कोटड़ा गाँव की सुबह हमेशा से ही अलग रही थी। यहाँ सूरज उगने से पहले ही महिलाएँ चूल्हे की आग जला चुकी होती थीं और पुरुष अपनी हुक्के की लय में गाँव की चौपाल की ओर बढ़ रहे होते थे। लेकिन उस ठंडी नवंबर की सुबह कुछ और ही होने वाला था। सोलह साल की मीरा ने अपनी झोंपड़ी की दरार से बाहर देखा। आसमान अब भी तारों से भरा था लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। आज उसका दसवीं का रिज़ल्ट आने वाला था और उसे पूरा यकीन था कि वह गाँव की पहली लड़की बनेगी जो जिले के स्कूल में टॉप करेगी।
मीरा के हाथ में एक टूटी हुई चूड़ी थी जो उसकी दादी ने उसे दी थी। वह चूड़ी अब उसकी कलाई में ढीली हो गई थी लेकिन फिर भी उसने उसे पहना रखा था। यह उसकी यादों का हिस्सा बन चुकी थी। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक से सिर पर रखा और चुपचाप रसोई में घुस गई। उसकी माँ कमला चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। आग की लपटें उनके चेहरे पर एक अजीब सी लाली छोड़ रही थीं।
माँ। मीरा ने धीरे से कहा। आज मेरा रिज़ल्ट आएगा।
कमला ने हाँ में सिर हिलाया लेकिन उनकी आँखों में चिंता थी। वह जानती थीं कि इस गाँव में लड़कियों की पढ़ाई लिखाई कोई मायने नहीं रखती। लड़की तो पराया धन होती है। एक दिन उसे ससुराल जाना ही है। मीरा के पिता रामप्रसाद ने पहले ही कह दिया था कि दसवीं के बाद मीरा की शादी कर दी जाएगी। उसके भाई भैरव ने भी यही राय दी थी। भैरव खुद तो बारहवीं फेल था लेकिन गाँव की पंचायत में बैठने का हक़ उसे इसलिए था क्योंकि वह मर्द था।
मीरा ने रोटी का एक टुकड़ा उठाया और बाहर निकल आई। उसके कदम उसके स्कूल की ओर बढ़ रहे थे जो गाँव से तीन किलोमीटर दूर था। रास्ते में उसने सरिता को देखा। सरिता उसकी सहपाठी थी और दोनों ने साथ मिलकर रातों को तेल की लालटेन में पढ़ाई की थी।
मीरा तू तो टॉप करेगी ही। सरिता ने कहा। तेरी तो आँखों में आग है।
मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा कि आग नहीं सरिता। बस एक ख्वाब है। और वह ख्वाब यह है कि मैं पढ़कर कुछ बनूँ। गाँव की लड़कियों के लिए कुछ करूँ।
सरिता ने उदास होकर कहा कि मेरे बापू तो कह रहे हैं कि इस साल की बसंत पंचमी के बाद मेरी शादी कर देंगे। मुझे तो पढ़ना ही नसीब नहीं।
मीरा ने उसका हाथ पकड़ा। मत रो सरिता। एक दिन सब ठीक होगा। हम दोनों मिलकर कुछ करेंगे।
लेकिन मीरा नहीं जानती थी कि उसकी ज़िंदगी में भी एक तूफ़ान आने वाला था। जब वह स्कूल पहुँची तो प्रधानाचार्य ने उसे बुलाया। उसके हाथ में मार्कशीट थी। मीरा ने जिले में पहला स्थान हासिल किया था। स्कूल में खुशी की लहर दौड़ गई। लेकिन मीरा के चेहरे पर मुस्कुराहट ज़्यादा देर नहीं टिकी।
शाम को जब वह गाँव लौटी तो उसके घर के बाहर एक घोड़ी बंधी हुई थी। और गाँव के बुज़ुर्ग जमा थे। उसकी सासू माँ यानी कि जिस घर में उसकी शादी तय हुई थी वहाँ से लोग आए थे। मीरा का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा।
