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आंटी को पिछली बार अंकल के चौथे पे देखा था ।जाने के समय जब मैंने हाथ जोड़कर उनसे विदा ली तो कहने लगीं,
“तुम्हारे अंकल भी चले गए रेनू के पास ...”और अपनी चिरपरिचित उदासी में खो गईं जैसे व्योम के शून्य में कुछ ढूँढ रही हों।
आंटी पिछले बीस वर्षों में नहीं बदली थीं।या शायद उस से पहले भी मैंने उन्हें ऐसा ही देखा था ।भारी क़द -काठी ,गोल चेहरा,होठों पे चिपकी एक हल्की मुस्कान ।सादगी से पूर्ण व्यक्तित्व व्यवहार में शांत और ठहराव ,ये ठहराव और मुखमंडल पर हल्की मुस्कान घर के सभी सदस्यों में था ।उनकी मुस्कान ग़म और ख़ुशी दोनों वक्तों में उतनी ही रहती थी ,ना एक सेंटीमीटर कम ना ज़्यादा,खासकर रेनू की असमय मृत्यु के बाद ..जब भी मैं उनसे मिलती ,उन्हें ख़ुशी तो होती मगर उनकी मुस्कुराहट में एक उदासी और आँखों में एक सूनापन भी दिखाई देता..कहती थीं,
“इस छोटी सी ज़िंदगी में मेरी रेनू ने सब कुछ देख लिया..उसका सरकारी नौकरी पाना ,माँगलिक होना और इस कारण देर से शादी होना ,शादी के बाद दहेज की माँग ,दहेज के चलते घर भेजा जाना ,सास का रूखापन ,पति और सास दोनों का बुरा व्यवहार,रेनू को चक्कर आना,डाईगनोज में ट्यूमर का पता चलना ,बीमारी से जूझना ..कीमो थेरपी करवाना ,बाल उड़ना ,ऑपरेशन करवाना ,फिर से ट्यूमर हो जाना ,फिर से सर का ऑपरेशन होना ,फिर उसका कोमा में जाना और फिर कभी लौट के ना आना ...”,आंटी कहती जातीं और मैं हाँ में सर हिलाती जाती ..सब कुछ चलचित्र की भाँति मेरी आँखो के सामने चलने लगता ..
रेनू को मैंने पहली बार अपने कालेज के पहले ही दिन देखा था।लम्बे क़द की छरहरी गोरी तीखे नक़्श वाली लड़की ..उस दिन सफ़ेद पैंट-क़मीज़ में थी ।ये ख़ुलासा तो बाद में हुआ कि वो बहुत ही शर्मीली लड़की थी ..आइंदा मैंने उसे पैंट -कमीज में कभी नहीं देखा।कालेज को जाती सड़क पर वह मेरे साथ साथ चल रही थी ,उसने मुझे पूछा ,
“कालिन्दी कॉलेज ?”
“हाँ ,तुम ?”
“मैं भी.”
“फ़्रेशर ?”
“हाँ ..कोर्स .?”
“पास कोर्स ..बी ए..”
“मैं भी ..आपका नाम .?”
“रेनू”
“अरे ..!! मैं भी रेणु हूँ “अपनी हमनाम में मुझे कुछ रुचि आने लगी ।
“वाउ..नाइस टू मीट यू...कहाँ रहते हो आप ?”अब रेनू को भी अच्छा लगा अपनी हमनाम से मिल कर ,
“मैं उत्तम नगर..आप ..?”
“तिलक नगर ..चलो वेस्ट दिल्ली तो है ।”
“मेरे मामाजी तिलक नगर रहते हैं ..वो अशोक नगर में मोंगा स्वीट्स है ना उसके सामने...”
