Shakti ke Shiv - 10 in Hindi Women Focused by sheetal books and stories PDF | Shakti ke Shiv - 10

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Shakti ke Shiv - 10

सुबह के ठीक आठ बजे...

उसी समय मुख्य प्रवेश द्वार से शक्ति अंदर दाख़िल हुई।

उसके साथ अलिशा भी थी।

दोनों के चेहरे पर वही गंभीरता थी, जो किसी नए मिशन की शुरुआत से पहले दिखाई देती है।

जैसे ही शक्ति अंदर पहुँची, ड्यूटी पर मौजूद सभी पुलिसकर्मियों ने एक साथ सलामी दी।

"जय हिंद, मैडम!"

"जय हिंद।"

शक्ति ने शांत स्वर में जवाब दिया और बिना रुके सीधे कॉन्फ़्रेंस रूम की ओर बढ़ गई।

अंदर ACP विक्रम सिंह और उनकी पूरी टीम पहले से मौजूद थी।

शक्ति ने मेज़ पर रखी केस फ़ाइल उठाई और सभी अधिकारियों पर एक नज़र डाली।

"आज से इस केस की असली जाँच शुरू होगी।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

"और याद रखिए..."

उसकी आवाज़ पहले से अधिक दृढ़ थी।

"आज हम किसी अपराधी का पीछा नहीं करेंगे..."

"...आज हम उसकी पहली गलती ढूँढ़ेंगे।"

इतना कहकर उसने फ़ाइल बंद की और कॉन्फ़्रेंस रूम से बाहर निकल गई।


__

शक्ति ने फ़ाइल बंद की और कॉन्फ़्रेंस रूम से बाहर निकल आई।

उसके पीछे अलिशा, एसीपी विक्रम सिंह और पूरी टीम भी बाहर आ गई।



कॉरिडोर में चलते हुए शक्ति ने बिना रुके पूछा—

"इस केस पर अब तक कितनी टीमें काम कर चुकी हैं?"

एसीपी विक्रम ने जवाब दिया—

"मैडम, कुल तीन टीमें। लेकिन किसी को भी कोई ठोस सफलता नहीं मिली।"

"और पहली लड़की?"

"उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट आठ महीने पहले दर्ज हुई थी।"

शक्ति कुछ पल चुप रही।

फिर उसने चलते-चलते कहा— "हम शुरुआत आख़िरी केस से नहीं करेंगे..."

सभी अधिकारी उसकी तरफ़ देखने लगे।

"हम पहले केस से शुरुआत करेंगे।"

एसीपी विक्रम ने हल्की हैरानी से पूछा— "पहले केस से, मैडम?"

"हाँ।"

शक्ति की आवाज़ पूरी तरह शांत थी।

"हर अपराधी पहली गलती करता है... और ज़्यादातर मामलों में वही गलती पहले अपराध में छिपी होती है।"

अलिशा ने तुरंत अपनी डायरी में यह बात नोट कर ली।

शक्ति ने आगे कहा—

"मुझे पहली पीड़िता की पूरी फ़ाइल चाहिए। उसकी कॉल डिटेल, परिवार, दोस्तों की जानकारी, आख़िरी लोकेशन... एक भी जानकारी छूटनी नहीं चाहिए।"

"जी, मैडम।"

"और..."

शक्ति रुक गई।

उसने सभी अधिकारियों की तरफ़ देखा।

"आज से इस केस की एक-एक जानकारी इस कमरे से बाहर नहीं जाएगी। जब तक मैं न कहूँ, मीडिया से कोई बात नहीं करेगा।"

"यस, मैडम!"

पूरी टीम ने एक साथ जवाब दिया।

शक्ति ने हल्का-सा सिर हिलाया!

"मुझे उस जगह ले चलिए... जहाँ से इस कहानी की शुरुआत हुई थी।"

इतना कहकर वह तेज़ क़दमों से बाहर की ओर बढ़ गई।

उसके पीछे पूरी टीम भी उसी दृढ़ता के साथ चल पड़ी।
__

कुछ ही देर बाद...

