मैंने अपनी बेटी को स्कूल से लेने जाना था। रास्ते में एक औरत मिली। उसने मुझे रोका। बोली, "बहन, थोड़ा पानी मिलेगा?" मैंने अपनी बोतल उसे दी। वो पानी पीते हुए रोने लगी। मैंने पूछा, "क्या हुआ बहन?" तो बोली, "कुछ नहीं। बस ऐसे ही।"
उसकी आँखों में वो रोना था जो बहुत दिनों से भरा हुआ था। जैसे कोई नदी बरसात के बाद उफान पर हो और किनारे तोड़कर बहने को बेताब हो। मैंने उसका हाथ पकड़ा। बोली, "आओ, थोड़ा बैठो। मेरी बेटी का स्कूल अभी छूटने में आधा घंटा है।"
हम सड़क किनारे एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गए। धूप तेज़ थी। पेड़ की छाँव में थोड़ी ठंडक थी। वो औरत अपना दुपट्टा सँभालते हुए बोली, "मैं राधा हूँ। गाँव से आई हूँ। शहर में काम ढूँढ़ने।"
मैंने पूछा, "घर में कौन कौन है?"
"कोई नहीं," बोली वो। "पति मर गया। दो साल पहले। शराब पीता था। एक रात सड़क पार करते समय ट्रक ने मार दिया। बेटा है। छह साल का। ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया। बोले, तुम्हारा कोई हक़ नहीं। जाओ जहाँ जाना है।"
मैंने पूछा, "क्या तुम्हारे मायके में कोई नहीं?"
"मायका?" वो हँसी। एक ऐसी हँसी जो दर्द से भरी थी। "मायके में माँ है। बूढ़ी। बाप मर गया। भाई है। उसकी शादी हो गई। भाभी रोज़ लड़ती है। माँ रोज़ रोती है। मैंने सोचा, अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ। बेटे को पढ़ाऊँ। लिखाऊँ। कुछ बनाऊँ।"
मैंने पूछा, "कहाँ रहती हो?"
"एक महिला आश्रय में," बोली वो। "वहाँ रात को सोती हूँ। दिन में कहीं भी काम मिल जाए, कर लेती हूँ। कभी झाड़ू पोछा, कभी बर्तन धोना, कभी कपड़े धोना। जो मिले।"
मैंने पूछा, "कितना कमाती हो?"
"कभी सौ, कभी दो सौ," बोली वो। "कभी कुछ नहीं। कभी कभी घर वाले पैसे देते ही नहीं। बोलते हैं, कल देंगे। कल कभी नहीं आता।"
मैंने अपनी जेब से जो कुछ था, निकाला। दो सौ रुपये। उसे दिए। उसने मना किया। बोली, "नहीं बहन। मैं भीख नहीं माँगती। मेहनत करती हूँ।"
मैंने ज़बरदस्ती हाथ में रख दिए। बोली, "ये भीख नहीं। एक बहन का प्यार है।"
वो रोने लगी। फिर उठी। चलने लगी। मुड़कर बोली, "धन्यवाद।" और गायब हो गई सड़क के मोड़ पर।
मैं अपनी बेटी को लेकर घर आई। रात को खाना बनाते समय राधा याद आ रही थी। मैंने अपने पति से बात की। बोले, "ऐसी लाखों राधाएँ हैं इस देश में। तुम एक की मदद करोगी, दूसरी कहाँ जाएगी?"
मैंने कहा, "एक की मदद से शुरुआत तो होती है न?"
पति ने कुछ नहीं कहा। टीवी चालू कर लिया। न्यूज़ में एक रिपोर्ट चल रही थी। एक लड़की के साथ गैंगरेप हुआ था। शहर के बाहर। पुलिस ने केस दर्ज किया। आरोपी फरार। लड़की अस्पताल में। हालत गंभीर।
मैंने टीवी बंद कर दिया। बेटी सो चुकी थी। मैंने उसे देखा। मासूम सी। आठ साल की। कल सुबह स्कूल जाएगी। शाम को ट्यूशन। फिर डांस क्लास। फिर घर। सुरक्षित। सुरक्षित? क्या कोई सुरक्षित है?
अगले दिन मैंने राधा को ढूँढ़ने की कोशिश की। उस महिला आश्रय में गई। वहाँ की संचालिका से मिली। बोलीं, "राधा? हाँ, थी यहाँ। कल रात को चली गई।"
"कहाँ?" मैंने पूछा।
"पता नहीं," बोलीं संचालिका। "रोज़ की बात है। कोई आता है, कोई जाता है। कुछ लोग काम मिलने पर रुक जाते हैं। कुछ लोग कहीं और चले जाते हैं। कुछ लोग..."
