Jaisi Karnee Visi Bharni in Hindi Short Stories by Devendra Kumar books and stories PDF | जैसी करनी वैसी भरनी

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जैसी करनी वैसी भरनी

जैसी करनी वैसी भरनी

सुन कर बड़ा दुःख हुआ था कि  मेरा एक पुराना सहयोगी राकेश  सोलंकी  दिल्ली के मैक्स  हॉस्पिटल के आई सी यू में काफी सीरियस हालत में भर्ती कराया गया है . एक दूसरा  पुराना मित्र जो  उसे देखने के लिए गए गया  कुछ मिनट  ही शीशे से ही देख पाया था, उसने पाया  कि  राकेश सोलंकी सिर्फ हड्डी का ढांचा मात्र रह गया है. उस हालत में उसका व्हाट्स एप ग्रुप पर शेयर किया फोटो  देख कर बहुत तकलीफ हुई. मन में आया अच्छा होता वह फोटो शेयर न करता. उसके  पहले  चेहरे और अब में कोई साम्य नहीं था इतना कुरूप और वीभत्स चेहरा  ही नहीं पूरा शरीर  जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.  बिलकुल  हड्डी का ढांचा या स्केल्टन. आंख कोटर के अन्दर मुंह खुला का खुला.  बताया  गया  वह न सुन पाता  है न बोल पाता है न खा पाता न पी पाता है.

 वह तो कभी  एक बेहद फैशनेबल इंसान था. लड़कियों की तरह पूरा  मेकअप किया करता था. यहाँ तक की वह  आखों  में काज़ल भी लगाता था, पॉवडर क्रीम पोतता था, बालों में ब्रिल क्रीम लगा कर देवानंद की तरह के गुफ्फे बनाता था. उसे कभी मुसे कपड़ों में किसी ने नहीं देखा होगा. उसका बाद में इतना बुरा हाल  होगा यह अकल्पनीय था. ‘कबीरा सब दिन जात न एक समाना’-सही ही कह गए थे कबीर दास.

 गाँव से दिल्ली के हॉस्पिटल में राकेश काफी ख़राब हालत में लाया गया था. पहले एक सप्ताह आईसीयू में रख कर ही वह कुछ इलाज के लायक हो पाया था. वह खाने पीने में निरा असमर्थ था, पहले उसके गले में एक फ्लेक्सिबल नली से कुछ खिलाने में  उसके गले में एक छेद कर थोडा खाना सीधा फ़ूड पाइप  में पहुँचाया जाने की चेष्टा की गयी फिर नाक से एक पतली RT ट्यूब सीधे आमाशय  तक वह भी पूरा सफल न होने पर बाद में PEG प्रणाली अपनाई सीधे पेट को छेद कर खाना स्टमक या आमाशय में भेज दिया जाता. पेशाब के लिए एक थैली लगाई हुई थी, आँखों की पलकें खुली की खुली थी झपक नहीं रही थी, चेहरे पर कोई भाव नहीं.  कई तरह की नलियाँ व  मोनिटर लगे हुए थे, ड्रिप से दवाईयां चढ़ाई जा रही थी. सिरहाने पर बैठी एक नर्स  उसकी निरंतर  लगे मोनिटेरों  को देख  कर वाच कर रही थी. कई सीनियर स्पेशलिस्ट उसे देख कर कुछ हिदायत दे कर चले जाते थे. इलाज के साथ साथ उस के ऊपर प्रयोग ही कर रहे थे ज़बरदस्त जिंदा रख रहे थे वैसे उसमें बचा कुछ नहीं था. लगभग ब्रेन डेड मरीज़ था साँस चल रही थी और दिल धड़क रहा था. 

 उस दिन उसके घर का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं है, बताया कि कुछ दिन पहले  राकेश का  पचास वर्षीय बेटा अर्जुन सोलंकी  पुलिस एस्कॉर्ट के साथ गाँव से लेकर आया और  भर्ती कर गया था. पता लगा की  पहले  उसके छोटे भाई ने उसे भेजने से इनकार कर दिया था जिसके पास  वह पिछले तीन चार साल से रह रहा था.  दो दिनों के बाद राकेश का  बेटा अर्जुन जो कॉर्पोरेट वर्ल्ड में अच्छी सर्विस कर रहा था,  फिर गाँव गया था इस बार साथ में पुलिस थी और एक एम्बुलेंस ले जाने के लिए आई थी . बेटा  उनको अपने चाचा के पास गाँव से पुलिस की मदद से ज़बरदस्ती उठवाकर ले गया था.  इस काम के लिए सुनील ने अपने पिता के पुराने साथी को बताया था कि गाँव में उसका अपना चाचा राकेश को लगभग बंधक बना कर ज़बरदस्ती गाँव में रखे हुए हैं ताकि उसके पैसे और नियमित पेंशन से वे मजे करते रहे. मित्र ने यू पी पुलिस  के उच्च अधिकारियों से बात कर पुलिस एस्कॉर्ट भिजवा दी थी और वे उसे दिल्ली के एक  बड़े प्राइवेट मैक्स में ले आये.

 हॉस्पिटल ने बेहद नाज़ुक स्थिति देख सीधे आईसीयू में  भर्ती कर लिया था. और बाद में  बेटे ने एक  हेल्पर उसके लिए रखवा  कर अपनी एक ड्यूटी का अंजाम दे दिया वही  उनका हाल  फ़ोन पर बता कर उन्हें सूचित कर देता था. हाँ, उनका  छोटा भाई और भाभी भी गाँव से उसे देखने के लिए आये हुए थे दूर से देख कर रोकर चले गए थे. कह रहे थे “अब जब इसमें कुछ रहा ही नहीं यहाँ लाकर बेचारे की मिटटी ख़राब करने तथा हमें ज़लील करने को लाये हैं, हम पिछले तीन साल से भी ज्यादा इसकी सेवा कर रहे थे, इसका गू मूत उठा रहे थे, एक दिन देखने नहीं फटके, ऐसा बेटा भगवान किसी को ना दे, हमें पता है, उसे भी पता है अब यह ठीक तो होगा नहीं बस अस्पताल वाले अपना बिल बनवाते रहेंगे और ये इलाज का ढिंढोरा पीटेगें और दुनिया की नज़रों में हमारी, गाँव के भाई लोगों की भद पीटेंगें. असलियत गाँव भर को मालूम है. हमारा भी खून का रिश्ता है और गाँव वालों मेनाभी भी इंसानियत जिंदा नहीं, भगवन सब देख रहा है” उसकी बातों में उसका दर्द साफ़ था.

जो भी हो आईसीयू  में कोई दस दिन रखने के बाद उसे कमरे में शिफ्ट कर दिया गया बताया गया की अब उसके कई पैरामीटर ठीक हो चुके हैं मगर बाकी सुधार र्धीरे-धीरे ही आ सकता है, वहां उसकी एक प्राइवेट नर्स देखभाल के लिए रख दी गयी थी. बेटा अर्जुन  कभी कभी आता था इलाज़ तो कैशलेस सीजीएच एस कार्ड होने से अच्छा और सस्ता हो रहा था जैसा सभी केन्द्रीय सरकार के कर्मियों और पेंशनरों  का होता है.

आजकल  घरवालों को छोड़ बहुत कम ही लोग मरीज़  को देखने जाते है, फ़ोन और व्हाट्स एप का ज़माना है उस पर ही पूछताछ और शुभ कामनाएं, या ‘प्रेईंग  फॉर रिकवरी’ लिख कर बस काम चल जाता है या कोई जा कर  देख कर अपने फोटो के  साथ  पूरे ग्रुप में डाल सूचित  कर देते हैं. यही हुआ था जिसे मैने भी तो अपने बेटे के पास  दूसरे  देश में रहने के कारण  ग्रुप के मेसेज  में पढ़ कर ही इस बारे में इस बात को जाना था अन्यथा कहाँ  कुछ पता चलता. राकेश मेरा तो सहकर्मी रह चुका था, एक इलाके के रहने वाले  हैं, सो उसके बारे में मैं बहुत कुछ जानता था.

बस यह सब ही सुन जान कर राकेश की  पुरानी बातें, घटनाएं एक एक कर याद आने लगी, उन्ही की जुगाली कर बाहर निकाल रहा हूँ  और यह किस्सा लिख रहा हूँ. मेरे जैसे एक साधारण मध्यवर्गीय पुराने सरकारी नौकरी करने वाले का जीवन जैसा होता है वैसा था उसको लिखने की बात तो जचती नहीं है, पर राकेश सोलंकी जैसे रंगीन तबियत के इंसान और उसकी जिन्दगी की उठक पटक  बिलकुल अलग तरह की जिंदगी रही है जिसको मैंने निकट से देखा है, जाना है, उसे लिखना बड़ा आसान है. सच में उसने  अपनी जिंदगी को एक अनूठे ढंग से जिया, बड़े बदलाव किये, बड़े रिस्क लिए, बहुत झटके झेले, वह तो किसी भी कहानी लिखने वाले के लिए, सुनने वालों के बढ़िया पठनीय मसाला है.

