Kalu ki Pahadi in Hindi Spiritual Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | कालू की पहाड़ी - 12

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कालू की पहाड़ी - 12

बुजुर्ग की आंखों से बहते आंसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने अपनी फटी हुई आवाज़ में उस धोखे की परतें खोलनी शुरू कीं, जिसे सुनकर कार्तिक का कलेजा कांप उठा।



प्यार का मायाजाल और मीना का दोहरा चेहरा


बुजुर्ग ने बताया, "बेटा, शुरुआत में सब कुछ किसी सपने जैसा था। कल्याण सिंह (कालू) अपनी सादगी और मेहनत से जो भी कमाता, वह मीना के कदमों में लाकर रख देता।



दोनों का मिलना-जुलना इतना बढ़ गया था कि पूरा गाँव उनकी मिसालें देने लगा था। कल्याण सिंह उसे अपने घर ले जाता, 


अपनी बूढ़ी माँ से मिलवाता। उसकी माँ ने तो मीना को अपनी बहू मान लिया था और अपनी बरसों पुरानी सोने की चूड़ियाँ भी उसे पहना दी थीं।"



कल्याण सिंह के लिए मीना सिर्फ एक लड़की नहीं, उसकी इबादत बन चुकी थी।


वह दिन-भर पहाड़ों पर भेड़ें चराते वक्त सिर्फ मीना के सुनहरे भविष्य के सपने बुनता। उसे लगता था कि मीना भी उससे उतनी ही मोहब्बत करती है।



पर मीना... मीना के भीतर लालच का एक ऐसा समंदर उबल रहा था, जिसकी गहराई का अंदाज़ा उस भोले चरवाहे को कभी नहीं हुआ।



मीना सुंदर थी, और उसे अपनी सुंदरता का गुमान था। उसे गाँव की धूल और गोबर की गंध से नफरत थी।


उसे रेशमी साड़ियाँ, शहर के जेवर और एक आलीशान हवेली चाहिए थी, जो एक चरवाहा उसे कभी नहीं दे सकता था। 



इसीलिए, जब वह कल्याण सिंह के साथ प्रेम का ढोंग कर रही थी, उसी समय उसने पास के गाँव के एक अहंकारी जमींदार के बेटे, प्रेमचंद पर अपनी नज़रों का जाल डाल दिया था।



दौलत की भूख और प्रेमचंद का साथ



प्रेमचंद के पास अथाह दौलत थी, पर उसके पास संस्कार नहीं थे।


मीना जानती थी कि अगर वह प्रेमचंद से शादी कर लेती है, तो वह रातों-रात इस इलाके की सबसे रईस औरत बन जाएगी। वह प्रेमचंद से छिप-छिप कर मिलने लगी।



वह प्रेमचंद को बताती कि कल्याण सिंह (कालू) उसके पीछे हाथ धोकर पड़ा है और उसे परेशान करता है।



इधर, वह कल्याण सिंह से मिलकर कहती, "कल्याण, अगर तुम मुझसे शादी करना चाहते हो, तो मुझे कुछ साबित करके दिखाना होगा। मुझे सुरक्षा चाहिए, मुझे गहने चाहिए।"



भोला कल्याण सिंह अपनी जान छिड़कता रहा। उसने अपनी माँ के इलाज के लिए जोड़े गए पैसे, अपनी पुश्तैनी ज़मीन के आखिरी टुकड़े तक को गिरवी रखकर मीना की फरमाइशें पूरी कीं।




उसे लगा कि वह अपनी दुल्हन के लिए घर सजा रहा है, पर असल में वह अपनी ही कब्र की ईंटें चुन रहा था।



बुजुर्ग ने अपनी धुंधली आंखों को पोंछा और उस काली रात का वर्णन करने लगे जब छल-कपट ने एक मासूम रूह को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल दिया था।



षड्यंत्र की वह खौफनाक सुबह



मीना की आँखों में अब प्यार की जगह केवल लालच की चमक थी। उसने शीशे में अपना चेहरा देखा और बुदबुदाई, "अब बहुत हुआ यह प्यार का नाटक। यह चरवाहा कल्याण सिंह मेरे पैरों की बेड़ी बनता जा रहा है।



अगर यह ज़िंदा रहा, तो न यह मुझे प्रेमचंद की दौलत भोगने देगा और न ही चैन से जीने देगा। मैं इस गरीबी की सड़ांध में और नहीं रह सकती। 



मुझे महलों की रानी बनना है, और रानी बनने के रास्ते में जो भी आएगा, उसे हटना ही होगा।"



उसी सुबह, मीना ने गुपचुप तरीके से ज़मींदार के बेटे प्रेमचंद को गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के पास मिलने बुलाया। 



जब प्रेमचंद आया, तो मीना ने अपनी आँखों में झूठे आँसू भरे और सिसकियाँ लेते हुए एक ऐसी कहानी गढ़ी जिसने प्रेमचंद के खून को खौला दिया।



उसने कहा, "प्रेमचंद जी, मैं बहुत मुसीबत में हूँ। इसी गाँव का वह चरवाहा, कल्याण सिंह... वह पागल हो गया है।



