Avni ek Atut Vishwas - 5 in Hindi Love Stories by RAAHULL SHARMA books and stories PDF | अवनि एक अटूट विश्वास - 5

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अवनि एक अटूट विश्वास - 5

अवनि ने अपनी चोटिल उंगली पर पट्टी बाँधते हुए कान्हा की मूरत को निहारा। उसकी आँखों में आंसू नहीं, बल्कि एक गहरा सवाल था। 


"कान्हा! क्या किसी का दिल इतना पत्थर हो सकता है कि उसे दूसरे का लहू भी दिखावा लगे? 


या फिर... या फिर उनके साथ कुछ ऐसा हुआ है जिसने उन्हें 'इंसानियत' पर भरोसा करना ही भुला दिया है?"



अवनि को याद आया कि कैसे आर्यमन ने मंदिर में उसका हाथ थामा था। उस एक पल के लिए उसकी पकड़ में जो मज़बूती थी, वह किसी को गिराने वाले की नहीं, बल्कि किसी को बिखरने से बचाने वाले की थी। 


अवनि ने मन ही मन संकल्प किया, "आर्यमन जी, आपकी कड़वाहट आपकी ढाल हो सकती है, पर मेरा विश्वास मेरी शक्ति है।


मैं आपके घाव नहीं जानती, पर मैं यह जानती हूँ कि हर अँधेरी रात के बाद सुबह ज़रूर होती है।"



उधर रात के सन्नाटे में जब हवेली की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, आर्यमन अपने कमरे की बालकनी में खड़ा था। 


ठंडी हवा के झोंके उसके चेहरे से टकरा रहे थे, पर उसके भीतर का शोर शांत होने का नाम नहीं ले रहा था।


नीलम की बातें, अवनि का वह शांत चेहरा और उसकी आँखों में झलकता हुआ निस्वार्थ भाव... सब कुछ एक फिल्म की तरह उसके दिमाग में घूम रहा था।



आर्यमन का पश्चाताप


आर्यमन ने गहरी सांस ली और मन ही मन खुद से बुदबुदाया, "मैंने आज जो कुछ भी किया, वह ठीक नहीं था। 


वह लड़की... उसने तो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा था। वह तो बस अपनी दुनिया में जी रही है।"



उसे याद आया कि कैसे अवनि ने चोट लगने के बावजूद एक शब्द नहीं कहा था। 

उसका वह वाक्य— 'उन्होंने आपको मेरा हाथ थामने के लिए भेजा'—आर्यमन के कानों में गूँज रहा था। उसे अपनी बेरुखी पर अब शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।



"श्रद्धा ने मुझे चोट पहुँचाई थी, पर उसकी सज़ा मैं अवनि को क्यों दे रहा हूँ? वह श्रद्धा नहीं है। अवनि की आँखों में  वह चमक, वह मासूमियत... वह दिखावा नहीं हो सकती।"

इसी बीच नीलम की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। जैसे-जैसे रात गहरा रही थी, उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी।


उसे रह-रहकर मंदिर का वह दृश्य याद आ रहा था, जहाँ आर्यमन ने अवनि को गिरने से बचाया था। उसे डर था कि कहीं आर्यमन का 'पत्थर दिल' अवनि की सादगी से पिघल न जाए।



नीलम की चाल और रात का सन्नाटा


नीलम अपने बिस्तर से उठी और दबे पाँव कमरे से बाहर निकली। हवेली के गलियारे में मद्धम रोशनी थी। 


उसने देखा कि आर्यमन अभी भी अपनी बालकनी में खड़ा, दूर अंधेरे को ताक रहा है। उसके कंधे झुके हुए थे और वह किसी गहरी सोच में डूबा था।



नीलम ने अपने चेहरे पर 'फिक्र' का एक झूठा मुखौटा ओढ़ा और धीरे से आर्यमन के पास जाकर खड़ी हो गई।
"अभी तक जागे हो, आर्यमन?" नीलम की आवाज़ ने सन्नाटे को तोड़ा।