मुझे पता है कि उसकी जिन्दगी बड़ी अजीब रही थी, जितनी मुझे पता है उसके भाई बंधुओं या दूसरे  करीबियों को भी शायद पता न हो. चलो किस्सा कोता शुरू से बयान करता हूँ. बहुत कुछ स्वयं देखा था और बहुत अपने  कॉमन सहयोगियों  से  नौकरी और जिंदगी में पता चलता रहता था. सबको  तुरपाई कर बस जोड़ा हे तो है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कस्बे शामली के पास एक गाँव है भारसी. वैसे तो वहां छत्तीस जात खूब आराम और मिल जुल कर रहती थी पर बाहुल्य  खेतीहर जाट जाति के लोगों का था जो या तो खेती करते थे, जानवर पालते या फ़ौज में नौकरी करते थे. शामली  क़स्बा पास होने के कारण उन दिनों भी गाँव से कुछ बच्चे पढ़ कर नौकरी में आने लगे थे. आज की तरह पढने की इतनी सुविधा पुराने दिनों में कहाँ थी?  राकेश के पिता सूरत सिंह पुत्र भाले राम ने सन 1941 के आसपास मिडिल स्कूल थर्ड डिवीज़न से पास कर लिया था और कुछ महीने बाद वह पटवारी की सरकारी पर शुरू में कच्ची नौकरी पा गया  था जो बाद में पक्की भी हो गयी थी. यह भाले राम परिवार यहाँ तक पूरे गाँव के लिए बड़ी बात थी, असल में किसी भी ग्रामीण इलाके में दो ही तो महत्वपूर्ण पद थे थानेदार और पटवारी. दूसरी वर्ल्ड वॉर चल रही थी भाले राम का दूसरा छोटा बेटा हरबीर सिंह घर से भाग कर बरेली के जाट सेण्टर में जाकर फौज में भर्ती हो गया था. उनकी खेती तो साधारण थी पर दो बेटों के नौकरी पा जाने पर परिवार में  काफी खुशहाली आ गयी थी. गाँव में रुतबा बढ़ गया था.

समय के साथ सूरत सिंह की शादी किरठल नामक बड़े गाँव के अच्छे परिवार की लड़की से हो गयी थी, उसकी पत्नी पढ़ी लिखी तो नहीं थी पर घर के काम व व्यवहार में काफी होशियार थी. जाटों में गोत्र देख कर तथा अपने गोत्रों से बचा कर शादी की जाती थी. भारसी गाँव में गोत्र पंवार था और किरठल में चौहान. उन दिनों नाम के साथ गोत्र लिखने का रिवाज़ नहीं के बराबर था. कच्ची उम्र में शादी करने और मेडिकल कवर न होने के कारण सूरत सिंह के पहले दो बच्चे जीवित नहीं रह पाए थे. तीसरा बच्चा कन्या थी और वह बच गयी थी उसका नाम रखा था वीरपाली, उसके बाद दो बेटे हुए जिनका नाम रखा राकेश और राजेश. राकेश सतमासा  हुआ था, शुरू में लगता था कि पता नहीं बचेगा भी या नहीं, पर जिस को राखे साईयाँ वाली बात थी वह बच भी गया शरीर से थोडा कमज़ोर रहा, कद काठी में भी कम पर दिमाग से तेज़ निकला था.

सूरत सिंह पटवारी ने अपने थोड़े ही कार्यकाल में अच्छे खासे पैसे कमा लिए थे, घेर घर पक्के ही नहीं बड़े अच्छे बनवा लिए थे  अपनी खेती की ज़मीन भी  खरीद कर बढ़ा ली थी. उस समय ज़मीदारी प्रथा थी उसमें ज्यादातर पटवारी ज़मींदारों का काफी फेवर करते तथा उन्हें खुश रखते भले ही आम जोतदार किसान को तकलीफ हो. देश स्वतंत्र होने पर किसानों की स्थिति को ठीक करने के लिए उत्तर प्रदेश के राजस्व मंत्री चौधरी चरण सिंह ने ज़मीदारी उन्मूलन अवं भूमि व्यवस्था अधिनियम लाकर किसानों और शासन के बिचोलिये ज़मीदारों को समाप्त कर दिया, इसके विरोध में पटवारियों ने हड़ताल की थी, सूरत सिंह भी आगे बढ़ कर उसमें शामिल हुआ, 270000 ने इस्तीफ़ा भेजा, उम्मीद थी कि  सरकार कदम पीछे ले लेगी, पर  उत्तर प्रदेश के  मज़बूत राजस्व मंत्री चरण सिंह ने सब का इस्तीफ़ा मंज़ूर कर लिया और नई भर्ती कर नया नाम लेखपाल नाम दे दिया. इस कदम से सूरत सिंह पटवारी की की चार दिन की चांदनी अँधेरी रात में बदल गयी.

 सूरत सिंह ने हाथ से खेती का काम कभी किया नहीं था जो पर अब करना पड़ गया था. उसकी पत्नी भी काफी दिन से बीमार चल रही थी, पर इलाज के बावजूद सुधार नहीं हो रहा था. और दुर्भाग्य से एक दिन बेचारी चल बसी. केवल अपनी बेटी बीरपाली  की शादी देख पाई थी. परिवार जो तरक्की की तरफ अग्रसर था अचानक इन दो झटकों से मुसीबत में आ गया था.

 राकेश ने  अपने गाँव से ही  प्राइमरी क्लासेज की, आगे का स्कूल गाँव में नहीं था. छटी से10 वीं तक की पढ़ी के लिए राकेश, जिसने नाम के साथ अपना गोत्र सोलंकी भी जोड़ लिया था, ने किसान इंटर कॉलेज शामली में पढ़ाई की. इंटर से आगे की पढाई वहीँ के डिग्री कॉलेज से बीएससी कर ली. इस बीच उसका चाचा हरबीर सिंह,जो कुछ वर्ष फौज में रह कर डिस्चार्ज हो गया था और अब सिविलियन नौकरी कर रहा था, उसे अपने पास शाहदरा ले गया ताकि कहीं अच्छा जॉब ढूंढने में मदद मिल सके.  जाते ही उसे नौकरी तो नहीं मिल पायी पर उसकी चाची का दुलारा बन गया, जो निम्फो या निम्फोमेनीक भी थी. उसने कच्ची उम्र के राकेश पंवार के साथ  सम्बन्ध बना लिए थे. केवल यही नहीं कभी कभाक बल्कि बहुत अधिक जिससे पहले ही से हलके राकेश का स्वास्थ्य कमज़ोर रहा और उसका  जो शरीर में आगे बढ़ोतरी होनी थी, वह रूक गयी और इस चस्के से राकेश को सेक्स की  एक ऐसी इल्लत लगी जिससे जीवन भर कभी भी छुटकारा नहीं मिल पाया, वह इस बिना तली के अँधेरे कूप में वह जीवन भर एक तरह या दूसरी  गिरता ही चला गया, गिरता ही चला गया. जब भी जहाँ भी मौका मिलता छोड़ता नहीं था. आश्चर्य की बात थी की ज्यादातर जगह वह सफल हो जाता वह तो बाद की बात थी.

 चाचा चाची के पास रहते उसे जल्दी कोई अच्छी  सिविल जॉब तो न मिल पायी पर चाचा की कोशिश से  एयरफोर्स में एयरमेन  भर्ती हो गया था, भर्ती पालम एयर फ़ोर्स स्टेशन पर हुई  थी और  ट्रेनिंग के लिए उसे एयरफोर्स स्टेशन बेलगाँव, कर्नाटक भेजा गया था जहाँ ट्रेनिंग के साथ साथ  उसका बोलना चालना तथा अंग्रेजी में बात करना आदि बहुत सुधर गया था. वहां के अच्छे माहौल  व खान पान से उसका स्वास्थ्य और फिटनेस भी काफी ठीक हो गये थे. उसमें अच्छा खासा तेज़ दिमाग तो पहले ही से ही था. बेसिक ट्रेनिंग के बाद तीन महीने के लिए फिर दोबारा एयरफोर्स स्टेशन पालम में  संचार ट्रेड सीखने के लिए छः महीने की पोस्टिंग मिल गयी थी. पास होने के कारण वह चाचा के घर कहें या चाची के पास जाता ही रहता था तथा अपने माँ बाप  के पास  गाँव में बहुत कम क्या लगभग जाता ही नहीं था. चाची पर पैसे भी खूब खर्च करने लगा था. यह अजीब प्लेटोनिक प्रेम के साथ साथ अजीब सा शारीरिक सम्बन्ध था जिसमें उम्र का भी काफी अंतर था. रिश्ता भी निषेध वाला था, पर भी था ही जिससे चाह  कर भी  वह छोड़ पा रहा  था. उसकी मां को या अपने गाँव और परिवार से दूरी बनाना बिलकुल नहीं बर्दाश्त हुआ और उसने उसे कई बार खूब झाडा भी, उसे अन्दर की बात पता नहीं थी, क्योंकि ऐसा  उसकी मां  दूर तक भी नहीं सोच सकती थी .

 छोटा भाई राजेश सोलंकी अधिक न पढ़ पाया हाई स्कूल मुश्किल से थर्ड डिवीज़न से कर पाया था जिसे ‘फर्स्ट डिवीज़न विद  टू  बॉडी गार्ड’ ‘(III)’ बता कर बड़ा खुश होता. घर के खेती के काम करने में ज्यादा रुचि रखता था. मस्ती से रहता खाता पीता गाँव में ताश खेलता. वह न तो पढ़ा लिखा पूरा न किसान पूरा था क्योंकि उनके इलाके में अनपढ़ ही असली किसान रह पाते थे.  अधकचरे पढ़े लिखे न इधर के न उधर के रह जाते थे. उसे न खुदा ही मिला ना बिसाले सनम, पर उस जैसे गाँव में बहुत थे.

 दुर्भाग्य से राकेश और राजेश की मां और सूरत सिंह पटवारी की पत्नी असमय थोड़ी सी बीमार हो कर स्वर्ग सिधार गयी थी. सारा परिवार मुसीबत में आया हुआ था, अब जाकर सूरत सिंह को घर की गृह लक्ष्मी के महत्त्व का असली एहसास हो रहा था उसका खाना पीना सब गड़बड़ा गया था. घर की तथा ज़मींन जायदाद व खेती बाड़ी  की  सारी जिम्मेंदारी  उसी ने ही अब संभाली हुई थी. कुछ सोच विचार कर उसने छोटे बेटे की कम उम्र में ही शादी कर दी ताकि  घर का चौका-चूल्हा संभल जाए व गृहस्थी चलती रहे. गाँव देहात में  कृषि से जुड़े छोटे भाई का बाहर नौकरी पर निकले बड़े भाई से पहले विवाह हो जाना एक आम  सी बात  थी. अब राकेश और उसकी बीवी ही धीरे-धीरे घर के चौधरी और चौधरन होते जा रहे थे, खेत के लिए बिहार से आये मजदूरों से खेती करवाते थे.

 राकेश के पालम एयरफोर्स स्टेशन पर रहते उसके साथ के कई एयरमेन केन्द्रीय पुलिस में गजटेड पोस्ट के लिए फॉर्म भर रहे थे, देखादेखी राकेश सोलंकी  ने भी वह फार्म भर दिया था, तथा उसके लिए भाग दौड़ तथा दूसरी तैयारी भी अच्छी की. चयन  बोर्ड ने सभी उम्मीदवारों को बारी-बारी दिल्ली पुलिस के किंग्सवे कैंप स्थित ग्राउंड में चयन प्रक्रिया के बुलवाया था, वहां दो दिन तक अभ्यर्थियों के  विभिन्न टेस्ट हुए थे. जिसके कोई छः महीने बाद रिजल्ट आया जिसमें में राकेश पंवार सफल घोषित हुआ जो उसके लिए ही नहीं बल्कि उसके चाचा चाची  समेत पूरे परिवार के लिए बड़ी ख़ुशी का मौका था. इस तरह से पटवारी पुत्र राकेश सोलंकी  बीएसएफ का अधिकारी बन गया था. उसके चाचा के तीन बेटियां थी वे भी राकेश के काफी करीब थी. वह भी अपनी सगी बड़ी बहन के मुकाबले उनका ही अधिक ध्यान करता था. छोटा भाई जिसे सूरत सिंह मजाक में ‘राजेश गंवार चमार’ कह कर  चिडाया करता था, अपने बड़े भाई के साथ तुलना पर थोड़ी सी  हीन भावना  में रहता था तथा भाई से अन्दर से अन्दर जलन करता था.

बीएसएफ  में उसकी ट्रेनिंग बीएसएफ अकादमी, टेकनपुर, ग्वालियर में हुई थी, उसके कोर्स में लगभग पचास कैंडिडेट थे, हालाकि ट्रेनिंग साल भर की थी पर 1971 की पाकिस्तान के साथ लड़ाई के मद्देनज़र  ट्रेनिंग को छोटा कर उन्हें उनकी बटालियनों में भेज दिया गया था, सोलंकी को कुपवाड़ा सेक्टर  की बटालियन में भेजा गया था. हालाकि जब तक बटालियन में पहुंचा लड़ाई खत्म हो चुकी थी, पूर्वी पाक आर्मी के 93,000 सैनिको को युद्ध बंदी बना लिया गया था. एक नए देश बंगलादेश ने जन्म ले लिया था.  वहां  दो  तीन साल  बिताने  के बाद असिस्टेंट कमांडेंट राकेश को दिल्ली स्थित बीएसफ कैंप छावला में भेज दिया गया था, तब तक इसकी शादी के लिए गाँव और चाचा चाची के पास कई रिश्ते आये हुए थे, जिसमें  तय करने की भूमिका में  मुख्य सलाहकार चाचा चाची थे. राकेश  लड़कियों को देखने खूब सजधज कर जाया करता, खूब क्रीम पाउडर पोतता, आँखों में सुरमा  लगाता, पर कई जगह तो शरीर कमज़ोर तथा कम हाइट होने के कारण इसकी बात नहीं बन रही थी. कई बार जाट लडकियां  ही उससे लम्बी और मज़बूत होती. पर शादियाँ तो शायद पूर्व निर्धारित होती हैं, मेरठ में इनके चाचा को एक योग्य रिश्ते का पता लगा तो खुद ही पहल कर लड़की वालों से संपर्क स्थापित किया. फोटो आदि एक दूसरे को दिखाए और तय किया गया कि अगले रविवार को देखने की रस्म की जाए, उस दिन लड़का और लड़की एक दूसरे को देख लें बात कर  लें और बात आगे बढ़ाई जाए.

अगले ही सप्ताह रविवार के दिन राकेश के पिता सूरत सिंह, चाचा हरबीर सिंह, चाची, चाचा की बड़ी बेटी और राकेश मेरठ में लड़की वालों के घर पहुंचे, लड़की के पिता कबूल सिंह मेरठ के पास कस्बे माछ्ररे में वाइस प्रिंसिपल थे जो उन्हें अल्पभाषी, सीधे सच्चे व शांत लगे थे, उनकी पत्नी सुनहरी तेज तर्रार, बातूनी और  सब पर हावी हो रही थी  और घर पर कण्ट्रोल करने वाली, वही आने वाले मेहमानों से बात कर रही थी, राकेश का भी अच्छा खासा इंटरव्यू ले डाला, पर बातचीत में वह भी  कम माहिर नहीं था, बस उस समय तक शरीर में ही पतला दुबला व कमज़ोर दिखता था.

 थोड़ी देर में उनकी  बेटी चाय के ट्रे और कुछ खान पान का सामान ले कर आयी, वह भी थोडा  सा छोटे कद की, खूब गोरा रंग काफी  सुन्दर की श्रेणी में तथा बहुत अच्छे और सुरुचिपूर्ण ड्रेस में थी. वह न तो शर्मा रही थी न ही संकोच कर रही थी और आराम से थी  बातचीत में भी वह पूरी निपुण थी. निसंकोच सवालों के उत्तर दे रही थी अर्थात उस समय की आम कन्या की तरह नहीं थी, समय से आगे थी तथा  दीक्षांत समारोह में एलएलबी की डिग्री लेते हुए गाउन पहने, डिग्री दिखाते बड़ा सा फोटो उनके ड्राइंग रूम में सजा था. शायद यह दिखाने के लिए कि लड़की योग्यता में लड़के से आगे ही है पीछे नहीं.  

 श्रीमान राकेश तो एक दम प्रसन्न थे बल्कि उस पर से  निगाह नहीं उठा  पा रहे थे पूरी तरह से  लट्टू हो गए थे.  बात सुन सुन चाची को डर सता रहा था कि लड़की ही राकेश को रिजेक्ट न कर दे. लड़की के मुकाबले राकेश काफी फीका था. राकेश के पिता ने कबूल सिंह से बात की अच्छे लगे पर उनकी पत्नी स्वयं  पहल कर रही थी उनसे पहले जबाब देती थी सो  हर विषय की बात में एक तरफ से लड़की की मां सुनहरी और दूसरी तरफ  चाचा  चाची ही ज्यादा से ज्यादा बात कर रहे थे. सुनेहरी बेटी के गुणों और खूबियों को बताते थक नहीं रही थी.

 सूरत सिंह  पटवारी को मेरठ के लिए चलने से पहले गाँव के एक बुज़ुर्ग ने तजुर्बे की बात बताई थी कि अगर लड़की को देखने के लिए  जा रहे हो तो मां को भी जांचना, बेटियां मां पर ही ज्यादा जाती हैं, और अगर बेटी के लिए लड़का देखने जा रहे हो तब उसके बाप को, और एक कथन सुनाया कि ‘बाप  पर पूत  पिता पे घोड़ा, बहुत नहीं तो थोडा थोडा. और सूरत सिंह  देख रहा था कि बिलकुल कम पढ़ी लड़की की मां पढ़े लिखे आदमी के घर में उसे एक तरफ रख  खुद ही खुद मुख्त्यार बन रही है, शायद उसे नचाती होगी उसे  यह अच्छा लक्षण नहीं  लगा पर वह भी क्या करे चाचा चाची और राकेश खुद ही ठेकेदार बने हुए  

 चाय के बाद दोपहर खाने का इंतजाम था, रसोई में खाना बनाने वाली थी मां बेटी ने मेज पर ला ला कर सामान रखा जिसमे राकेश की चाची ने भी  रसोई में जाकर थोड़ी मदद की. भोजन बड़ा अच्छा था बहुत सारी डिश थी. काफी तैयारी थी.

 लंच के बाद थोड़ी देर लड़के लड़की को आपस में अकेले बात करने के लिए ऊपर के कमरे में भेज दिया. कोई आधा घंटे के बाद दोनों नीचे आये, माँ सुनहरी  बेटी उषा राय पूछने के लिए उसको  अन्दर ले गयी तथा  पिता  कबूल सिंह भी  बाहर चले गए ताकि लड़के वाले आपस में विचार विमर्श कर लें. चाचा चाची व राकेश की तरफ से हाँ थी, उधर मां ने अपनी लड़की की तरफ  से ‘हाँ ’ कही.

