**भाग पांच: हक़ीक़त की दीवार**कमरे में एक भारी खामोशी पसरी हुई थी, जिसे सिर्फ बाहर गिरती बारिश की बौछारें और कोने में खड़खड़ाते कूलर की आवाज़ ही भेद पा रही थी। पल्लवी ने स्टील के गिलास से पानी का आखिरी घूंट भरा, और कबीर ने बेहद सहजता से उसके कांपते हाथों से वह गिलास वापस ले लिया।"तू लेट जा थोड़ी देर। माथे पर सूजन साफ़ दिख रही है। मैं रसोई में अदरक वाली कड़क चाय बनाता हूँ, सिर का दर्द एक झटके में गायब हो जाएगा," कबीर ने पलटते हुए अपने उसी पुराने, बेपरवाह लेकिन फिक्रमंद अंदाज़ में कहा। उसने रसोई की तरफ कदम बढ़ाए ही थे कि पीछे से पल्लवी की बेहद धीमी, मगर किसी ठहरी हुई नदी जैसी गंभीर आवाज़ आई।"कबीर... रुको।"कबीर के कदम वहीं ठिठक गए। उसने कंधे उचकाकर पीछे मुड़कर देखा। पल्लवी तख्त के बिल्कुल किनारे पर आ बैठी थी। उसकी झुकी हुई आँखें अब उठ चुकी थीं और सीधे कबीर पर टिकी थीं।"मुझे चाय नहीं पीनी... मुझे तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी कहना है," पल्लवी की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था, हालाँकि उसकी उंगलियां घबराहट के मारे अब भी उस खुरदरी सूती चादर को कसकर भींच रही थीं।कबीर ने गिलास को पास रखी एक छोटी सी मेज पर टिका दिया। वह वहीं खड़े-खड़े अपनी आँखें सिकोड़ते हुए बोला, "हाँ, बोल ना। क्या बात है? चक्कर आ रहे हैं क्या फिर से?"पल्लवी ने धीरे से अपना सिर 'ना' में हिला दिया। उसने एक गहरी सांस ली, मानो अपने भीतर बिखरी हिम्मत को एक जगह समेटने की कोशिश कर रही हो।"तुम... तुम मेरे पास आओ। यहाँ, बिल्कुल मेरे सामने। फिर बताऊंगी।"कबीर को कुछ अजीब लगा, लेकिन वह बिना कोई प्रतिवाद किए पल्लवी की तरफ बढ़ गया। दो लंबे कदमों में वह पल्लवी के ठीक सामने आ खड़ा हुआ। दोनों के बीच अब बमुश्किल एक फुट का फासला बचा था।जैसे ही कबीर उसके इतने करीब आया, पल्लवी के पूरे वजूद में सिर से लेकर पैर तक एक तेज़ झनझनाहट सी दौड़ गई। कबीर के जिस्म की गर्माहट और उसके कपड़ों से उठती बारिश और सोंधी मिट्टी की महक ने पल्लवी के होश सुन्न कर दिए। उसे महसूस हुआ मानो किसी ने उसकी रगों में कोई तेज़ करंट छोड़ दिया हो। उसकी साँसें एकदम से भारी हो गईं और दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि उसे खौफ होने लगा कि कहीं कबीर भी उसकी आवाज़ न सुन ले।पल्लवी ने धीरे से अपना कांपता हुआ हाथ उठाया। उसने अपनी नाज़ुक, गोरी उंगलियों से कबीर के उस सख्त, मज़बूत और लोहे का काम करने वाले खुरदरे हाथ को थाम लिया। कबीर की हथेलियों का वह स्पर्श इस वक़्त पल्लवी को पूरी दुनिया का सबसे महफूज़ ठिकाना लग रहा था।कबीर अचानक चौंक गया। उसने अपना हाथ पीछे खींचने की कोशिश की, लेकिन पल्लवी की उस कमज़ोर सी दिखती पकड़ में आज एक अजीब सी ज़िद और हठ थी। पल्लवी ने अपना चेहरा ऊपर उठाया। उसकी डबडबाई हुई, बड़ी-बड़ी आँखों में बिना किसी मिलावट के, एक बेहद गहरा और सच्चा समर्पण छलक रहा था।"मैं तुमसे प्यार करती हूँ कबीर... आई लव यू," पल्लवी के सूखे होंठों से ये लफ़्ज़ किसी पवित्र दुआ की तरह आहिस्ता से निकले।ठीक उसी पल बाहर आसमान में बिजली ज़ोर से कड़की, लेकिन उस बंद कमरे के भीतर मानो वक़्त की सुइयां हमेशा-हमेशा के लिए थम गईं।कबीर के चेहरे के सारे कैज़ुअल भाव एक झटके में जम गए। वह किसी बुत की तरह अपनी जगह जड़ हो गया। उसने पहले अपनी कलाई को देखा, जिसे पल्लवी ने अपने दोनों हाथों के घेरे में जकड़ रखा था। पल्लवी की वह नाज़ुक, कोमल उंगलियां और कबीर के खुरदरे, मज़दूर हाथों के बीच का वह साफ़ अंतर बिल्कुल उनकी अलग-अलग ज़िंदगियों के फासले जैसा था। फिर कबीर की निगाहें धीरे से उठीं और पल्लवी की नम आँखों से जा टकराईं।