रामप्रसाद ने उसे बुलाया। मीरा आ। तेरा भाग्य तारे लिखे जा रहे हैं। तेरी शादी तय हो गई है। अगले महीने तुझे विदा कर देंगे।
मीरा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पिता जी मैंने तो अभी पढ़ना है। मैंने जिले में टॉप किया है। मुझे आगे पढ़ने दीजिए।
रामप्रसाद ने गुस्से में कहा कि चुप। लड़की होकर इतनी बोलती हो। तुम्हारी शादी ऊँची जाति के ठाकुर साहब के बेटे से हो रही है। यह हमारे लिए सम्मान की बात है। पढ़ाई लिखाई लड़कियों के लिए नहीं होती।
मीरा ने अपनी माँ की ओर देखा। कमला की आँखें नम थीं लेकिन वह कुछ नहीं बोल सकीं। भैरव ने कहा कि बहन तू समझ। तेरा क्या है। तू तो ससुराल चली जाएगी। यहाँ रहकर हमारा नाम खराब मत कर।
उस रात मीरा ने अपने कमरे में रोते हुए अपनी किताबें एक कपड़े में बाँधीं। वह उन्हें छिपाना चाहती थी। लेकिन उसे पता था कि अब उसकी दुनिया बदलने वाली है। शादी के दिन उसे लाल जोड़े में सजाया गया। गाने बजे। लोग नाचे। लेकिन मीरा का दिल रो रहा था। उसकी आँखों के सामने उसके सपने टूट रहे थे जैसे कांच की चूड़ियाँ जो एक झटके में बिखर जाती हैं।
ससुराल पहुँचने पर उसे पता चला कि उसका पति रघुबीर एक शराबी और ज़ालिम आदमी है। उसकी सास एक कठोर औरत थी जो मीरा को हर समय गालियाँ देती थी। मीरा को सुबह चार बजे उठना पड़ता था। पूरे घर की सफ़ाई करनी पड़ती थी। फिर खेतों में जाकर मज़दूरी करनी पड़ती थी। शाम को जब वह थकी हुई लौटती तो उसके हाथ में एक सूखी रोटी थमा दी जाती थी।
एक दिन जब मीरा ने रघुबीर से कहा कि मुझे पढ़ना है। मुझे स्कूल जाने दीजिए। रघुबीर ने उसे ज़ोर से थप्पड़ मारा। तुम्हें पढ़ना है। तुम एक औरत हो। और औरत का काम सिर्फ़ घर संभालना है। बाहर जाकर मुँह मत खोलो।
मीरा के गाल पर लाल निशान था लेकिन उसके मन में एक आग और तेज़ हो गई। उसने सोचा कि अगर यही मेरी ज़िंदगी है तो मैं इसे बदलकर रहूँगी। लेकिन कैसे। वह एक दिन खेतों में काम कर रही थी तो उसने देखा कि एक बूढ़ी औरत सिलाई का काम कर रही थी। वह औरत गाँव की बाहर एक झोंपड़ी में रहती थी। लोग उसे बुधिया कहते थे। मीरा ने उससे बात की।
बुधिया ने कहा कि बेटी मैं सिलाई जानती हूँ। लेकिन अब आँखें कमज़ोर हो गई हैं। मुझे कोई उत्तराधिकारी नहीं मिला।
मीरा ने कहा कि माँ जी मुझे सिखा दीजिए। मैं आपकी मदद करूँगी।
बुधिया ने मुस्कुराते हुए कहा कि तू एक ठाकुरानी है बेटी। तुझे यह सब करने की क्या ज़रूरत है।
मीरा ने कहा कि माँ जी ठाकुरानी होने से पेट नहीं भरता। और आत्मा तो भूखी रह जाती है।
बुधिया ने उसे अपनी झोंपड़ी में बुलाया। रोज़ शाम को जब मीरा खेतों से लौटती तो एक घंटे के लिए बुधिया के पास जाती। वह सिलाई सीखने लगी। उसके हाथ तेज़ थे। वह जल्दी सीख गई। कुछ ही महीनों में उसने कुर्ते सलवार और ब्लाउज बनाने सीख लिए।
एक दिन बुधिया ने उसे एक पुरानी सिलाई मशीन दी। यह मेरी बेटी की थी। वह चली गई। अब तू रख ले।