सूरत सिंह शांत रहे कि जब उसे कोई पूछ ही नहीं रहा और ऊपर से होने वाले मियाँ बीबी राज़ी तो उसे क्या लेना देना, गाँव में आकर यह बहू रहने वाली नहीं लगती. बस उसी दिन लड़की वालों ने प्रस्ताव रखा कि साथ के साथ की साथ रोकना की रस्म कर दी जाए और 15 दिन के बाद शादी की तारीख भी तय कर दी. पिता चुप था पर पूरा प्रसन्न नहीं था, क्योंकि उन्होंने बाकी परिवार, पीछे से उनके बारे में कोई छानबीन नहीं की, उषा  के दो बड़े भाई बहन थे, और रिश्तेदारियां थी उनके बारे में जान लेना क्यों ज़रूरी नहीं समझा, जैसा उन दिनों में रिवाज था. थोड़ी बहुत छान बीन कर लेनी चाहिए थी बाद में पछताना नहीं पड़ता.

खैर शादी धूम धाम से हुई, उस दिन दुल्हन बनी उषा ने बेहद सुन्दर बनारसी साड़ी पहनी हुई थी, वह  सुन्दर थी और कुशल मेकअप करने वाली ने उसे बहुत अच्छा मन से सजाया हुआ था. जब दूल्हा दुल्हन  दोनों एक साथ शादी में सजी सेज पर बैठे, दोनों में बहुत अंतर लग रहा था, बारात में आये हुए गाँव के मुंह फट बारातियों ने एक ने कहा, “भई, कव्वा ज़लेबी ले  उड़ा.” इस तरह के बेढब उदगार सुनने को मिल रहे थे, एक गाँव वाली कह रही थी,“लौंडा कहीं जनखा है क्या आँखों में  कितना काज़ल लगा रखा है. एक हंसोड़ कह रही थी “ ऐ कव्वा चला हंस की चाल अपनी भी भूल गया”, एक गाँव का देसी चौधरी अपनी भाषा में कह रहा था,“भाई  मैं नू कहूं  यू  म्हारे लौंडे ने क्या सांग करा, देखा देखी काज़ल आदि क्यूं लगाया ज़नानियों की तरह. मझे तो जनखा लग रा,” वैसे राकेश ने तीन पीस का कीमती सूट पहना हुआ था अच्छा खासा लग रहा था पर उषा के सामने फीका ही था.

एक मोहल्ले की जासूस महिला दूसरी के कान में कह रही थी,“उधर देख, अपनी छोरी का बॉय फ्रेंड कैसे टुकर टुकर देख रहा है, इसे बुलाना नहीं चाहिए था, इसके लम्ब्रेटा स्कूटर पर उसने कई बार दोनों को देखा है. कई बरस की यारी थी साथ पढ़ते थे.”  

शादी अच्छी संपन्न हो  गयी फेरे के समय ज्यादातर घर वाले बचे थे, राकेश के फूफ्फा ने ज्यादा दारु चढ़ा ली थी उसे फेरों के टाइम कै  हो गयी थी, खाया पीया सब निकल गया था उसे धर्मशाला जहाँ  बारात ठहरी हुई थी, दो लोग ले गए  थे हालाकि वो वहीँ रहने की जिद कर रहा था. शादियों में फूफा कुछ काण्ड न करें तो कैसे फूफा?

खैर बरात बस और एक कार में मेरठ की दुल्हन को तारों की छांव विदा कर ले जा रहे थी और लाउड स्पीकर पर गाना चल रहा था , “छोड़ बाबुल का घर मोहे पी के नगर आज जाना पड़ा ...याद कर के  ये घर रोई आँखे मगर मुस्कुराना पडा ....ये था झूठा नगर इसलिए छोड़ कर मोहे जाना पड़ा ......

बेटी की बिदाई बड़ा ही भावुक समय होता है मां पिता बहन भाई और रिश्तेदार रो रहे थे, उषा की रोते रोते हिचकी बंध गयी थी. विदा हुई और सुबह जाकर गाँव भारसी  पहुंची वहां राकेश की चाची, बहन आदि आरते के बाद अन्दर ले गए, सब बुरी तरह से थके हुए थे.

चलिए आगे के किस्सों की केवल ख़ास खास बाते संक्षेप में लिख दी जाएँ. जैसा अक्सर शादी में होता है शुरू के कई साल उनके काफी अच्छे गुजरे शादी के अढाई साल में पहली संतान बेटा  हुआ सब खुश थे नाम रखा अर्जुन, बॉर्डर पर ड्यूटी होने के बावजूद फॅमिली साथ रह पाई थी शुरू में कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर में हुई थी बाद में कई बरस गुरेज़ व बारामूला में रहे थे सब कुछ ठीक चल रहा था, पर जब कभी छुट्टी आते गड़बड़ हो जाती पत्नी अपने घर रहना चाहती और पति अपने. यहाँ  आकर उसे उड़ते उड़ते चाची और राकेश के संबंधों के बारे थोड़ी हवा लगी जिसके बाद उसने थोड़ी जासूसी अपनाई और उसका शक विश्वास में बदल गया उसके बाद महाभारत होना ही था हुआ सम्बन्धों में कडुवाहट आ गयी थी. राकेश ने कभी स्वीकार नहीं किया पर महिलाओं में सिक्स्थ सेंस गज़ब की होती है और ऐसे मामलों में विशेष रूप से. उषा ने यह बात अपने तक न रख कर अपनी मां को भी बता दी जिसने चाचा के घर जा कर चाचा चाची की अच्छे खबर  ली. रिश्ते कटु होते चले गए, राकेश ने भी अपनी तरह की जासूसी और पूछताछ कर नीरजा के पूर्व प्रेमी के बारे में पता किया तथा उसका नाम लेकर उसके चरित्र पर भी ऊँगली उठाई. इस बीच  एक बेटी  ने भी जन्म लिया जिस का नाम पिता ने खुश होकर विजयेता रखा, भाई बहन के बीच उम्र में लगभग पांच साल का अंतर था.

नौकरी के फ्रंट पर एक अच्छा राकेश एक असिस्टेंट कमांडेंट माना जाता था, सिर्फ महिलाओं के प्रति कमजोरी के अलावा उसमें कोई और बुरी आदतें नहीं थी, स्मोक नहीं करता था न दारु का सेवन. बॉर्डर पर रहते उसने कभी कोई बेईमानी का काम नहीं किया था जैसे कुछ  अफसर कर जाते हैं. गुरेज  सेक्टर में रहते हुए उसकी पहचान एक सूफी फकीर कादरी बाबा मस्त कलंदर दरवेश से हुई जिसके बारे में इलाके में कई बातें मशहूर थी कि उन में बहुत सी अदृश्य पॉवर हैं, वे खोई हुई चीज़, खोये हुए बच्चे आदि को बता देते है. कोई जिन्न इस काम में उनकी मदद करता है, उन्हें वशीकरण व अनेक टोने टोटके आते हैं, कर्ण पिशाचनी सिद्धि भी उनके पास है. राकेश उनके पास जाने लगा वे चौबीसों घंटे मस्त रहते वह उनसे तंत्र विद्या आदि सीखने लगा था, लड़कियों के हाथ देखने का शौंक उसका पुराना था. वहीँ से वह अंगुली पकड़ते पकड़ते पहुंचा पकड़ने सिद्ध हो चुका था. अब तो वशीकरण भी काफी सीख चुका था जिससे उसको औरतों को बहकाने और बस में सहायता मिलती उसका उसने अपने ही एक मित्र अफसर की बीबी पर सफल प्रयोग किया और सफल भी हुआ .

 कादरी बाबा ने उसे अच्छी तरह समझा कर, ठोक बजा कर कलमा पढ़ कर गंडा और ताबीज दिए थे कि उसकी सिखाई हुए विद्या को सिर्फ नेक काम में इस्तेमाल कर सकेगा, गलत इस्तेमाल करने पर सिद्धि भ्रष्ट बड़ी दुखदायी होती है. इंसान  को कहीं का नहीं रहता. ख़ास तौर पर उनकी मौत बड़ी दुखदायी होती है. राकेश ने इस सुन लिया इरादा भी किया पर अमल करने में चूक जाता था .

 उसने कई पक्का निश्चय किया कि वह कभी भी अदृश्य ज्ञान का दुरूपयोग नहीं करेगा, जो इल्म और कुव्वत कादरी बाबा से मिली  उस हुनर कभी कोई गलत इस्तेमाल नहीं करेगा. कादरी बाबा ने उसे मरने के बाद गयी रूह या आत्माओं से बात करने के लिए ‘मीडियम’ बनना सिखा दिया जिसको करने के लिए वह ट्रांस में चला जाता था जिसमें लगता था कि वह गहरी नींद में है और पूछने वाले के सवालों के जबाब दुनिया से जाने वाले की रूह से पूछ कर बहुत संक्षेप में बताता था. कई बार जब उत्तर उट पटांग  हो तब माना जाता था कि बुलाई आत्मा के स्थान पर  कोई  गलत या शैतान रूह है और बताता  कि ‘लगता है की कोई शैतान आत्मा आ गयी है.” कादरी बाबा अक्सर एक कई सौ पुरानी रूह से वाकिफ थे जो अब के  ईराक में पुराने समय के सफाविद एम्पायर के समय वहां के बाशिंदे थे. कादरी बाबा अँधेरे कमरे में ईराकी रूह से बातचीत करते थे, उन्होंने खुश होकर एक दो बार राकेश से भी  फ़क़ीर से ऐसे बात कराई की जैसे वो पीर वहीँ आसपास मौजूद हैं. राकेश को  बातचीत कर भारी रोमांच हुआ था और उसे यकीन हो गया कि इस दुनिया से आगे भी कोई दुनिया है, जो रहस्य है. तथा उन रूहों और आत्माओं के लिए कहीं भी आना जाना या जानना मुश्किल नहीं है न ही भाषा की कोई रूकावट. उसे यह भी हिदायत दी गयी कि जो ज्ञान या इल्म उन्हें दिया जा रहा है उसे अपने पास  हिफाज़त से रखे, गलती पर अदृश्य शक्तियां  कठोर सजा स्वयं दे  देती है. 

