A Simple Love Story - 4 in Hindi Love Stories by Anamika books and stories PDF | एक आम सी प्रेम कहानी - 4

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एक आम सी प्रेम कहानी - 4

एक आम सी प्रेम कहानी 
भाग-४
लेखिका "अनामिका"
भाग-४: सड़क का दो किनारा
°लड़के का नज़रिया (मलय-कॉलेज सेकंड ईयर)
​उसी बस स्टॉप के दूसरे किनारे पर आज वो फिर दिखी—स्कूल यूनिफॉर्म में, कंधे पर बस्ता टांगे। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर एक हल्की सी शरारती मुस्कान आ गई, जैसे कह रही हो कि बुकस्टोर में मेरे 'बच्ची' बोलने पर वह अब और नाराज़ नहीं है। मेरा मन हुआ कि पास जाकर दोबारा उसे थोड़ा चिढ़ाऊँ, पर तभी मेरी बस आ गई। वक़्त की पाबंदी ने हमें रोक दिया।
​मैं बेमन से बस में चढ़कर खिड़की वाली सीट पर बैठ गया। जैसे ही बस आगे बढ़ी, दिल पूरी तरह बैठ गया। एक पल की वह खुशी अचानक एक भारी उदासी में बदल गई कि काश, इस भीड़भाड़ वाली ज़िंदगी में कुछ पल और मिल जाते।
°​लड़की का नज़रिया (निहरिका-9वीं क्लास)
​सामने वाले छोर पर वो खड़े थे। उन्हें देखकर मेरे दिमाग में तुरंत बुकस्टोर वाली बात घूम गई, जब उन्होंने मुझे 'बच्ची' बोल दिया था। आज उन्हें देखकर मेरा सारा गुस्सा गायब हो गया और मैंने जानबूझकर एक ऐसी मुस्कान दी, जिससे उन्हें समझ आ जाए कि मैं अब नाराज़ नहीं हूँ। वो भी मुस्कुरा दिए। दिल किया कि बस रोक लूँ और उनसे कहूँ कि मैं बच्ची नहीं हूँ! पर तभी मेरी बस आ गई।
​भारी कदमों से बस के अंदर जाकर मैं खिड़की के पास बैठ गई। बस के चलने पर अचानक मन बहुत उदास हो गया, जैसे कोई अच्छी चीज़ हाथ आते-आते रह गई हो। कंधे पर टंगा बस्ता और भारी लगने लगा और मैं बस शून्य में देखती रह गई।
सुबह की पहली किरण के साथ ही दोनों के दिलों में एक अजीब सी बेचैनी शुरू हो जाती है। निहारिका अपनी स्कूल यूनिफॉर्म का कॉलर ठीक करते हुए बार-बार घड़ी देखती है; उसका दिल हर सेकंड के साथ भारी होने लगता है कि कहीं आज फिर देर न हो जाए। वह अपनी सहेलियों की बातों को अनसुना करके स्टॉप की तरफ लगभग भागने लगती है, सिर्फ इसलिए कि काश आज वह दो मिनट पहले पहुंच जाए और उसे सड़क के उस पार खड़ा देख सके। उधर मलय, अपनी कॉलेज की कैंटीन और दोस्तों की महफिलें छोड़कर, चिलचिलाती धूप में घंटों पहले आकर उस बस स्टॉप के कोने पर खड़ा हो जाता है। उसकी नजरें हर आती-जाती नीली-सफेद स्कूल बस के दरवाजे पर टिक जाती हैं। वह अंदर ही अंदर मन्नतें मांगता है कि उसकी खुद की बस आज लेट हो जाए, भले ही उसकी अटेंडेंस शॉर्ट हो जाए, बस एक बार वह चेहरा दिख जाए।
​दोनों के बीच की यह दूरी अब एक मीठा दर्द बन चुकी है। कभी निहारिका जानबूझकर अपनी बस छोड़ देती है और अगले पंद्रह मिनट स्टॉप पर खड़े रहकर दिल की धड़कनें गिनते हुए बिताती है, लेकिन तभी मलय की बस आकर उसका रास्ता रोक देती है। कभी मलय भीड़ को चीरकर सड़क पार करने ही वाला होता है कि निहारिका की बस हॉर्न बजाती हुई निकल जाती है। जब दोनों की नजरें सड़क के दो किनारों से टकराती हैं, तो हवा में एक खामोश चीख होती है—'रुक जाओ, प्लीज मत जाओ।' वे दोनों एक-दूसरे को देखकर एक बेबस, अधूरी मुस्कान मुस्कुराते हैं, जिसमें मिलने की बेइंतहा चाहत भी होती है और किस्मत के आगे घुटने टेकने की मजबूरी भी। वे एक ही वक्त पर, एक ही जगह होकर भी दो अलग-अलग रास्तों के मुसाफिर बने सिर्फ एक-दूसरे को दूर से चाहते रहने के लिए मजबूर हैं।