“अरे वो तो मेरे घर के पास है..”और इस तरह हम दोनों में ख़ूब बातें होती गई और यूँ हमारी दोस्ती की शुरुआत हुई ।
हम दोनों लेडीज़ स्पेशल बस में साथ साथ आने जाने लगे ,साथ लंच करना ,पढ़ाई करना सब शुरू हो गया।हमारी दोस्ती गहरी दोस्ती में बदलती गई ।धीरे धीरे हम एक दूसरे के घर आने जाने लगे ..अब हम एक दूसरे के परिवारों को भी जानने लगे थे और पारिवारिक परिस्तिथियाँ भी ।
हम दोनों को कम बोलने वालों में माना जाता था पर आपस में हमारी बहुत बातें होती बल्कि मैं ही ज़्यादा बोलती थी । रेनू बहुत सीधी लड़की थी ,घर से कॉलेज और कॉलेज से घर बस इतना ही जानती थी ,गर्ल्ज़ स्कूल में पढ़ी थी ,कभी किसी लड़के से बात तक नहीं की थी ..किसी भी बात पर जल्दी डर जाती थी ।उसके घर जाकर पता चला कि उसके भाई और माँ भी उसकी तरह हैं ,सिर्फ़ पापा बोल्ड हैं ।बाहर का सारा काम अंकल ही करते थे ,बिना थके किसी भी समय सामान लाने चले जाते थे ।ख़ुद ही रसोई में चेक करते कि क्या कम है ,बोलने से पहले सामान भर देते थे ,उनके घर में फिर उनकी तरह का कोई नहीं हुआ ।
आंटी,रेनू और भैया उनकी इस आदत पे हँसते रहते थे कि पापा के पैर में चकरी है , बैठ ही नहीं सकते ..अंकल फ़ूड कॉर्परेशन ऑफ़ इंडिया में काम करते थे और अब रिटायर होने वाले थे ।वे चाहते थे कि दोनों बच्चों की सरकारी नौकरी लग जाए तो शादी अच्छे घरों में हो जाए और वे चिंतामुक्त भी हो जाएँ ।भैया और रेनू कम्पेटिटिव परीक्षाएँ देते रहते थे ..साथ साथ मैं भी ..मैंने बी एड किया और टीचिंग में आगई ।रेनू ने भी परीक्षा निकाल ली और श्रम शक्ति भवन में असिस्टेंट क्लर्क लग गई..घर में ख़ुशी का ठिकाना ना रहा।
पर इस ख़ुशी को नज़र लगने में देर ना लगी ।अंकल जी ने दस लाख की किटी डाली थी जो रेनू की शादी के लिए जमा पूँजी थी ,कोई एक मेम्बर लेकर फ़रार हो गया।वे लोग अचानक दस लाख के नीचे आ गए...कहाँ से लाएँगे पैसे ..!!अपने तो गए सो गए बाक़ी सदस्यों के भी गए ..सबको पैसे कैसे दिए जाएँगे..!!अब घर में सब चिंतित रहते थे ..सभी अंकल का मुँह देखते रहते जैसे ये उनकी परीक्षा हो कि वे इस मुश्किल की घड़ी में कौन सा क़दम उठाएँगे ..अंकल भी परेशान थे क्या किया जाए ..इतने ज़ेवर नहीं थे कि बेचे जाएँ , जो थे रेनू के लिए आंटी ने रख छोड़े थे ..
अब आख़री उपाय बचा था -घर ,अंकल को भी कुछ न सूझ रहा था ..फ़ैसला हुआ घर बेचने का ..और कोई चारा भी नहीं था ।आंटी बहुत रोईं क्यूँकि मकान उनके माँ बाप ने दिया था अपनी इकलौती संतान को ..आंटी का ना कोई भाई ना बहन थे ..मगर बेचारी को अपने पिता की आख़री निशानी को बेचना ही पड़ा ..और अब वे लोग उत्तम नगर के एक छोटे से मकान में आ गए ।यहाँ आंटी का मन बिलकुल नहीं लगता था पर हो भी क्या सकता था।मकान बेचकर पैसे जो चुकाने थे।
रेनू समय समय पर सारी बात बताती रहती थी।भैया की भी सरकारी नौकरी नहीं लग पाई थी ।वे प्राइवेट जॉब करने लगे।अंकल अब भी ज़िंदादिल बने हुए थे ..घर में हँसने-हँसाने ,बातें करने और खिलखिलाने का काम उन्ही का था। चूँकि रेनू माँगलिक थी और शादी २८-२९ से पहले शुभ नहीं थी सो भैया की शादी कर दी गई..इस बहाने घर में कुछ रौनक़ आई..भैया की शादी अच्छे ढंग से की गई ।रेनू और मैंने तो ख़ूब अरमान निकाले,नए कपड़े बनवाने का मौका मिल गया और नाच-गाने का भी।