एक दिन कादरी बाबा बिना बताये कहीं चले गए उस पता नहीं चला था  पर यह बात एक दो बार उन्होंने  अपनी मंशा  ज़ाहिर की थी वे अजमेर शरीफ में जियारत के लिए जाना चाहते हैं, उम्र भी उनकी काफी बड़ी हो चुकी  है जब भी उनके पीर साहेब का हुकुम होगा, बुलावा आएगा वे बस चल देंगें. राकेश को अंदाज़ा नहीं था कि इतनी ज़ल्दी जायेंगे.    

 उधर दिल्ली में राकेश की उसकी पत्नी उषा अपने दिल्ली के लक्ष्मी बाई नगर के सरकारी क्वार्टर में दोनों बच्चों के साथ रहती थी. दोनों बच्चे अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे थे. मेरठ नगर पास होने के कारण कई बार बीच बीच में उषा की माँ उसके पास आकर घूम जाती थी, कुशलता देख जाती. परिवार की मदद के लिए एक बूढ़ा  अर्दली दिन में बीएसएफ के दिल्ली एडम कैंप से सुबह आ जाता था, सुरक्षा के अलावा छूटकर या बाजार के काम कर देता था जिससे परिवार को काफी सुविधा  रहती थी.

राकेश गुरेज में अपनी बॉर्डर की ड्यूटी कर रहा था वहीँ उसकी जान पहचान एक मुस्लिम तलाक शुदा औरत से हो गयी जो उम्र में राकेश से  थोड़ी बड़ी थी, बेचारी के कोई संतान नहीं थी न ही गुजारे का कोई विशेष स्रोत, थोड़ी जमीन थी और एक घर था, सब्जी फल बेचती  थी कभी किसी के घर का काम मिल जाए वह भी कर लेती थी. बीएसएफ की ‘जी ब्रांच’ के लिए भी वह कुछ  ख़ुफ़िया काम  भी चुपचाप कर देती थी, कई बार बॉर्डर क्रासिंग करने वालों के सुराग उसे मिल जाते थे. या किसी टेररिस्ट एक्शन के बारे में पूर्व सूचना मिल जाए या उसके आसपास गाँव में आने के बारे में वह भी चुपचाप दे देती थी. उसी सिलसिले में राकेश का उससे मिलाप हुआ था, और  चोरी  चोरी बात आगे बढ़ गयी. राकेश को फिसलने की पुरानी आदत कच्ची उम्र से थी ही, शादी हो गयी थी पर ‘चोर चोरी से जाए, हेरा फेरा से न जाए’ वाली बात थी. प्रमोशन होने पर वह गुरेज़ से राजौरी बॉर्डर पर दूसरी बटालियन में आ गया, वहां उसे फेमिली क्वार्टर भी मिल गया था गर्मी की छुट्टियों में उषा और बच्चे भी वहीँ बुला लिए थे.  परिवार खूब  घूमे फिरे भी, वैष्णों देवी में दर्शन किये, पर बच्चों  की पढाई और दिल्ली के अच्छे स्कूलों के कारण निश्चय रहा कि दिल्ली का सरकारी  क्वार्टर भी अपने पास रखेंगें. जम्मू कश्मीर या भारत के उत्तरपूर्व में तैनात कर्मियों को  दिल्ली में परिवार के लिए यह सुविधा सरकार ने दे  रक्खी थी. 

वहीँ  दिल्ली में उषा का पुराना क्लास फेलो तथा  बॉय फ्रेंड  सूरज भान त्यागी, जो सीआईएसएफ में सब इंस्पेक्टर था जिसका परिवार  उनके पडौस में मेरठ  था ही परिवार एक दूसरे से परिचित थे,  वे दोनों एल.एल.बी में साथ मे थे. अलग जाति होने के कारण शादी नहीं हो सकती थी अतः सिर्फ मित्र बन कर रह गए थे. अब दोनों शादीशुदा थे पर ‘ओल्ड फ्लेम इज ओल्ड फ्लेम’ सो फिर से आपस में मिलने लगे थे पुरानी मित्रता रंग लाई. सूरजभान ने अपनी पत्नी व बच्चे मेरठ में ही दादा दादी के पास  रखे हुए थे और वह हर हफ्ते वहां जाता रहता था. दिल्ली में एस ओज मेस में रहने खाने की व्यवस्था की हुई  थी. उषा की मां सुनहरी अपनी बेटी के पास आती रहती थी. बेटी के जीवन में काफी दखल देने लगी थी. राकेश के परिवार के पिता चाचा या भाई कोई मिलने आता उनको कुछ कटी फटी ज़रूर सुनाती. राकेश को जब  पता लगता तब वह उषा को समझाने की कोशिश करता. उसके कारण पति-पत्नी में कई बार झड़प हो जाती. आखिर एक बार राकेश ने अपनी सास को साफ़ साफ़  सुना दिया कि वह उनकी गृहस्थी में आग लगाना छोड़ दे, वही सब के हित में रहेगा- जिसका उसर उल्टा ही हुआ, वैमनस्य व  आपस की दूरियां और भी बढ़ती चली गयी. यहाँ तक हो गया कि ज़ब राकेश कुछ दिन के लिए दिल्ली आता बीवी  के रूखेपन से अपने ही घर में उधारा सा रहता. उदास रहता बच्चों से भी उतना स्नेह नहीं कर पाता ना उनसे से सम्मान जितना एक पिता का होना चाहिए. उषा घर में खर्च भी  अनाप-शनाप  करती थी. राकेश किसी बाहर के लोग से अपनी घर की कभी कोई बुराई नहीं करता, जबकि उषा  जानने वालों, अड़ोसी पड़ोसी को पति की और उसके घरवालों की बुराई करने में आगे रहती. कहती कि राकेश के पिता और भाई  राकेश से  किसी न किसी बहाने से पैसे मांगने आते है. कब तक अपना पेट काट कर उन लोगों की मदद करेंगे. राकेश इन बातों से बहुत झुंझलाता व परेशान होता. वह सबसे मिल कर चलना चाहता था जब की उषा अपने बच्चों व अपने मैके वालों तक सीमित रहना कहती थी.

बच्चे धीरे धीरे बड़ी कक्षाओं  में आ गये थे, इसलिए राकेश इस तरह की पोस्टिंग लेता जा रहा था जिसमें वह दिल्ली का क्वार्टर अपने पास रख सके. पिछली बार कमांडेंट का प्रमोशन होने पर उसने कोशिश करके बीएसएफ फ्रंटियर हेड क्वार्टर हुमहुमा जो श्रीनगर एअरपोर्ट के पास है पोस्टिंग ले ली थी, यहाँ उसकी पोस्ट काफी महत्वपूर्ण थी, रहने के लिए भी बहुत अच्छा क्वार्टर था जिसे उसने बड़ी अच्छी तरह से सजा धजा लिया था. अपने काम में चतुर चालाक होने के कारण उसके बॉस फ्रंटियर कमांडर उस पर भरोसा करते थे तथा बटालियन कमांडर्स उसको प्रसन्न रखते थे. घर की तरफ से खुश न होने के बावजूद वह अपने कार्य से काफी प्रसन्न व संतुष्ट था. इस बार उसने ग्रीष्म अवकाश में अपने परिवार के साथ-साथ अपने पिता सूरत सिंह पटवारी को भी में कश्मीर बुलवा लिया था और सब को दर्शनीय स्थान भी अच्छी तरह दिखाये पत्नीं, पिता को भी बुलाने के कारण थोडा खुश नहीं थी-जो उसके व्यवहार से स्पष्ट प्रदर्शित हो जाता था, ऐसे मौके पर राकेश दो पाटों के बीच खिंचा रहता था दुखी होता पर किसी को कुछ नहीं कह पाता था. इसी तरह दिन निकलते जा रहे थे साथ-साथ कश्मीरी महिला मित्र से भी उसका लगातार मिलना होता रहता भले वह कहीं भी हो.

सात साल बाद   

सात साल बाद राकेश डीआईजी बन चुका था, अब उसके पास पंजाब का बॉर्डर था उसका हेड क्वार्टर अमृतसर में अटारी-वाघा बॉर्डर से थोडा पहले खासा  नामक स्थान पर था, बहुत ड्यूटी उन दिनों बेहद संवेदनशील शील जिम्मेदारी थी ही.

अटारी वाघा बॉर्डर की जिम्मेदारी भी उसी की थी, पर दोनों भारत पाकिस्तान की तरफ से मित्रता की प्रतीक ‘बीटिंग द रिट्रीट’ परेड भी रोजाना होती थी, दोनों देश के बीच का गेट खुलता था, हजारों लोग दोनों तरफ से देखने आते थे. यहाँ पर राकेश ही सबसे सीनियर बीएसएफ अधिकारी था. उसके पास बहुत लोगों की सिफारिश आती वीआईपी पास के लिए तथा इस तरीके से वह लोकप्रिय भी होता गया, बहुत लोगों से जान पहचान हो गयी थी फ़ोर्स के अन्दर भी और बाहर भी.

