चलो दूर कहीं.. 26
प्रतीक्षा को जीवित देखकर जैसे उसकी माँ के प्राण लौट आए थे ! महीनों से बिछावन में पड़े रहने के बाबजूद भी ना जाने उसमें कहां से इतनी शक्ति आ गई थी कि वह एक झटके में उठ बैठी थी और उसके गालों को थरथराते हाथों से सहलाते हुए बोली रही थी,"तू इतने दिनों तक कहां थी बेटा.. तुझे पता है तेरे बापू ने तुझे मरा हुआ मानकर तेरा क्रिया कर्म भी करा दिया.. मैं.. उनसे कहती रही कि मेरी प्रतीक्षा जिंदा है, वो इस तरह मर नहीं सकती कहीं चली गई होगी.. एक न एक दिन लौट आएगी.. लेकिन सब मुझे पागल कह रहे थे, और देखो इस पगली की बात सच हुई.. मेरी प्रतीक्षा लौट आई..अब मैं चैन से मर सकूंगी..!"
"मां.. ऐसा न कहो मां..! ये मरने की बातें मत कहो,तुम्हें कुछ नहीं होगा.. मैं आ गई हूं न देखना तुम्हें पहले जैसे तंदुरुस्त करके ही दम लुंगी..!"
प्रतीक्षा बोल ही रही थी कि उसे ढूंढते हुए अनाह,रवि और सुमी वहां पहुंचे तो उसकी मां नजर अनाह पर पड़ते ही वह डर से प्रतीक्षा से लिपटते हुए थरथराते स्वर में बोली,"ये कौन सा जानवर हमारे घर में घुस आया है..इसे बाहर निकालो प्रतीक्षा..!"
प्रतीक्षा अपनी मां को अपने से अलग करते हुए बोली,"मां ये मेरा दोस्त अनाह है.. इससे डरने की जरूरत नहीं है..! इसी ने मुझे बचाया है। फिर अनाह से मुखातिब होते हुए बोली,"अनाह ये मेरी मां है..!"
प्रतीक्षा के इतना कहते ही अनाह ने,"नमस्ते मां जी..!" कहा और उसके हाथों को पकड़ा तो उसके कृषकाय शरीर में जैसे करंट दौड़ गया.. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसके रगों में जमा खून फिर से उबलने लगा है..! वह चाहकर भी अपने हाथ को उसके हाथों से हटा नहीं पा रही थी..उसे एकटक अनाह को निहारते देख प्रतीक्षा उसे झिंझोड़ते हुए बोली,"क्या हुआ मां.. ऐसे अनाह को क्यों घूर रही हो..?"
प्रतीक्षा के झिंझोड़ने से जैसे उसकी तंद्रा टूटी और उसने अपना हाथ पीछे खींच कर आश्चर्य से उसे घूरते हुए कहा," ये.. ये..कौन है.. और हमारे घर में कैसे घुस आया..? इसे बाहर निकालो प्रतीक्षा..!"
"मां ये अनाह है मेरा दोस्त.. इससे डरने की कोई जरूरत नहीं..! इसी के कारण तो मुझे तुम मुझे जिंदा देख रही हो ..!" प्रतीक्षा ने मां के हाथ को पकड़ कर प्यार से बोल ही रही थी कि अनाह ने उसके आंखों में आंखें डालकर कहा," ये झूठ बोल रही है मां जी.. मैं इसका दोस्त नहीं हूं और न ही मैंने इसे बचाया है.. ये तो प्रतीक्षा का बड़प्पन है कि ये सबका दिल जीत लेती है..! इसने मुझे भी अपना गुलाम बना लिया है..!"
