हैं। चाहे कोई हिन्दू हो, मुसलमान, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन या किसी अन्य परंपरा का अनुयायी—सभी महान धर्म मनुष्य को सत्य, करुणा, प्रेम, न्याय, सेवा और सदाचार का मार्ग दिखाते हैं।
वेद और उपनिषद आत्मज्ञान की प्रेरणा देते हैं। भगवद्गीता धर्ममय जीवन का संदेश देती है। पवित्र क़ुरआन इंसाफ़, रहमत (दया), भलाई और नेक आचरण पर बल देता है। बाइबल प्रेम, क्षमा और पड़ोसी से प्रेम करने की शिक्षा देती है। गुरु ग्रंथ साहिब सेवा, नम्रता और मानव-एकता का संदेश देता है। बौद्ध धर्म करुणा और मैत्री को साधना का आधार मानता है, जबकि जैन धर्म अहिंसा को सर्वोच्च धर्म कहता है।
मार्ग अलग-अलग हो सकते हैं, उपासना की पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, पर यदि मनुष्य के भीतर दया, करुणा, सत्य, सेवा और चरित्र का विकास नहीं हुआ, तो आध्यात्मिक साधना अधूरी रह जाती है।
आज हम देखते हैं कि अनेक लोग धन, पद और प्रसिद्धि प्राप्त कर लेने के बाद भी मानसिक अशांति, पारिवारिक विघटन, विवाह-विच्छेद, माता-पिता की उपेक्षा और रिश्तों में टूटन से जूझ रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि केवल बाहरी सफलता जीवन को पूर्ण नहीं बनाती। जब तक मनुष्य के भीतर संस्कार, संयम, करुणा और धर्मबोध नहीं जागते, तब तक वास्तविक सुख और शांति दुर्लभ रहते हैं।
दीक्षा संस्कार देती है। दीक्षा विद्या देती है। विनम्रता उसका अलंकार है। इन्हीं गुणों से सुसज्जित चरित्र में दया, करुणा, विवेक और धर्मबोध का विकास होता है। और जब धर्म का बोध होता है, तभी मनुष्य अपने अस्तित्व की रक्षा करना सीखता है।
परमदयाल श्री श्री ठाकुर की एक प्रेरणादायक बांग्ला वाणी है—
"শত দীক্ষা তুই এখনি নে , ইষ্টেতে রাখ সম্প্রীতি।
মরণ-তারণ এই নামজপে , কাটায় অকাল যমভীতি॥"
हिन्दी में उनका प्रेरणादायक संदेश है—
"तुम सत्संग का आश्रय ग्रहण करो, सतनाम का मनन करो। मैं तुम्हें निश्चय ही कहता हूँ, तुम्हें तुम्हारे उन्नयन के लिए सोचना नही पड़ेगा "
संत कबीरदास का प्रसिद्ध दोहा भी गुरु के महत्व को स्पष्ट करता है—
"गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय॥"
अतः शास्त्र, संत-परंपरा और जीवन के अनुभव हमें यह संकेत देते हैं कि सच्ची दीक्षा का उद्देश्य किसी संप्रदाय का विस्तार नहीं, बल्कि मनुष्य का निर्माण है। जिस दीक्षा से मनुष्य सत्य, प्रेम, सेवा, करुणा, सदाचार और ईश्वरनिष्ठ जीवन की ओर अग्रसर हो, वही दीक्षा सार्थक है।
अगले अध्याय में हम इस विषय पर चर्चा करेंगे कि दीक्षा कब लेनी चाहिए, किससे लेनी चाहिए, कौन दीक्षा का अधिकारी है तथा हमारे दैनिक जीवन में इसका क्या महत्व है।
यह लेख किसी धर्म, जाति, पंथ या समुदाय की श्रेष्ठता अथवा आलोचना के लिए नहीं लिखा गया है। इसका उद्देश्य केवल उन सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों पर चिंतन करना है जो समस्त मानवता के कल्याण का आधार हैं। यदि इस लेख से किसी के जीवन में सद्विचार, सदाचार और ईश्वराभिमुखता की एक छोटी-सी ज्योति भी प्रज्वलित हो जाए, तो यही इसकी सबसे बड़ी सफलता होगी।
ज्ञानदान को भारतीय परंपरा में श्रेष्ठ दानों में गिना गया है। यदि आपको यह लेख विचारणीय लगे, तो इसे केवल अपने तक सीमित न रखें। हो सकता है, आपके एक साझा करने से किसी के जीवन में नई दिशा का आरंभ हो जाए।

 जयगुरु। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
वंदे पुरुषोत्तमम 
" चंद्रा सत्संग केंद्र "
बोकारो , झारखंड