मैंने पूछा, "कुछ लोग क्या?"
संचालिका ने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया। मैं समझ गई।
मैंने सोचा, राधा कहाँ होगी? किसी घर में काम कर रही होगी? किसी सड़क पर? किसी और शहर में? या... नहीं। मैंने सोचना बंद किया।
घर आकर मैंने अपनी माँ से फोन पर बात की। माँ गाँव में रहती हैं। बोलीं, "बेटा, तुम्हें पता है, पड़ोस की सरोज का क्या हुआ?"
मैंने पूछा, "क्या?"
"उसका पति दूसरी शादी कर रहा है," बोलीं माँ। "बोल रहा है, पहली वाली बेटी नहीं दे सकी। दूसरी से बेटा होगा। सरोज रो रही है। कोई सुनने वाला नहीं।"
मैंने पूछा, "क्या सरोज ने कुछ किया?"
"क्या करेगी?" बोलीं माँ। "लड़की है। सहन करेगी। यही तो करती हैं स्त्रियाँ। सहन करना ही उनका कर्म है।"
मैंने फोन रख दिया। माँ की बात कानों में गूँज रही थी। "सहन करना ही उनका कर्म है।" क्यों? क्यों सहन करना ही कर्म है? क्यों नहीं लड़ना कर्म है? क्यों नहीं कहना कर्म है? क्यों नहीं रोना कर्म है? क्यों नहीं हँसना कर्म है? क्यों सिर्फ सहन करना?
मैंने सोचा, मैं क्या कर रही हूँ? मैं एक शिक्षिका हूँ। सरकारी स्कूल में पढ़ाती हूँ। मेरी ज़िंदगी अच्छी है। पति अच्छे हैं। बेटी अच्छी है। घर अच्छा है। लेकिन क्या ये काफी है? क्या मैं सिर्फ अपनी ज़िंदगी जीकर खुश रह सकती हूँ? जब राधा जैसी औरतें सड़कों पर भटक रही हैं? जब सरोज जैसी औरतें रो रही हैं? जब न्यूज़ में रोज़ रेप की खबरें आ रही हैं?
मैंने फैसला किया। मैं कुछ करूँगी। क्या? अभी नहीं पता। लेकिन कुछ। शायद राधा को ढूँढ़ूँगी। शायद सरोज की मदद करूँगी। शायद अपनी स्कूल की लड़कियों को जागरूक करूँगी। शायद कुछ और। लेकिन कुछ तो करूँगी।
अगले हफ्ते मेरी स्कूल में एक कार्यक्रम था। बाल दिवस। मैंने एक नाटक तैयार किया। "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" पर। लड़कियों ने अभिनय किया। एक लड़की ने बेटी का किरदार निभाया जिसे मारने की कोशिश होती है। एक ने माँ का किरदार जो बेटी को बचाती है। एक ने समाज का किरदार जो ताना मारता है।
नाटक के बाद मैंने भाषण दिया। बोली, "बेटियाँ इस देश की शक्ति हैं। उन्हें मारना नहीं, पढ़ाना है। उन्हें दबाना नहीं, उड़ान देनी है।"
सबने तालियाँ बजाईं। मैं खुश थी। लेकिन अंदर कहीं एक आवाज़ थी। बोल रही थी, "ये तालियाँ काफी नहीं। कुछ और करो।"
उसी रात मैंने एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया। "नारी शक्ति" नाम रखा। अपनी स्कूल की महिला टीचर्स को जोड़ा। कुछ मोहल्ले की औरतों को जोड़ा। बोली, "हम हर हफ्ते मिलेंगी। एक दूसरे की मदद करेंगी। जो किसी भी तरह की मदद चाहती हो, बेझिझक बोले।"
पहली मीटिंग में दस औरतें आईं। कुछ शर्मा रही थीं। कुछ उत्साहित थीं। एक ने बताया, उसके पति शराब पीकर मारते हैं। दूसरी ने बताया, उसकी ननद जेब से पैसे चुराती है। तीसरी ने बताया, उसकी बेटी को स्कूल में एक लड़का परेशान करता है।
मैंने सबकी बात सुनी। नोट्स बनाए। फिर एक एक करके सलाह दी। शराबी पति वाली को बोली, "पुलिस में शिकायत दर्ज कराओ। डरो मत।" चोरी वाली को बोली, "घर में ताला लगाओ। अलमारी में तिजोरी रखो।" परेशानी वाली को बोली, "स्कूल प्रिंसिपल से मिलो। लड़के के माता पिता को बुलवाओ।"
सबने हाँ में सिर हिलाया। लेकिन आँखों में संदेह था। क्या ये काम करेगा? क्या हम बदल पाएँगी? क्या समाज बदलेगा?