इस समय तक उसका बेटा अर्जुन दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से बी कॉम कर  एक विदेशी बैंक में नौकरी पा चुका था. उसके माँ और पिता के बीच बहुत झंझट हो चुके थे, उसे कश्मीरी महिला के साथ उसके अतरंग सम्बन्ध की भनक मिल चुकी थी. उसकी मां उषा उसके पिता की बेरुखी और चरित्र के ढीले-पन  से बेहद आहत थी, पहले तो इस बात को घर में  कलह और खूब झंझट होते रहे. दोनों ही एक दूसरे पर बेवफाई के आरोप लगाते रहे, ज्यादातर शोर शराबा तो मां की तरफ से होता था. उनकी नानी मेरठ से आकर तरह तरह की राकेश को धमकी देती, “तुझे सड़क पर ले आएंगे.” उसी के कहने पर उषा ने इंस्पेक्टर सूरज भान से टेलीफोन नंबर लेकर बीएसएफ के महा निदेशक को शिकायत भरा टेलीफोन किया, जिन्होंने शांति से बात सुन कर उल्टा समझाया कि यह घर का मसला अगर घर में सुलझा लें तो ज्यादा ठीक रहेगा” 

पर स्त्री जब का स्वभाव है कि जब वह आहत होकर आपे में आ जाती है  तो नागिन की तरह फुंकार कर बिना परिणाम को सोचे , बदला लेने के लिए कुछ भी कदम उठा सकती है. उसने यहाँ तक दिया कि ‘तुम यह काम करोगे तो मुझे रोक कर देखना.’  

 फिर उसने ने बीएसएफ हेड क्वार्टर में एक शिकायत जिसमें उससे मारपीट करने परिवार का ठीक भरण पोषण न करने तथा दूसरी महिलाओं से नाजायज़ सम्बन्ध जैसे आरोप लगा कर लिखित शिकायत की, तथा उसकी प्रतिलिपि गृह मंत्री समेत गृहमंत्री  को भी भेज दी.

 उस पर कुछ दिन तक कोई कारवाही होते न देख थोड़े दिनों बाद एक एफआईआर भी पुलिस स्टेशन में कर दी, राकेश को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड रही थी, एक आई जी ने उस की इन्क्वायरी की तथा ज्यादातर आरोपों को बेबुनियाद व बढ़ा चढ़ा कर होना पाया गया. फिर भी उसे एक ‘वार्निंग लैटर का शो कॉज लैटर’ मिला जिस से उसे कष्ट हुआ, पर कष्ट पहुँचाना ही  पर उसने उसका ज़बाब कस कर दिया और मामला रफा दफा हो गया, सुना गया कि महा निदेशक ने कश्मीरी महिला से सम्बन्ध में हंस कर  टिप्पणी की थी, “अरे इस में क्या है, कोई सबूत तो नहीं मिला,अगर सच भी है तो यह तो नेशनल इंटीग्रेशन ही तो हो रहा है.”

 घर का पूरा कण्ट्रोल उषा के हाथ में था बैंक अकाउंट जॉइंट था, अच्छा खासा वेतन आता जिस पर उसका कब्ज़ा रहता था. बस इस स्टेज पर राकेश घर नहीं आ पाता था, विवश और कमज़ोर था  शादी टूटने की कगार पर थी. बीबी से सम्बन्ध और बात चीत हुए कई बरस हो गए थे.

उषा पूरी क्रुद्ध थी बदला लेने पर आमदा अतः बेटे की सर्विस लगते और थोडा सा जमते ही उसने तलाक की अर्जी भी डाल कर  अगला खतरनाक दांव खेला जिसमें अपने ऊपर उसने अपने ऊपर मारपीट व दुर्व्यहार का भी आरोप था, अपने व बच्चों के भरण पोषण, पढाई लिखाई व शादी विवाह के लिए बड़ी राशि की मांग लिखी थी. नोटिस पाकर राकेश तिलमिला उठा था कि नौकरी करे या कोर्ट कचहरी व वकीलों के चक्कर लगाये व सब जगह अपनी हिमाकत व बेइज्जती करवाए. मन ही मन उषा उससे तलाक नहीं चाहती थी, सिर्फ नीचा दिखा कर अपना पक्ष ऊपर रखना थी कि राकेश घुटने के बल आकर गलती माने और आगे के लिए तोबा करे, पर चाहना और होना एक तो नहीं होता, दूसरे एक पुरुष और उस पर भी पति का अहं ऐसा करने से रोकता है. दूसरे कुछ इलज़ाम तो नितांत झूठे थे उसने कभी मार पीट नहीं की थी उलटे ही उषा ने एक बार पानी से भरा गिलास उस के सर पर दे मारा था, जिसका उसने कभी भी किसी से ज़िक्र तक नहीं किया.  

राकेश पहले से ही ज्योतिषी, पीर फकीर, बाबाओं से, टोने टोटके वालों से तरह तरह के उपाय करता कराता रहा था, उसने  दस में से पांच अंगुली में प्रभावशाली जेम स्टोन जैसे नीलम, मूंगा, पुखराज आदि की  अंगूठियाँ पहनता था, तथा चमत्कारों में पूरी आस्था रखता था. अपने पीर बाबा को याद करता पर अब उनसे कोई संपर्क नहीं होता. पुरानी आत्माओं से भी बात कर उपाय पूछे और उनके कहे हुए मन्त्र जाप किये, तांत्रिकों के पास गया उन्होंने बताया कि उषा पर भी किसी मौला बाबा का ताबीज़ है जिस से वे कुछ नहीं कर पा रहे, ये सब कितने झूठे सच्चे है यह तो पता नहीं पर इन सब अन्धविश्वासी चीज़ों में कुछ साफ़ निकला तो नहीं दिखाई दिया, बड़ी बात है कि पढ़े लिखे लोग भी इन चक्करों में रहते हैं. 

 राकेश तलाक का नोटिस आने पर एक तरफ से वकीलों से बात करता था दूसरी तरफ बाबाओं, ओझाओं और ज्योतिषियों से भी चालू रहता. ‘प्लान्चेट’ में भी उसका विश्वास था बल्कि स्वयं भी उसे करता रहा था. इस विद्या में भूतों या आत्माओं को औझा लोग एक बोर्ड पर ऊँगली रखवा कर आटोमेटिक राइटिंग द्वारा वार्तालाप करवाते हैं. गुरेज़ में कादरी बाबा का चेला तो बन ही गया था. हाँ, जब तलाक का चल रहा था, उसकी  मुस्लिम महिला महबूबा जान खुल कर उसके पास आ गयी ताकि मुसीबत के समय साथ हो.

अब धीरे धीरे राकेश और उषा के बीच  सुलह होने की आशा नहीं  बची थी क्योंकि वह तो ‘त्रिया हठ’ पकडे थी अतः राकेश ने अपने  वकील की राय ली तथा दूसरी तरफ उषा के वकील से भी एक बिचोलिये से मिल कर सम्बन्ध साधा और दोनों वकीलों  ने इस बात पर जोर दिया कि अगर दोनों पार्टियाँ  अगर म्यूच्यूअल कंसेंट से तलाक ले लें तो ज़ल्दी हो जाएगा वरना केस बहुत लम्बा खींचता ही  जाएगा. शुरू में उषा ऐसा नहीं चाहती थी पर बाद में मान गयी पर वह अपने भरण के लिए के मासिक  गुज़ारा भत्ता राशि तथा  दोनों बच्चों की  शादी विवाह के पूरे खर्चे के लिए अडी रह और कोर्ट ने अच्छी राशि अलिमोनी फिक्स कर उनका 28 वर्ष का विवाह विच्छेद कर दिया. दोनों के लिए बड़ी तकलीफ की बात थी पर दोनों के लिए  और कोई रास्ता नहीं था दोनों में से कोई झुक के रिश्ता बचने के लिए तैयार नहीं था, फ़िल्मी गाने के बोल ‘वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा वाली बात थी.

बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान अल्लाह की कहावत चरितार्थ करते  हुए बेटे अर्जुन ने मुम्बई में एक सिन्धी लड़की पम्मी मीरचंदानी, जो ऑफिस में साथ ही कार्य करती थी, तेज़ तर्रार थी, से एक साल की  चुपचाप डेटिंग के बाद शादी करने का इरादा अपनी माँ उषा को बताया जो अभी तक राकेश के दिल्ली के  सरकारी  क्वार्टर में ही जमीं हुई थी. मां खुश नहीं हुई उसे बेटे को  काफी समझाया फिर हार कर मां भी मजबूरी में मान ही गयी चूँकि बेटे ने कोर्ट मैरिज की धमकी जो दे दी थी. शादी से पहले  ही बेटे बहू ने मिलकर एक छोटा फ्लैट मुम्बई में ले लिया था, और शादी से ठीक पहले उषा ने दिल्ली से मुम्बई शिफ्ट कर लिया पीछे रह गयी बेटी देवलीना सोलंकी जो अभी दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज में बीए ओनर्स कर रही थी.

   एक समय  ऐसा भी था जब राकेश की पोस्टिंग दिल्ली में थी और वह वहां उषा के होते अपने सरकारी क्वार्टर में आ भी नहीं सकता था, घर  पर  उषा का कब्ज़ा जो था, अतः वह एक बटालियन के अफसर मेस में रहने लगा था. इस बात को लेकर सामने तो नहीं पीठ पीछे  उसके मित्र लोग  हँसते थे.

