painter's curse in Hindi Human Science by Vijay Erry books and stories PDF | चित्रकार का श्राप

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चित्रकार का श्राप

चित्रकार का श्राप        लेखक: विजय शर्मा ऐरी, अजनाला, अमृतसर         पहाड़ों से घिरे एक छोटे से गाँव का नाम था रंगपुर. गाँव का नाम ही उसकी पहचान था. वहाँ के घरों की दीवारों पर रंग-बिरंगे चित्र बने रहते थे. हर त्योहार पर लोग अपने घरों को नए चित्रों से सजाते थे. उसी गाँव में एक युवक रहता था, जिसका नाम था आदित्य. वह इतना अद्भुत चित्रकार था कि लोग कहते थे, "उसके बनाए चित्रों में जान बसती है."आदित्य बचपन से ही प्रकृति का दीवाना था. वह घंटों नदी किनारे बैठकर पेड़ों, पक्षियों और बादलों को देखता रहता. फिर अपनी तूलिका से वही दृश्य कैनवास पर उतार देता. उसकी बनाई तस्वीरें इतनी जीवंत होतीं कि देखने वाला कुछ पल के लिए वास्तविकता और चित्र के बीच का अंतर भूल जाता.धीरे-धीरे उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई. राजा-महाराजा, व्यापारी और बड़े अधिकारी भी उसके बनाए चित्र खरीदने आने लगे. धन, सम्मान और प्रसिद्धि उसके कदम चूमने लगे.एक दिन गाँव में एक वृद्ध साधु आए. उन्होंने आदित्य के चित्र देखे और मुस्कुराकर बोले, "बेटा, तुम्हें यह कला ईश्वर का वरदान है. इसे केवल सत्य, प्रेम और मानवता के लिए उपयोग करना. जिस दिन तुम अपने स्वार्थ के लिए कला का दुरुपयोग करोगे, उसी दिन यह वरदान श्राप बन जाएगा."आदित्य ने विनम्रता से सिर झुका दिया. लेकिन मन ही मन उसने सोचा, "मैं इतना महान कलाकार हूँ, मुझे कोई श्राप नहीं लग सकता."समय बीतता गया.एक दिन राजधानी से एक धनी व्यापारी आया. उसने कहा, "मुझे ऐसा चित्र चाहिए जो देखने वाले को मोहित कर दे. मैं तुम्हें जितना चाहो उतना धन दूँगा."धन का नाम सुनकर आदित्य का मन डगमगा गया. उसने कई दिनों तक मेहनत करके एक अद्भुत चित्र बनाया. चित्र इतना सुंदर था कि उसे देखते ही हर व्यक्ति उसमें खो जाता.व्यापारी चित्र लेकर चला गया.कुछ दिनों बाद खबर आई कि जिसने भी वह चित्र देखा, वह अपने काम-काज भूलने लगा. लोग घंटों उसी चित्र के सामने बैठे रहते. परिवार टूटने लगे. व्यापार बंद होने लगे. बच्चों की पढ़ाई छूट गई. लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया.आदित्य को अपनी भूल का एहसास हुआ, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी.उस रात उसे वही वृद्ध साधु स्वप्न में दिखाई दिए.उन्होंने कहा, "मैंने तुम्हें चेतावनी दी थी. कला का उद्देश्य लोगों को जीवन से जोड़ना है, जीवन से दूर करना नहीं."सुबह जब आदित्य अपनी चित्रशाला पहुँचा तो उसके सामने रखा हर चित्र बदल चुका था.किसी चित्र में फूल मुरझा गए थे.किसी में नदी सूख गई थी.किसी में पक्षियों के पंख गायब थे.और सबसे विचित्र बात यह थी कि हर चित्र की आँखों से आँसू बह रहे थे.आदित्य घबरा गया.उसने नया चित्र बनाने की कोशिश की.लेकिन तूलिका हाथ में आते ही रंग काले पड़ जाते.लाल रंग राख जैसा हो जाता.हरा रंग धूसर बन जाता.