थोड़े उजाले, थोड़े अँधेरे के बीच में `उड़ियो पँख पसार
नीलम कुलश्रेष्ठ
जिस तरह हवा हरे पत्तों को सहलाती ,इठलाती वातावरण नम करती है या बारिश की इक बूँद किसी पत्ते पर थरथराती है। थोड़ा उजाला ,थोड़ा अँधेरा एक रहस्य उत्पन्न करता है या शब्दों के अम्बार में कुछ शब्द किसी अलौकिक शक्ति की भक्ति ,मंत्रोच्चार के बीच उठते हुए धुँये से अनिवर्चनीय आत्मिक शांति की बात करते हैं , ऐसी हैं निशा चंद्रा की कहानियों की भाषा उनके पांचवे कहानी संग्रह`उड़ियो पंख पसार `की। थोड़ी हैरानी ये है कि जिनके चार कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें दो गुजरात हिंदी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हैं ,के पांचवे कहानी संग्रह के प्रकाशन
में इतना अंतराल क्यों है ? ख़ैर ,ये उनका अपना निर्णय है बहरहाल फ़ेस बुक पर उनकी लिखी समीक्षाएं अपने दिल को छूते भावुक शब्दों के कारण लोकप्रिय हो रहीं हैं।
इन कहानियों का दायरा अलग अलग पात्रों में फैला हुआ है जैसे अघोरी ,विदेशों में बसी युवतियां ,घोस्ट राईटर ,कोई ज़बरदस्ती बदनाम गली में बैठा दी गई लड़की ,फ़्लाईट लेफ़्टीनेंट ,चिड़िया की बोली समझने वाली ,चूड़ी बेचने वाला ,धोखेबाज़ प्रेमी , उपेक्षित माँयें। ये हमारे आस पास के बिखरे समाज की करुण व आकर्षक कथानक की कहानियाँ हैं।
एक दिलचस्प बात ये है कि उन्होंने सती शब्द की टक्कर का शब्द `सता `खड़ा किया है। ये शीर्षक बहुत चौंकाता है। कहानी पढ़ते पढ़ते एक बद्ज़ात पति की छवि सामने आती जाती है। वह सता होता है तो क्यों ?ये जानकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
`उजली अमावस `किसी डॉक्टर या कह सकते हैं कि किसी बेहद व्यस्त पुरुष की पत्नी की व्यथा कथा है कि वह किस तरह अपनी प्रतिभा पति के कैरियर के लिये कुर्बान कर देती है। ये भी हम सबको पता है कि भारतीय देवियों के बलदान ,समर्पण की कोई कीमत नहीं है। जो लड़की हनीमून पीरियड में अपने डॉक्टर पति से पूछती है ,``तुम मुझे इतना ही प्यार करोगे ?``
वह अपने प्यार में उसे निहाल कर देता है लेकिन ज़िंदगी ढर्रे पर आते ही वह बहुत व्यस्त होता चला जाता है.यहाँ तक तो ठीक है लेकिन वही प्यार का दम भरने वाला न अपनी पत्नी की कद्र करता ,न उसकी प्रतिभा की। वही सीधी सादी लड़की कैसे क्रूर हो जाती है। क्रूरता किसी की भी हो उसका परिणाम किसी के लिए काली अमावस की रात बन जाता है।ये भी सत्य है कि यही अमावस का अन्धेरा उस पत्नी को भी वेध जाता है।
मुझे इस संग्रह की सभी कहानियाँ अपनी भाषा शैली के कारण ज़िंदगी से भरी छलकती हुई लगीं हैं। यदि नियति कुपित हो तो कोई डॉक्टर बनने का सपना देखता लड़का लगातार उसके प्रहारों से ,अपने घर में परिवार वालों की दो वर्ष में चार मौतों से इतना दुःख से पागल हो जाता है कि अपनी मेडीकल की डिग्री भी नदी में विसर्जित कर देता है।`अघोरी ` का नायक सन्यासी -अघोरी बन जाता है। मैं भी विश्वास नहीं कर पाती यदि हमारे समाने वाले फ़्लैट में ऐसा परिवार आकर नहीं बसता जिनके यहाँ दो महीने में पांच मौतें हुईं थीं। ग़नीमत ये थी कि बड़ा परिवार था इसलिए कुछ कंधे सिर रखकर रोने के लिए बचे थे।
अमेरिका से आई अनंता की कुछ ऐसी ही स्थिति को निशा ने अपनी जादुई भाषा से व्यक्त किया है ---`सांध्य घनीभूत हो रही है। सांध्य आरती के घंटे बज उठे हैं। आकाश में तारे टिमटिमा रहे हैं। गंगा का जल शांत हो चुका है। तट पर बैठी वह सोच रही है ,इस अनंत विश्व में वह कहाँ जाए ,कहाँ ?`
अघोरी व अनंता में से कौन किसको अपनी दुनियां में खींच ले जाता है ?ये जानने के लिए आपको `अघोरी `पढ़नी होगी।
विदेश और देश के बीच की आवाजाही की पृष्ठभूमि पर जहाँ `अर्हम `की नायिका जो रॉबिन चिड़िया की बोली समझती है व बोल सकती है। अपने गहन प्रेम पर पड़ी चोट से अमेरिका से वृन्दाबन आकर साध्वी बनकर अपने पिता तुल्य गुरु से वही प्रस्ताव पाती है जो आचार्य चतुरसेन की `चित्रलेखा `को वृद्ध राजपुरोहित से मिला था। उधर `माया महाठगिनी हम जानि `की नायिका माया डेनमार्क में अपनी बर्थ डे पार्टी में फ़्लाईट लेफ्टिनेंट शांतनु वशिष्ठ से मिलती है।उसके विवाह का वायदा करते हुए वह सोच भी नहीं पाती कि वह भारत जाएगा और वह तब तक उसके प्यार में इतना डूब चुकी होगी कि उसे उसकी याद में उसकी पुण्य तिथि पर बीस वर्ष तक दिया जलाना होगा। आगे ये कहानी बहुत चौंका देती है जब मामा के मरने के बाद अपना व्यवसाय समेटकर ,सब कुछ बेचकर माया भारत आती है तो क्यों आश्रम का रुख़ कर सन्यासिनी बन जाती है ?
आज की स्त्री तेज़ी से बदल रही है ,वह प्रतिकार करती है लेकिन समझ चुकी है पुरुष सत्ता से सिर टकराने का मतलब है ,सिर का ही घायल होना इसलिए त्रिया चरित्र अपनाती है चाहे `मुक्ति `की सुमन की मर्मान्तक तकलीफ़ कुछ लड़कियों को तो होती ही है। कारण मुक्ति के पति के पौरुष का पौरुषविहीन हो कर भी पत्नी को प्रताड़ित करना हो या किसी और कारण से उस पर शारीरीक या मानसिक अत्याचार करना हो। ऐसी स्थिति में सुमन उस पर जो भूत प्रेत आने का नाटक रचती है लेकिन कब तक ?स्त्रियों के हिस्टीरिया के दौरे पड़ने के बहुत से ऐसे ही कारण होते हैं। ये कहानी इस बड़े तथ्य को उद्घाटित करने के लिए जानी जाएगी।लड़कियां ,स्त्रियां जाने कितने गोपनीय दुखों से घिरी होतीं हैं, चाहे वे मानसिक विकलांग ही क्यों न हों। । ये अक्सर हिस्टीरिया की शिकार हो जातीं हैं।
