यजुर्वेद सूक्ति (6) की व्याख्या"मा अघशंसः°यजुर्वेद-- 1/1हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहगत न करें। पूरा मंत्र अर्थ सहितआपके द्वारा उद्धृत "मा अघशंसः" वास्तव में यजुर्वेद 1.1 का एक अंश है। पूरा मंत्र इस प्रकार है—इषे त्वा ऊर्जे त्वा। वायवः स्थ। देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे। आप्यायध्वमघ्न्या देवभागमूर्जस्वतीः पयस्वतीः। प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा। मा वः स्तेन ईशत। मा अघशंसः। ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात। बह्वीः यजमानस्य पशून् पाहि॥— यजुर्वेद 1.1शब्दार्थमा = नवः = तुमको / तुम्हारास्तेनः = चोरईशत = अधिकार करे, वश में करेअघशंसः = दुष्ट, अनिष्ट चाहने वाला, पापीगोपतौ = रक्षक, स्वामीपशून् पाहि = पशुओं की रक्षा करोभावार्थहे परमात्मा! हमें अन्न और बल प्रदान करें। सविता देव हमें श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त करे। हमारी गौएँ (या जीवन के पालन-पोषण के साधन) पुष्ट, दुग्धसम्पन्न, रोगरहित और संतानयुक्त हों। न तो कोई चोर उन पर अधिकार करे और न कोई दुष्ट अथवा अहित चाहने वाला उनका या हमारा अनिष्ट करे। वे सुरक्षित रहें और यजमान के धन-धान्य तथा पशुधन की रक्षा हो।इस मंत्र में "मा अघशंसः" का भाव है—"हे ईश्वर! कोई दुष्ट, पापी अथवा अहित चाहने वाला हमारा अहित न करे।वेदों में प्रमाण --"यदि विषय "हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (दुष्टों से रक्षा की प्रार्थना) है, तो वेदों में इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख वैदिक मंत्र उनके अर्थ और संक्षिप्त विवरण सहित दिए जा रहे हैं।1. यजुर्वेद 1.1...मा वः स्तेन ईशत। मा अघशंसः। ध्रुवा अस्मिन् गोपतौ स्यात्। बह्वीः यजमानस्य पशून् पाहि॥अर्थ:हे परमेश्वर! न चोर हमारा धन छीनें और न दुष्ट अथवा अहित चाहने वाले हमारा अनिष्ट करें। हमारे धन-धान्य और पशुओं की रक्षा करें।विवरण:यह मंत्र ईश्वर से बाहरी दुष्टों, चोरों और अहितकारियों से रक्षा की प्रार्थना है।2. ऋग्वेद 1.89.1आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः॥अर्थ:हमारे पास सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार आएँ, और कोई हमें हानि पहुँचाने वाला न हो।विवरण:यह मंत्र शुभ विचारों और अहित से रक्षा की प्रार्थना करता है।3. अथर्ववेद 19.15.6भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः। भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥अर्थ:हे देवो! हम अपने कानों से शुभ सुनें, आँखों से शुभ देखें और सुरक्षित जीवन व्यतीत करें।विवरण:यह मंत्र जीवन में कल्याण और अनिष्ट से सुरक्षा की कामना करता है।4. ऋग्वेद 10.63.10मा नो हिंसीज्जनिता यः पृथिव्या...अर्थ:हे परमेश्वर! कोई हमारा अहित न करे; आप हमारी रक्षा करें।विवरण:यहाँ ईश्वर से हिंसा और अनिष्ट से बचाने की प्रार्थना की गई है।5. यजुर्वेद 36.24शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा।शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः॥अर्थ:हमारे लिए सब ओर से कल्याण हो, शांति हो और कोई अनिष्ट न हो।विवरण:यह शान्ति एवं सुरक्षा की सार्वभौमिक प्रार्थना है, जिसमें जीवन के सभी प्रकार के भय और अहित से रक्षा की कामना की गई है।इन सभी वैदिक मंत्रों का मूल संदेश है कि मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करे कि दुष्ट, चोर, हिंसक और अहित चाहने वाले लोग उसका अनिष्ट न कर सकें तथा ईश्वर उसकी सर्वत्र रक्षा करे।उपनिषदों में प्रमाण---यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" है, तो उपनिषदों में भी ईश्वर से रक्षा, अभय और दुष्टता से मुक्ति की भावना अनेक स्थानों पर व्यक्त हुई है। यद्यपि "मा अघशंसः" शब्दशः उपनिषदों में नहीं आता, परन्तु उसका भाव निम्नलिखित मंत्रों में स्पष्ट रूप से मिलता है।1. कठोपनिषद् 2.3.2यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥अर्थ:जब मनुष्य के हृदय में स्थित सभी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं, तब वह अमृतस्वरूप होकर ब्रह्म को प्राप्त करता है।विवरण:दुष्टता, हिंसा और अहित का मूल कारण कामना और स्वार्थ है। यह मंत्र बताता है कि ईश्वर की प्राप्ति से मनुष्य दुष्ट प्रवृत्तियों से मुक्त होता है।2. ईशोपनिषद् मन्त्र 18अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम॥अर्थ:हे प्रभु! हमें उत्तम मार्ग से ले चलिए। हमारे पापों और कुटिल प्रवृत्तियों को दूर कीजिए। हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।विवरण:यह उपनिषद् का अत्यन्त प्रसिद्ध रक्षा-प्रार्थना मंत्र है। इसमें ईश्वर से आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकार के अनिष्ट से रक्षा की याचना की गई है।3. तैत्तिरीयोपनिषद् (शान्तिपाठ)सह नाववतु।सह नौ भुनक्तु।सह वीर्यं करवावहै।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥अर्थ:हे परमात्मा! हमारी रक्षा करें, हमारा पालन करें, हमें सामर्थ्य दें और हमारे बीच द्वेष उत्पन्न न हो।विवरण:यह शान्तिपाठ बताता है कि ईश्वर की कृपा से परस्पर द्वेष समाप्त होता है और अहित की संभावना नहीं रहती।4. मुण्डकोपनिषद् 2.2.11भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥अर्थ:परमात्मा के साक्षात्कार होने पर हृदय की गाँठें खुल जाती हैं, सभी संशय दूर हो जाते हैं और बन्धनकारी कर्म नष्ट हो जाते हैं।विवरण:जो ईश्वर को प्राप्त करता है, वह दुष्टता और भय से ऊपर उठ जाता है; उसके जीवन में आध्यात्मिक सुरक्षा स्थापित होती है।5. बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्माऽमृतं गमय॥अर्थ:हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलिए।विवरण:यह मंत्र दुष्टता, अज्ञान और विनाश से बचाकर सत्य, प्रकाश और कल्याण की ओर ले जाने की प्रार्थना है। इसका भाव "मा अघशंसः" के अनुरूप है कि ईश्वर हमें अनिष्ट और अधर्म से बचाएँ।निष्कर्ष:उपनिषदों में "मा अघशंसः" शब्द नहीं मिलता, लेकिन ईश्वर से रक्षा, अभय, पाप और दुष्ट प्रवृत्तियों से मुक्ति, तथा कल्याण की प्रार्थना बार-बार की गई है। विशेष रूप से ईशोपनिषद् मन्त्र 18, तैत्तिरीयोपनिषद् का शान्तिपाठ, और बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28 इस विषय के सबसे उपयुक्त प्रमाण हैं।पुराणों में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् ईश्वर से दुष्टों एवं अहितकारियों से रक्षा की प्रार्थना) है, तो पुराणों में भी अनेक स्थानों पर भगवान से रक्षा की प्रार्थना की गई है। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण श्लोक संख्या सहित दिए जा रहे हैं।1. विष्णु पुराण (1.19.23)त्वमेव शरणं नाथ जगतां त्राणकारकः।त्वमेव प्रतिपालश्च त्वमेव शरणं मम॥अर्थ :हे प्रभो! आप ही सम्पूर्ण जगत के रक्षक हैं। आप ही मेरे रक्षक और शरण हैं।विवरण :यह श्लोक भगवान को सभी प्रकार के भय, दुष्टों और संकटों से रक्षा करने वाला बताता है।2. श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.58समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवंमहत्पदं पुण्ययशो मुरारेः।भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदंपदं पदं यद्विपदां न तेषाम्॥अर्थ :जो भगवान के चरणों की शरण ग्रहण करते हैं, उनके लिए यह संसार-सागर सरल हो जाता है और वे विपत्तियों से सुरक्षित रहते हैं।विवरण :ईश्वर की शरण लेने वाले की रक्षा होती है; दुष्टों और संकटों का प्रभाव उस पर नहीं पड़ता।3. श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.28नारायणपराः सर्वेन कुतश्चन बिभ्यति।स्वर्गापवर्गनरकेष्वपितुल्यार्थदर्शिनः॥अर्थ :जो भगवान नारायण के आश्रित हैं, वे किसी से नहीं डरते।विवरण :ईश्वर की शरण मनुष्य को निर्भय बनाती है; दुष्ट उसका वास्तविक अहित नहीं कर सकते।4. मार्कण्डेय पुराण (देवीमाहात्म्य) 11.24सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥अर्थ :हे सर्वशक्तिमयी! हमें सभी प्रकार के भय और संकटों से बचाइए।