पुलिस की दो गाड़ियाँ बनारस की व्यस्त सड़कों से होती हुई शहर के पुराने हिस्से में पहुँच गईं।

गाड़ियाँ एक संकरी गली के बाहर आकर रुकीं।

शक्ति गाड़ी से उतरी और चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई।

आठ महीने पहले इसी इलाके से पहली लड़की अचानक लापता हुई थी। आज वहाँ ज़िंदगी पहले की तरह चल रही थी, जैसे यहाँ कभी कुछ हुआ ही न हो।

सामने छोटी-छोटी दुकानें थीं। सड़क पर लोगों की आवाजाही सामान्य थी।



एसीपी विक्रम उसके पास आकर बोले—

"मैडम... पहली लड़की को आख़िरी बार इसी जगह देखा गया था।"

शक्ति ने कुछ नहीं कहा।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

उसकी नज़रें हर छोटी-बड़ी चीज़ पर थीं—दुकानों की बनावट, गलियों का रास्ता, आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे और लोगों की गतिविधियाँ।

कुछ कदम चलने के बाद वह एक जगह रुक गई।

उसने सामने लगी एक पुरानी इमारत की तरफ़ इशारा किया।

"ये इमारत आठ महीने पहले भी यहीं थी?"

विक्रम ने तुरंत जवाब दिया—

"जी, मैडम।"

"और सामने लगा कैमरा?"

"उस समय भी था... लेकिन घटना वाले दिन उसकी रिकॉर्डिंग नहीं मिली थी।"

शक्ति ने कैमरे को कुछ पल ध्यान से देखा।

फिर शांत स्वर में बोली—

"रिकॉर्डिंग नहीं मिली..."

उसने कैमरे से नज़र हटाए बिना कहा—

"...या किसी ने मिलने नहीं दी?"

उसके इस सवाल पर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

एसीपी विक्रम ने पहली बार महसूस किया कि वह इस केस को बिल्कुल अलग नज़रिए से देख रही थी।

शक्ति ने अलिशा की तरफ़ देखा।

"इस इलाके के पिछले एक साल के सभी सीसीटीवी, दुकानदारों के बयान और उस दिन की पूरी टाइमलाइन चाहिए।"

"जी, मैडम।"

"और एक बात..."

"उसकी नज़रें पूरी गली का बारीकी से निरीक्षण कर रही थीं। दुकानों की बनावट, गलियों का फैलाव, आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे और लोगों की हर गतिविधि उसकी पैनी नज़रों से छूट नहीं रही थी।"

"अपराधी कितनी भी सफ़ाई से काम करे..."

"...वो अपने पीछे कोई न कोई गलती ज़रूर छोड़ता है।"

"हमें बस उसे ढूँढ़ना है।"

इतना कहकर वह उस गली के भीतर की ओर बढ़ गई...

जहाँ शायद इस रहस्य की पहली असली कड़ी उनका इंतज़ार कर रही थी।

__

उसी समय...

बनारस शहर के दूसरे छोर पर।

एक काली एसयूवी धीरे-धीरे शहर की पुरानी गलियों से गुजर रही थी।

ड्राइविंग सीट पर कुशल था, जबकि पीछे शिवाय प्रताप सिंह शांत भाव से बैठे खिड़की के बाहर देख रहे थे।

सुबह का बनारस अपनी अलग ही रफ्तार में था।

घाटों की ओर बढ़ते श्रद्धालु, मंदिरों की घंटियाँ और हर गली में फैली पुरानी संस्कृति...

लेकिन शिवाय का ध्यान इनमें से किसी पर नहीं था।

शिवाय पूरे रास्ते खिड़की के बाहर देखते रहे। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, लेकिन उनकी उँगलियाँ सीट के हत्थे पर लगातार हल्की थाप दे रही थीं। कुशल समझ गया था कि इस बार शिवाय असामान्य रूप से बेचैन थे।


कुछ देर बाद गाड़ी एक पुराने मकान के सामने आकर रुकी।

कुशल नीचे उतरा और पीछे का दरवाज़ा खोलते हुए बोला—

"सर... हम पहुँच गए।"

शिवाय बिना कुछ कहे गाड़ी से नीचे उतरे।

उन्होंने एक नज़र उस पुराने मकान पर डाली।

बाहर से देखने पर वह बिल्कुल साधारण लग रहा था...