मीरा ने वह मशीन अपने घर के पिछवाड़े में छिपा रखी। रात को जब सब सो जाते तो वह कपड़े सिलती। फिर उन्हें बुधिया के ज़रिए बाज़ार में बेचवा देती। धीरे धीरे उसके हाथ में कुछ पैसे आने लगे। उसने एक गुल्लक खरीदा और उसमें हर रोज़ एक एक रुपया जमा किया।
लेकिन एक रात रघुबीर शराब में धुत उसके कमरे में आया। उसने देखा कि मीरा सिलाई मशीन पर काम कर रही है। उसका चेहरा काला पड़ गया। तुमने मेरी इजाज़त के बिना यह क्या शुरू कर दिया। रघुबीर ने मशीन उठाई और ज़मीन पर पटक दी। मशीन टूट गई। मीरा ने रोकने की कोशिश की तो रघुबीर ने उसे लात मारी। मीरा गिर गई। उसके सिर में चोट आई। खून बहने लगा।
उस रात मीरा बाहर निकली। उसने सोचा कि अब और नहीं। अगर मैं यहाँ रही तो मर जाऊँगी। लेकिन कहाँ जाऊँ। उसकी सास ने उसे देखा और कहा कि रो मत। यही तो औरतों की किस्मत है। सहन करना सीखो।
मीरा ने कहा कि नहीं माँ जी। मैं और नहीं सह सकती।
अगले दिन सुबह मीरा ने अपने गुल्लक में से पैसे निकाले। कुल मिलाकर पाँच सौ रुपये थे। उसने एक छोटा सा बैग बाँधा और गाँव की सीमा की ओर चल पड़ी। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। आँसू आ रहे थे लेकिन कदम रुक नहीं रहे थे।
वह जिले के शहर पहुँची। वहाँ उसने एक ढाबे पर काम माँगा। मालिक ने उसे रख लिया। काम बहुत था। सुबह चार बजे से रात के ग्यारह बजे तक। लेकिन मीरा ने हिम्मत नहीं हारी। वह दिन में ढाबे पर काम करती और रात को एक पास के स्कूल में नाइट क्लास में पढ़ने जाती। वहाँ उसने बारहवीं की परीक्षा दी और पास हो गई।
ढाबे के मालिक ने उसे एक दिन कहा कि बेटी तू बहुत मेहनती है। मैं तुझे एक और काम सिखाना चाहता हूँ। वह उसे अपने कंप्यूटर सेंटर में ले गया। मीरा ने कंप्यूटर सीखना शुरू किया। टाइपिंग। एक्सेल। वर्ड। उसे सब आने लगा। उसकी मेहनत देखकर एक ग्राहक ने उसे अपनी छोटी कंपनी में नौकरी दे दी।
मीरा अब एक दफ़्तर में काम करती थी। उसने अपने किराए के कमरे में एक छोटी सी लाइब्रेरी बनाई। वहाँ वह शाम को गाँव की औरतों को मुफ़्त में पढ़ाने लगी जो शहर में मज़दूरी करने आई थीं। उनमें से कई अनपढ़ थीं। मीरा ने उन्हें हिंदी और गणित सिखाया। फिर उन्हें सिलाई का प्रशिक्षण दिया। धीरे धीरे उसके पास औरतों की भीड़ जमा होने लगी।
एक दिन एक समाचार पत्र के रिपोर्टर ने उसका इंटरव्यू लिया। अगले दिन अख़बार में छपा। गाँव से भागी लड़की अब सैकड़ों औरतों की उम्मीद बनी। मीरा ने यह पढ़ा तो रो पड़ी। लेकिन यह आँसू खुशी के थे।
तीन साल बीत गए। मीरा अब एक स्वयं सहायता समूह चलाती थी जिसका नाम था उड़ान। इस समूह में पचास से ज़्यादा औरतें थीं जो मिलकर सिलाई का काम करती थीं। उनका सामान शहर के बड़े बाज़ारों में बिकने लगा। मीरा ने एक छोटा सा कारखाना खोल लिया था।
फिर एक दिन उसे खबर मिली कि उसके पिता रामप्रसाद बीमार हैं। उसकी माँ कमला ने फोन किया। मीरा ने सोचा कि क्या वह वापस जाए। लेकिन डर भी लग रहा था। फिर उसने हिम्मत की। वह अपनी गाड़ी में कोटड़ा गाँव पहुँची। गाँव वाले उसे देखकर हैरान रह गए। वह साड़ी में थी लेकिन आँखों में वही आग थी।