अब बात पति पत्नी ,प्रेम ,परिवार आदि से अलग हटकर कहानियों की -`इतिवृत्त `.,`घोस्ट राइटर `. जब हम ट्रेन में अकेले सफ़र कर रहे होते हैं तो हमारा मन बीते हुए कल में और आज के बीच झूलता रहता है। ऐसी ही इस कहानी`इतिवृत्त ` की नायिका की है जो अपने प्रेमी और पति को याद कर रही है। रेल में यात्रा करते एक पुरुष की गोद में सिर रक्खे लेटी औरत को देखकर परम क्रोध में चीखती बूढ़ी औरत ,उसके साथ यात्रा करता बुड्ढा व भावेश कुमार -ये तीनों विचित्र पात्र ,इनके आपस में रिश्ते और एक ट्रेन की जीवंत यात्रा का वर्णन हमें भी ट्रेन की सैर करा देता है। आज के साहित्य का पतन `घोस्ट राइटर `कहानी पढ़कर बहुत दुःख के साथ लिख रहीं हूँ कि एक प्रकाशक का मेरे लिए सन्देश आया था कि हमारे यहाँ घोस्ट राइटर भी मिलते हैं।
मुझे`प्रारब्ध `कहानी पढ़कर एक परिचित डी. लिट .महिला आ गईं जिन्होंने अपनी बहू को प्लेन से दूसरे शहर भेजा कि वह गर्भ का सेक्स डिटर्मिनेशन करवा कर आये। यदि गर्भ में लड़की हो तो वहीं भ्रूण हत्या कर दे। ये तो बहू की किस्मत अच्छी थी कि उसके पेट में बेटा पल रहा था। इन्हीं सास की एक और क्रूरता की बात है- बड़ी बहू किन्ही कारणों से बहुत बीमार रहती थी। इतनी कि अपने को सम्भालना बहुत मुश्किल था.अचानक उसका नौ वर्ष का बेटा मर गया। अब सास व हर कदम पर साथ देने वाली ननद उसके पीछे पड़ गईं कि एक और बेटा पैदा करे। आप ही सोचिये क्या एक बार गर्भ धारण करके ये सौ प्रतिशत सम्भव था ?एक जर्जर शरीर वाली साइंस में पी. एच डी. बहू से ये कैसी निर्मम मांग ? `प्रारब्ध `कहानी उन स्त्रियों की कहानी है जो बेटा न पैदा कर पाने के कारण कितनी मानसिक यातना झेलतीं हैं ।ये अनेकों भारतीय परिवारों की कहानी है जो चाहते हैं कि यदि गर्भ में बच्ची हो तो उसे कोख में पलने न दिया जाए। नायिका के लाख विरोध के बाद उसकी बच्ची की भ्रूण हत्या कर दी जाती है---अंत में क्या होता है जानकर चौंक जाइयेगा। परिस्थिति से विद्रोह करती वृन्दाबन में जबरन घरवालों द्वारा छोड़ दी गई`मुक्तिधाम `की सिर मुंडाए ,सफ़ेद धोती पहने विधवा हो या `ना जानो जानकीनाथे `की अनी हो ग़लत को अपने जीवन से हटाकर `एक बोल्ड स्त्री की तरह `उड़ियो पंख पसार जानतीं हैं।
निशा चंद्रा की कहानियों में मैंने एक बात नोट की है कि उनका अंत लिखते समय निशा अपनी सारी कलात्मकता पिरो देतीं हैं।
वनिका पब्लिकेशंस की प्रकाशिका डॉ. नीरज शर्मा द्वारा सुंदरता से प्रकाशित इस पुस्तक में उनकी कुछ कहानियों की इतनी मेग्नेटिक थीम है कि उन्हें भूल पाना सम्भव नहीं है -उनमें से कुछ ये है -`अघोरी ` ` मदर्स डे `-`बशीरा `,`तोता उड़ `,`अर्हम `.
पुस्तक : `उड़ियो पंख पसार `[कहानी संग्रह ]
लेखिका -निशा चंद्रा
समीक्षक -नीलम कुलश्रेष्ठ
मूल्य -320 रु
प्रकाशन -वनिका पब्लिकेशंस