विवरण :यह श्लोक भय, संकट और अहित से रक्षा की प्रार्थना है।5. गरुड़ पुराण (पूर्वखण्ड)रक्षां करोति भगवान् विष्णुः भक्तवत्सलः।भावार्थ :भगवान विष्णु अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उन्हें संकटों से बचाते हैं।विवरण :गरुड़ पुराण में अनेक स्थानों पर भगवान को भक्तों का रक्षक बताया गया है।निष्कर्ष"मा अघशंसः" का भाव—"हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें"—पुराणों में मुख्यतः ईश्वर की शरण, दुष्टों से रक्षा, भय से मुक्ति और भक्त-रक्षा के रूप में व्यक्त हुआ है।विशेष रूप से इस विषय के लिए सबसे उपयुक्त प्रमाण हैं:विष्णु पुराण 1.19.23श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.58श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.28ध्यान दें: ऊपर दिए गए कुछ श्लोकों के अध्याय/संख्या विभिन्न संस्करणों (संस्करण-भेद) में थोड़े भिन्न मिल सकते हैं। भगवद्गीता में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" है, तो श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने भक्तों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और निर्भयता का आश्वासन दिया है। यहाँ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. भगवद्गीता 9.31कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥अर्थ:हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! तुम निश्चयपूर्वक घोषणा कर दो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।विवरण:यह भगवान का स्पष्ट आश्वासन है कि जो उनकी शरण में रहता है, उसका वास्तविक अहित नहीं होता।2. भगवद्गीता 18.66सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥अर्थ:सब प्रकार के आश्रयों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों और उनके परिणामों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत करो।विवरण:ईश्वर की शरण ग्रहण करने वाला उनकी रक्षा में रहता है; उसे भय और अनिष्ट से अभय मिलता है।3. भगवद्गीता 4.8परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥अर्थ:साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।विवरण:यह श्लोक "मा अघशंसः" के भाव का सबसे सशक्त प्रमाण है—भगवान स्वयं सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के दमन का वचन देते हैं।4. भगवद्गीता 16.1–3 (प्रारम्भ)अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः.अर्थ:निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान और सद्गुण दिव्य सम्पदा के लक्षण हैं।विवरण:ईश्वरमार्ग पर चलने वाला व्यक्ति निर्भय होता है; दुष्टों का भय उसके जीवन पर शासन नहीं करता।5. भगवद्गीता 12.6–7ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥अर्थ:जो अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं और अपने कर्म मुझे अर्पित करते हैं, उनका मैं शीघ्र ही संसाररूपी संकट-सागर से उद्धार करता हूँ।विवरण:भगवान अपने भक्तों के रक्षक और उद्धारकर्ता हैं; यही "हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" की भावना का गीता में विस्तार है।निष्कर्ष"मा अघशंसः" के भाव के समर्थन में गीता के सबसे उपयुक्त श्लोक हैं:गीता 4.8 — परित्राणाय साधूनां... (सज्जनों की रक्षा, दुष्टों का विनाश)गीता 9.31 — न मे भक्तः प्रणश्यति।गीता 18.66 — मामेकं शरणं व्रज... मा शुचः।गीता 12.6–7 — भगवान अपने भक्तों का उद्धार करते हैं।ये सभी श्लोक इस सिद्धांत की पुष्टि करते हैं कि ईश्वर की शरण में रहने वाले की रक्षा होती है और दुष्टों का अनिष्ट अंततः सफल नहीं होता।महाभारत में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" है, तो महाभारत में भी अनेक स्थानों पर धर्मात्माओं की रक्षा, दुष्टों के दमन तथा ईश्वर की शरण का वर्णन मिलता है। यहाँ प्रमुख प्रमाण श्लोक, उद्धरण और भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. महाभारत, उद्योगपर्व 58.24यतो धर्मस्ततो जयः॥अर्थ :जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।विवरण :यह महाभारत का मूल सिद्धान्त है। जो धर्म का पालन करता है, अंततः उसका अहित नहीं होता और दुष्टों का नाश होता है।2. महाभारत, वनपर्व 313.117धर्मो रक्षति रक्षितः।अर्थ :जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।विवरण :यह महाभारत का अत्यन्त प्रसिद्ध सिद्धान्त है। ईश्वर और धर्म के मार्ग पर चलने वाले की रक्षा स्वयं धर्म करता है; दुष्ट उसका स्थायी अहित नहीं कर सकते।3. महाभारत, उद्योगपर्व 72.23न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥अर्थ :हे प्रिय! कल्याणकारी कर्म करने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।विवरण :यह शिक्षा महाभारत में भी प्रतिपादित है और बाद में भगवद्गीता (6.40) में भी यही वचन मिलता है। सज्जन का अंततः अहित नहीं होता।4. महाभारत, शान्तिपर्व 109.10अहिंसा परमो धर्मः।अर्थ :अहिंसा परम धर्म है।विवरण :जो अहिंसा और धर्म का पालन करता है, वह ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है और दुष्टता से दूर रहता है।5. महाभारत, शान्तिपर्व 161.7धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥अर्थ :धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है, और धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है। इसलिए धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।विवरण :यह श्लोक "मा अघशंसः" के भाव का प्रत्यक्ष समर्थन करता है—धर्मपरायण व्यक्ति की रक्षा होती है और अधर्मी अंततः स्वयं विनष्ट होता है।निष्कर्ष"हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" इस भाव के समर्थन में महाभारत के सबसे उपयुक्त प्रमाण हैं—महाभारत, शान्तिपर्व 161.7 — धर्मो रक्षति रक्षितः...महाभारत, वनपर्व 313.117 — धर्मो रक्षति रक्षितः।महाभारत, उद्योगपर्व 58.24 — यतो धर्मस्ततो जयः।महत्वपूर्ण टिप्पणी:"धर्मो रक्षति रक्षितः" और "यतो धर्मस्ततो जयः" अत्यंत प्रसिद्ध महाभारतीय उक्तियाँ हैं, लेकिन अध्याय और श्लोक संख्या विभिन्न संस्करणों (जैसे गीता प्रेस, BORI Critical Edition आदि) में भिन्न मिल सकती है। स्मृतियों में ष्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् दुष्टों से रक्षा एवं धर्मात्मा की सुरक्षा) है, तो स्मृति-ग्रन्थों में भी इस भाव का समर्थन मिलता है। यहाँ प्रमुख प्रमाण श्लोक, श्लोक संख्या, अर्थ और विवरण सहित प्रस्तुत हैं।1. मनुस्मृति 8.15धर्मो रक्षति रक्षितो हन्ति धर्मो हतः।तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥अर्थ :धर्म की रक्षा करने पर धर्म हमारी रक्षा करता है, और धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है। इसलिए धर्म का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।विवरण :यह स्मृति का अत्यन्त प्रसिद्ध सिद्धान्त है। जो धर्म का पालन करता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म और ईश्वर करते हैं; दुष्ट उसका स्थायी अहित नहीं कर सकते।2. मनुस्मृति 7.35धर्मेण रक्षन् प्रजाः सर्वाः...अर्थ :राजा को धर्म के अनुसार प्रजा की रक्षा करनी चाहिए।विवरण :स्मृति का यह सिद्धान्त बताता है कि धर्म का उद्देश्य सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का दमन है।3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.356धर्मशास्त्रपुरस्कृत्य...भावार्थ :मनुष्य को धर्मशास्त्र के अनुसार आचरण करना चाहिए; ऐसा करने से उसकी रक्षा होती है और समाज में न्याय बना रहता है।विवरण :धर्मानुसार जीवन ही सुरक्षा और कल्याण का आधार है।4. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।अर्थ :अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम—ये सभी का धर्म हैं।विवरण :जो इन धर्मों का पालन करता है, वह दुष्टता से दूर रहता है और ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है।5. पराशर स्मृति 1.22धर्मेण पापमपनुदति।अर्थ :धर्म के द्वारा पाप और अनिष्ट दूर होते हैं।विवरण :यह स्मृति बताती है कि धर्माचरण मनुष्य को संकटों और अहित से बचाता है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" के भाव का समर्थन स्मृतियों में मुख्यतः इन सिद्धान्तों से होता है—मनुस्मृति 8.15 — धर्मो रक्षति रक्षितः... (सबसे प्रमुख प्रमाण)मनुस्मृति 7.35 — धर्म द्वारा प्रजा की रक्षा।याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122 — धर्ममय जीवन सुरक्षा का आधार।पराशर स्मृति 1.22 — धर्म से पाप और अनिष्ट का नाश।महत्वपूर्ण टिप्पणी:ऊपर दिए गए कुछ उद्धरणों के अध्याय एवं श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों में भिन्न हो सकते हैं। नीति ग्रन्थों में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् दुष्टों से रक्षा, सज्जनों का कल्याण और धर्म की विजय) है, तो नीति-ग्रन्थों में भी इस भाव का समर्थन मिलता है। यहाँ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. विदुरनीति (महाभारत, उद्योगपर्व 33.72)न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति॥अर्थ :जो विश्वास योग्य न हो, उस पर विश्वास न करे; और जो विश्वासपात्र हो, उस पर भी अति-विश्वास न करे। क्योंकि अनुचित विश्वास से उत्पन्न भय और अनिष्ट मनुष्य की जड़ तक काट देता है।विवरण :विदुर बताते हैं कि दुष्टों से सावधान रहना भी आत्मरक्षा का धर्म है।2. चाणक्य नीति 1.15परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्।वर्जयेत् तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम्॥अर्थ :जो सामने मीठी बातें करे और पीछे से अहित करे, ऐसे व्यक्ति का त्याग करना चाहिए; वह ऊपर से दूध और भीतर से विष से भरे घड़े के समान है।विवरण :यह श्लोक दुष्ट और कपटी लोगों से बचने की शिक्षा देता है।3. चाणक्य नीति 1.16न दुर्जनेषु भागधेयं न च विश्वासकारणम्।भावार्थ :दुष्ट व्यक्तियों के साथ साझेदारी या विश्वास नहीं करना चाहिए।विवरण :दुष्ट से दूरी ही सुरक्षा का उपाय है।4. हितोपदेश, मित्रलाभ 75दुर्जनः प्रियवादी च नैतद् विश्वासकारणम्।मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदये तु हलाहलम्॥अर्थ :यदि दुष्ट व्यक्ति मधुर वचन भी बोले, तो भी उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। उसकी जिह्वा पर मधु होता है, पर हृदय में विष।विवरण :यह नीति-श्लोक दुष्टों से सावधान रहने की शिक्षा देता है।5. पंचतन्त्र, मित्रभेददुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कृतोऽपि सन्।मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः॥अर्थ :दुष्ट व्यक्ति विद्वान् या गुणी दिखाई दे, तब भी उसका त्याग करना चाहिए; जैसे मणि से सुशोभित सर्प भी भयावह ही होता है।विवरण :यह श्लोक बताता है कि दुष्ट का स्वभाव नहीं बदलता; इसलिए उससे दूर रहना ही हितकर है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" के भाव के समर्थन में नीति-ग्रन्थों के सबसे उपयुक्त प्रमाण हैं—विदुरनीति (महाभारत, उद्योगपर्व 33.72) — दुष्टों पर अंधविश्वास न करो।चाणक्य नीति 1.15 — परोक्षे कार्यहन्तारम्... (कपटी से सावधान रहो।)हितोपदेश, मित्रलाभ 75 — दुर्जनः प्रियवादी च... (मधुर वचन बोलने वाले दुष्ट पर भी विश्वास न करो।)पंचतन्त्र, मित्रभेद — दुर्जनः परिहर्तव्यः... (दुष्ट का संग त्यागना चाहिए।)ध्यान दें: चाणक्य नीति, हितोपदेश और पंचतन्त्र के श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों में भिन्न हो सकते हैं। वाल्मीकि रामायण में प्रमाण-- यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् दुष्टों से रक्षा एवं धर्मात्माओं की सुरक्षा) है, तो वाल्मीकि रामायण में भगवान श्रीराम के चरित्र और अनेक श्लोक इस भाव का समर्थन करते हैं। यहाँ प्रमुख प्रमाण श्लोक, अर्थ और विवरण सहित दिए जा रहे हैं।1. वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 18.33सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥अर्थ :जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहे कि "मैं आपका हूँ", उसे मैं सभी प्राणियों से अभय देता हूँ। यह मेरा व्रत है।विवरण :विभीषण की शरणागति के समय श्रीराम का यह वचन है। यह "हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" के भाव का सर्वोत्तम प्रमाण है, क्योंकि भगवान स्वयं शरणागत की रक्षा का व्रत लेते हैं।2. वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड 2.18.30 (भाव)धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।अर्थ :इस संसार में धर्म ही सर्वोच्च है और सत्य धर्म में ही प्रतिष्ठित है।विवरण :धर्म का पालन करने वाले की रक्षा स्वयं धर्म करता है; अधर्मी अंततः पराजित होता है।3. वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 99.25 (भाव)धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि।पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वः शरेण जहि रावणिम्॥अर्थ :यदि दशरथनन्दन श्रीराम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं तथा पराक्रम में अद्वितीय हैं, तो इस बाण से रावण का वध हो।विवरण :यह श्लोक धर्म की विजय और दुष्ट के विनाश का उद्घोष है।4. वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड 128.101धर्मो हि तेषामधिकः बलं च।अर्थ :धर्म ही सज्जनों का सबसे बड़ा बल है।विवरण :दुष्टों से रक्षा का वास्तविक साधन धर्म और ईश्वर का आश्रय है।निष्कर्ष"मा अघशंसः" के भाव के समर्थन में वाल्मीकि रामायण का सबसे प्रमुख प्रमाण है—युद्धकाण्ड 18.33सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥यह श्लोक स्पष्ट रूप से बताता है कि भगवान शरणागत को सभी प्राणियों से अभय प्रदान करते हैं; अर्थात् कोई दुष्ट उसका अहित नहीं कर सकता।महत्वपूर्ण टिप्पणी: वाल्मीकि रामायण के सर्ग और श्लोक संख्या विभिन्न संस्करणों (गीता प्रेस, क्रिटिकल एडिशन आदि) में कुछ भिन्न हो सकती है। योग वाशिष्ठ में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" है, तो योगवासिष्ठ का मुख्य उपदेश यह है कि आत्मज्ञानी और ईश्वरनिष्ठ पुरुष अंततः भय, शोक और बाह्य अनिष्ट से परे हो जाता है। यद्यपि योगवासिष्ठ में यह वाक्य शब्दशः नहीं मिलता, किन्तु उसके भाव के अनुरूप अनेक श्लोक हैं।1. योगवासिष्ठ, निर्वाणप्रकरण (उत्तरार्ध)न बिभेति कुतश्चित् स न शोचति कदाचन।आत्मज्ञानबलोपेतो जीवन्मुक्तः स उच्यते॥अर्थ :जो आत्मज्ञान से सम्पन्न है, वह किसी से नहीं डरता और कभी शोक नहीं करता; वही जीवन्मुक्त कहलाता है।विवरण :आत्मज्ञान और ईश्वरनिष्ठा मनुष्य को भय और दुष्टों के आतंक से ऊपर उठा देती है।2. योगवासिष्ठ, उपशमप्रकरणचित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत्।यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम्॥अर्थ :मन ही संसार का कारण है; इसलिए उसे शुद्ध करना चाहिए। जैसा मन होता है, मनुष्य वैसा ही बन जाता है।विवरण :दुष्टता का मूल मन की अशुद्धि है। मन के शुद्ध होने पर अहित, द्वेष और भय का प्रभाव समाप्त हो जाता है।3. योगवासिष्ठ, वैराग्यप्रकरणयस्य नास्ति स्वयं भयम् तस्य कुतो भयं परात्।अर्थ :जिसके भीतर भय नहीं है, उसे बाहरी वस्तुओं से भी भय नहीं होता।विवरण :ईश्वर-विश्वास और आत्मज्ञान से युक्त व्यक्ति दुष्टों से भी विचलित नहीं होता।4. योगवासिष्ठ, निर्वाणप्रकरणशुभाशुभपरित्यागी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।समः सर्वेषु भूतेषु स शान्तिमधिगच्छति॥अर्थ :जो शुभ-अशुभ के अहंकार से ऊपर उठकर सबमें समभाव रखता है, वही वास्तविक शान्ति प्राप्त करता है।विवरण :ऐसे साधक का अन्तःकरण सुरक्षित रहता है; बाहरी दुष्टता उसकी आत्मिक शान्ति को नष्ट नहीं कर सकती।निष्कर्ष"मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" के भाव के अनुरूप योगवासिष्ठ का संदेश यह है कि—ईश्वरनिष्ठ और आत्मज्ञानी पुरुष निर्भय होता है।शुद्ध मन वाला व्यक्ति दुष्टता से अप्रभावित रहता है।वास्तविक सुरक्षा आत्मज्ञान और ईश्वराश्रय से प्राप्त होती है।महत्वपूर्ण सावधानी: ऊपर दिए गए श्लोकों में से कुछ भावानुकूल उद्धरण हैं। योगवासिष्ठ के विभिन्न संस्करणों (लघु योगवासिष्ठ, बृहद् योगवासिष्ठ, निर्वाणप्रकरण के भिन्न पाठ) में श्लोक-पाठ और संख्या में पर्याप्त भिन्नता मिलती है। इस्लाम धर्म में प्रमाण--यदि विषय "हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (दुष्टों से रक्षा की प्रार्थना) है, तो इस्लाम में भी अल्लाह से सुरक्षा और बुराई से बचाने की अनेक दुआएँ तथा क़ुरआन की आयतें हैं।1. सूरह अल-फ़लक (113:1–5)अरबी:قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ الْفَلَقِ ١مِن شَرِّ مَا خَلَقَ ٢وَمِن شَرِّ غَاسِقٍ إِذَا وَقَبَ ٣وَمِن شَرِّ النَّفَّاثَاتِ فِي الْعُقَدِ ٤وَمِن شَرِّ حَاسِدٍ إِذَا حَسَدَ ٥हिन्दी अर्थ:कह दीजिए: मैं प्रभात के पालनहार की शरण लेता हूँ—उसकी बनाई हुई हर बुरी चीज़ के अनिष्ट से, अंधकार के फैलने की बुराई से, गाँठों में फूँकने वालों की बुराई से, और ईर्ष्या करने वाले की बुराई से जब वह ईर्ष्या करे।विवरण:यह दुष्टों, ईर्ष्यालुओं और हर प्रकार की बुराई से ईश्वर की शरण लेने की प्रार्थना है।2. सूरह अन-नास (114:1–6)अरबी:قُلْ أَعُوذُ بِرَبِّ النَّاسِ ١مَلِكِ النَّاسِ ٢إِلَٰهِ النَّاسِ ٣مِن شَرِّ الْوَسْوَاسِ الْخَنَّاسِ ٤الَّذِي يُوَسْوِسُ فِي صُدُورِ النَّاسِ ٥مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ ٦हिन्दी अर्थ:कह दीजिए: मैं लोगों के पालनहार, लोगों के स्वामी और लोगों के उपास्य की शरण लेता हूँ, उस फुसफुसाने वाले के अनिष्ट से, जो लोगों के दिलों में बुरे विचार डालता है, चाहे वह जिन्नों में से हो या मनुष्यों में से।विवरण:यह बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार की बुराइयों से सुरक्षा की प्रार्थना है।3. सूरह आल-इमरान (3:173)अरबी:حَسْبُنَا اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُहिन्दी अर्थ:अल्लाह हमारे लिए पर्याप्त है, और वही सबसे अच्छा संरक्षक (कार्य-संपादक) है।विवरण:विश्वासी कठिन समय और शत्रुओं के भय में अल्लाह पर भरोसा रखता है।4. सूरह अल-बक़रह (2:286)अरबी:رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا ۚ أَنْتَ مَوْلَانَا فَانْصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَहिन्दी अर्थ:हे हमारे पालनहार! हम पर ऐसा बोझ न डाल जो हमारी शक्ति से बाहर हो। हमें क्षमा कर, हमें माफ़ कर, हम पर दया कर। तू ही हमारा संरक्षक है, इसलिए हमें विरोधियों पर सहायता प्रदान कर।विवरण:यह अल्लाह से सहायता, दया और सुरक्षा की प्रार्थना है।निष्कर्षवैदिक प्रार्थना "मा अघशंसः" (हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें) के भाव से इस्लाम में सबसे निकट की आयतें हैं—सूरह अल-फ़लक (113:1–5) — हर प्रकार की बुराई से शरण।सूरह अन-नास (114:1–6) — मनुष्यों और अदृश्य बुराइयों से सुरक्षा।सूरह आल-इमरान (3:173) — حَسْبُنَا اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ।सूरह अल-बक़रह (2:286) — अल्लाह से संरक्षण, क्षमा और सहायता की प्रार्थना।सूफी सन्तों में प्रमाण--यदि विषय "हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (ईश्वर से रक्षा, बुराई से सुरक्षा) है, तो सूफ़ी संतों की रचनाओं में भी अल्लाह की शरण, बुराई से सुरक्षा और ईश्वर पर भरोसे का भाव मिलता है। नीचे कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी संतों के उद्धरण दिए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि सूफ़ी साहित्य का अधिकांश भाग काव्य और सूक्तियों का है, न कि शास्त्रीय ग्रंथों की तरह अध्याय-श्लोकबद्ध।1. हज़रत जलालुद्दीन रूमी (مثنوی معنوی)فارسی:هر که در پناهِ حق آید، از آفت ایمن گردد.हिन्दी अर्थ:जो ईश्वर की शरण में आता है, वह विपत्तियों और अनिष्ट से सुरक्षित हो जाता है।विवरण:रूमी ईश्वर की शरण को सभी भय और दुष्टता से सुरक्षा का आधार बताते हैं।2. शेख़ सादी शीराज़ी (گلستان)فارسی:توکل بر خدا کن، که خدا نگهدارِ بندگانِ خویش است.हिन्दी अर्थ:ईश्वर पर भरोसा रखो, क्योंकि वही अपने बंदों का रक्षक है।विवरण:सादी के अनुसार वास्तविक सुरक्षा केवल ईश्वर पर भरोसा रखने से मिलती है।3. हाफ़िज़ शीराज़ी (دیوان حافظ)فارسی:در پناهِ لطفِ خدا، هیچ بیمی نیست.हिन्दी अर्थ:ईश्वर की कृपा की छाया में कोई भय नहीं रहता।विवरण:यह ईश्वर की कृपा से निर्भय होने का संदेश है।4. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीفارسی:هر که با خدا باشد، از دشمنان نترسد.हिन्दी अर्थ:जो ईश्वर के साथ है, उसे शत्रुओं से भय नहीं होता।विवरण:ईश्वर की निकटता को दुष्टों से सुरक्षा का आधार माना गया है।5. हज़रत निज़ामुद्दीन औलियाفارسی:دل با خدا دار، که خدا نگهبانِ دلهای پاک است.हिन्दी अर्थ:अपने हृदय को ईश्वर से जोड़ो; ईश्वर पवित्र हृदय वालों का रक्षक है।विवरण:शुद्ध हृदय और ईश्वर-स्मरण से अनिष्ट का भय कम होता है।6. शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानीالعربية:مَنْ تَوَكَّلَ عَلَى اللَّهِ كَفَاهُ اللَّهُ.हिन्दी अर्थ:जो अल्लाह पर भरोसा करता है, अल्लाह उसके लिए पर्याप्त हो जाता है।विवरण:ईश्वर पर पूर्ण भरोसा रखने वाला उसकी सुरक्षा में रहता है।7. बायज़ीद बिस्तामीفارسی:هر که به خدا پناه برد، از شرِّ خلق ایمن شود.हिन्दी अर्थ:जो ईश्वर की शरण लेता है, वह लोगों की बुराई से सुरक्षित हो जाता है।विवरण:यह कथन ईश्वर की शरण को दुष्टों के अनिष्ट से बचने का उपाय बताता है।महत्वपूर्ण टिप्पणीऊपर दिए गए सूफ़ी उद्धरणों में से कई भावानुकूल सूफ़ी कथन हैं, न कि ऐसे उद्धरण जिनके लिए क़ुरआन या हदीस की तरह सार्वभौमिक अध्याय/पद्य संख्या उपलब्ध हो। सूफ़ी संतों की वाणी विभिन्न मसनवी, दीवान, मलफ़ूज़ात और तज़किरा ग्रंथों में अलग-अलग पाठों के साथ मिलती है। सिक्ख धर्म में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (हे प्रभु! दुष्टों से मेरी रक्षा करें) है, तो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में भी ईश्वर से रक्षा, निर्भयता और शरण की भावना अनेक स्थानों पर व्यक्त हुई है। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी, लिप्यंतरण, अर्थ और संदर्भ सहित दिए जा रहे हैं।1. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 263ਗੁਰਮੁਖੀ:ਰਾਖਾ ਏਕੁ ਹਮਾਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥लिप्यंतरण:Rākhā ek hamārā suāmī.हिन्दी अर्थ:हमारा एकमात्र रक्षक परमात्मा है।विवरण: यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि वास्तविक रक्षा केवल परमात्मा ही करता है; दुष्ट उसका अहित नहीं कर सकते जो उसकी शरण में है।2. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 816ਗੁਰਮੁਖੀ:ਜਾ ਕੈ ਰਾਖੈ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ॥ਤਾ ਕਉ ਮਾਰਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ ॥लिप्यंतरण:Jā kai rākhai sirjaṇhār, tā kau mār na sakai koī.हिन्दी अर्थ:जिसकी रक्षा स्वयं सृष्टिकर्ता करता है, उसे कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता।विवरण: यह "मा अघशंसः" के भाव का अत्यंत निकट प्रमाण है।3. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 682ਗੁਰਮੁਖੀ:ਭੈ ਕਾਹੂ ਕਉ ਦੇਤ ਨਹਿ ਨਹਿ ਭੈ ਮਾਨਤ ਆਨ ॥लिप्यंतरण:Bhai kāhū kau det nahi, nahi bhai mānat ān.हिन्दी अर्थ:न किसी को भय दो और न किसी से भय मानो।विवरण: ईश्वर-भक्ति मनुष्य को निर्भय बनाती है।4. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 394ਗੁਰਮੁਖੀ:ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਭਉ ਨ ਬਿਆਪੈ ॥लिप्यंतरण:Prabh kai simran bhau na biāpai.हिन्दी अर्थ:प्रभु के स्मरण से भय पास नहीं आता।विवरण: ईश्वर का स्मरण मनुष्य को दुष्टों और संकटों के भय से मुक्त करता है।5. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 293ਗੁਰਮੁਖੀ:ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥लिप्यंतरण:Nānak nām chaṛhdī kalā, tere bhāṇe sarbat dā bhalā.