  उषा के बेटे के पास मुम्बई शिफ्ट होते ही तुरंत राकेश अपने क्वार्टर में आ गया था और पिता पुत्री साथ रहने लगे. देखने से ऐसा लगता की परिवार में बच्चे भी बंट  गए हैं, मां बेटा एक तरफ, पिता पुत्री दूसरी तरफ, यह राकेश के लिए अच्छा हुआ, क्योंकि बेटा शुरू से माँ भक्त था जबकि उसकी बेटी अपने पिता को ज्यादा प्रिय थी, और उसका खूब ध्यान करती थी, यह बिलकुल नैसर्गिक सच्चाई है ,बेटियां हमेशा से पिता का ध्यान बेटों से बढ़ कर करती हैं. ऐसा हुए दो ही महीने हुए थे कि ऑफिस के राकेश के आने पर उसे शादी का एक निमंत्रण कार्ड  घर के पते पर आया मिला जिसमें एक सप्ताह बाद  अर्जुन और किसी पम्मी मीरचंदानी की मुम्बई में शादी के लिए निमंत्रण था. राकेश को धक्का लगा की मां  बेटे ने भी थोडा सा भी पूछने या बताने को मुनासिब नहीं समझा, इस बात की भी कार्ड को देख कर पीड़ा हुई निमंत्रण केवल उषा की तरफ से था उसका नाम नदारद था. निश्चित रूप से यह उषा की कारस्तानी थी उसे नीचा दिखाने के लिए जान बूझ कर ऐसा किया  होगा.

शादी में पिता पुत्री दोनों शामिल हुए, पर पिता को जो महत्त्व मिलना चाहिए था वह नहीं था, फिर भी राकेश ने परिपक्वता दिखाई और अपमान को अन्दर ही अन्दर पी गया. उसने कोर्ट के आदेश के अनुसार शादी का खर्च भी पूछ कर दिया था. वह शादी के अवसर  पर किसी भी  तरह का झंझट नहीं चाहता था. पिता पुत्री  दिल्ली साथ साथ लौट आये.

पांच वर्ष और बाद  राकेश बी एस एफ से रिटायर हो गया था, नौकरी के अंत में कुछ महीने के लिए आई जी का पद पा गया था, बेटी की भी शादी कर दी थी, वह दिल्ली में उसने बड़े मन और उत्साह से की, अच्छे  परिवार और सजातीय विवाह किया, इस शादी में मुम्बई की शादी के विपरीत अपने बेटे बहू, अपनी पूर्व पत्नी को पूरा महत्त्व दिया, दोनों तरफ के सभी रिश्तेदारों को बुलाया और अपनी हैसियत से बढ़ कर पैसा भी खर्च किया, पूरी सावधानी बरतने के बावजूद  विवाह संस्कार के समय कश्मीरी महिला को  देखते ही  उषा न बड़ा बखेड़ा कर दिया. पूरा करा कराया काम काफी ख़राब हो गया था. बेटे  बहू के साथ उषा शादी का बहिष्कार करके चली गयी, बेटी की बिदाई अकेले करते राकेश इतना रोया कि उसकी तबियत बहुत ख़राब हो गयी थी, उसे दिल का पहला दौरा पड़ा था जो गंभीर नहीं था, धीरे धीरे तबियत संभल गयी दोबारे से चलने फिरने तो लगा पर अब दवाईयां ही दवाईयां खानी पड रही थी. उसे संतोष था कि उसकी परिवार की सारी जिम्मेदारी पूरी हो गयी तथा वह अब स्वतंत्र हो गया है. उषा ने उसकी कश्मीरी मित्र को लेकर जो काण्ड बेटी की  शादी में कर दिया, उससे महबूबा भी बहुत अपमानित महसूस कर रही थी. राकेश की तबियत  सँभलते ही वह भी अपना  बिस्तर बोरिया समेट जहाँ से आई थी वहीँ चली गयी. राकेश अकेला पड गया, अकेलापन अपने में  एक बड़ी बीमारी है.  

 अब वह अकेला पड गया था मित्र मण्डली भी छोटी होती जा रही थी, अवसाद रहता था, शरीर का बैलेंस कम हो गया था गिरने का डर रहने लगा था. उसने एक नौकर रख लिया था जो ड्राइविंग भी जानता था और घर में मदद भी करता था. उसके साथ रहने व कश्मीरी  मित्र महबूबा के चले जाने पर तो अपने आप को और भी असहाय हो गया था.

अंग्रेजी में कहावत है, misfortune never come alone, उस की प्यारी बेटी की शादी हुए थोडा ही समय हुआ था  कि उसका अचानक  कार्डियक अटेक से निधन हो गया, अब तो उसकी रही सही हिम्मत भी ज़बाब दे गयी. वह बिलकुल टूट गया और उषा इतनी कठोर और निर्दयी हो गयी कि बेटी के देहांत की जान कर मुम्बई से न खुद आई और न उसका बेटा. कोई माँ इतनी कठोर हो सकती है इसका विश्वास नहीं होता पर हुआ ऐसा ही था. बेटी का अंतिम संस्कार के बाद राकेश ने लगभग खाना छोड़ दिया. उसे लगने लगा कि उसके लिए अब जीने का कोई मतलब नहीं है. एक दिन उसने अपनी 12 बोर की गन से अपने आप को मारने की कोशिश नहीं की परन्तु इससे पहले वह ट्रिगर दबा पाता सहायक ने उससे छीन लिया पर इस खीचा तानी में बस एक हवाई फायर  हुआ और कमरे की छत पर  छर्रों के निशान बन गए थे. वह  अपने अवसाद और दुःख से उबर ही नहीं पा रहा था. कुछ मित्रों ने आगे बढ़ कर उसका इलाज हॉस्पिटल में कराया और पहले से थोडा ठीक हो गए  मानसिक शांति के लिए वह ऋषिकेश में एक आश्रम में भी जाकर रहा पर वहां भी उस शांति नहीं मिल सकी. दिल्ली में अपने  प्राइवेट घर में अकेले रहते अभी कुछ ही दिन ही  हुए कि  उसे एक ब्रेन स्ट्रोक हुआ और उसे गुरुग्राम के मेदांता हॉस्पिटल में इलाज कराना पड़ा. वहीँ के डॉक्टर ने उससे  फ़ोन नम्बर पूछ कर उसके भाई राजेश को बुलवाया था.

खून तो खून होता है राजेश ने उसकी एक नहीं सुनी और उसे अपने साथ गाँव भारसी में ले आया, यहाँ की आबो हवा और आत्मीय माहौल में उसका स्वास्थ्य काफी ठीक हुआ लगने लगा था. लोगबागों को फुर्सत थी आकर उससे मिलते ही नहीं थे बल्कि आकर वहीँ बैठक जमाने लगे, राकेश का अकेलापन तो समाप्त हो गया था परन्तु दिल इतने झटके खा चुका था, जैसे ही अकेला पड़ता सब कुछ याद आने लगता रात को कई बार नींद में डर जाता, उस का भाई राजेश उसका ध्यान तो करता पर उसके अन्दर क्या भरा पड़ा है, क्या उसे अकेलेपन में चकोटता रहता है, क्या भय हैं, क्या दुश्चिन्ताएं हैं, उस का तो राजेश क्या हकीम लुकमान के पास इलाज नहीं था. उसे दिखने वाली समस्या थी उसकी गिरती हालत और भुलक्कड़पन था, वह भूल जाता था वह कहाँ है, घर वालों को ही भूल जाता, उसे पार्किन्सन की बीमारी तो पहले से ही अब अल्झाइमर्स भी तेज़ी से बढ रहा था. इस घर का एक न एक सदस्य उसका ध्यान रखता था. धीरे धीरे बोलने में दिक्कत होने लगी थी बोलता पर क्या कह रहा है क्या कहना चाहता है उसमें दिक्कत होने लगी. शामली के एक डॉक्टर से ही राजेश सलाह और दवादारू कराते थे जो काफी कुशल डॉक्टर माने जाते थे. जब राकेश बेहतर था उसने अपना बैंक का डेबिट कार्ड दिया हुआ था जिसमें उसकी पेंशन थी, उसी से खर्चे के पैसे राजेश या उसके बेटे  पैसे निकाल कर स्तेमाल करते रहते थे. उसके पास दिल्ली में जो कार थी उसे भी बेच दिया था और बन्दूक को भी बेच दिया था.

   गाँव  में रहते रहते राकेश को रहते तीन साल हो गए उसके बेटे और बीवी ने उसके बारे में पूछने की भी कोई ज़रूरत नहीं समझी थी, गाँव में केवल उसके एक पुराने सहयोगी जिनका गाँव बावली था आते जाते उससे एक दो बार मिलने आये थे, उन्होंने भाई को  अपना नाम सुरेंदर तोमर बताया था. एक बार तो राकेश ने थोड़ी बात समझी शायद उसे पहचाना हो पर दूसरी बार तो कुछ सुन, बताने या पहचानने का सवाल ही नहीं था. बस देख कर थोड़ी देर बैठ चाय पीकर चले गए. भाई राजेश को अपना नंबर दे गए, जाते जाते बता गए की राजेश का भतीजा और राकेश का बेटा अर्जुन अब दिल्ली आ गया है. उसका भी फ़ोन नंबर राजेश को लिख कर दे गए. कह कर गए कि इतने चटक-चतुर स्मार्ट अफसर की यह  हालत व दुर्दशा देख कर वे बहुत दुखी हैं. भाई की बडाई की भाई का ध्यान रख रहा है.

