अध्याय 8 — नानी की डायरी
उस दिन बारिश थम चुकी थी, लेकिन हवा में अब भी भीगी मिट्टी की खुशबू घुली हुई थी।
रुहिका घर के पुराने कमरे की सफ़ाई कर रही थी। लकड़ी की पुरानी अलमारी के नीचे एक लोहे का छोटा-सा संदूक रखा था। उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।
"माँ, इसमें क्या है?" उसने आवाज़ दी।
माँ कुछ पल चुप रहीं। फिर धीरे-धीरे कमरे में आईं। संदूक को देखकर उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने काँपते हाथों से उस पर हाथ फेरा और बोलीं—
"इसमें तुम्हारी नानी की यादें हैं… और एक ऐसा सपना, जो कभी पूरा नहीं हो सका।"
रुहिका ने हैरानी से माँ की ओर देखा।
संदूक खुला।
अंदर कुछ पुराने कपड़े, पीली पड़ चुकी तस्वीरें, और लाल कपड़े में लिपटी एक मोटी डायरी रखी थी।
माँ ने डायरी दोनों हाथों से उठाई, जैसे कोई पूजा की थाली उठाता है।
"मैंने यह डायरी वर्षों से संभालकर रखी है," माँ बोलीं, "तुम्हारी नानी लिखती थीं। उनका सपना था कि एक दिन उनकी किताब छपे। लेकिन हालात ने उनका सपना अधूरा छोड़ दिया।"
रुहिका के हाथ अपने आप आगे बढ़ गए।
उसने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर सुंदर अक्षरों में लिखा था—
"अगर यह डायरी मेरी नातिन के हाथों तक पहुँचे, तो समझना कि मेरे अधूरे सपनों को एक नया रास्ता मिल गया है।"
रुहिका की आँखें नम हो गईं।
वह धीरे-धीरे पन्ने पलटने लगी।
हर पन्ने पर कहानियाँ थीं।
कहीं कविताएँ...
कहीं अधूरे पत्र...
कहीं ऐसे विचार, जो समय से बहुत आगे थे।
आख़िरी पन्ने पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—
"बेटी, अगर शब्द सच्चे हों, तो उन्हें दुनिया तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता।"
रुहिका ने डायरी अपने सीने से लगा ली।
उसी पल उसने मन ही मन एक वचन लिया—
"नानी... आपका सपना अब अधूरा नहीं रहेगा। मैं लिखूँगी। तब तक लिखूँगी, जब तक मेरे शब्द किसी एक इंसान के दिल में उम्मीद जगा सकें।"
खिड़की से आती हवा ने डायरी का एक और पन्ना पलटा।
उस पन्ने पर एक तारीख़ लिखी थी...
और उसके नीचे एक नाम...
वह नाम रुहिका ने पहले भी कहीं सुना था।
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
आख़िर वह नाम किसका था?
और नानी ने उसे अपनी डायरी में क्यों लिखा था?
यही सवाल अब उसकी ज़िंदगी का अगला सफ़र बनने वाला था...वो लड़की जो कभी नहीं हारी
अध्याय 9 — वह नाम, जिसने सब बदल दिया
रात बहुत गहरी थी।
बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन पुराने घर की मिट्टी अब भी भीगी हुई थी। कमरे में एक पीतल का छोटा-सा दीया जल रहा था। उसकी लौ कभी तेज़ होती, कभी धीमी, जैसे वह भी किसी कहानी को सुनने के लिए ठहर गई हो।
रुहिका के सामने नानी की डायरी खुली थी।
उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे पन्ने पलट रही थीं। हर पन्ने पर एक नई दुनिया थी—कहीं कविता, कहीं अधूरी कहानी, कहीं जीवन के अनुभव। लेकिन एक पन्ने पर आकर उसकी नज़र ठहर गई।
ऊपर सिर्फ़ एक नाम लिखा था—
"सारंग"
नाम के नीचे बस एक पंक्ति थी—
«"अगर कभी मेरी नातिन यह नाम पढ़े, तो उसे बता देना कि अधूरे सपनों से बड़ा कोई बोझ नहीं होता।"»
रुहिका ने हैरानी से माँ की ओर देखा।
"माँ... ये सारंग कौन हैं?"
माँ कुछ देर तक चुप रहीं। उनकी आँखें खिड़की से बाहर अँधेरे में कहीं खो गईं।
"सारंग तुम्हारी नानी के छोटे भाई थे," उन्होंने धीमे स्वर में कहा। "उन्हें किताबों से बहुत प्रेम था। उन्होंने तुम्हारी नानी से वादा किया था कि एक दिन उनकी लिखी किताब छपवाएँगे। लेकिन एक सड़क दुर्घटना ने सब बदल दिया। वादा अधूरा रह गया... और तुम्हारी नानी ने फिर कभी अपनी पांडुलिपि किसी को नहीं दिखाई।"
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
रुहिका ने डायरी को सीने से लगा लिया।
उसे पहली बार समझ आया कि यह सिर्फ़ एक डायरी नहीं, एक अधूरे वादे की विरासत है।
उस रात वह देर तक सो नहीं सकी।
उसने अपनी डायरी निकाली और लिखा—
«"कुछ विरासतें ज़मीन या गहनों की नहीं होतीं। कुछ विरासतें सपनों की होती हैं। और उन्हें संभालने के लिए हिम्मत चाहिए।"»
सुबह जब सूरज निकला, तो रुहिका पहले जैसी नहीं थी।
अब वह सिर्फ़ अपनी पहचान बनाने के लिए नहीं लिख रही थी।
वह उस वादे को पूरा करने के लिए लिख रही थी, जो समय की धूल में कहीं दब गया था।
लेकिन उसे नहीं पता था कि उसी दिन उसके मोबाइल पर एक संदेश आने वाला है—
"आपकी कहानी को इस महीने की सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए चुना गया है..."
रुहिका ने संदेश पढ़ा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसने आसमान की ओर देखा और बहुत धीरे से कहा—
"नानी... शायद सफ़र शुरू हो गया है।"