हिन्दी अर्थ:हे नानक! प्रभु के नाम से उत्साह बना रहता है, और उसकी इच्छा में सबका कल्याण हो।विवरण: यह शिक्षा केवल अपनी रक्षा ही नहीं, बल्कि सभी के कल्याण की भावना भी सिखाती है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" के भाव से सबसे निकट सिख प्रमाण हैं—ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 816 — ਜਾ ਕੈ ਰਾਖੈ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ਤਾ ਕਉ ਮਾਰਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ।ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 263 — ਰਾਖਾ ਏਕੁ ਹਮਾਰਾ ਸੁਆਮੀ।ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 394 — ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਭਉ ਨ ਬਿਆਪੈ।ਗੁਰੂ ਗ੍ਰੰਥ ਸਾਹਿਬ, ਅੰਗ 682 — ਭੈ ਕਾਹੂ ਕਉ ਦੇਤ ਨਹਿ ਨਹਿ ਭੈ ਮਾਨਤ ਆਨ।ये सभी प्रमाण इस सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं कि परमात्मा की शरण और नाम-स्मरण से मनुष्य निर्भय रहता है तथा दुष्ट उसका वास्तविक अहित नहीं कर सकते।ईसाई धर्म में प्रमाण --यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (हे परमेश्वर! दुष्टों और बुराई से मेरी रक्षा करें) है, तो ईसाई धर्म (बाइबल) में भी परमेश्वर से सुरक्षा और बुराई से बचाने की अनेक प्रार्थनाएँ मिलती हैं। यहाँ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी लिपि (English text), हिन्दी अर्थ और संदर्भ सहित दिए जा रहे हैं।1. Psalm 121:7–8English (KJV):"The Lord shall preserve thee from all evil: he shall preserve thy soul.The Lord shall preserve thy going out and thy coming in from this time forth, and even for evermore."हिन्दी अर्थ:प्रभु तुम्हें हर प्रकार की बुराई से बचाएगा; वह तुम्हारे प्राणों की रक्षा करेगा। तुम्हारे आने-जाने की रक्षा अब से सदा तक करेगा।विवरण: यह बाइबल में ईश्वर द्वारा हर प्रकार की बुराई से रक्षा का स्पष्ट आश्वासन है।2. Psalm 91:9–11English (KJV):"Because thou hast made the Lord, which is my refuge, even the most High, thy habitation;There shall no evil befall thee...For he shall give his angels charge over thee, to keep thee in all thy ways."हिन्दी अर्थ:क्योंकि तुमने परमेश्वर को अपना आश्रय बनाया है, इसलिए कोई अनिष्ट तुम्हारे ऊपर नहीं आएगा; वह अपने स्वर्गदूतों को तुम्हारी रक्षा के लिए नियुक्त करेगा।विवरण: यह ईश्वर की शरण लेने वाले की सुरक्षा का सबसे प्रसिद्ध बाइबिलीय वचन है।3. 2 Thessalonians 3:3English (KJV):"But the Lord is faithful, who shall stablish you, and keep you from evil."हिन्दी अर्थ:प्रभु विश्वासयोग्य है; वह तुम्हें दृढ़ करेगा और बुराई से बचाए रखेगा।विवरण: यह वचन सीधे-सीधे परमेश्वर द्वारा बुराई से रक्षा का आश्वासन देता है।4. Isaiah 41:10English (KJV):"Fear thou not; for I am with thee: be not dismayed; for I am thy God: I will strengthen thee; yea, I will help thee; yea, I will uphold thee with the right hand of my righteousness."हिन्दी अर्थ:मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; निराश मत हो, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ। मैं तुझे सामर्थ्य दूँगा, तेरी सहायता करूँगा और अपने धर्ममय दाहिने हाथ से तुझे संभालूँगा।विवरण: ईश्वर अपने भक्त को निर्भय रहने और अपनी सुरक्षा का विश्वास दिलाते हैं।5. Matthew 6:13 (The Lord's Prayer)English (KJV):"And lead us not into temptation, but deliver us from evil."हिन्दी अर्थ:हमें परीक्षा में न पड़ने दे, बल्कि बुराई से बचा।विवरण: यह प्रभु यीशु द्वारा सिखाई गई प्रार्थना है, जिसमें परमेश्वर से बुराई से रक्षा की याचना की गई है।6. Romans 8:31English (KJV):"If God be for us, who can be against us?"हिन्दी अर्थ:यदि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो हमारा विरोध कौन कर सकता है?विवरण: ईश्वर के संरक्षण में रहने वाले को शत्रुओं से भय नहीं रहता।7. Psalm 46:1English (KJV):"God is our refuge and strength, a very present help in trouble."हिन्दी अर्थ:परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है; वह संकट के समय सदैव उपस्थित सहायक है।विवरण: यह श्लोक बताता है कि संकट और दुष्टों के समय परमेश्वर ही सच्चा रक्षक है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" के भाव के सबसे निकट बाइबल के प्रमाण हैं—Psalm 121:7–8 — The Lord shall preserve thee from all evil.Psalm 91:9–11 — There shall no evil befall thee.2 Thessalonians 3:3 — The Lord... will keep you from evil.Matthew 6:13 — Deliver us from evil.Isaiah 41:10 — Fear thou not; for I am with thee.ये सभी प्रमाण इस बात पर बल देते हैं कि परमेश्वर की शरण लेने वाला व्यक्ति बुराई और दुष्टों से उसकी रक्षा की प्रार्थना कर सकता है, और परमेश्वर को अपना रक्षक मानता है।जैन धर्म में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! (या आध्यात्मिक अर्थ में) दुष्ट मेरा अहित न करें" है, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जैन धर्म सृष्टिकर्ता ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना पर नहीं, बल्कि आत्मबल, सम्यक् दर्शन, अहिंसा और कर्म-सिद्धान्त पर आधारित है। इसलिए जैन आगमों में वैदिक शैली की "हे ईश्वर! मेरी रक्षा करें" जैसी प्रार्थना नहीं मिलती। इसके स्थान पर अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधुओं की वंदना तथा अहिंसा, क्षमा और आत्मरक्षा (आध्यात्मिक अर्थ में) का उपदेश मिलता है।फिर भी दुष्टता से बचने, किसी का अहित न करने और निर्भय रहने के भाव से संबंधित प्राकृत प्रमाण निम्न हैं:1. णमोकार (नवकार) मंत्रप्राकृत (देवनागरी):णमो अरिहंताणं।णमो सिद्धाणं।णमो आयरियाणं।णमो उवज्झायाणं।णमो लोए सव्वसाहूणं॥अर्थ: अरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार।विवरण: जैन धर्म में यह सर्वोच्च मंगलमंत्र है। इसका उद्देश्य आत्मा को राग-द्वेष और पापकर्मों से सुरक्षित करना है।2. उत्तराध्ययन सूत्र 8.9प्राकृत (देवनागरी):खमेमि सव्वे जीवा,सव्वे जीवा खमंतु मे।मित्ती मे सव्वभूएसु,वेरं मज्झं ण केणइ॥अर्थ: मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी प्राणियों से मेरी मैत्री है, किसी से मेरा वैर नहीं।विवरण: जहाँ वैर नहीं है, वहाँ अहित की भावना भी नहीं रहती। यह "दुष्ट मेरा अहित न करे" के स्थान पर "मैं किसी से वैर न रखूँ" का उच्च आदर्श प्रस्तुत करता है।3. दशवैकालिक सूत्रप्राकृत (देवनागरी):अहिंसा संजमो तवो।अर्थ: अहिंसा, संयम और तप ही धर्म हैं।विवरण: अहिंसा के पालन से स्वयं भी सुरक्षित रहते हैं और दूसरों का भी अहित नहीं करते।4. तत्त्वार्थसूत्र 7.11प्रमादो हिंसा।अर्थ: प्रमाद (असावधानी) ही हिंसा का कारण है।विवरण: जैन दर्शन के अनुसार हिंसा और अहित से बचने का उपाय सतत जागरूकता है।5. मूलाचारप्राकृत (देवनागरी):सव्वे पाणा ण हंतव्वा।अर्थ: सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।विवरण: जो किसी का अहित नहीं करता, वह अपने कर्मों को भी शुद्ध करता है।निष्कर्षवैदिक वाक्य "मा अघशंसः" का जैन धर्म में निकटतम भाव है—"वेरं मज्झं ण केणइ" — किसी से मेरा वैर न हो।"खमेमि सव्वे जीवा..." — सबके प्रति क्षमा और मैत्री।"अहिंसा संजमो तवो।" — अहिंसा और संयम ही सुरक्षा का मार्ग हैं।इनमें विशेष रूप से "खमेमि सव्वे जीवा..." जैन परम्परा का सबसे प्रसिद्ध और व्यापक रूप से स्वीकृत प्राकृत सूत्र है, जो द्वेष, वैर और अहित का पूर्ण परित्याग सिखाता है।बौद्ध धर्म मे प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" है, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि बौद्ध धर्म में सृष्टिकर्ता ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना की अपेक्षा बुद्ध, धम्म और संघ की शरण, मैत्री (मेत्ता), करुणा तथा कर्म के सिद्धान्त पर अधिक बल दिया गया है। इसलिए वैदिक शैली की "हे ईश्वर! मेरी रक्षा करें" जैसी प्रार्थना पाली त्रिपिटक में नहीं मिलती। इसके स्थान पर द्वेष से रक्षा, मैत्री और शरण का उपदेश मिलता है।नीचे इस भाव से संबंधित प्रमुख पाली प्रमाण देवनागरी लिपि में दिए जा रहे हैं।1. धम्मपद ५पाली (देवनागरी):न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥(Dhammapada, Verse 5)अर्थ :इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; केवल अवैर (मैत्री) से ही वैर शांत होता है। यही सनातन धर्म है।विवरण :दुष्ट के अहित से बचने का सर्वोच्च उपाय द्वेष का त्याग और मैत्री का विकास बताया गया है।2. त्रिशरण (बुद्धं शरणं गच्छामि)पाली (देवनागरी):बुद्धं सरणं गच्छामि।धम्मं सरणं गच्छामि।सङ्घं सरणं गच्छामि॥अर्थ :मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ।मैं धम्म की शरण जाता हूँ।मैं संघ की शरण जाता हूँ।विवरण :बौद्ध धर्म में आध्यात्मिक सुरक्षा बुद्ध, धम्म और संघ की शरण से मानी जाती है।3. करणीय मेत्ता सुत्त (सुत्तनिपात 1.8)पाली (देवनागरी):सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता॥अर्थ :सभी प्राणी सुखी हों।विवरण :जब सभी के प्रति मैत्री होती है, तब शत्रुता और अहित की भावना क्षीण होती है।4. धम्मपद २२३पाली (देवनागरी):अक्कोधेन जिने कोधं,असाधुं साधुना जिने।जिने कदरियं दानेन,सच्चेनालिकवादिनं॥(Dhammapada, Verse 223)अर्थ :क्रोध को अक्रोध से, दुष्ट को सज्जनता से, कंजूस को दान से और झूठे को सत्य से जीतना चाहिए।विवरण :यह दुष्ट के प्रति प्रतिशोध नहीं, बल्कि सदाचार से विजय का मार्ग बताता है।5. मंगल सुत्त (सुत्तनिपात 2.4)पाली (देवनागरी):फुट्ठस्स लोकधम्मेहि,चित्तं यस्स न कम्पति।असोकं विरजं खेयं,एतं मङ्गलमुत्तमं॥अर्थ :जो संसार की विपरीत परिस्थितियों से विचलित नहीं होता, शोक और कलुष से रहित रहता है—वही सर्वोत्तम मंगल है।विवरण :आध्यात्मिक दृढ़ता ही वास्तविक सुरक्षा है।निष्कर्ष"मा अघशंसः" के भाव से बौद्ध धर्म में सबसे निकट प्रमाण हैं—धम्मपद ५ — न हि वेरेन वेरानि... (वैर का अंत मैत्री से होता है।)धम्मपद २२३ — अक्कोधेन जिने कोधं... (दुष्टता को सज्जनता से जीतो।)करणीय मेत्ता सुत्त — सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता। (सभी प्राणी सुखी हों।)त्रिशरण — बुद्धं सरणं गच्छामि... (बुद्ध, धम्म और संघ की शरण।)ये प्रमाण बताते हैं कि बौद्ध धर्म में दुष्टों से रक्षा का मूल उपाय मैत्री, अहिंसा, धैर्य, आत्मसंयम और बुद्ध-धम्म-संघ की शरण है, न कि प्रतिशोध।यहूदी धर्म में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् परमेश्वर से दुष्टों, शत्रुओं और बुराई से रक्षा की प्रार्थना) है, तो यहूदी धर्म (Judaism) में भी तनख़ (Hebrew Bible/Old Testament) में परमेश्वर से सुरक्षा, शरण और बुराई से बचाने की अनेक प्रार्थनाएँ मिलती हैं। नीचे प्रमुख प्रमाण हिब्रू लिपि, उच्चारण और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. תהלים (Tehillim / भजन संहिता) 121:7–8हिब्रू:יְהוָה יִשְׁמָרְךָ מִכָּל־רָעיִשְׁמֹר אֶת־נַפְשֶׁךָ׃יְהוָה יִשְׁמָר־צֵאתְךָ וּבוֹאֶךָמֵעַתָּה וְעַד־עוֹלָם׃उच्चारण (Transliteration):Adonai yishmorkha mikol-ra; yishmor et-nafshekha.हिन्दी अर्थ:यहोवा तुझे हर बुराई से बचाएगा; वह तेरे प्राण की रक्षा करेगा। तेरे आने और जाने की रक्षा अब से सदा तक करेगा।विवरण:यह दुष्टता और अनिष्ट से परमेश्वर की रक्षा का स्पष्ट आश्वासन है।2. תהלים (Tehillim) 91:4–5हिब्रू:בְּאֶבְרָתוֹ יָסֶךְ לָךְ וְתַחַת־כְּנָפָיו תֶּחְסֶהצִנָּה וְסֹחֵרָה אֲמִתּוֹ׃לֹא־תִירָא מִפַּחַד לָיְלָהמֵחֵץ יָעוּף יוֹמָם׃उच्चारण:Be'evrato yasekh lakh, vetachat kenafav tekhseh.हिन्दी अर्थ:वह अपने पंखों से तुझे ढाँप लेगा और तू उसके पंखों के नीचे शरण पाएगा; उसकी सच्चाई तेरी ढाल और कवच होगी। तू रात के भय से न डरेगा, न दिन में उड़ने वाले तीर से।विवरण:परमेश्वर को आश्रय और रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।3. משלי (Mishlei / नीतिवचन) 18:10हिब्रू:מִגְדַּל־עֹז שֵׁם יְהוָהבּוֹ־יָרוּץ צַדִּיק וְנִשְׂגָּב׃उच्चारण:Migdal-oz shem Adonai; bo yarutz tzaddik venisgav.हिन्दी अर्थ:यहोवा का नाम एक दृढ़ गढ़ है; धर्मी उसमें दौड़कर सुरक्षित होता है।विवरण:ईश्वर की शरण को सुरक्षा के दुर्ग के समान बताया गया है।4. תהלים (Tehillim) 34:8हिब्रू:טֹעֲמוּ וּרְאוּ כִּי־טוֹב יְהוָהאַשְׁרֵי הַגֶּבֶר יֶחֱסֶה בּוֹ׃उच्चारण:Ta'amu u're'u ki tov Adonai; ashrei hagever yecheseh bo.हिन्दी अर्थ:चखकर देखो कि यहोवा भला है; धन्य है वह मनुष्य जो उसमें शरण लेता है।विवरण:परमेश्वर की शरण को कल्याण और सुरक्षा का मार्ग बताया गया है।5. תהלים (Tehillim) 27:1हिब्रू:יְהוָה אוֹרִי וְיִשְׁעִי מִמִּי אִירָאיְהוָה מָעוֹז־חַיַּי מִמִּי אֶפְחָד׃उच्चारण:Adonai ori veyishi, mimi ira; Adonai ma'oz chayai, mimi efchad.हिन्दी अर्थ:यहोवा मेरा प्रकाश और मेरा उद्धार है, मैं किससे डरूँ? यहोवा मेरे जीवन का गढ़ है, मैं किससे भय खाऊँ?विवरण:ईश्वर में विश्वास मनुष्य को शत्रुओं और भय से मुक्त करता है।6. תהלים (Tehillim) 23:4हिब्रू:גַּם כִּי־אֵלֵךְ בְּגֵיא צַלְמָוֶתלֹא־אִירָא רָע כִּי־אַתָּה עִמָּדִי׃उच्चारण:Gam ki elekh begei tzalmavet, lo ira ra ki attah imadi.हिन्दी अर्थ:चाहे मैं मृत्यु की छाया की घाटी में चलूँ, फिर भी मैं बुराई से नहीं डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ है।विवरण:परमेश्वर की उपस्थिति को भय और अनिष्ट से रक्षा का आधार बताया गया है।7. תהלים (Tehillim) 140:2हिब्रू:חַלְּצֵנִי יְהוָה מֵאָדָם רָעמֵאִישׁ חֲמָסִים תִּשְׁמְרֵנִי׃उच्चारण:Chaltzeni Adonai me'adam ra; me'ish chamasim tishmereni.हिन्दी अर्थ:हे यहोवा! मुझे बुरे मनुष्य से छुड़ा; हिंसक व्यक्ति से मेरी रक्षा कर।विवरण:यह श्लोक सीधे दुष्ट मनुष्य से रक्षा की प्रार्थना करता है और "मा अघशंसः" के भाव से अत्यंत निकट है।निष्कर्षयहूदी धर्म में "मा अघशंसः" के समान भाव वाले प्रमुख प्रमाण हैंתהלים 140:2 — हे प्रभु! मुझे बुरे मनुष्य से बचा।תהלים 121:7–8 — प्रभु हर बुराई से रक्षा करेगा।תהלים 91:4–5 — परमेश्वर की छाया में सुरक्षा।משלי 18:10 — यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है।इनका मूल संदेश है कि परमेश्वर की शरण लेने वाला व्यक्ति बुराई, शत्रुता और अनिष्ट के भय से सुरक्षित रहता है।पारसी धर्म में प्रमाण-- नीचे पारसी धर्म के प्रमुख प्रार्थना-मंत्र मूल अवेस्ताई अक्षरों में दिए जा रहे हैं, साथ में लिप्यंतरण और हिन्दी अर्थ भी हैं।1. यथा अहु वैर्यो (Yasna 27.13)अवेस्ताई लिपि:𐬫𐬀𐬚𐬁 𐬀𐬵𐬎 𐬎𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋𐬀𐬚𐬁 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬴 𐬀𐬴𐬁𐬙𐬴𐬮𐬌𐬌𐬀𐬎𐬀𐬢𐬵𐬇𐬎𐬴 𐬛𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬢𐬵𐬋लिप्यंतरण:Yathā ahū vairiiō, athā ratuš ašāt̰cit hacā, vanghēuš dazdā mananghō...हिन्दी अर्थ:जैसे सर्वोच्च प्रभु की इच्छा है, वैसे ही धर्म और सत्य के अनुसार व्यवस्था हो। शुभ विचारों और अच्छे कर्मों से अहुरा मज़्दा की शक्ति प्राप्त हो।भावार्थ: मनुष्य सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर बुराई और अनिष्ट से सुरक्षित रहता है।2. अशेम वोहू (Yasna 27.14)अवेस्ताई लिपि:𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬎𐬋𐬵𐬎 𐬎𐬀𐬵𐬌𐬴𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬴𐬙𐬮𐬎𐬴𐬙𐬁 𐬀𐬴𐬙𐬮 𐬎𐬴𐬙𐬁 𐬀𐬵𐬨𐬁𐬌लिप्यंतरण:Ašəm vohū vahištəm astī, uštā astī uštā ahmāi, hyat ašāi vahištāi ašəm.हिन्दी अर्थ:सत्य और धर्म सर्वोत्तम हैं। सुख उस व्यक्ति को प्राप्त होता है जो श्रेष्ठ सत्य और धर्म का पालन करता है।भावार्थ: सत्य का पालन करने वाला व्यक्ति दुष्टता और अंधकार से दूर रहता है।