मैंने कहा, "बदलाव धीरे धीरे आता है। लेकिन आता ज़रूर है। बस हिम्मत नहीं हारनी।"
हफ्तों बीत गए। "नारी शक्ति" ग्रुप बढ़ता गया। बीस, तीस, पचास औरतें। हर हफ्ते मीटिंग। कभी किसी की नौकरी लगवाई। कभी किसी का केस दर्ज कराया। कभी किसी की बेटी का दाखिला कराया। कभी किसी को सिलाई का काम सिखाया। कभी किसी को कंप्यूटर सिखाया।
एक दिन एक फोन आया। अज्ञात नंबर। उठाया। आवाज़ आई, "बहन, मैं राधा बोल रही हूँ।"
मेरा दिल ज़ोर से धड़का। बोली, "राधा! कहाँ हो तुम? ठीक हो?"
"हाँ," बोली वो। "मैं ठीक हूँ। एक घर में काम कर रही हूँ। मालकिन अच्छी हैं। बेटे को एक छोटे स्कूल में दाखिला दिलाया है। रात को वहीं सोती हूँ।"
मैंने कहा, "तुमने फोन कैसे किया?"
"मालकिन का फोन है," बोली वो। "मैंने सोचा, एक बार धन्यवाद कह लूँ। आपने मुझे पानी दिया। बात सुनी। पैसे दिए। उस दिन से आज तक याद है।"
मैं रोने लगी। बोली, "राधा, तुम मज़बूत हो। बहुत मज़बूत। तुम्हारे जैसी औरतें इस देश की असली शक्ति हैं।"
राधा ने कहा, "शक्ति नहीं बहन। बस जीने की ललक है। बेटे के लिए। अपने लिए। एक दिन अपना घर होगा। अपनी दुकान होगी। सिलाई की। बेटा बड़ा होगा। डॉक्टर बनेगा।"
मैंने कहा, "ज़रूर बनेगा। और मैं तुम्हारी मदद करूँगी। जो चाहिए, बोलना।"
राधा ने धन्यवाद कहा। फोन रख दिया। मैं उस आवाज़ को कानों में सहेजे रही। एक आवाज़ जो टूटी हुई थी, लेकिन टूटी नहीं थी। एक आवाज़ जो कमज़ोर थी, लेकिन कमज़ोर नहीं थी। एक आवाज़ जो रो रही थी, लेकि हँस भी रही थी।
महीनों बीत गए। "नारी शक्ति" अब सौ औरतों का ग्रुप था। हमने एक छोटा सा केंद्र खोला। एक किराए का कमरा। वहाँ सिलाई क्लास चलती थी। कंप्यूटर क्लास चलती थी। कानूनी सलाह मिलती थी। मनोवैज्ञानिक सलाह मिलती थी।
एक दिन एक लड़की आई। सत्रह अठारह साल की। कॉलेज जाती थी। रोते हुए बोली, "मैडम, मेरे साथ... मेरे साथ..." कह नहीं पाई। मैं समझ गई।
मैंने उसे गले लगाया। बोली, "डरो मत। बताओ। क्या हुआ?"