भैया की बारात सहारनपुर गई।भैया की दुल्हन यानी भाभी अच्छे घर की संस्कारी लड़की थी ..उसने भी आते ही घर सम्हाल लिया ..घर में ऐसे रच बस गई जैसे यहाँ बहुत पहले से रहती हों।हर काम आंटी से पूछ कर करती थीं,अंकल से भी ख़ूब गप करती थीं ,काम में भी फ़ुर्तीली थीं।रेनू का भी ख़ूब मान होता था।अब अंकल के साथ घर में एक हँसमुख सदस्य और बढ़ गया ।
धीरे धीरे रेनू के लिए रिश्ते देखे जाने लगे..बहुत ढूँढाई के बाद एक अच्छा परिवार मिला और शादी हो गई।रेनू की शादी के तीन महीने बाद ही लड़के और उसके घरवालों ने रंग दिखाने शुरू कर दिए ।आए दिन रेनू पति और सास के व्यवहार की चर्चा करती कि उसकी तनख़्वाह में से उसे कुछ नहीं मिलता .पैसे वो लोग लेते थे और हर छोटी बड़ी चीज़ रेनू से माँगी जाती बल्कि रेनू को इस शर्त पे घर भेज दिया जाता कि सामान लेकर ही लौटना होगा वरना वहीं रह जाना होगा ।
और इस तरह रेनू से कार की डिमांड हुई..रेनू इस बार घर बैठ गई..उसने बताया कि वे लोग उसे पूरे घर में अकेला काम करने के लिए छोड़ कई घंटो तक चले जाते थे ..वह उनकी धमकियों से डर गई थी ..सो इस बार ख़ुद ही फ़ैसला किया कि नहीं जाना है ..और कुछ ही दिनों में तलाक का नोटिस भेज दिया गया ..और बहुत संघर्षों के बाद तलाक़ हो गया ।
रेनू की ऐसी स्थिति देख आंटी और अंकल बीमार रहने लगे थे। एक बेटी जिसे बड़े नाजों से पाला था उसपर इतने दुःख, शादी के बाद कोई सुख नहीं ..मुझसे मिलती तो मुस्कुरा कर कहती,
“चलो शादी का स्टैम्प लगना था लग गया ,शहीदों की लिस्ट में हमारा भी नाम आ गया..”,ये कह कर वह ज़ोर से हँसने लगी ..।
“ कैसी बातें करती हो ..ये हँसी की बात है क्या !”मैं पूछा करती।
“ मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया ..हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ा...”वह दार्शनिक अन्दाज़ में गाते हुए कहती।मैं जानती थी कितना बर्दाश्त कर रही थी वो और आंटी भी।
मगर उसके दुखों का पहाड़ अभी कहाँ ख़त्म हुआ था ..अभी तो बहुत कुछ बाक़ी था।इतना सब झेलते झेलते , अपने भाई और पिता को कोर्ट के चक्कर लगाते देख वह ख़ुद बीमार रहने लगी ।उसके सर में भारी दर्द रहने लगा और चक्कर आने
लगे ..मेरे बहुत कहने पर वह डॉक्टर को दिखाने गई ..और फिर जो सिलसिला चला उससे आंटी अंकल और टूट गए ..रेनू के सर में ट्यूमर निकला..फिर ऑपरेशन ..उसके सर से घने काले बाल हटा दिए गए ..अब भी जब अपने पापा के साथ मेरे घर मुझसे मिलने आ जाया करती थी,
गले लग कर कहती,
“ आज बहुत मन था तुमसे मिलने का ..बड़ी याद आरही थी ..सोचा डॉक्टर को दिखाने के बाद तुमसे मिल लूँ “
“कैसी बात कर रही हो मुझे बुलवा लिया होता तुम्हें इतनी दूर आने की तकलीफ़ ना होती ..”मैंने कहा ।
“ इतना साथ दिया है तुमने ..पूरे ऑपरेशन में ,ऑपरेशन से पहले और बाद वहीं बैठी रही हो अस्पताल में ..सब जानती हूँ मैं ..छुप के रोती हो मेरे लिए..जब जब किमो करवाने जाती हूँ दुआएँ करती हो मेरे लम्बे जीवन के लिए ..”,
“बस बस कुछ ज़्यादा नहीं बोल रही आज तुम..!मैंने ऐसा तो कुछ नहीं किया ..तुम मेरे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण हो तुम नहीं जानती ,तुम्हें कितना प्यार करती हूँ मैं..कितने सपने देखे थे तुम्हारे लिए ..तुम्हारा घर होगा फ़ैमिली होगी ..ख़ैर अब कुछ नहीं चाहिए मुझे तुम्हारे जीवन के सिवा ..क्या इसके लिए मैं दुआ नहीं माँग सकती ..?”