मैं तो उसे अपना भाई मानती थी, दो बातें प्यार से क्या कर लीं, वह खुद को मेरा आशिक समझने लगा।


वह रोज़ मेरे घर आता है, मुझे और मेरे बूढ़े माँ-बाप को डराता है। वह कहता है कि अगर मैंने उससे शादी नहीं की, तो वह मुझे ज़िंदा जला देगा। मेरा जीना हराम कर दिया है उसने।"



प्रेमचंद का क्रोध और अंतिम जाल


प्रेमचंद, जो पहले से ही अहंकारी और रईस था, मीना की खूबसूरती के जाल में इतना अंधा था कि उसने सच जानने की कोशिश भी नहीं की। 



उसने अपनी मूंछों पर ताव दिया और गुस्से में चिल्लाया, "उस मामूली चरवाहे की इतनी हिम्मत! 


वह मेरी होने वाली पत्नी को डराएगा? मीना, तुम फिक्र मत करो, आज की रात उसकी आखिरी रात होगी।"




मीना ने मन ही मन मुस्कुराते हुए अपना अंतिम दांव खेला। उसने प्रेमचंद का हाथ पकड़ा और कहा, "उसे गाँव में मारना ठीक नहीं होगा।



आज अमावस्या की रात है, वह पहाड़ी की चोटी पर शिवजी के मंदिर में दीया जलाने जाता है। हम उसे वहीं खत्म करेंगे।



दुनिया को लगेगा कि वह पैर फिसलने से खाई में गिर गया। उसके बाद... उसके बाद हम दोनों हमेशा के लिए एक हो जाएंगे और तुम्हारी मैं हमेशा हमेशा के लिए हो जाऊंगी।"



कल्याण सिंह की मासूमियत


उधर, बेचारा कल्याण सिंह इस खूनी साज़िश से बिल्कुल बेखबर था। वह उस दिन बहुत खुश था क्योंकि उसने कड़ी मेहनत करके अपनी माँ की पसंद के कुछ गहने मीना के लिए बचाकर रखे थे।




उसने सोचा था कि आज रात जब वह चोटी पर महादेव की पूजा करेगा, तो मीना को अपने दिल की बात फिर से कहेगा।



बुजुर्ग ने कांपती आवाज़ में कहा, "बेटा कार्तिक, वह भोला लड़का अपनी मौत के सामान को ही अपना सुहाग समझ रहा था। 



वह नहीं जानता था कि जिस लड़की के लिए वह पूरी दुनिया से लड़ सकता था, वही लड़की उसकी पीठ में खंजर घोंपने की तैयारी कर चुकी थी।"



मौत की दहलीज़ पर



सूरज ढल चुका था और आसमान में काली घटाएं छाने लगी थीं। कल्याण सिंह अपने कंधे पर लाठी रखे, महादेव के मंत्र बुदबुदाते हुए उस ऊँची चोटी की ओर बढ़ने लगा।



हवा में ठंडक बढ़ गई थी और पहाड़ी की चोटियों पर सन्नाटा छा गया था। 



कल्याण सिंह यानी कालू के मन में आज उम्मीदों के हज़ारों दीये जल रहे थे। उसने सबसे सुंदर जंगली फूलों की माला गूँथी थी और महादेव के शिवलिंग पर जल चढ़ाया था।



वह मन ही मन सोच रहा था, "आज मीना आएगी, तो मैं महादेव को साक्षी मानकर उसकी माँग भर दूँगा। फिर हम दोनों नीचे गाँव जाएँगे, माँ के पैर छुएँगे। 



मेरी माँ उसे पाकर कितनी खुश होगी! हम दोनों मिलकर माँ की सेवा करेंगे। 



मैं रात-दिन मेहनत करूँगा, खूब पैसा कमाऊँगा और मीना के हर उस सपने को पूरा करूँगा जिसे उसने खुली आँखों से देखा है।"




उस बेचारे को क्या पता था कि जिस मीना के लिए वह महलों के ख्वाब देख रहा था, वह उसके लिए कफन तैयार कर चुकी थी।



सूरज पूरी तरह ढल चुका था और अमावस्या की काली रात ने अपने पैर पसार लिए थे। कालू ने मंदिर का दीया जलाया और उसकी लौ को हवा से बचाने के लिए अपने हाथों का ओट दिया।



तभी झाड़ियों में सरसराहट हुई। गुलाबी ओढ़नी में लिपटी मीना को आते देख कालू की खुशी का ठिकाना न रहा। उसका चेहरा खिल उठा।



"मीना! तुम आ गईं? मुझे पता था तुम ज़रूर आओगी!" कालू ने लपककर मीना का हाथ थाम लिया। उसकी आँखों में सच्‍ची मोहब्बत की चमक थी।



वह उतावलेपन में उसे अपनी सारी योजनाएँ बताने लगा—कैसे उसने घर की छत ठीक की है, कैसे उसने अपनी माँ की सोने की मोहरें निकाल कर रखी हैं।



मीना बस पत्थर की तरह खड़ी मुस्कुरा रही थी। उसकी मुस्कान में वह प्यार नहीं था, बल्कि एक शिकारी की वह चमक थी जो अपने शिकार को जाल में फँसते देख रही हो।