**भाग छ: टूटे ख़्वाब, बिखरी दुनिया**कमरे के उस घुटन भरे सन्नाटे को पीछे छोड़कर कबीर बाहर उस तेज़ बारिश में आ खड़ा हुआ था। आसमान जैसे आज पूरी ताकत से रो रहा था और बारिश की मोटी, सर्द बूंदें कबीर के चेहरे पर किसी बेरहम चाबुक की तरह पड़ रही थीं। उसकी शर्ट पूरी तरह भीग कर उसके शरीर से चिपक गई थी, लेकिन वह अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिला। उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपना चेहरा आसमान की तरफ उठा लिया।कबीर के चेहरे पर बहता हुआ पानी सिर्फ बारिश का नहीं था। उसकी उन हमेशा शांत रहने वाली आँखों के किनारों से आज एक गर्म धार फूट पड़ी थी, जिसे वह इस तेज़ बारिश के बहाने दुनिया से छुपा रहा था। उसने अपने दोनों हाथों की मुट्ठियां इतनी ज़ोर से भींच लीं कि उसकी नसों में दर्द होने लगा था।"मुझे माफ़ कर देना पल्लवी..." कबीर के कांपते होंठों से एक बहुत ही धीमी, घुटी हुई आवाज़ निकली, जो बादलों की गड़गड़ाहट में कहीं दबकर रह गई। "मैं तुम्हें कोई चोट नहीं पहुँचाना चाहता था। लेकिन मेरी हकीकत, मेरी मजबूरियां तुम्हारी उस रेशमी दुनिया से बहुत अलग हैं। मेरे साथ रहने का तुम्हारा यह फैसला तुम्हें सिर्फ कांटे देगा। मैं मानता हूँ कि प्यार अंधा होता है, वह अमीरी-गरीबी नहीं देखता... लेकिन इंसान को तो अपनी आँखें खुली रखनी चाहिए ना? किसी को तो हकीकत के बारे में सोचना ही था।"कबीर अच्छी तरह जानता था कि उसने सिर्फ पल्लवी का दिल नहीं तोड़ा है, बल्कि उसने अपने ही हाथों से अपने दिल का भी कत्ल कर दिया है। लेकिन एक झोपड़ी और एक महल की नींव कभी एक साथ नहीं रखी जा सकती, यह हकीकत वह पल्लवी से बेहतर समझता था।उधर, कमरे के अंदर पल्लवी उस खुरदरे तख्त पर बुत बनकर बैठी थी। उसकी आँखों के आँसू अब पूरी तरह सूख चुके थे और उनकी जगह एक अजीब से खालीपन ने ले ली थी। उसने बेहद धीरे से अपने पैर ज़मीन पर रखे। उसके टखने की मोच अभी भी ताज़ा थी, जहाँ अब गहरा नील पड़ चुका था। जैसे ही उसने अपना वज़न पैर पर डाला, दर्द की एक भयंकर लहर उसके पूरे वजूद में दौड़ गई, लेकिन आज वह शारीरिक दर्द उसके सीने में उठ रहे तूफ़ान के सामने कुछ भी नहीं था।पल्लवी ने कांपते हाथों से अपना डिज़ाइनर सैंडल पहना, जिसकी एक हील अब टूट चुकी थी। उसने अपना दुपट्टा उठाया और लंगड़ाते हुए भारी कदमों से उस कमरे की चौखट पार कर दी।बाहर आते ही बारिश की तेज़ बौछारों ने उसे अपने आगोश में ले लिया। पल्लवी का हल्का गुलाबी सूट पल भर में भीग गया। बारिश का पानी उसके चेहरे से होता हुआ उसके होठों तक आ रहा था, और उसी पानी के साथ उसके वे ताज़ा आँसू भी मिल रहे थे, जो अब बिना किसी आवाज़ के बह रहे थे। आस-पास की दुनिया, वे तंग गलियां, वे लोग—सब कुछ धुंधला हो चुका था।पल्लवी ने एक बार भी पीछे मुड़कर कबीर के उस घर को नहीं देखा। मन ही मन उसका टूटा हुआ दिल चीख रहा था— 'मैंने तुमसे बहुत सच्चा प्यार किया था कबीर... अपनी जान से भी ज़्यादा! और तुमने बिना कुछ सोचे मेरा दिल एक झटके में तोड़ दिया। आई हेट यू... बहुत गंदे इंसान हो तुम कबीर!'