“ ओके ओके मेरी सखी मेरी उम्र बहुत लम्बी होने वाली है तुम मुझे कहीं नहीं जाने दोगी ..किमो सब ठीक कर देगा..और बाल ..वो तो आ ही जाएँगे ..बताओ मैं कैप में कैसी लग रही हूँ ?”और कैप को ठीक करने लगी।मैं मुस्कुरा के उसकी ओर देख रही थी।वह बहुत कमज़ोर हो चली थी ,कितनी हिम्मत जुटा कर वो इतना सब बोल पाई थी।मेरे चेहरे पे चिंता और दुःख की लकीरों को देख वह फिर से बोली ,
“ सुनो,तुम भी अब ससुराल वाली हो बच्चों की ज़िम्मेदारी है ,जीजाजी को देखना है ..पूरा परिवार है ..मेरे लिए चिंता मत किया करो ना ही बार बार देखने आया करो ..मेरा तो यूँ ही चलता रहेगा ..मैं ठीक हो जाऊँगी ..।”कह कर उसने विदा ली..पर क्या उसे विश्वास था कि वह ठीक हो जाएगी ??मुझे बहलाने के लिए कह गईं है ,ये वो ख़ुद भी जानती थी।
इसके कुछ ही महीनों तक ही वह जी पाई। छः महीने बाद सर में ट्यूमर फिर उग आया था ,फिर से ऑपरेशन होना था ,ऑपरेशन से पहले मैं जब मिलने गई वह बहुत हो शिथिल दिखाई दी ,सूख कर काँटा हो गई थी ..इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और अपनी धीमी आवाज में मुझसे कहा,
“ भैया की नौकरी नहीं लगी है ,तुम तो जानती हो कितना कम बोलते हैं ,अपनी बात रखना भी नहीं जानते ..अंदर ही अंदर घुलते हैं,ध्यान रखना ..तुम्हारे भी भाई हैं वो ..मम्मी पापा से बात करती रहना ..बहुत दुखी रहते हैं दिखाते नहीं हैं।”
“ ये सब तो तुम मुझे फ़ोन पर भी कह चुकी हो..और तुम घबरा क्यूँ रही हो कुछ नहीं होगा तुम्हें ..पिछली बार की तरह यूँ गई और यूँ आई..तुम बिलकुल ठीक हो जाओगी...ट्यूमर सदा के लिए ग़ायब हो जाएगा ।”और फिर उसने अपनी माँ यानी आंटी को बुला लिया ..
ऑपरेशन तो ४-५ घंटे चला पर रेनू कोमा में चली गई।उसे वेंटिलेटर पर रखा गया ..३-४ दिनों तक ज़िंदगी और मौत के बीच लड़ते हुए वह मौत की ओर चल दी।
हम अब उसे खो चुके थे।मैं आंटी से मिलने घर जाने लगी।रेनू के कमरे में उसका पलंग,अलमारी सब वैसे ही रखा था आंटी ने ,उसकी बड़ी तस्वीर को देखते हुए बोलीं,
“देखो रेनू अब तस्वीर हो गई है ..आज भी लगता है अभी बोल उठेगी..”और आंटी एक उदासी भरे अंधेरे में खो जातीं।
रेनू के कहेनुसार भैया की नौकरी लगवा दी है।राखी के त्योहार से दो दिन पहले रेनू की भाभी का फ़ोन आया कि दीदी आपके भैया रेनू को बहुत याद कर रहे हैं ,अगर आप राखी बाँध दें उनके दिल को कुछ शांति मिलेगी .।” “ कैसी बात कर रही हैं भाभी आपको कहने की ज़रूरत नहीं थी ,मैं तो ख़ुद राखी पर आनेवाली थी ..।”
और राखी के दिन सुबह तड़के ही भैया को मैंने फ़ोन किया ,
“ भैया घर आ जाइए ..मैं भी तो रेणु हूँ आपकी बहन ..आपका इंतज़ार कर रही हूँ ।”