°लड़की का मोड़ 
स्कूल का वीकली क्लास टेस्ट का रिज़ल्ट आता है। निहारिका, जो हमेशा टॉपर्स में रहती थी, इस बार उसके मार्क्स काफी गिर जाते हैं।
 शाम को जब मम्मी-पापा रिपोर्ट कार्ड देखते हैं, तो डांटने के बजाय उनकी आंखों में चिंता होती है। पापा धीमे से कहते हैं—"बेटा, 9वी° क्लास आगे की पढ़ाई का बेस होती है। अगर अभी से पढ़ाई ढीली हो जाएगी, तो आगे करियर का क्या होगा?" मम्मी भी चिंता जताती हैं।
माता-पिता की डांट से ज़्यादा उनका यह भरोसा टूटना निहारिका को अंदर तक चुभ जाता है। अपने कमरे में अकेले बैठकर वह सोचती है—"मैं क्या कर रही हूँ? सिर्फ रास्ते के उस पार किसी की एक झलक पाने के लिए अपनी बस छोड़ देती हूँ, पढ़ाई का नुकसान कर रही हूँ..." उसे समझ आता है कि किसी के प्रति आकर्षण अपनी जगह है, लेकिन अपना भविष्य बिगाड़ना बहुत बड़ी बेवकूफी है। वह तुरंत अपनी किताबें खोलती है और खुद से वादा करती है कि अब पढ़ाई से कोई समझौता नहीं होगा।
​°लड़के का अहसास 
कॉलेज का नोटिस बोर्ड। सेकंड ईयर के मिड-टर्म से पहले अटेंडेंस की लिस्ट बाहर लगी है।
मलय का नाम रेड मार्क में होता है (शॉर्ट अटेंडेंस)। प्रोफेसर उसे अपने केबिन में बुलाते हैं और चेतावनी देते हैं—"अटेंडेंस 75% से नीचे चली गई है। अगर यही हाल रहा तो तुम्हें सेमेस्टर एग्ज़ाम में बैठने नहीं दिया जाएगा। सेकंड ईयर बहुत क्रूशियल होता है, अपने फ्यूचर के साथ खिलवाड़ मत करो।"
कॉलेज से बाहर निकलते हुए मलय बहुत गंभीर हो जाता है। वह बस स्टॉप की तरफ देखता है और खुद से बातें करता है—"दो-तीन बार सिर्फ देखने के चक्कर में बस छोड़ दी, क्लासेस मिस हो गईं। मैं अपने करियर के साथ यह क्या कर रहा हूँ?" उसे अहसास होता है कि समझदारी इसी में है कि पहले अपनी पढ़ाई और अटेंडेंस संभाली जाए।
°लड़की की ज़िंदगी में बदलाव 
​जो लड़की पहले हर वक्त मस्ती और बातों में खोई रहती थी, प्यार के अहसास ने उसे अंदर से शांत और परिपक्व  बना दिया है।
वह अब अपने भविष्य और पढ़ाई को लेकर सीरियस होने लगी है, क्योंकि वह अपने प्यार के लिए एक बेहतर इंसान बनना चाहती है।
वह अपनी ग्रूमिंग, अपनी आदतों और अपनी पसंद-नापसंद को लेकर सजग हो गई है। उसमें एक नया आत्मविश्वास आ गया है।
°​लड़के की ज़िंदगी में बदलाव 
उस चुलबुली लड़की के अचानक ज़िंदगी में आ जाने से, लड़के की ठहरी और शांत सी दुनिया में एक मीठी सी उथल-पुथल मच गई थी। जो लड़का पहले हर वक्त गुमसुम रहता था, किताबों के सिवा किसी से मतलब नहीं रखता था, अब अचानक कहीं भी बैठे-बैठे अकेले में मुस्कुराने लगता था। उसे पहली बार पहले प्यार का यह नया और बेपरवाह सा एहसास महसूस हो रहा था—एक ऐसी ख़ामोश सी दीवानगी, जो उसके दिल को सुकून भी देती थी और एक अजीब सी मीठी बेचैनी भी।
​कभी रात को पढ़ते-पढ़ते उसकी नज़रें पन्नों से हट जातीं और उस लड़की की चुलबुली हंसी, उसकी बातें हवा में तैरने लगतीं। लेकिन इस खूबसूरत मोड़ पर आकर भी वह भूला नहीं था कि उसकी अपनी एक मंज़िल है। वह जानता था कि प्यार का यह एहसास उसकी पढ़ाई के रास्ते की रुकावट नहीं, बल्कि आगे बढ़ने की वजह बनना चाहिए। इसलिए हर बार उस हंसी की याद से अपने चेहरे पर एक हल्की मुस्कान सजाकर, वह वापस दोगुने मन से अपनी किताबों में दिल लगा लेता था।
चौथा भाग समाप्त, कहानी जारी हे......