Ek Aam si Prem Kahaani - 1-2 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | एक आम सी प्रेम कहानी - 1-2

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एक आम सी प्रेम कहानी - 1-2

एक आम सी प्रेम कहानी

भाग- १

लेखिका "अनामिका"

लेखिका की ओर से

अक्सर ऐसा होता हे की हमे बचपन से हि दिखाया या अहसास कराया जाता हे के प्रेम कहानिया बस अमर या अद्भुत हि होती हे।

जैसे की फिल्मो मे हीरो-हीरोइन या किताबों मे राधा-कृष्णा बस यही हम बचपन से देखते,सुनते ओर अहसास करते हे।

हम अपने आस पास के उन छोटी छोटी कहानी पर कभी ध्यान हि नहीं देते वो आम सी काहानी जो हर सहर हर गली हर घर मे होती हे।

ऐसी हि एक कहानी, जो एक जोड़े को देखकर अपनी कल्पनाएं मिलाकर बनाई हे,

एक आम सी प्रेम कहनी....

आगे जो अप पढ़ेंगे निहारिका, मलय, सभी पात्र,नाम और जगह का नाम सब काल्पनिक हैं। लेकिन उनकी भाबनाएं और प्रेम वो अहसास उसे अपने कभी ना कभी अपने अंदर भी महसूस तो जरूर किया हि होगा।

स्नेह सहित, आनामिका.....

भाग-१: शहनाइयाँ और दो अजनबी

​°लड़की का नज़रिया (निहारिका - 7वीं क्लास)

​शादी वाले घर में पैर रखने की जगह नहीं थी, लेकिन मेरा पूरा ध्यान अपनी नई लाल ड्रेस पर था। कजिन्स के साथ आइसक्रीम काउंटर की तरफ भागते हुए अचानक मेरा पैर किसी के जूतों से टकराया। मैंने ऊपर देखा—एक लंबा सा लड़का, जो नए-नए कॉलेज जाने वालों की तरह थोड़ा गंभीर दिख रहा था, मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया। मम्मी ने पीछे से आवाज़ दी, "निहारिका, सीधे चलो!" मैं शरमा कर भाग गई, लेकिन उस पूरी शादी में मेरी आँखें बार-बार उसी 'कॉलेज वाले भैया' को ढूंढ रही थीं।

​°लड़के का नज़रिया (मलय - 12वीं पास/कॉलेज का पहला साल)

​रिश्तेदारों की शादियाँ मेरे लिए हमेशा से बोरिंग रही हैं। हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा था—"12th के बाद आगे क्या सोच रखा है?" मैं बड़ों के इन सवालों से बचकर कोने में कोल्ड ड्रिंक पी रहा था कि तभी लाल ड्रेस पहने एक चुलबुली सी लड़की हवा के झोंके की तरह मुझसे टकराई। उसकी आँखों में कोई फिक्र नहीं थी, बस एक अजीब सी मासूमियत थी। उसे देखकर मेरे चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ गई। मुझे नहीं पता था कि रिश्तेदारों की इस भीड़ में, यह छोटी सी मुलाकात मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत पन्ना बनने वाली है।

पहला भाग समाप्त, कहानी जारी है.....



​एक आम सी प्रेम कहानी

भाग-२

लेखिका "अनामिका"

भाग २ : लड़की का नज़रिया (निहारिका - 9वीं क्लास)

​दो साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। मैं अब नाइंथ क्लास में आ गई थी, लेकिन उस शादी की यादें आज भी मेरे दिल के किसी कोने में महफूज़ थीं। हमेशा की तरह आज भी मैं स्कूल यूनिफॉर्म पहने बस स्टॉप पर खड़ी अपनी बस का इंतज़ार कर रही थी।

​तभी मेरी नज़र सड़क के ठीक उस पार गई। कंधे पर कॉलेज बैग टांगे कोई खड़ा था। मैंने आँखें सिकोड़कर देखा और मेरा दिल ज़ोर से धड़क उठा—यह तो वही था! वही आँखें, वही चेहरा। गाड़ियों के शोर के बीच हमारी नज़रें मिलीं और मुझे लगा जैसे वक़्त ठहर गया।

​तभी ट्रैफिक सिग्नल रेड हुआ और वह सड़क पार करके सीधे मेरी तरफ आने लगा। मेरी धड़कनें और तेज़ हो गईं।

"तुम्हारी स्कूल बस छूट गई क्या?" उसने बहुत सहजता से पूछा।

मैंने घबराकर अपनी घड़ी देखी और कहा, "नहीं... अभी आने वाली है। वैसे, आप यहाँ?"

"मैं अब इसी रूट से कॉलेज जाता हूँ," उसने मुस्कुराते हुए कहा।

​तभी मेरी स्कूल बस हॉर्न बजाती हुई आ गई। मेरे पास रुकने का कोई बहाना नहीं था। मैंने बस पर कदम रखा और पीछे मुड़कर कहा, "चलती हूँ, बस आ गई।"

उसने हाथ हिलाकर कहा, "अगली बार फिर मिलेंगे।"

बस आगे बढ़ गई, पर मेरा दिल वहीं बस स्टॉप पर उस अजनबी के पास छूट गया था। ना नाम पता था, ना नंबर, फिर भी एक अजीब सी खुशी थी।

​ °लड़के का नज़रिया (मलय - कॉलेज का सेकंड ईयर)

​कॉलेज का सेकंड ईयर शुरू हो चुका था और रोज़ की तरह मैं अपने नए रूट वाले बस स्टॉप पर खड़ा था। सुबह की इस भीड़भाड़ में मेरा ध्यान कहीं नहीं था, जब तक कि मेरी नज़र सड़क के उस पार नहीं गई।

​सड़क के दूसरे किनारे पर, स्कूल यूनिफॉर्म में एक लड़की खड़ी थी। उसे देखते ही मेरे दिमाग में दो साल पहले की उस शादी की तस्वीरें तैर गईं। वह कितनी बड़ी हो गई थी, लेकिन उसकी आँखें आज भी वैसी ही मासूम थीं। जब हमारी नज़रें मिलीं, तो मुझे यकीन हो गया कि वह भी मुझे पहचान चुकी है।

​जैसे ही ट्रैफिक का सिग्नल रेड हुआ, मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं तुरंत सड़क पार करके उसके पास पहुँच गया। दो साल की इस दूरी को मिटाने के लिए मैंने बात शुरू की, "तुम्हारी स्कूल बस छूट गई क्या?"

उसने थोड़ी झिझक और घबराहट के साथ अपनी घड़ी देखी, "नहीं... अभी आने वाली है। वैसे, आप यहाँ?"

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं अब इसी रूट से कॉलेज जाता हूँ।" मैं चाहता था कि यह बातचीत लंबी चले, लेकिन तभी उसकी स्कूल बस वहाँ आ रुकी।

​वह बस में चढ़ी और उसने मुड़कर कहा, "चलती हूँ, बस आ गई।"

मैंने उसे अलविदा कहते हुए हाथ हिलाया, "अगली बार फिर मिलेंगे।"

बस चली गई और मैं उसे जाते हुए देखता रहा। मुझे उसका नाम तक नहीं पता था, लेकिन उस सुबह ने मेरे चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान दे दी थी जो पूरे रास्ते नहीं उतरी।

दूसरा भाग समाप्त, कहानी जारी हे....