“थैंक यू दीदी ..मैंने सोचा इस बार मेरी कलाई सूनी रह जाएगी ..।”और वे रुआंसे हो गए थे।इसके कुछ ही महीनों बाद रेनू के पापा को परैलिसस अटैक हुआ ,वे बहुत ज़्यादा बीमार हो गए ..कई बार अस्पताल में भर्ती हुए ..भैया ने बहुत सेवा की..भैया स्वयं उन्हें खाना खिलाते ,गोद में शौच आदि ले जाते ..मगर उन्हें भी ना बचाया जा सका ।
आंटी के दुःख-सुख का साथी अंकल सिधार चुके थे ।अंकल के बिना उनके जीवन की कल्पना तक नहीं हो पा रही थी ..उनके बाद तो आंटी बिलकुल उदास और चुप सी हो गईं जैसे कोई भिक्षुक सत्य की खोज में विचाराधीन ,अनेक जिज्ञासाओं और दुखों का कारण ढूँढने ,सबकुछ त्याग कर ,जीवन से मोहभंग कर ,मोक्ष की प्राप्ति को एक अथक अनंत सतत यात्रा को निकल पड़ता है।
बीच बीच में भाभी मानसी की शादी की बात करती और पूछ पूछ कर ज़ेवर कपड़े आदि दिखाती रहती।आंटी बेमन से सब देखती रहती।उन्होंने रेनू का सोने का सेट मानसी को देने को कहा ...और अंकल के जाने के बाद गोवर्धन बाँके बिहारी के दर्शन की अभिलाषी हो गई।राकेश भाई से गुहार लगती रहती कि एक बार मुझे बाँके बिहारी के दर्शन करा दे ।उनके घुटनों में कई वर्षों से दर्द चल रहा था जिसकी वजह से वह कहीं आती जाती नहीं थी ,सीढ़ियों पे चढ़ना तो सपना हो गया था ..इसलिए भैया तालमटोल करते रहते थे ।आख़िर बाँके बिहारी जी ने भी उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली ।
मानसी की शादी तय हुई ।भैया उन्हें गोवर्धन ले गए।पोती की शादी ka न्योता जो देना था ।शादी के कार्ड पर अंकल के नाम से पहले ‘स्वर्गीय’ शब्द लगा देख बहुत रोईं,कहने लगीं,”कुछ दिन और जी जाते ..”
दर्शनों के उपरांत उन्हें पोती की शादी का न्योता दे ,उन्हें अपनी ऊँगली से इशारा कर कहा जैसे आग्रह कर रही हों,
“हे !कृष्णा पोती की शादी है ,पहला कार्ड आपको दिया है ,शादी में ज़रूर आना..”,
कहकर लौटीं और किसी को बिन कहे दाँत के डॉक्टर से दर्द की दवा लेने गईं और डॉक्टर के सामने ही चल बसीं।घर पर उस समय कोई न था ,भैया भाभी शादी का न्योता देने सहारनपुर गए हुए थे ।मानसी और प्रतीक भी अपनी नौकरियों पर।डॉक्टर साब स्वयं उन्हें गोद में उठा कर पास के नरसिंग होम ले गए पर वो तो दम तोड़ चुकी थीं।डॉक्टर साब ने हड़बड़ा कर फ़ोन किया ,बच्चे शाम तक पहुँच पाए और भैया भाभी रात १.३० बजे।
आंटी अकेली पड़ी रहीं ...चिता से पहले ही जलती रहीं ..पच्चीस वर्षों से जल रहीं थी वो ...
मानसी यानि आंटी की पोती ,रेनू की भतीजी हूबहू रेनू की तरह दिखती है ..लम्बी ,गोरी तीखा नक़्श ..बिलकुल रेनू..उसकी शादी न बुआ देख पाएगी न दादा न दादी..।भाभी अकेले सब सम्हाल रही हैं ..बौखलाई दीवानी सी ..बार बार कहती हैं ..कैसे होगा मम्मी जी के बिना ...!!
भैया गुमसुम और चुप गए हैं।.आंटी की चिता की अग्नि उनकी आँखों से गर्म लहू सी बह रही है।
रेणु हुसैन