की पकड़ ढीली हो रही थी और पेड़ की जड़ें मिट्टी छोड़ रही थीं। अवनि ने तय कर लिया कि वह उसे ऐसे मरने नहीं देगी।
मौत से मुकाबला
अवनि ने हिम्मत जुटाई और ढलान के रास्ते धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी। पत्थरों की रगड से उसके हाथ-पाँव छिल रहे थे, वह फिसल रही थी, पर उसकी नज़र सिर्फ आर्यमन पर थी।
फिसलते हुए वह एक ऐसी चट्टान पर पहुँच गई जो आर्यमन के ठीक ऊपर थी। वह उसके बिल्कुल करीब तो नहीं थी, पर इतनी पास थी कि उसकी आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
"आर्यमन जी, घबराइए मत! मैं आ गई हूँ। मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी," अवनि ने हांफते हुए कहा।
अवनि ने फौरन अपने गले से वह लंबा रेशमी दुपट्टा उतारा। उसने देखा कि पास ही एक मज़बूत झाड़ी की जड़ें चट्टान के अंदर तक धंसी हुई थीं।
उसने दुपट्टे के एक सिरे को उस मज़बूत झाड़ी के तने से कसकर बाँधा और दूसरा सिरा अपनी कमर के गिर्द लपेटा ताकि उसे सहारा मिल सके। फिर उसने दुपट्टे का आखिरी कोना आर्यमन की ओर नीचे फेंका।
जान दांव पर
"इसे पकड़िये! अपनी पूरी ताकत लगाकर इसे थाम लीजिये!" अवनि चिल्लाई।
आर्यमन ने कांपते हाथों से पेड़ की डाल छोड़ी और हवा में लहराते उस दुपट्टे को पकड़ने की कोशिश की। पहले प्रयास में वह चूक गया और अवनि की चीख निकल गई। "आर्यमन जी, एक बार और!"
दूसरे प्रयास में आर्यमन ने दुपट्टे को कसकर थाम लिया। अवनि के कंधों पर अचानक बहुत भार आ गया। उसकी उंगली की चोट फिर से दुखने लगी,
उसकी कलाई की नसें खिंचने लगीं, पर उसने हार नहीं मानी। वह अपने पैरों को चट्टान में गड़ाकर पूरी ताकत से ऊपर की ओर खींचने लगी।
"कान्हा... ताकत देना!" अवनि के मुँह से बस यही प्रार्थना निकल रही थी।
मौत के मुँह से वापसी
अवनि के चेहरे पर पसीना और मिट्टी मिल चुके थे। उसकी सांसें फूल रही थीं, पर उसका इरादा चट्टान जैसा मज़बूत था।
धीरे-धीरे, रेंगते हुए और दुपट्टे को खींचते हुए, उसने आर्यमन को उस खतरनाक डाल से ऊपर खींच लिया। जैसे ही आर्यमन का हाथ चट्टान के किनारे तक पहुँचा, अवनि ने उसे मजबूती से पकड़ लिया और अपनी पूरी जान लगाकर उसे ऊपर खींच लिया।
दोनों हाँफते हुए ऊपर सुरक्षित ज़मीन पर गिर पड़े। मौत के मुँह से बाहर आकर आर्यमन बदहवास था, और अवनि थकान और घबराहट से बेहाल।
पहाड़ी पर अब फिर से सन्नाटा था, पर यह सन्नाटा खौफ का नहीं, बल्कि एक नई ज़िंदगी की शुरुआत का था।
अवनि ने अपनी जान जोखिम में डालकर उस इंसान को बचा लिया था, जिसने कुछ ही देर पहले उसके चरित्र पर सवाल उठाए थे।
मौत के करीब से लौटकर आने का अहसास रूह को झकझोर देने वाला था।
कुछ देर तक दोनों वहीं पथरीली ज़मीन पर बेसुध पड़े रहे। चारों ओर केवल ढलते सूरज की लालिमा और तेज़ हवाओं का शोर था।
पश्चाताप की अग्नि
थोड़ी देर बाद, आर्यमन ने लड़खड़ाते हुए अपनी देह को संभाला और उठ खड़ा हुआ। अवनि अभी भी वहीं मिट्टी पर बैठी थी, उसकी सांसें अब भी तेज़ थीं और आँखों में उस खौफनाक मंज़र की दहशत साफ दिख रही थी।
आर्यमन ने उसकी ओर देखा—वही लड़की, जिसे वह अभी कुछ देर पहले अपमानित कर रहा था, आज उसी ने अपनी जान की परवाह न करते हुए उसे मौत के मुँह से खींच निकाला था।
आर्यमन के भीतर अचानक नफरत की जगह एक गहरी ग्लानि ने ले ली। वह झपट्टे के साथ उस चट्टान की ओर बढ़ा जहाँ अय्याशी का वह सारा सामान रखा था।
उसने शराब की उन महँगी बोतलों को उठाया और पूरी ताकत से पत्थरों पर दे मारा। कांच के टुकड़े चारों ओर बिखर गए, मानो उसके मन का भ्रम टूट रहा हो।
फिर उसने सिगरेट के पैकेट, विदेशी नमकीन और सोडे की बोतलों को एक ढेर में इकट्ठा किया।
अपनी जेब से लाइटर निकाला और कांपते हाथों से उस ढेर में आग लगा दी।
देखते ही देखते वह सारा 'दिखावा' और 'झूठ का जाल' आग की लपटों में जलकर राख होने लगा। वह धुआँ अब अवनि को डरा नहीं रहा था, बल्कि आर्यमन के मन की गंदगी को साफ कर रहा था।
विश्वास की पुनर्स्थापना
आर्यमन के हाथ में अब भी अवनि का वह दुपट्टा था, जो कुछ पल पहले उसकी ज़िंदगी की डोर बना था।
उसने अत्यंत सम्मान और कोमलता के साथ वह दुपट्टा उठाया और अवनि के पास आया। अवनि ने चौंककर ऊपर देखा।
आर्यमन ने बिना कुछ कहे, बड़े धीमे से वह दुपट्टा अवनि के माथे पर सहेजकर रखा, जैसे कोई किसी पवित्र मूरत पर चादर चढ़ाता है।
उसकी आँखों में अब वह ज़हरीला गुस्सा नहीं, बल्कि एक श्रद्धा थी। उसने मन ही मन खुद से कहा:
"नहीं... अवनि वैसी बिल्कुल नहीं है जैसा भाभी ने बताया था।
भाभी को ज़रूर सुनने में कोई बड़ी गलतफहमी हुई है। इतनी निस्वार्थ और बहादुर लड़की कभी धोखेबाज़ नहीं हो सकती।"
मन का मंथन
आर्यमन को अपनी पूर्व प्रेमिका श्रद्धा की याद आई, जिसने उसके एक्सीडेंट के बाद उसे 'बोझ' समझकर छोड़ दिया था और उसका केवल इस्तेमाल किया था।
पर अवनि? अवनि ने तो उसे तब बचाया जब वह उसे सबसे बुरा भला कह रहा था।
आर्यमन ने संकल्प लिया, "अवनि श्रद्धा जैसी नहीं है। यह सचमुच वैसी ही है जैसी दिखती है—पवित्र और सच्ची।
मैं अब इसे और अंधेरे में नहीं रखूँगा। मैं इसे धोखा नहीं दे सकता। मुझे इसे अपनी ज़िंदगी का हर वो कड़वा सच बताना होगा जो मुझ पर बीता है, ताकि हमारे बीच झूठ की कोई दीवार न रहे।"
आर्यमन ने अवनि की ओर अपना हाथ बढ़ाया, इस बार उसे गिराने के लिए नहीं, बल्कि उसका साथ निभाने के लिए।
आर्यमन के मन में पश्चाताप की अग्नि जल रही थी, लेकिन जैसे ही उसकी नज़र अवनि पर पड़ी, उसका दिल दहल गया।
अवनि ने उठने की कोशिश तो की, पर उसके शरीर ने साथ देने से मना कर दिया।
खाई की ढलान पर फिसलने, चट्टानों से टकराने और फिर पूरी ताकत लगाकर आर्यमन का भारी शरीर ऊपर खींचने की वजह से वह पूरी तरह टूट चुकी थी।
उसके पैरों में तेज़ दर्द था और शरीर का हर हिस्सा कराह रहा था।
आर्यमन तुरंत यह बात समझ गया। उसने बिना एक पल गंवाए अवनि के पास घुटनों के बल बैठकर उसके कांपते हाथों और पैरों को सहलाया।
अगले ही पल, उसने बड़ी कोमलता और अधिकार के साथ अवनि को अपनी गोद में उठा लिया।
सदियों का मिलन
अवनि ने हकबकाकर आर्यमन के गले में अपनी बाहें डाल दीं। जैसे ही आर्यमन उसे गोद में उठाकर अपनी कार की ओर बढ़ने लगा, समय जैसे वहीं ठहर गया।
पहाड़ी की ऊँचाई पर ढलते सूरज की सुनहरी और सिंदूरी रोशनी उन दोनों के चेहरों पर पड़ रही थी।
आर्यमन की नज़रें अवनि के चेहरे पर ऐसी थमीं कि फिर हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
एक रूहानी जुड़ाव: उस पल ऐसा लग रहा था मानो दो प्रेमी, जो हज़ारों सालों से बिछड़े हुए थे, आज सदियों बाद किसी मोड़ पर मिले हों।
मोहब्बत का समंदर: आर्यमन के चेहरे पर अब नफरत का नामोनिशान नहीं था। उसकी आँखों में एक ऐसी कशिश थी, मानो वह अवनि के चेहरे में सारी दुनिया की मोहब्बत देख रहा हो।
उसे लग रहा था जैसे उसे उसकी कोई खोई हुई अनमोल प्रेमिका मिल गई हो, जिसे वह अब कभी खुद से दूर नहीं होने देगा।
अवनि ने भी अपनी थकान और दर्द के बीच अपनी आँखें उठाईं। उसने देखा कि आर्यमन उसे कितनी शिद्दत और सम्मान से देख रहा है।
वह चेहरा, जो कुछ देर पहले ज़हर उगल रहा था, अब प्रेम और पश्चाताप की साक्षात मूरत बन चुका था।
अवनि को महसूस हुआ कि जिस कान्हा पर उसने भरोसा किया था, उसने सच में आर्यमन के भीतर के 'पत्थर' को पिघला दिया है।