भारसी गाँव के एक नाई का बेटा बीएसफ में हेड कांस्टेबल था जिसे राकेश ने  ही भर्ती किया था, वह जब भी गाँव आता राकेश से मिल कर जाता था. उसने राकेश के साथ रहे कुछ अफसरों को राकेश के गाँव में होने और ख़राब हालत के बारे में बताया. उन्होंने एक बीएसएफ के डॉक्टर एक नर्सिंग बॉय को मिल कर आकर उसके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लाने को कहा. डॉक्टर ने आकर रिपोर्ट दिया कि राकेश की हालत बहुत नाजुक है और गाँव में परिवार तो ध्यान कर रहा है पर उसे एडवांस ट्रीटमेंट की ज़रूरत है. उसके बाद अचानक चीज़े तेज़ी से हुई, वेलफेयर ब्रांच, डायरेक्टर मेडिकल हरकत में आये राकेश के बेटे से संपर्क किया और उसके पिता के बारे में पूछा गया, उसके यह बताने पर कि उनसे सम्बन्ध विच्छेद हो चुका है. सुन के बीएसएफ अधिकारी ने उसे वार्निंग दी कि वे तुरंत अपने पिता राकेश का पूरा ध्यान, इलाज व देखभाल करें वरना उन पर माता पिता और वरिष्ठ  नागरिकों का भरणपोषण अधिनियम 2007  के तहत  सरकार की तरफ से कार्यवाही की जायेगी. बेटा और मां सोते से जागे, बल्कि डरे कोर्ट केस ज्यादा बदनामी  से आदमी ज्यादा डरता है, अभी तक वे सब को राकेश को ही दोषी कहते आये पर अब वे खुद कटघरे में थे, दो दिन बाद अर्जुन गाँव में था, पिता की हालत दयनीय थी केवल वह हड्डी का ढांचा था, उसके बिस्तर से पेशाब बदबू आ रही थी, डायपर पहनाया हुआ था जो भर गया था, राजेश और  बेटे  ने उसको गोदी में उठाया, बाथ रूम ले गए, दोनों ने राकेश को मिलकर साफ़ किया बिस्तर से चादर बदल कर उस पर लिटाया, उसका मुंह खुला था उसे हाथ से बंद किया. आँखे खुली थी पर देख किसी को नहीं रही थी, नीचे पैरों में सिर्फ डायपर पहनाया और चादर से ढक दिया, ऊपर एक आधी बांह का बनियान जो आगे से खुला हुआ था और बटन से बंद किया था ताकि पहनाना आसान रहे. इस बीच राजेश की पत्नी आई, अर्जुन ने उसे नमस्ते की, उसने पुचकारा वह राकेश के गंदे कपडे उठा कर साफ़ करने और धोने के लिए ले गयी.  

थोड़ी देर में अर्जुन ने अपने आने का मकसद  बताया कि वह अपने पिता को दिल्ली ले जाने के लिए आया है. उसी समय गाँव के कुछ  बुज़ुर्ग लोग आये यह सुन कर की राकेश का बेटा आया हुआ है. उन्होंने अर्जुन की बात सुन ली थी.

राजेश ने संजीदा हो आकर कहा,“ बेटा तुमने बहुत देर कर दी, पहले आते तो ठीक रहता, मेरे भाई में अब कुछ बचा ही कहाँ है, मुंह में कुछ नहीं जाता सिर्फ चम्मच से थोडा डाल का पानी, दूध या चाय की दो चार चम्मच डालते हैं, अब इसका समय आ गया है हफ्ते दस दिन से ज्यादा नहीं चलेगा, हमारे शामली वाले डॉक्टर का भी यही अनुमान है.”

अर्जुन ने कहा “अब यहाँ नहीं रखेंगे हॉस्पिटल में इलाज कराएँगे.”

राजेश कुछ उत्तर देता गाँव के एक ठेठ बुजुर्ग ने कहा,“तेरी गाडी में अकेले तो दिल्ली पहुँच लिया तेरा बाप, तेरा चाचा भी  चाहे मान जा हम ही इसे इस हालत में हरगिज नहीं  जान दें. आया नवक ले जान वाला, चार साल ते कहाँ था, तेरे जैसा  निकम्मा बेटा  हमने नहीं देखा ?”

“नहीं मैं आज ही एम्बुलेंस मंगवा लेता हूँ  तब तो ले जान दोगे.”अर्जुन ने कहा.

राजेश ने बीच बचाव करते कहा, “ये हमारे बुजुर्ग हैं इनकी बात मान  लो, देर हो गयी है पहले आते तब और बात थी, दूसरे हम सब तो मिल जुल कर इसका ध्यान उठा लेते हैं तुम और तुम्हारी वाइफ तो नौकरी पर चले जाते हो, तुम्हारी मां सबके सामने कसम खा कर गयी कि इसका मुंह नहीं देखेगी, बताओ कैसे करोगे?”

अर्जुन झुंझला चुका था और थोड़े रोष में कहा, “ हमारा मामला निजी है कि कैसे करेंगे, और में फिर आऊँगा देखता हूँ  कौन रोक लेगा.” और वह चुनौती देकर वापिस चला गया.

अगले शनिवार को फिर आया उस दिन एक एम्बुलेंस थी साथ में थाने से एक पुलिस का दीवान जी तथा दो सिपाही थे, और राकेश को ले गए. कुछ लोगों ने एतराज किया था पर दीवान ने उन्हें समझाया कि ऊपर पुलिस कप्तान से हुकुम आया है. सो बात ख़त्म हुई  इस तरह करके अर्जुन दिल्ली ले गए थे राकेश को.

 कोई तीन हफ्ते हॉस्पिटल में रख कर राकेश की वहां से छुट्टी कर दी कि जो कुछ वे कर सकते थे, सब कर दिया है, काफी मरम्मत कर दी थी. पेट में छेद कर एक नाली  सीधे आमाशय में डाल दी थी कि केवल तरल खाना डाल दिया करे, मूत्राशय या यूरिनरी ब्लैडर में नाली डाल दी और बाहर एक पेशाब के लिए थैली दे दी जिसमें पेशाब निकलता रहेगा, जिसे समय पर फेंकना है, सुबह शाम इंट्रावेनस इंजेक्शन के पोर्ट तथा केथेटर लग गए हाथ और छाती में, ऑक्सीजन को जरूरत पड़ते ही लगाना है  उसका  एक सिलिंडर हमेशा पास रखना है, साथ में एक क्वालिफाइड नर्स दिन रात देखभाल के लिए होनी चाहिए .  इस तरह से आदमी न रह कर राकेश एक वह गिनीपिग बन गया था जो बेहोश है और उसपर प्रयोग हो रहे हैं.

अर्जुन पहले लोक लज्जा से बचा और राकेश के बैंक के पैसे,  प्रॉपर्टी, गाँव की खेती की ज़मीन आदि पर कब्ज़ा रखने के लिए ले तो आया पर एक तरह से फजीयत भी मोल ले ली थी, घर में न तो इतनी जगह थी, न उनके दिलों में राकेश के लिए जगह या सहानुभूति. बस उसने बीएसएफ और बैंकों को सूचित कर दिया, हर साल जाने वाला ‘लिविंग सर्टिफिकेट’ की कारवाही बैंक अधिकारियों को घर बुला कर और ‘थम्ब इम्प्रैशन’ अर्थात अंगूठा लगवा कर पूरी कर दी, इसी प्रकार अपने आप को अपने बर्थ सर्टिफिकेट, मां के तलाक नामे, अन्य एफिडेविट आदि देकर स्वयं को हर तरह से ‘एक मात्र जीवित उत्तराधिकारी’ कोर्ट द्वारा घोषित करवा लिया जिसके लिए कई अधिकारियों और रजिस्ट्रार आदि की जेब गरम करनी पड़ी.

अब तक घर का माहौल  बहुत ख़राब हो चुका था, घर में गंदगी और बदबू भी रहती और न उषा उस की तरफ देखना चाहती थी और अर्जुन की पत्नी तो उस कमरे में झाँकने भी नहीं आती सिर्फ अर्जुन का बेटा अर्थात राकेश का पोता अपने बाबा के लिए थोडा ध्यान करता, नर्स का काम भी देखता, राकेश  के पास आकर उसका हाथ लेकर बैठता था. उसने अर्जुन समेत अपनी मां और दादी को भी काफी सुनाया और यहाँ तक कह दिया ‘सोच लो जैसा व्यवहार उसके बाबा के साथ हो रहा है उनके साथ भी वैसा करेगा.’  वह अपने बाबा की पुरानी फोटो एल्बम व डायरी  निकाल कर ले आया पढता और देखता. यह अकेला संवेदन शील प्राणी घर में था.

समय गुज़र रहा है  राकेश की हालत जस की तस है, वह न मरने में है न जिंदा होने में, शुरू शुरू में तो दो तीन जो उसके साथी थे आये कईयों ने फ़ोन से पूछताछ की पर अब न कोई मिलने आत्ता न कोई पूछता, गाँव से कभी उसके भाई का फ़ोन आता और पूछता है, “ राकेश भाई, अभी भी जीवे है ?” इनके बताने में आगे कुछ नहीं पूछता.

इस हालत में भी राकेश किसी पर कम से कम आर्थिक बोझ नहीं है. एक लाख से अधिक पेंशन आ रही है. पर नर्स और पोते के अलावा शायद सभी चाहते हैं की वह और ऐसे न रहे. नर्स की नौकरी तब तक है जब तक उसकी साँस चल रही है. कहानी तो ख़त्म हो गयी पर उसका जीव आत्मा अभी भी यमराज के दूतों का इंतज़ार ही कर रहा है.