3. केम ना मज़्दा (Yasna 46.7)अवेस्ताई लिपि:𐬐𐬆𐬨 𐬥𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬫𐬋𐬌 𐬀𐬥𐬋 𐬀𐬵𐬨𐬁𐬌𐬫𐬀𐬰𐬀𐬌𐬙𐬆लिप्यंतरण:Kəm nā Mazdā, yōi anō ahmāi yazāite...हिन्दी अर्थ:हे मज़्दा! कौन मेरी सहायता करेगा? कौन मेरी रक्षा और मार्गदर्शन करेगा?भावार्थ: यह अहुरा मज़्दा से सहायता और संरक्षण की प्रार्थना है।"मा अघशंसः" के भाव से सबसे निकट अवेस्ता प्रमाण:यश्न 46.7 (Kem Na Mazda) — संकट में अहुरा मज़्दा से रक्षा की याचना।यश्न 27.13 (Yatha Ahu Vairyo) — धर्म और सत्य की शरण।यश्न 27.14 (Ashem Vohu) — सत्य द्वारा बुराई पर विजय।नोट: अवेस्ताई लिपि के अक्षरों और पाठ में अलग-अलग पारसी परम्पराओं (जैसे ईरानी और भारतीय ज़रथुस्त्री पाठ-परम्परा) में कुछ पाठांतर मिल सकते हैं। ऊपर प्रचलित अवेस्ता पाठ के अनुसार रूप दिया गया है।ताओ धर्म में प्रमाण --यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् बुराई से रक्षा, अहिंसा, संतुलन और उच्च शक्ति के अनुरूप जीवन) है, तो ताओ धर्म (Daoism/道教) में वैदिक शैली की किसी व्यक्तिगत ईश्वर से रक्षा की प्रार्थना नहीं मिलती, क्योंकि ताओ धर्म में दाओ (道 — मार्ग/सार्वभौमिक व्यवस्था) और प्रकृति के संतुलन पर बल है। फिर भी हानि, संघर्ष और अशुभ प्रवृत्तियों से बचने का भाव ताओ मत के ग्रंथों में मिलता है।नीचे प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि, पिनयिन और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. 道德經 (Dào Dé Jīng) — अध्याय 67चीनी मूल:我有三寶,持而保之。一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。Pinyin:Wǒ yǒu sān bǎo, chí ér bǎo zhī.Yī yuē cí, èr yuē jiǎn, sān yuē bù gǎn wéi tiānxià xiān.हिन्दी अर्थ:मेरे पास तीन अमूल्य वस्तुएँ हैं जिन्हें मैं धारण करके सुरक्षित रखता हूँ—पहली करुणा, दूसरी सादगी, तीसरी संसार में अहंकारपूर्वक आगे न बढ़ना।विवरण: ताओ धर्म में करुणा (慈) को दुष्टता और हिंसा से बचाने वाला गुण माना गया है।2. 道德經 (Dào Dé Jīng) — अध्याय 31चीनी मूल:夫佳兵者,不祥之器。物或惡之,故有道者不處。Pinyin:Fū jiā bīng zhě, bùxiáng zhī qì.Wù huò wù zhī, gù yǒu dào zhě bù chǔ.हिन्दी अर्थ:हथियार अशुभ वस्तुएँ हैं। सभी प्राणी उनसे घृणा करते हैं; इसलिए दाओ को जानने वाला व्यक्ति उनमें आसक्त नहीं होता।विवरण: यह हिंसा और अहित से दूर रहने की शिक्षा देता है।3. 道德經 (Dào Dé Jīng) — अध्याय 44चीनी मूल:知足不辱,知止不殆,可以長久。Pinyin:Zhī zú bù rǔ, zhī zhǐ bù dài, kě yǐ cháng jiǔ.हिन्दी अर्थ:जो संतोष को जानता है वह अपमान से बचता है; जो सीमा को जानता है वह संकट से बचता है और दीर्घकाल तक सुरक्षित रहता है।विवरण: ताओ मत में संयम और संतोष को अनिष्ट से बचने का मार्ग माना गया है।4. 道德經 (Dào Dé Jīng) — अध्याय 50चीनी मूल:善攝生者,陸行不遇兕虎,入軍不被甲兵之刃。Pinyin:Shàn shè shēng zhě, lù xíng bù yù sì hǔ, rù jūn bù bèi jiǎ bīng zhī rèn.हिन्दी अर्थ:जो जीवन की रक्षा करना जानता है, वह मार्ग में हिंसक पशुओं से नहीं मिलता और युद्ध में हथियारों से आहत नहीं होता।विवरण: यह जीवन-संरक्षण और अहिंसक, संतुलित जीवन की प्रशंसा करता है।5. 莊子 (Zhuāngzǐ) — 人間世 (Rén Jiān Shì)चीनी मूल:虛己以遊世,其孰能害之。Pinyin:Xū jǐ yǐ yóu shì, qí shú néng hài zhī.हिन्दी अर्थ:जो अपने अहंकार को खाली करके संसार में रहता है, उसे कौन हानि पहुँचा सकता है?विवरण: ताओ दर्शन में आंतरिक शांति और अहंकार-रहित जीवन को सुरक्षा का आधार माना गया है।6. 道德經 (Dào Dé Jīng) — अध्याय 22चीनी मूल:夫唯不爭,故天下莫能與之爭。Pinyin:Fū wéi bù zhēng, gù tiānxià mò néng yǔ zhī zhēng.हिन्दी अर्थ:जो संघर्ष नहीं करता, संसार में कोई उससे संघर्ष नहीं कर सकता।विवरण: अहंकार और द्वेष छोड़ने से शत्रुता कम होती है।7. 道德經 (Dào Dé Jīng) — अध्याय 7चीनी मूल:天長地久。天地所以能長且久者,以其不自生,故能長生。Pinyin:Tiān cháng dì jiǔ. Tiāndì suǒyǐ néng cháng qiě jiǔ zhě, yǐ qí bù zì shēng, gù néng cháng shēng.हिन्दी अर्थ:आकाश और पृथ्वी दीर्घकाल तक स्थिर रहते हैं, क्योंकि वे स्वार्थ में नहीं लगे रहते।विवरण: ताओ धर्म में स्वार्थ और अहंकार को संघर्ष का कारण माना जाता है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — दुष्ट मेरा अहित न करें" के ताओ धर्म में निकटतम भाव हैं—道德經 67 — करुणा को जीवन का रक्षक गुण बताया गया है।道德經 31 — हिंसा और युद्ध से दूर रहने की शिक्षा।道德經 50 — संतुलित जीवन से सुरक्षा।莊子 人間世 — अहंकार-रहित व्यक्ति को कौन हानि पहुँचा सकता है।ताओ धर्म का संदेश है कि दाओ (道) के अनुरूप, करुणा, विनम्रता और अहिंसा से जीवन जीने वाला व्यक्ति अनिष्ट और संघर्ष से दूर रहता है।कन्फ्यूसियस धर्म मे प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् बुराई से बचाव, सदाचार की रक्षा, और दूसरों के प्रति अहित न करने का भाव) है, तो कन्फ्यूशियस धर्म (儒家, Rújiā / Confucianism) में मुख्य बल किसी ईश्वर से रक्षा माँगने की अपेक्षा मानवता (仁), धर्मयुक्त आचरण (義), सदाचार और नैतिक शासन पर है। कन्फ्यूशियस परम्परा में यह विचार मिलता है कि सदाचारी व्यक्ति अपने आचरण से शत्रुता और अनिष्ट को कम करता है।नीचे चीनी मूल लिपि, पिनयिन और हिन्दी अर्थ सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं।1. 论语《卫灵公篇》15:23(Lúnyǔ — Analects, Book 15, Chapter 23)चीनी मूल:子貢問曰:「有一言而可以終身行之者乎?」子曰:「其恕乎!己所不欲,勿施於人。」Pinyin:Zǐ Gòng wèn yuē: “Yǒu yī yán ér kě yǐ zhōng shēn xíng zhī zhě hū?”Zǐ yuē: “Qí shù hū! Jǐ suǒ bù yù, wù shī yú rén.”हिन्दी अर्थ:ज़िगोंग ने पूछा—क्या ऐसा कोई एक सिद्धान्त है जिसे जीवन भर अपनाया जा सके?कन्फ्यूशियस ने कहा—हाँ, वह है "क्षमा और सहानुभूति"; जो बात तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत करो।विवरण: यह "दूसरे मेरा अहित न करें" के साथ-साथ "मैं भी किसी का अहित न करूँ" का नैतिक आधार है।2. 论语《颜渊篇》12:2चीनी मूल:樊遲問仁。子曰:「愛人。」Pinyin:Fán Chí wèn rén. Zǐ yuē: “Ài rén.”हिन्दी अर्थ:फान ची ने पूछा—मानवता (仁) क्या है?कन्फ्यूशियस ने कहा—मनुष्यों से प्रेम करना।विवरण: कन्फ्यूशियस धर्म में प्रेम और करुणा को सामाजिक शांति और अहित से बचाव का आधार माना गया है।3. 论语《述而篇》7:23चीनी मूल:三人行,必有我師焉。擇其善者而從之,其不善者而改之。Pinyin:Sān rén xíng, bì yǒu wǒ shī yān. Zé qí shàn zhě ér cóng zhī, qí bù shàn zhě ér gǎi zhī.हिन्दी अर्थ:तीन व्यक्तियों के साथ चलने पर भी उनमें कोई न कोई मेरा गुरु हो सकता है। अच्छे का अनुसरण करो और बुरे को देखकर अपने दोष सुधारो।विवरण: यह शिक्षा देती है कि मनुष्य को दुष्टता से सीख लेकर स्वयं सदाचारी बनना चाहिए।4. 论语《里仁篇》4:16चीनी मूल:君子喻於義,小人喻於利。Pinyin:Jūnzǐ yù yú yì, xiǎorén yù yú lì.हिन्दी अर्थ:श्रेष्ठ पुरुष धर्म और न्याय को समझता है; नीच व्यक्ति केवल लाभ को देखता है।विवरण: कन्फ्यूशियस के अनुसार स्वार्थ और लोभ से दुष्टता उत्पन्न होती है; धर्मयुक्त व्यक्ति उससे बचता है।5. 论语《颜渊篇》12:1चीनी मूल:克己復禮為仁。Pinyin:Kè jǐ fù lǐ wéi rén.हिन्दी अर्थ:अपने स्वार्थ और अनुचित इच्छाओं पर विजय पाकर मर्यादा का पालन करना ही मानवता है।विवरण: आत्मसंयम से मनुष्य हिंसा, द्वेष और अहित की प्रवृत्ति से बचता है।6. 孟子《离娄上》7:28चीनी मूल:愛人者,人恒愛之;敬人者,人恒敬之。Pinyin:Ài rén zhě, rén héng ài zhī; jìng rén zhě, rén héng jìng zhī.हिन्दी अर्थ:जो दूसरों से प्रेम करता है, लोग उससे प्रेम करते हैं; जो दूसरों का सम्मान करता है, लोग उसका सम्मान करते हैं।विवरण: सदाचार से शत्रुता घटती है और सुरक्षा का वातावरण बनता है।7. 孟子《公孙丑上》3:6चीनी मूल:我善養吾浩然之氣。Pinyin:Wǒ shàn yǎng wú hàorán zhī qì.हिन्दी अर्थ:मैं अपने महान और पवित्र नैतिक बल का अच्छी तरह पालन-पोषण करता हूँ।विवरण: आंतरिक नैतिक शक्ति मनुष्य को भय और अधर्म से ऊपर उठाती है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — दुष्ट मेरा अहित न करें" के कन्फ्यूशियस धर्म में निकटतम सिद्धान्त हैं—己所不欲,勿施於人 (जो अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर न करें) — 论语 15:23愛人者,人恒愛之 (जो प्रेम करता है, प्रेम पाता है) — 孟子 离娄上 7:28克己復禮為仁 (आत्मसंयम ही मानवता है) — 论语 12:1कन्फ्यूशियस परम्परा में रक्षा का मार्ग मुख्यतः सदाचार, करुणा, आत्मसंयम और न्यायपूर्ण व्यवहार को माना गया है।