वो लड़की जो कभी नहीं हारी
अध्याय 12 — वह अनजान सहारा
सुबह की धूप आँगन में फैली हुई थी। तुलसी के पास रखा दीपक बुझ चुका था, लेकिन उसकी हल्की-सी खुशबू अभी भी हवा में थी।
रुहिका अपने कमरे में बैठी थी। सामने वही डायरी, वही अधूरी पांडुलिपि और वही सपना...
उसने प्रकाशन संस्था को जवाब नहीं दिया था।
उसने अपना सपना माँ की दवाइयों के लिए पीछे रख दिया था।
दिल में हल्का-सा दर्द था, लेकिन पछतावा नहीं।
तभी मोबाइल की घंटी बजी।
एक अनजान नंबर था।
"नमस्ते, क्या मैं रुहिका जी से बात कर रहा हूँ?"
"जी... मैं ही बोल रही हूँ।"
"मैं आर्यन मेहता बोल रहा हूँ। मैं आपकी कहानियाँ पिछले कई महीनों से पढ़ रहा हूँ।"
रुहिका कुछ पल चुप रही।
"आपकी लिखी कहानी 'बारिश के बाद की धूप' ने मेरी छोटी बहन को फिर से लिखने का साहस दिया। उसने महीनों बाद पहली बार डायरी लिखी।"
रुहिका की आँखें नम हो गईं।
आर्यन आगे बोला—
"मुझे पता चला कि आपने अपनी किताब इसलिए नहीं छपवाई क्योंकि आपने अपनी माँ की दवाइयों को चुना।"
रुहिका ने हैरानी से पूछा,
"आपको यह कैसे पता?"
"दुनिया में अच्छाई की खबरें भी कभी-कभी लोगों तक पहुँच जाती हैं।"
कुछ पल की ख़ामोशी के बाद उसने कहा—
"मैं आपकी मदद करना चाहता हूँ।"
रुहिका ने तुरंत मना कर दिया।
"नहीं... मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती।"
आर्यन मुस्कुराया।
"यह मदद नहीं है, रुहिका जी। यह एक पाठक का धन्यवाद है। आपकी किताब छपेगी, लेकिन एक शर्त पर..."
"क्या?"
"जब आपकी पहली किताब प्रकाशित हो जाए, तो उसकी पहली प्रति अपनी नानी की तस्वीर के सामने रखिएगा। बस यही मेरी फीस होगी।"
रुहिका की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने आसमान की ओर देखा।
उसे लगा जैसे नानी की दुआएँ अब भी उसके साथ चल रही हैं।
उसी शाम उसने अपनी डायरी में लिखा—
«"ईश्वर हमेशा चमत्कार नहीं करता। कई बार वह किसी इंसान को किसी और की दुआ का जवाब बनाकर भेज देता है।"»
उसे अभी नहीं पता था कि किताब छपने की राह तो खुल गई है...
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।
क्योंकि हर सफलता के साथ कुछ लोग तालियाँ बजाते हैं...
और कुछ लोग रास्ते में काँटे बिछाने लगते हैं।वो लड़की जो कभी नहीं हारी
अध्याय 13 — जब अपने ही सवाल करने लगे
गाँव छोटा था।
यहाँ खुशियाँ भी जल्दी फैलती थीं और अफ़वाहें उससे भी तेज़।
रुहिका की किताब छपने की खबर धीरे-धीरे लोगों तक पहुँचने लगी। कुछ लोग दिल से खुश थे, लेकिन कुछ के चेहरे पर मुस्कान थी और दिल में जलन।
एक दिन वह बाज़ार से लौट रही थी। रास्ते में दो औरतों की बातें उसके कानों में पड़ीं।
"आजकल की लड़कियाँ दो-चार कहानियाँ लिख लें, तो खुद को बड़ा लेखक समझने लगती हैं।"
दूसरी ने हँसते हुए कहा,
"देखना, ये सब कुछ दिन का शौक है।"
रुहिका बिना कुछ बोले आगे बढ़ गई। शब्द कानों से टकराए ज़रूर, लेकिन उसने उन्हें दिल में जगह नहीं दी।
शाम को घर पहुँची तो माहौल अलग था।
चाचा बैठे थे।
उन्होंने सीधे पूछा,
"रुहिका, ये किताब छपवाने का खर्च कहाँ से आ रहा है?"
उनके स्वर में चिंता कम और शक ज़्यादा था।
रुहिका ने शांत होकर पूरी बात बताई—एक पाठक ने मदद की, लेकिन बिना किसी बदले की उम्मीद के।
चाचा ने सिर हिलाया।
"दुनिया इतनी आसान नहीं होती, बेटी। मुफ़्त में कोई कुछ नहीं देता।"
ये शब्द तीर की तरह उसके दिल में उतर गए।
उस रात वह बहुत देर तक जागती रही।
उसने नानी की डायरी खोली।
एक पन्ने पर लिखा था—
«"जब लोग तुम्हारे इरादों पर शक करने लगें, तब अपने चरित्र को इतना साफ़ रखो कि समय तुम्हारी ओर से जवाब दे।"»
रुहिका ने डायरी बंद की।
उसने आईने में खुद को देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उनमें डर नहीं था।
उसने धीरे से कहा—
"अगर मेरा रास्ता सच्चा है, तो मुझे हर किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं। मैं अपने काम से जवाब दूँगी।"
अगली सुबह उसने फिर से लिखना शुरू किया।
क्योंकि उसे समझ आ गया था—
रुक जाना ही उन लोगों की जीत होगी, जो चाहते हैं कि वह हार मान ले।
लेकिन उसी दिन डाक से एक और लिफ़ाफ़ा आया।
उस पर एक बड़े साहित्यिक पुरस्कार का नाम लिखा था।
रुहिका ने काँपते हाथों से उसे खोला…
और जो लिखा था, उसने उसकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।