कबीर के होंठों से एक लफ़्ज़ भी नहीं निकला। वह बस एकटक, बिना पलक झपकाए पल्लवी को देखता रहा। उसकी उन गहरी, शांत आँखों में न तो कोई ख़ुशी दिखी और न ही कोई हैरानी, बल्कि एक ऐसी डरावनी खामोशी थी जो पल्लवी के अंदर के विश्वास को तोड़ने लगी।वह सन्नाटा पल्लवी के लिए असहनीय होने लगा। कबीर की वह खाली, शून्य और भेदती हुई नज़रे देखकर पल्लवी का दिल किसी अनजाने डर से कांप उठा। उसे ऐसा महसूस होने लगा मानो उसने कोई बहुत बड़ी खता कर दी हो। डर के मारे उसकी पकड़ कबीर के हाथ पर अपने आप ढीली पड़ने लगी और वह तख्त पर नर्वस होकर थोड़ा सा पीछे खिसक गई।पल्लवी को इस तरह डर कर पीछे हटते देख कबीर को जैसे होश आया। उसने एक बहुत ही गहरी, भारी सांस छोड़ी और अपनी कलाई को आहिस्ता से पल्लवी की ढीली पड़ती पकड़ से आज़ाद करा लिया।"तू पागल हो गई है क्या?" कबीर की आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन उसमें बर्फ जैसी एक चुभती हुई ठंडक थी। "पल्लवी... मैंने तुझे कभी उस नज़र से देखा ही नहीं। न कभी मेरे दिमाग में ऐसा कोई ख्याल आया।"पल्लवी के दिल पर जैसे किसी ने एक भारी हथौड़ा चला दिया हो। उसकी आँखों से आँसुओं की एक गर्म धार टूटकर उसके सुर्ख लाल गालों पर बहने लगी।"कबीर...""मेरी बात पूरी सुन," कबीर ने अपना हाथ उठाकर उसे बीच में ही टोक दिया। उसका चेहरा अब एकदम सख्त और सपाट हो चुका था। वह एक ऐसी कड़वी हकीकत बयान कर रहा था, जिसे पल्लवी अपने इस प्यार के खुमार में देखना ही नहीं चाहती थी। "हम सिर्फ कॉलेज के अच्छे दोस्त हैं। तेरी और मेरी दुनिया में ज़मीन-आसमान का फर्क है पल्लवी। कहाँ तू... उस करोड़ों की आलीशान हवेली में रहने वाली लड़की, और कहाँ मैं... इस टीन की छत और सीलन भरे एक अदने से कमरे में रहने वाला आम लड़का। हमारी दुनिया कभी एक हो ही नहीं सकती।"ये लफ़्ज़ पल्लवी के सीने को किसी आरी की तरह बेरहमी से चीर रहे थे। वह अपनी सुबकती हुई आवाज़ को काबू करने की कोशिश करते हुए चीख उठी, "प्यार में ये सब नहीं देखा जाता कबीर! सच्चा प्यार कभी अमीरी, गरीबी या कोई महल-हवेली नहीं देखता!"उसने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा पूरी तरह छुपा लिया और हिचकियाँ लेते हुए बुरी तरह रोने लगी। "मैं यहाँ सिर्फ तुमसे मिलने आई थी... मैं बस तुम्हारी एक झलक देखना चाहती थी। मुझे नहीं पता मुझे क्या हो गया है, लेकिन तुम्हारे बिना मेरा एक पल भी नहीं कटता कबीर। मैं घुटने लगती हूँ तुम्हारे बिना!"कबीर ने पीछे अपनी मुट्ठियां कस लीं। पल्लवी को इस तरह तड़पते, रोते और बिखरते हुए देखना उसके लिए भी आसान नहीं था। उसका दिल भी हाड़-मांस का बना था, पत्थर का नहीं। लेकिन वह अच्छी तरह जानता था कि आज की उसकी यह थोड़ी सी भी नरमी या दिलासा, आने वाले कल में पल्लवी के लिए ज़िंदगी भर का नासूर बन जाएगी। उसे पल्लवी को इस ख्याली दुनिया के मखमली जाल से बाहर खींचना ही था।कबीर ने अपनी आवाज़ में जानबूझकर एक ऐसा कठोरपन, रूखापन और कड़वाहट घोल ली, जो पल्लवी के दिल पर सीधे तीर की तरह चुभे।"ये फ़िल्मों वाले खोखले डायलॉग मारना अब बंद कर पल्लवी," कबीर ने अपना मुँह दूसरी तरफ मोड़ते हुए रूखेपन से कहा। "असल ज़िंदगी में इस प्यार-व्यार से पेट नहीं भरता, और न ही यह महज़ प्यार तुम्हारी हवेली और मेरी इस झोपड़ी का फासला कभी मिटा सकता है। अपने दिमाग से यह सारा फितूर हमेशा के लिए निकाल दे। और बेहतर यही होगा कि अपना यह सारा ध्यान अपनी पढ़ाई और उस शानदार करियर पर लगा, जिसके लिए तेरे माँ-बाप ने तुझे इस कॉलेज में भेजा है।"बिना एक पल भी और रुके, कबीर मुड़ा और कमरे से बाहर उस मूसलाधार बरसती हुई बारिश में निकल गया। कमरे के अंदर अब सिर्फ कूलर की खड़खड़ाहट गूंज रही थी, और उस सादी सूती चादर वाले तख्त पर बैठकर फूट-फूट कर रोती हुई पल्लवी बची थी, जिसकी मासूमियत और पहला प्यार आज हकीकत की उस बेरहम और ठोस दीवार से टकराकर पूरी तरह चकनाचूर हो चुका था।