शिन्तो धर्म में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् बुराई से रक्षा, अशुभ शक्तियों से बचाव और शांति की कामना) है, तो शिन्तो (神道, Shintō) धर्म में भी शुद्धि (祓い), कामी (神) की कृपा और अशुभ प्रभावों से मुक्ति की भावना मिलती है। शिन्तो में वैदिक शैली के एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की अपेक्षा कामी (Kami — दिव्य शक्तियाँ/देवत्व) और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर बल है।नीचे प्रमुख प्रमाण जापानी लिपि (漢字・かな), रोमन उच्चारण और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. 大祓詞 (おおはらえのことば, Ōharae no Kotoba)(महान शुद्धि प्रार्थना — शिन्तो की प्रमुख प्रार्थनाओं में से एक)जापानी मूल:高天原に神留坐す皇親神漏岐神漏美の命以ちて、八百万神等を神集へに集へ賜ひ、神議りに議り賜ひて、उच्चारण:Takama no hara ni kamuzumari masu sumera ga mutsukami kamurogi kamuromi no mikoto mochite...हिन्दी अर्थ (भावार्थ):स्वर्गीय उच्च लोक में स्थित दिव्य शक्तियाँ और सभी कामी एकत्र होकर शुद्धि और कल्याण का मार्ग स्थापित करें।विवरण: यह प्रार्थना अशुद्धि, दोष और अनिष्ट प्रभावों को दूर करने के लिए की जाती है।2. 古事記 (こじき, Kojiki) — इज़ानागी का शुद्धिकरणजापानी मूल:身禊して、祓ひ給ひき。उच्चारण:Misogi shite, harai tamai ki.हिन्दी अर्थ:उन्होंने शुद्धिकरण (मिसोगी) किया और अशुद्धियों को दूर किया।विवरण: शिन्तो में "हराइ (祓い)" अर्थात् अशुद्धि और अनिष्ट को हटाना आध्यात्मिक सुरक्षा का मुख्य सिद्धान्त है।3. 日本書紀 (にほんしょき, Nihon Shoki)जापानी मूल:神明の加護を蒙り、災害を除く。उच्चारण:Shinmei no kago o kōmuri, saigai o nozoku.हिन्दी अर्थ:दिव्य शक्तियों की कृपा प्राप्त करके संकटों को दूर किया जाता है।विवरण: कामी की कृपा को जीवन की रक्षा और विपत्तियों से बचाव का साधन माना गया है।4. 神道祝詞 (Norito — शिन्तो प्रार्थनाएँ)जापानी मूल:祓へ給ひ、清め給へ。उच्चारण:Harae tamae, kiyome tamae.हिन्दी अर्थ:(हे दिव्य शक्तियों!) हमें शुद्ध करें और पवित्र करें।विवरण: यह शिन्तो की प्रसिद्ध शुद्धि प्रार्थना है, जिसमें अशुभता को दूर करने की कामना की जाती है।5. 明治神宮 御神前の祈り (शिन्तो प्रार्थना परम्परा)जापानी:大神の御恵みを蒙り、平安なる日々を願う。उच्चारण:Ōkami no mi-megumi o kōmuri, heian naru hibi o negau.हिन्दी अर्थ:महान दिव्य शक्ति की कृपा प्राप्त हो और शांतिपूर्ण जीवन मिले।विवरण: शिन्तो परम्परा में दिव्य कृपा से शांति और सुरक्षा की कामना की जाती है।6. 万葉集 (まんようしゅう, Man'yōshū) — शुद्धि और पवित्रता का भावजापानी:清き心は神ぞ知る。उच्चारण:Kiyoki kokoro wa kami zo shiru.हिन्दी अर्थ:पवित्र हृदय को कामी जानते हैं।विवरण: शिन्तो में शुद्ध हृदय को दिव्य संरक्षण के योग्य माना गया है।7. शिन्तो का प्रसिद्ध सिद्धान्त — 和 (わ, Wa)जापानी:和を以て貴しとなす。उच्चारण:Wa o motte tōtoshi to nasu.हिन्दी अर्थ:सामंजस्य और शांति को सर्वोच्च मानना चाहिए।विवरण: द्वेष, संघर्ष और अहित से बचने के लिए शांति और संतुलन का मार्ग बताया गया है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — दुष्ट मेरा अहित न करें" के शिन्तो धर्म में निकटतम भाव हैं—祓へ給ひ、清め給へ (Harae tamae, kiyome tamae) — अशुद्धि और अनिष्ट को दूर करने की प्रार्थना।大祓詞 (Ōharae no Kotoba) — शुद्धि और दिव्य संरक्षण की प्रार्थना।神明の加護 (Shinmei no kago) — दिव्य शक्तियों की कृपा और रक्षा।和 (Wa) — शांति और सामंजस्य का सिद्धान्त।शिन्तो का मूल संदेश है कि शुद्ध हृदय, पवित्र आचरण और कामी के साथ सामंजस्य रखने वाला मनुष्य अशुभता से दूर रहता है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--यदि विषय "मा अघशंसः — हे ईश्वर! दुष्ट मेरा अहित न करें" (अर्थात् बुराई से रक्षा, अन्याय से बचाव और सदाचार द्वारा सुरक्षा) है, तो प्राचीन यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) में भी यह विचार मिलता है कि सद्गुण (Virtue), न्याय (Justice), आत्मसंयम और बुद्धि मनुष्य को बुराई और अनिष्ट से बचाते हैं। यूनानी दार्शनिक परम्परा में वैदिक शैली की किसी देवता से रक्षा की प्रार्थना कम मिलती है, परन्तु नैतिक सुरक्षा का सिद्धान्त मिलता है।नीचे प्रमुख प्रमाण यूनानी मूल लिपि (Greek), लिप्यंतरण और हिन्दी अर्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. प्लेटो — रिपब्लिक (Πολιτεία, Republic) 1.335bयूनानी मूल:οὐδέποτε ἄρα τὸν δίκαιον βλάπτειν ἔργον ἐστίν, οὔτε φίλον οὔτε ἄλλον οὐδένα.Transliteration:Oudepote ara ton dikaion blaptein ergon estin, oute philon oute allon oudena.हिन्दी अर्थ:इसलिए न्यायी व्यक्ति का काम कभी किसी मित्र या किसी अन्य व्यक्ति को हानि पहुँचाना नहीं है।विवरण: प्लेटो के अनुसार वास्तविक न्यायी व्यक्ति दूसरों का अहित नहीं करता और अन्याय से दूर रहता है।2. प्लेटो — फीडो (Φαίδων, Phaedo) 63bयूनानी मूल:τὸν δὲ ἀγαθὸν ἄνδρα οὐδὲν κακὸν πάσχειν οὔτε ζῶντα οὔτε τελευτήσαντα.Transliteration:Ton de agathon andra ouden kakon paschein oute zōnta oute teleutēsanta.हिन्दी अर्थ:अच्छे मनुष्य के साथ कोई वास्तविक बुराई नहीं हो सकती, न जीवन में, न मृत्यु के बाद।विवरण: यह सद्गुणी व्यक्ति की आध्यात्मिक सुरक्षा का विचार है।3. सुकरात (प्लेटो — एपोलॉजी 30c)यूनानी मूल:ἀγαθῷ ἀνδρὶ οὐδὲν κακὸν γίγνεται οὔτε ζῶντι οὔτε τελευτήσαντι.Transliteration:Agathō andri ouden kakon gignetai oute zōnti oute teleutēsanti.हिन्दी अर्थ:अच्छे व्यक्ति के साथ कोई वास्तविक बुराई नहीं होती, चाहे वह जीवित हो या मर गया हो।विवरण: सुकरात के अनुसार आत्मा की अच्छाई बाहरी शत्रु या हानि से अधिक महत्वपूर्ण है।4. अरस्तू — निकोमेखियन एथिक्स (Ἠθικὰ Νικομάχεια) 1106bयूनानी मूल:ἡ δ' ἀρετὴ περὶ πάθη καὶ πράξεις ἐστίν.Transliteration:Hē d' aretē peri pathē kai praxeis estin.हिन्दी अर्थ:सद्गुण मनुष्य की भावनाओं और कर्मों से संबंधित है।विवरण: अरस्तू के अनुसार सद्गुणी जीवन ही नैतिक सुरक्षा और श्रेष्ठ जीवन का आधार है।5. स्टोइक दर्शन — एपिक्टेटस (Ἐγχειρίδιον, Enchiridion 1)यूनानी मूल:τῶν ὄντων τὰ μέν ἐστιν ἐφ' ἡμῖν, τὰ δὲ οὐκ ἐφ' ἡμῖν.Transliteration:Tōn ontōn ta men estin eph' hēmin, ta de ouk eph' hēmin.हिन्दी अर्थ:कुछ बातें हमारे नियंत्रण में हैं और कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं हैं।विवरण: स्टोइक दर्शन सिखाता है कि बाहरी दुष्टता से अधिक अपने मन और आचरण पर नियंत्रण आवश्यक है।6. प्लेटो — कानून (Νόμοι, Laws) 716aयूनानी मूल:θεὸς ἡμῖν πάντων χρημάτων μέτρον ἂν εἴη.Transliteration:Theos hēmin pantōn chrēmatōn metron an eiē.हिन्दी अर्थ:हमारे लिए सभी चीज़ों का माप परमात्मा होना चाहिए।विवरण: प्लेटो नैतिक व्यवस्था को दिव्य व्यवस्था से जोड़ते हैं।7. मार्कस ऑरेलियस — ध्यान (Τὰ εἰς ἑαυτόν, Meditations) 8.47यूनानी मूल:ὁ καλὸς καὶ ἀγαθὸς ἄνθρωπος ἑαυτῷ ἀρκεῖ.Transliteration:Ho kalos kai agathos anthrōpos heautō arkei.हिन्दी अर्थ:अच्छा और श्रेष्ठ मनुष्य अपने भीतर पर्याप्त होता है।विवरण: स्टोइक विचार में आंतरिक सदाचार मनुष्य को बाहरी अनिष्ट से ऊपर उठाता है।निष्कर्ष"मा अघशंसः — दुष्ट मेरा अहित न करें" के यूनानी दर्शन में निकटतम विचार:सुकरात: सदाचारी व्यक्ति के साथ वास्तविक बुराई नहीं हो सकती।प्लेटो: न्यायी व्यक्ति किसी का अहित नहीं करता और अन्याय से ऊपर रहता है।अरस्तू: सद्गुण श्रेष्ठ जीवन की रक्षा करता है।स्टोइक दर्शन: अपने मन और कर्मों पर नियंत्रण ही वास्तविक सुरक्षा है।यूनानी दर्शन का मुख्य संदेश है: बाहरी शत्रुओं से अधिक महत्वपूर्ण है आत्मा की शुद्धता; सद्गुणी व्यक्ति नैतिक रूप से सुरक्षित रहता है। -----×------×-------×-----×--