उसने बताया। उसके एक रिश्तेदार ने छुआछूत की। धमकी दी। बोला, "किसी को बताया तो जान से मार दूँगा।"
मैंने उसे पुलिस ले गई। केस दर्ज कराया। वकील रखा। मीडिया को बताया। आरोपी गिरफ्तार हुआ। लड़की की हिम्मत बढ़ी। बोली, "मैडम, आपने मेरी जान बचाई।"
मैंने कहा, "नहीं बेटी। तुमने खुद अपनी जान बचाई। मैंने सिर्फ हाथ पकड़ा। चलना तुमने खुद सीखा।"
एक साल बीत गया। मेरी बेटी अब नौ साल की हो गई। एक दिन उसने पूछा, "मम्मी, आप इतनी व्यस्त क्यों रहती हो? रोज़ मीटिंग, रोज़ फोन, रोज़ केस। कभी मेरे साथ खेलती नहीं।"
मैंने उसे गोद में बिठाया। बोली, "बेटा, मम्मी कुछ काम कर रही है। बहुत ज़रूरी काम। बहुत सी लड़कियों, बहुत सी औरतों की मदद कर रही है।"
"क्यों?" पूछी बेटी।
"क्योंकि," मैंने कहा, "इस देश में बहुत सी औरतें दुखी हैं। उन्हें कोई सुनने वाला नहीं। मम्मी उनकी आवाज़ बन रही है।"
बेटी ने सोचा। फिर बोली, "मम्मी, जब मैं बड़ी हूँगी, तो मैं भी आपकी मदद करूँगी। मैं भी औरतों की मदद करूँगी।"
मैंने उसे कसकर गले लगाया। आँखें भर आईं। बोली, "हाँ बेटा। ज़रूर। तुम करना। और ज़्यादा। मुझसे ज़्यादा।"
आज "नारी शक्ति" पाँच सौ औरतों का ग्रुप है। तीन केंद्र हैं। दस टीचर्स हैं। पाँच वकील हैं। दो डॉक्टर्स हैं। हर महीने सौ से ज़्यादा औरतें मदद लेती हैं। कुछ नौकरी पाती हैं। कुछ पढ़ाई करती हैं। कुछ केस जीतती हैं। कुछ बस किसी से बात कर लेती हैं। और थोड़ी राहत पाती हैं।
राधा आज अपनी सिलाई की दुकान चलाती है। एक छोटी सी। लेकिन अपनी। बेटा दसवीं में है। अच्छे नंबर लाता है। उसने मुझे एक दिन दुकान पर बुलाया। चाय पिलाई। बोली, "बहन, ये सब आपकी बदौलत।"
मैंने कहा, "नहीं राधा। ये सब तेरी मेहनत की बदौलत। मैंने सिर्फ एक बोतल पानी दी थी। तूने तो पूरा समुद्र पार किया।"
राधा हँसी। वो हँसी जो पहली बार मिली थी उस दिन सड़क पर। लेकिन अब वो हँसी में आत्मविश्वास था। गर्व था। जीत थी।
मैंने सोचा, क्या ये काफी है? पाँच सौ औरतें? तीन केंद्र? एक राधा की दुकान? नहीं। ये बहुत कम है। इस देश में करोड़ों राधाएँ हैं। करोड़ों सरोज हैं। करोड़ों लड़कियाँ हैं जो स्कूल नहीं जा पातीं। करोड़ों औरतें हैं जो घरेलू हिंसा सहती हैं। करोड़ों माँएँ हैं जो बेटियों को मारने से रोक नहीं पातीं। करोड़ों बहनें हैं जो दहेज़ के लिए जलाई जाती हैं। करोड़ों बेटियाँ हैं जो रोज़ सड़कों पर डरे डरे चलती हैं।
क्या ये काफी है? नहीं। लेकिन शुरुआत तो हुई है। एक बूँद से सागर बनता है। एक कदम से मंज़िल मिलती है। एक आवाज़ से क्रांति होती है।
मैंने अपनी डायरी में लिखा, "आज फिर एक औरत आई। रोते हुए। मैंने उसे चाय पिलाई। बात सुनी। कल वो फिर आएगी। शायद मुस्कुराते हुए। शायद रोते हुए। लेकिन आएगी ज़रूर। क्योंकि उसे पता है, यहाँ कोई है जो सुनेगा। यहाँ कोई है जो समझेगा। यहाँ कोई है जो कहेगा, तुम अकेली नहीं हो।"
रात हो गई। मैंने अपनी बेटी को सुलाया। उसके माथे पर चूमा। बोली, "सपने अच्छे देखना बेटा। कल सुबह नई उमंग के साथ उठना।"
मैं खिड़की से बाहर देखी। चाँद था। तारे थे। शहर की रोशनी थी। कहीं कोई रो रहा होगा। कहीं कोई हँस रहा होगा। कहीं कोई जाग रहा होगा। कहीं कोई सो रहा होगा। यही ज़िंदगी है। यही दुनिया है।
लेकिन मैंने एक बात सीखी। कि हारना नहीं है। रुकना नहीं है। लड़ना है। हर रोज़। हर पल। हर औरत के लिए। हर बेटी के लिए। हर माँ के लिए। हर बहन के लिए।
क्योंकि स्त्री की दशा नहीं, दिशा बदलनी है। और ये दिशा बदलेगी। एक दिन ज़रूर बदलेगी। हमारे हाथों से। हमारी आवाज़ से। हमारी मेहनत से।
बस हिम्मत नहीं हारनी। कभी नहीं।