घर पहुँचने पर रामप्रसाद ने उसे देखा और रोने लगे। बेटी मैंने तुम्हें गलत समझा। मुझे माफ़ कर दे। मीरा ने उनके पैर छुए। पिता जी आप मेरे बाप हैं। मैं आपसे नाराज़ नहीं।
भैरव ने भी सिर झुकाकर कहा कि बहन तूने तो हमारा नाम रोशन कर दिया। मुझे माफ़ कर। मैंने तुझे दबाया।
मीरा ने कहा कि भैरव भैया मुझे माफ़ी नहीं बदलाव चाहिए। गाँव की लड़कियों को पढ़ने का मौका चाहिए।
उसी रात मीरा ने गाँव की पंचायत में भाषण दिया। वहाँ सैकड़ों लोग जमा थे। मीरा ने कहा कि मैंने भागकर ज़िंदगी नहीं बनाई। मैंने लड़कर बनाई। और आज मैं चाहती हूँ कि हमारे गाँव की हर लड़की पढ़े। हर औरत आत्मनिर्भर बने। मैं यहाँ एक स्कूल खोलना चाहती हूँ। एक कौशल केंद्र। जहाँ औरतें सिलाई कंप्यूटर और अन्य काम सीख सकें।
गाँव के बुज़ुर्गों ने हाँ में सिर हिलाया। उन्होंने देखा था कि मीरा क्या कर सकती है। अगले ही महीने मीरा ने अपनी बचत से गाँव में एक स्कूल की नींव रखी। उसने नाम रखा सावित्री बाई फुले विद्या मंदिर। स्कूल खुलते ही सौ से ज़्यादा लड़कियाँ दाखिला लेने आईं। मीरा ने शहर से अपनी सहयोगी औरतों को बुलाया जो गाँव में आकर पढ़ाने लगीं।
छह महीने बाद मीरा को जिला परिषद् का सदस्य चुना गया। वह अब जनप्रतिनिधि थी। उसने गाँव में शौचालय बनवाए। स्वच्छ पानी की व्यवस्था की। और औरतों के लिए एक सामुदायिक केंद्र खोला जहाँ वे अपनी समस्याएँ बता सकती थीं।
एक दिन मीरा अपने स्कूल के बाहर खड़ी थी। एक छोटी लड़की दौड़कर आई। दीदी मैंने भी जिले में टॉप किया है। मीरा ने उसे गले लगा लिया। उसकी आँखों में आँसू थे। उसे लगा कि उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना पूरा हो गया है।
शाम को जब मीरा अपने स्कूल की छत पर खड़ी होकर सूरज को डूबते देख रही थी तो उसे अपने संघर्ष की याद आई। वह रात जब उसने मशीन पर काम किया था। वह दिन जब उसे लात पड़ी थी। वह सुबह जब वह गाँव छोड़कर भागी थी। सब कुछ याद आया। लेकिन अब वह दर्द नहीं था। वह ताकत बन चुका था।
उसने नीचे देखा। गाँव की औरतें अपने अपने काम से लौट रही थीं। कुछ के हाथ में किताबें थीं। कुछ के हाथ में कमाई। कुछ मुस्कुरा रही थीं। कुछ गा रही थीं। मीरा ने सोचा कि यही तो है असली आज़ादी। यही तो है नारी सशक्तिकरण। यह कोई नारा नहीं है। यह एक ज़िंदगी है। एक साँस है। एक हक़ है जो हर औरत को मिलना चाहिए।
उसने आसमान की ओर देखा। तारे निकल आए थे। मीरा ने फुसफुसाते हुए कहा कि माँ। आज मैंने आसमान छू लिया है। और यह आसमान सिर्फ़ मेरा नहीं। यह हम सब औरतों का है।
नीचे स्कूल के बच्चे एक गीत गा रहे थे। उड़ने दो हमें। आसमान हमारा है। मीरा ने मुस्कुराते हुए नीचे उतरना शुरू किया। उसके कदम मज़बूत थे। उसका हृदय भरा हुआ था। और उसकी आत्मा। उसकी आत्मा आज़ाद थी। पूरी तरह से आज़ाद।