वो लड़की जो कभी नहीं हारी
अध्याय 10 — पहली जीत, पहली परीक्षा
सुबह की धूप आज कुछ अलग थी।
रुहिका ने जैसे ही मोबाइल खोला, स्क्रीन पर एक संदेश चमक रहा था—
"बधाई! आपकी कहानी इस महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना चुनी गई है।"
कुछ पल तक उसे विश्वास ही नहीं हुआ।
उसने संदेश दोबारा पढ़ा।
फिर तीसरी बार।
उसकी आँखों में आँसू आ गए। यह आँसू जीत के थे। उसने सबसे पहले नानी की डायरी उठाई और उसे अपने माथे से लगाया।
"नानी… आज आपकी कलम मुस्कुरा रही होगी," उसने धीमे से कहा।
माँ रसोई से बाहर आईं।
"क्या हुआ, बेटी?"
रुहिका ने काँपते हाथों से मोबाइल माँ की ओर बढ़ा दिया।
माँ ने संदेश पढ़ा और बिना कुछ कहे उसे गले लगा लिया।
उस आलिंगन में गर्व भी था, आशीर्वाद भी, और उन वर्षों का दर्द भी जो अब धीरे-धीरे पिघल रहा था।
लेकिन खुशी हमेशा अकेली नहीं आती।
उसी शाम गाँव में कुछ लोग बातें करने लगे।
"मोबाइल पर लिखकर कोई लेखिका बन जाता है क्या?"
"दो-चार कहानियाँ लिख लेने से ज़िंदगी नहीं बदलती।"
रुहिका ने सब सुना।
एक पल के लिए उसका मन दुखी हुआ, लेकिन इस बार उसने जवाब नहीं दिया।
उसे समझ आ गया था कि हर आवाज़ का जवाब शब्दों से नहीं, समय से दिया जाता है।
रात को उसने अपनी डायरी खोली।
उसने लिखा—
«"जो लोग मेरी उड़ान पर हँस रहे हैं, उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं। क्योंकि उड़ान का एहसास ज़मीन पर खड़े लोग नहीं समझ सकते।"»
उसी रात उसके मोबाइल पर एक और संदेश आया।
इस बार संदेश किसी पाठक का नहीं था।
एक प्रकाशन संस्था ने लिखा था—
"क्या आप अपनी कहानियों का संग्रह पुस्तक के रूप में प्रकाशित करना चाहेंगी?"
रुहिका देर तक स्क्रीन को देखती रही।
यह वही सपना था जिसे उसकी नानी पूरा नहीं कर पाई थीं।
लेकिन इस सपने तक पहुँचने का रास्ता आसान नहीं था।
प्रकाशन के लिए पैसे चाहिए थे।
घर की आर्थिक स्थिति पहले से ही कठिन थी।
उसने मोबाइल बंद किया।
खिड़की के बाहर आसमान में चाँद था।
और उसके मन में एक सवाल—
"क्या सपने सच करने के लिए हमेशा कोई बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है?"
उस रात उसे नींद नहीं आई।
क्योंकि पहली बार सफलता ने उससे एक कठिन फैसला माँगा था... वो लड़की जो कभी नहीं हारी
अध्याय 11 — सबसे कठिन फैसला
रात के दो बज चुके थे।
पूरा घर सो चुका था, लेकिन रुहिका की आँखों में नींद नहीं थी। मेज़ पर रखा मोबाइल बार-बार उसकी नज़र खींच रहा था। प्रकाशन संस्था का संदेश अब भी खुला था।
"अगर आप अपनी कहानियों की पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहती हैं, तो अगले पंद्रह दिनों में उत्तर दें।"
उसने मोबाइल बंद कर दिया।
उसी समय आँगन से धीमी आवाज़ आई। माँ किसी से फोन पर बात कर रही थीं।
"हाँ... अभी पैसे का इंतज़ाम नहीं हो पाया। दवा लेनी तो ज़रूरी है... कोशिश कर रही हूँ।"
रुहिका के कदम वहीं रुक गए।
उसे पहली बार पता चला कि माँ कई दिनों से अपनी दवाइयाँ समय पर नहीं ले पा रही थीं, क्योंकि घर के खर्च पूरे करना मुश्किल हो रहा था।
उस रात उसने अपनी अलमारी खोली।
एक डिब्बे में उसने धीरे-धीरे कुछ पैसे जमा किए थे। वे पैसे उसकी पहली किताब के लिए थे।
उसने डिब्बा हाथ में लिया।
कुछ पल तक उसे देखती रही।
फिर बिना एक शब्द बोले वह पैसे माँ के हाथ में रख आई।
सुबह माँ ने पूछा,
"ये पैसे कहाँ से आए?"
रुहिका मुस्कुराई।
"माँ... किताब थोड़ी देर से छप जाएगी। लेकिन आपकी सेहत का इंतज़ार नहीं कराया जा सकता।"
माँ की आँखें भर आईं।
उन्होंने रुहिका का चेहरा दोनों हाथों में लेकर कहा—
"बेटी... किताबें फिर लिखी जा सकती हैं, लेकिन ऐसा दिल भगवान बहुत कम लोगों को देता है।"
उस दिन प्रकाशन संस्था को कोई उत्तर नहीं भेजा गया।
समय बीत गया।
मौका भी चला गया।
रुहिका ने खिड़की से बाहर देखा।
एक पल के लिए मन टूटा।
लेकिन अगले ही पल उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—
«"कुछ सपनों को टालना हार नहीं होती। अगर किसी अपने की मुस्कान बच जाए, तो वही सबसे बड़ी जीत होती है।"»
उसे नहीं पता था कि उसकी इस चुपचाप की गई कुर्बानी की खबर किसी और तक भी पहुँच चुकी थी।
और वही खबर कुछ दिनों बाद उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा चमत्कार बनकर लौटने वाली थी...