अनाह के आंखों के तेज से जैसे वो अपना सुध बुध खो बैठी थी.. उसे प्रतीत हो रहा था जैसे उसके शरीर के अंदर लावा फूट रहा है..! उसका अंग अंग फड़क रहा था,माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई थी, आंखें चढ़ गई थी, और सांसें धकौंनी की भांति फूल रही थी । प्रतीक्षा की नजर जब मां की स्थिति पर पड़ी तो उसकी स्थिति देख उसने रोते हुए कहा," मां.. मां.. तुम्हें क्या हुआ मां.. तुम ठीक तो हो..?" वह पागल की भांति चीख रही थी चिल्ला रही थी लेकिन उसे यह ध्यान ही नहीं आया कि ये खुराफ़ाती अनाह की है..! उसकी चीख सुनकर कमलनाथ भागते हुए वहां पहुंचे और पत्नी की स्थिति देख समझे शायद ये उसका अंतिम क्षण है और वे भी भोखार फाड़ कर रोने लगे..! रवि और सुमी उन्हें दोनों ओर से पकड़े हुए थे, रवि ने उनका नब्ज टटोलते हुए कहा," इनका नब्ज तो ठीक चल रहा है.. फिर इनका एकाएक ये हाल कैसे हो गया..? प्रतीक्षा ऐसा करो इन्हें बिस्तर पर लिटा दो..शायद इससे कुछ राहत मिले..!
रवि का इतना कहना था कि कमलनाथ को रोते देख कर अनाह ने गुस्से से बिलबिलाते हुए कहा," ये नौटंकी बंद करो.. ये मर नहीं रही है जो इतना खुश हो रहे हो..? बड़ी अजीब दुनिया है, जिसके मरने की रोज प्रार्थना करता है..आज ऐसा दिखावा करता है इससे ज्यादा दुखी और कोई नहीं है।
अनाह की बातें सुनकर कमलनाथ को लगा जैसे उसकी चोरी पकड़ी गई है..उसके चुप होते ही उसके आंखों का संपर्क उनसे टूटा और वह बिछावन में लुढ़क गई। वहां निशब्द सन्नाटा पसरा था ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई बड़ा तुफान अभी अभी गुज़रा हो..!
"थोड़ी देर में होश में आ जाएगी.. इन्हें एक कप गर्म दूध पीला देना..!" अनाह ने प्रतीक्षा से कहा और बाहर चला गया तो कमलनाथ ने भयभीत नजरों से इधर उधर देखते हुए सहमे हुए स्वर में प्रतीक्षा से पूछा,"ये अनाह कहीं कोई भूत प्रेत तो नहीं..?"
प्रतीक्षा कुछ नहीं बोली बस मां के नीचे झूलते पैर को बेड पर चढ़ाकर सीधा की और उन्हें एक चादर से ढककर उसके सिरहाने बैठ होश में आने का इंतजार करती रही।
इधर जैसे जैसे दिन चढ़ रहा था, प्रतीक्षा के लौट आने की सूचना पुरे मोहल्ले और परिजनों के बीच जंगल के आगे की तरह फ़ैल गई थी..! लगातार लोगों के आने का सिलसिला जारी था.. लोग आते प्रतीक्षा का कुशल क्षेम पूछते और उसकी मां की स्थिति पर अफसोस जताकर जा रहे थे। ये वही लोग थे जो अब से पहले इस घर की ओर झांकने तक से गुरेज करते थे। खैर ये हमारी सामाजिक व्यवस्थाएं हैं जिसमें सामान्य परिस्थिति में हम किसी के घर तांक झांक नहीं करते लेकिन किसी असामान्य परिस्थिति में हमसे कुछ हो या न हो हम भावनात्मक सपोर्ट जरुर करते हैं।
लोगों के भीड़ भाड़ के बीच दरवाजे पर एक कार आकर रुकी और उससे एक बेहद खूबसूरत औरत नीचे उतरी ..वह सलवार सूट पहनी थी,गले में मंगलसूत्र,मांग में सिंदूर, हाथों में चूड़ियां..! उस पर नजर पड़ते ही दरवाजे पर बैठे कमलनाथ अपनी याददाश्त पर जोर देकर याद करने की कोशिश कर ही रहे थे कि ये कौन है?वह आई और उनका पैर छूते हुए बोली," कैसे हैं अंकल.. प्रतीक्षा कहां है..?"
आवाज़ सुनते ही कमलनाथ ने कहा,"अरे.. शिखा बेटी, मैं तो पहचान ही नहीं पाया..आओ.. अंदर चलो प्रतीक्षा अपनी मां के पास है..!"
कमलनाथ का इतना कहना था कि वह दौड़ती हुई अंदर गई और प्रतीक्षा से लिपटते हुए बोली,"कैसी हो मेरी लालपरी..?"
प्रतीक्षा ने कुछ न कहा, उसे अपने से अलग करते हुए बस उसे घूरती रही..!
क्रमशः...