लेकिन कुशल जानता था कि इसी मकान में उनका सबसे भरोसेमंद source उनका इंतज़ार कर रहा है।

शिवाय ने धीमे स्वर में कहा—

"चलो।"

दोनों अंदर की ओर बढ़ गए।

उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था...

उसी शहर के दूसरे छोर पर...

एक और इंसान उसी सच के पीछे चल पड़ा था...

जिसकी तलाश शिवाय पिछले तेईस वर्षों से कर रहे थे।

__

पुराने मकान का दरवाज़ा अंदर से बंद होते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

कमरा साधारण था। एक पुरानी लकड़ी की मेज़, दो कुर्सियाँ और कोने में रखा एक लोहे का अलमारीनुमा संदूक।

कुछ ही क्षण बाद लगभग साठ वर्ष का एक व्यक्ति अंदर आया।

उसके चेहरे पर उम्र की लकीरें साफ़ दिखाई दे रही थीं, लेकिन आँखों की सतर्कता बता रही थी कि वह वर्षों से इसी काम में था।

जैसे ही उसकी नज़र शिवाय पर पड़ी, उसने सम्मान से सिर झुका दिया।

"प्रणाम, सर।"

शिवाय ने हल्के से सिर हिलाया।

"बैठिए।"

तीनों मेज़ के चारों ओर बैठ गए।

कुछ पल की चुप्पी के बाद शिवाय ने सीधे पूछा—

"सुना है... तुम्हारे पास हमारे काम की कोई जानकारी है।"

उस व्यक्ति ने धीमे से सिर हिलाया।

"जी, सर।"

उसने मेज़ पर एक पुराना लिफ़ाफ़ा रखा।

"ये पिछले हफ़्ते मेरे हाथ लगा। पहले मुझे लगा इसका आपकी तलाश से कोई संबंध नहीं होगा... लेकिन जब मैंने पूरी जानकारी जुटाई, तो लगा कि आपको बताए बिना नहीं रह सकता।"

शिवाय ने लिफ़ाफ़ा अपने हाथ में लिया, लेकिन उसे खोला नहीं।

"सीधे मुद्दे पर आइए।"

उस व्यक्ति ने गहरी साँस ली।

"सर... मुझे पूरा यक़ीन नहीं है। इसलिए इसे सच नहीं कहूँगा।"

"लेकिन..."

वह एक पल रुका।

"...जिस बच्ची को तेईस साल पहले बनारस लाया गया था..."

"...उसका ज़िक्र मुझे पहली बार किसी पुराने रिकॉर्ड में मिला है।"

कुशल और शिवाय दोनों एक साथ उसकी तरफ़ देखने लगे।

"उस रिकॉर्ड में नाम नहीं था..."

"...लेकिन कुछ ऐसी बातें थीं जो आपकी तलाश से मिलती हैं।"

शिवाय की आवाज़ पहले जैसी शांत थी, लेकिन इस बार उसमें एक अलग ही दृढ़ता थी।

"वो रिकॉर्ड कहाँ है?"

"सर... जिस आदमी के पास था, उसकी मौत कई साल पहले हो चुकी है।"

"लेकिन..."

"उसका बेटा अभी ज़िंदा है।"

कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया।

शिवाय धीरे से अपनी कुर्सी से उठे।

उन्होंने लिफ़ाफ़ा अपने हाथ में लिया और कुशल की तरफ़ देखा।

"चलो... अभी।"

"जी, सर।"

तीनों कमरे से बाहर निकल गए।

उन्हें नहीं पता था...

जिस सच के एक कदम और करीब वे पहुँच रहे थे...

उसी सच की दूसरी कड़ी...

इस वक्त बनारस की एक पुरानी गली में शक्ति तलाश रही थी।

जानने के लिए पढ़ते रहिए... Shakti Ke Shiv