नीला रंग गायब हो जाता.मानो रंगों ने उससे मित्रता तोड़ दी हो.गाँव के लोग कहने लगे, "चित्रकार पर श्राप लग गया है."कुछ ही दिनों में उसकी प्रसिद्धि समाप्त हो गई.जो लोग कभी उसकी प्रशंसा करते थे, वही अब उसका मजाक उड़ाने लगे.आदित्य अकेला पड़ गया.एक दिन वह जंगल की ओर निकल गया.वहीं एक घायल हिरणी तड़प रही थी.उसने अपने कपड़े फाड़कर उसकी मरहम-पट्टी की.पास ही एक गरीब लकड़हारा बैठा रो रहा था. उसकी बेटी बीमार थी.आदित्य ने अपने बचे हुए पैसे उसे दे दिए.उसने किसी से अपनी पहचान नहीं बताई.धीरे-धीरे उसने लोगों की सहायता करना शुरू कर दिया.वह गाँव के बच्चों को निःशुल्क चित्रकला सिखाने लगा.वह उन्हें बताता, "चित्र केवल सुंदर बनाने के लिए नहीं होते. चित्र किसी के मन में आशा जगाने चाहिए."एक वर्ष बीत गया.एक दिन वही वृद्ध साधु फिर उसके सामने प्रकट हुए.उन्होंने पूछा, "अब तुम्हें कला का अर्थ समझ आया?"आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले.उसने कहा, "पहले मैं चित्र बनाता था ताकि लोग मेरी प्रशंसा करें. आज मैं चित्र बनाना चाहता हूँ ताकि किसी के चेहरे पर मुस्कान आ सके."साधु मुस्कुराए.उन्होंने अपनी कमंडल से कुछ जल उसकी तूलिका पर छिड़का.अचानक तूलिका चमक उठी.आदित्य ने सामने रखा सफेद कैनवास उठाया.इस बार उसने किसी राजा, महल या धनवान का चित्र नहीं बनाया.उसने एक किसान को खेत में काम करते हुए बनाया.एक माँ को अपने बच्चे को गले लगाते हुए बनाया.एक सैनिक को सीमा पर खड़े हुए बनाया.एक शिक्षक को बच्चों को पढ़ाते हुए बनाया.एक डॉक्टर को रोगी की सेवा करते हुए बनाया.जब चित्र पूरा हुआ तो उसे देखने वालों की आँखों में आँसू आ गए.लेकिन इस बार वे आँसू दुःख के नहीं, प्रेरणा के थे.जिसने भी चित्र देखा, उसके मन में अपने कर्तव्य के प्रति नई ऊर्जा जाग उठी.लोगों ने कहा, "यह चित्र केवल आँखों से नहीं, आत्मा से बनाया गया है."आदित्य की प्रसिद्धि फिर लौट आई.लेकिन इस बार वह पहले जैसा नहीं था.वह कभी अपने चित्रों की कीमत नहीं बताता.वह कहता, "यदि मेरे चित्र से किसी का जीवन बेहतर होता है, वही मेरी सबसे बड़ी कमाई है."कई वर्षों बाद जब आदित्य वृद्ध हुआ तो उसने अपनी चित्रशाला के प्रवेश द्वार पर एक पंक्ति लिखवाई—"कला का सबसे बड़ा रंग प्रेम है, और सबसे बड़ा कैनवास मानव का हृदय."उसके निधन के बाद भी उसकी चित्रशाला खुली रही.लोग दूर-दूर से उसके चित्र देखने आते.कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से उन चित्रों को देखता, उसके भीतर छिपी अच्छाई जाग उठती.और जो केवल लालच या अहंकार लेकर वहाँ जाता, उसे कोई चित्र दिखाई ही नहीं देता.गाँव वाले आज भी कहते हैं कि चित्रकार को श्राप नहीं मिला था.श्राप तो उसके अहंकार को मिला था.जब अहंकार समाप्त हुआ, तब कला फिर से ईश्वर का आशीर्वाद बन गई.समाप्त.मौलिकता प्रमाणपत्र:यह कहानी पूर्णतः मौलिक रचना है. इसकी कथा, पात्र, घटनाएँ और संवाद स्वतंत्र रूप से रचे गए हैं. इसका उद्देश्य कला, विनम्रता, सेवा और मानवता के महत्व को रेखांकित करना है।