आर्यमन ने पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखों में थकान और उलझन साफ थी। "बस भाभी, नींद नहीं आ रही थी।"



नीलम ने एक गहरी ठंडी सांस भरी और रेलिंग पर हाथ रखते हुए बोली, "जानती हूँ। 


कानपुर की ये हवाएँ जितनी सुहानी दिखती हैं, उतनी हैं नहीं। मैं भी अभी नीचे पानी लेने गई थी, तो मैंने कुछ ऐसा देखा कि मेरा तो मन ही बैठ गया।"



झूठ का जाल


आर्यमन ने अपनी भौहें सिकोड़ीं, "क्या देखा आपने?"
नीलम ने इधर-उधर देखा, जैसे वह कोई बहुत बड़ा राज बताने जा रही हो।


वह फुसफुसाकर बोली, "मैं अवनि के कमरे के पास से गुज़र रही थी। वह फोन पर अपनी किसी सहेली से बात कर रही थी। 


वह हँसते हुए कह रही थी कि 'शहर के लड़के भावुक बहुत होते हैं, बस थोड़ा सा भक्ति और सादगी का नाटक करो और वे पिघल जाते हैं।' 


उसने तो यहाँ तक कह दिया कि एक बार शादी हो जाए, फिर वह तुम्हें अपनी उंगलियों पर नचाएगी।"



आर्यमन के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके दिमाग में फिर से श्रद्धा का वह चेहरा कौंध गया, जिसने उसे एक्सीडेंट के बाद "बोझ" कहकर छोड़ दिया था।



नीलम ने ज़हर घोलना जारी रखा, "आर्यमन, मुझे तो डर है कि ये जो उसने आज मंदिर में किया—वह गिरना, वह चोट खाना—यह सब पहले से तय था। 


उसे पता था कि तुम उसे बचाने आओगे। ये कानपुर की लड़कियाँ बहुत शातिर होती हैं, बड़े घरों के लड़कों को फँसाने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल देती हैं।"



विश्वास का कत्ल


आर्यमन की मुट्ठियाँ फिर से भिंच गईं। जो थोड़ी बहुत नरमी उसके दिल में अवनि के लिए आई थी, वह नीलम के इस झूठ की आग में जलकर खाक हो गई। उसका शक यकीन में बदल गया।



उसने कड़वाहट के साथ कहा, "मैं जानता था भाभी। औरतें कभी नहीं बदलतीं। 


सादगी के पीछे हमेशा एक साजिश छिपी होती है। शुक्रिया, आपने मेरी आँखें खोल दीं। अब मैं देखूँगा कि वह अपनी इस 'सादगी' से मुझे और कितना बेवकूफ बना पाती है।"



नीलम के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई। उसने देख लिया था कि उसका तीर निशाने पर लगा है।


वह बोली, "बस अपना ख्याल रखना आर्यमन। ये लोग तुम्हें भावनात्मक रूप से तोड़ना चाहते हैं।"



नीलम ने देखा कि लोहा गरम है, और अब उस पर आखिरी चोट करने का समय आ गया है। उसने अपनी आवाज़ को और भी रहस्यमयी बनाया और आर्यमन के थोड़ा और करीब सरक गई।



नीलम का आखिरी वार


नीलम ने अपनी नाक सिकोड़ते हुए धीरे से कहा, "और जानते हो आर्यमन, सबसे हैरान करने वाली बात क्या थी? 

जब मैं उसके कमरे के पास से गुजरी, तो मुझे हवा में एक अजीब सी गंध महसूस हुई। पहले तो मुझे लगा कि शायद कोई दवाई होगी, लेकिन जब मैंने ध्यान दिया... तो वह शराब की कड़वी बदबू थी!"



आर्यमन की आँखें फटी की फटी रह गईं। "क्या? शराब? अवनि और शराब? भाभी, आप क्या कह रही हैं? वह तो कान्हा की भक्त बनी फिरती है!"