सड़क के किनारे खड़ी अपनी सफेद कार तक पहुँचना पल्लवी के लिए किसी पहाड़ चढ़ने से कम नहीं था। पैर के असहनीय दर्द से वह हर कदम पर लड़खड़ा रही थी। आख़िरकार वह कार तक पहुँची, भारी दरवाज़ा खोला और अंदर ड्राइवर सीट पर गिर पड़ी।कार के अंदर एसी की ठंडक थी, लेकिन पल्लवी का शरीर किसी तेज़ बुखार की तरह तप रहा था। उसने स्टीयरिंग व्हील पर अपना सिर रख दिया और कुछ देर तक बुरी तरह सुबकती रही। फिर उसने किसी तरह खुद को समेटा, इंजन स्टार्ट किया और कार उस संकरी गली से बाहर निकाल ली।रास्ते भर पल्लवी की आँखें आंसुओं से इतनी धुंधली थीं कि उसे सामने का ट्रैफिक भी ठीक से नज़र नहीं आ रहा था। उसके कानों में बार-बार कबीर के वही कड़े लफ़्ज़ गूंज रहे थे— 'तेरी और मेरी दुनिया में ज़मीन आसमान का फर्क है...'जैसे-तैसे, लड़खड़ाती हुई उसकी कार 'ग्रीन पार्क एस्टेट' की उस विशाल हवेली के गेट के अंदर घुसी। गार्ड ने सलाम किया, लेकिन पल्लवी ने शीशा नीचे नहीं किया। कार पोर्टिको में रुकते ही पल्लवी बाहर निकली। बारिश और कीचड़ से सने कपड़े, टूटी हुई हील और बिखरे हुए बाल—घर के नौकर उसे इस बदहाल हालत में देखकर हैरान रह गए। किसी में भी आगे बढ़कर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई।"पल्लवी? बेटा ये क्या हालत बना रखी है तूने?" ड्रॉइंग रूम में बैठी उसकी माँ ने घबराकर आवाज़ लगाई। उसके पिता भी अख़बार छोड़कर तुरंत खड़े हो गए।लेकिन पल्लवी के कान जैसे बहरे हो चुके थे। उसने किसी की तरफ नहीं देखा, कोई जवाब नहीं दिया। वह लंगड़ाते हुए, बिना कुछ बोले सीधे सीढ़ियां चढ़ने लगी। हर एक सीढ़ी पर उसके पैर का दर्द चीख रहा था, लेकिन वह एक बेजान मशीन की तरह बस ऊपर बढ़ती जा रही थी।वह अपने आलीशान कमरे में घुसी और दरवाज़े का भारी ओक का पल्ला पूरी ताकत से बंद कर दिया। 'क्लिक' की आवाज़ के साथ ही उसने दरवाज़ा अंदर से लॉक कर लिया।पल्लवी वहीं उस बंद दरवाज़े के सहारे ज़मीन पर फिसलती हुई बैठ गई। उसने अपने घुटनों को अपनी छाती से लगा लिया और अपना चेहरा उनमें छुपा लिया। अब उसे खुद को रोने से रोकने की कोई ज़रूरत नहीं थी। उसके अंदर का सारा गुबार एक दिल दहला देने वाली चीख के साथ फूट पड़ा। वह अपने ही कमरे के ठंडे फर्श पर बैठकर बिलख-बिलख कर रोने लगी।बाहर से दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक होने लगी।"पल्लवी! दरवाज़ा खोल बेटा! क्या हुआ तुझे? तू ठीक तो है?" उसके पिता की घबराई हुई आवाज़ आ रही थी।"बेटा प्लीज़ दरवाज़ा खोल... हम डर रहे हैं!" उसकी माँ की रोती हुई आवाज़ भी बाहर से गूंज रही थी।लेकिन अंदर, पल्लवी उस दरवाज़े से पीठ टिकाए बस सुबक रही थी। उसके बाहर की दुनिया उसे पुकार रही थी, लेकिन उसके अंदर की वह दुनिया जो उसने कबीर के साथ बुनी थी, वह आज पूरी तरह बिखर चुकी थी।