नीलम ने एक गहरी आह भरी, जैसे उसे अवनि पर बहुत तरस आ रहा हो। "वही तो! यही तो उसका असली चेहरा है।


बाहर से गंगा जल के छींटे और सादगी का चोला, और अंदर कमरे में ये सब? मुझे तो लगता है कि ये पूरा परिवार हमें धोखा दे रहा है।



शायद अपनी इस 'बिगड़ी हुई' बेटी को ठिकाने लगाने के लिए उन्होंने तुम्हें चुना है।"



आर्यमन का टूटता विश्वास


आर्यमन के दिमाग में धमाका सा हुआ। उसे याद आया कि कैसे शाम को मंदिर में अवनि ने बड़ी सादगी से कहा था— "कान्हा सबके भीतर बसे हैं।" अब वे शब्द उसे किसी भद्दे मज़ाक की तरह लग रहे थे।



नीलम ने ज़हर का आखिरी घूँट पिलाया, "शायद इसीलिए उसने मंदिर में गिरने का नाटक किया, ताकि तुम उसे थामो और तुम्हें उसकी गंध न आए। 


पर मुझे शक हुआ, तो मैंने रुक कर देखा। वह अपनी सहेली से कह रही थी कि 'कानपुर में बोरियत बहुत है, थोड़ी सी ड्रिंक के बिना यहाँ रात काटना मुश्किल है।'"



आर्यमन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसके मन में जो थोड़ी-बहुत करुणा अवनि के लिए जगी थी, वह नफरत की आग में जलकर राख हो गई। उसने बालकनी की रेलिंग पर ज़ोर से मुक्का मारा।



"बस भाभी! अब और कुछ मत कहिए। मैं समझ गया कि यह लड़की कितनी बड़ी कलाकार है। श्रद्धा तो कम से कम सामने से बुरी थी, पर यह तो सादगी के पीछे गंदगी छिपा रही है।



कल सुबह होने दीजिए, मैं इसे दिखाऊंगा कि आर्यमन कपूर से टकराने का अंजाम क्या होता है।"


षडयंत्र की जीत


नीलम ने देखा कि आर्यमन की आँखों में  अब अवनि के लिए सिर्फ नफरत बची है।

। वह संतुष्ट होकर अपने कमरे की तरफ मुड़ी। उसे पता था कि उसने अवनि के चरित्र पर जो कीचड़ उछाला है, उसे साफ़ करना अब नामुमकिन होगा।



अवनि की अनजानी सुबह


उधर अवनि, अपने कमरे में बेखबर सो रही थी। उसने रात भर कान्हा से आर्यमन के दुखों को कम करने की प्रार्थना की थी।


उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि सुबह जब वह जगेगी, तो आर्यमन की नज़रों में वह 'घाव खाया परिंदा' नहीं, बल्कि एक 'शातिर शिकारी' बन चुकी होगी।



अगला मोड़: नाश्ते की मेज़ पर टकराव


सुबह जब सूरज की पहली किरण हवेली के आँगन में पड़ी, तो अवनि उत्साह के साथ नाश्ता तैयार करने में जुट गई। 


पर जैसे ही आर्यमन डाइनिंग टेबल पर आया, उसका व्यवहार पहले से भी ज़्यादा क्रूर और अपमानजनक था।


यह कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ विश्वास और षड्यंत्र के बीच का फासला मिट चुका है।


नीलम ने अवनि के चरित्र पर जो 'शराब' और 'धोखे' का झूठा आरोप लगाया है, उसने आर्यमन के पुराने ज़ख्मों (श्रद्धा का धोखा) पर नमक छिड़क दिया है।



यहाँ से कहानी का तनाव और भी गहराने वाला है। आइए देखते हैं कि नाश्ते की मेज़ पर यह कड़वाहट किस रूप में सामने आती है: