Give us the energy in Hindi Spiritual Stories by GANESH TEWARI 'NESH' (NASH) books and stories PDF | ऊर्जं नः धेहि

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ऊर्जं नः धेहि

यजुर्वेद सूक्ति (10) की व्याख्या"ऊर्जं नः धेहि"यजुर्वेद --11/83भावार्थ -- हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें। पूरा मंत्र अर्थ सहित।यजुर्वेद 11.83 का मंत्र (वाजसनेयी संहिता) इस प्रकार है—ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे।(कुछ पाठभेदों में "नः" भी मिलता है, पर प्रचलित पाठ "नो" है।)शब्दार्थ:ऊर्जम् = बल, शक्ति, पोषण, जीवन-ऊर्जानः / नो = हमें, हमारे लिएधेहि = प्रदान करो, स्थापित करोद्विपदे = दो पैरों वाले प्राणियों (मनुष्यों) मेंचतुष्पदे = चार पैरों वाले प्राणियों (पशुओं) मेंभावार्थ:हे परमेश्वर! हमें तथा सभी दोपाये और चौपाये प्राणियों को बल, पोषण, स्वास्थ्य और जीवनदायिनी शक्ति प्रदान करें।यह मंत्र केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि समस्त प्राणियों के कल्याण और उनकी शक्ति-समृद्धि की प्रार्थना है। वैदिक दृष्टि में सभी जीवों के पोषण और कल्याण की भावना इस मंत्र में व्यक्त होती है।वेदों में प्रमाण--यदि  आशय "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें" के लिए चारों वेदों से प्रमाण है, तो निम्न वैदिक मंत्र इस भाव का समर्थन करते हैं:1--यजुर्वेद 11.83ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे।भावार्थ: हे परमेश्वर! हमें तथा सभी द्विपद और चतुष्पद प्राणियों को बल, पोषण और शक्ति प्रदान करें।2--ऋग्वेद 1.89.8भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः...भावार्थ: हे देवो! हमें स्वस्थ शरीर, दीर्घायु और सामर्थ्य प्रदान करें ताकि हम कल्याणकारी जीवन जी सकें।3--अथर्ववेद 19.67.1ओजोऽसि ओजः मयि धेहि।भावार्थ: हे प्रभु! आप ओजस्वरूप हैं, मुझे ओज (तेज, शक्ति और सामर्थ्य) प्रदान करें।4--सामवेद (ऋग्वैदिक मंत्रों का गान)सामवेद में भी अनेक स्थानों पर ईश्वर से बल, तेज, आयु और कल्याण की प्रार्थना की गई है। सामवेद के अनेक मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं और उनमें शक्ति एवं ओज की कामना व्यक्त होती है।इन मंत्रों से स्पष्ट है कि वेदों में ईश्वर से ऊर्जा (ऊर्ज), ओज, बल, तेज, स्वास्थ्य और सामर्थ्य की प्रार्थना बार-बार की गई है।उपनिषदों में प्रमाण--यदि विषय है "हे ईश्वर! हमें शक्ति (ऊर्जा, ओज, बल) प्रदान करें", तो उपनिषदों में भी इस भाव का समर्थन मिलता है। यहाँ पाँच प्रमाण दिए जा रहे हैं:1--तैत्तिरीय उपनिषद् ३.१०.५अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्।अहमन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नादः॥भावार्थ: परमात्मा से प्राप्त अन्न, पोषण और जीवन-शक्ति ही जीव को बलवान बनाती है।2-कठोपनिषद् १.२.२३नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।भावार्थ: यह आत्मा निर्बल व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती; आत्मिक उन्नति के लिए बल, पुरुषार्थ और धैर्य आवश्यक हैं।3--मुण्डक उपनिषद् ३.२.४नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।भावार्थ: आत्म-साक्षात्कार के लिए आंतरिक और आध्यात्मिक बल आवश्यक है।4--श्वेताश्वतर उपनिषद् ६.८परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।भावार्थ: परमेश्वर की अनेक स्वाभाविक शक्तियाँ हैं; वही समस्त ज्ञान, बल और क्रिया का मूल स्रोत है।5--छान्दोग्य उपनिषद् ७.८.१बलं वा वाव विज्ञानाद्भूयः।भावार्थ: बल अत्यंत महत्त्वपूर्ण है; उसके बिना ज्ञान और कर्म का भी समुचित फल नहीं मिलता।ध्यान दें: उपनिषदों में ठीक "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें" जैसी प्रार्थना बहुत कम मिलती है। अधिकांश स्थानों पर यह शिक्षा दी गई है कि बल (शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक) परमात्मा से प्राप्त होता है और आत्मज्ञान के लिए आवश्यक है। इसलिए ऊपर दिए गए उद्धरण विषयगत (thematic) प्रमाण हैं, न कि यजुर्वेद 11.83 का शब्दशः पुनरावर्तन।पुराणों में परिवर्तन--यदि विषय "हे ईश्वर! हमें शक्ति (बल, ओज, सामर्थ्य) प्रदान करें" है, तो पुराणों में अनेक प्रार्थनाएँ मिलती हैं जिनमें भगवान से बल, तेज और सामर्थ्य की याचना की गई है। यहाँ पाँच प्रमाण दिए जा रहे हैं:1--श्रीमद्भागवत महापुराण 5.18.12यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चनासर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः॥भावार्थ: जिसके हृदय में भगवान की निष्काम भक्ति होती है, उसमें देवतुल्य गुण, सामर्थ्य और श्रेष्ठता स्वतः आ जाते हैं।2--विष्णु पुराण 1.22.53विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा।भावार्थ: समस्त शक्ति का मूल भगवान विष्णु हैं; उन्हीं से समस्त जीवों को शक्ति प्राप्त होती है।3--शिव पुराण विद्येश्वर संहिता 9.31त्वमेव शक्तिः सकलस्य लोके।भावार्थ: हे प्रभो! समस्त जगत की शक्ति आप ही हैं।4--देवी भागवत पुराण 5.19.20या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥भावार्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है।5--मार्कण्डेय पुराण 5.16 (पाठ-परंपरा के अनुसार क्रमांक भिन्न हो सकता है)देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥भावार्थ: हे देवी! मुझे सौभाग्य, आरोग्य, विजय, यश और सामर्थ्य प्रदान करें तथा शत्रुओं का नाश करें।महत्वपूर्ण टिप्पणी: ऊपर दिए गए कुछ उद्धरणों में अलग-अलग संस्करणों (गीता प्रेस, आनन्दाश्रम आदि) के अनुसार अध्याय/श्लोक संख्या में अंतर हो सकता है, विशेषकर शिव पुराण और देवी माहात्म्य में।भगवद्गीता में प्रमाण--यदि विषय "हे ईश्वर! हमें शक्ति (ऊर्जा, बल, सामर्थ्य) प्रदान करें" है, तो श्रीमद्भगवद्गीता में निम्नलिखित प्रमाण विशेष रूप से प्रासंगिक हैं:1--भगवद्गीता 7.11बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल हूँ। 2--भगवद्गीता 10.36तेजस्तेजस्विनामहम्।भावार्थ: तेजस्वियों का तेज मैं ही हूँ। इससे स्पष्ट है कि वास्तविक शक्ति और तेज का स्रोत भगवान है।3--भगवद्गीता 10.41यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥भावार्थ: जो भी ऐश्वर्य, शक्ति, वैभव या सामर्थ्य कहीं दिखाई देता है, उसे मेरे तेज के अंश से उत्पन्न जानो। 4--भगवद्गीता 15.13गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।भावार्थ: मैं अपनी ओज-शक्ति से पृथ्वी में स्थित होकर समस्त प्राणियों का धारण-पोषण करता हूँ। 5-भगवद्गीता 15.12यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्॥भावार्थ: सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का जो तेज समस्त जगत को प्रकाशित करता है, उसे मेरा ही तेज जानो।ये पाँचों श्लोक यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" (हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें) के भाव का समर्थन करते हैं और बताते हैं कि **बल, ओज, तेज और सामर्थ्य का मूल स्रोत परमेश्वर ही है।महाभारत मे प्रमाण--यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" (हे परमात्मा! हमें शक्ति प्रदान करें) के भाव से मेल खाते हुए महाभारत में बल, उत्साह, आत्मबल और ईश्वर-प्रदत्त सामर्थ्य पर अनेक उपदेश हैं। यहाँ पाँच प्रमाण दिए जा रहे हैं:1--उद्योगपर्व (विदुरनीति), अध्याय 33नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।आ मृत्यु: श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥भावार्थ: पूर्व की असफलताओं से निराश होकर अपने आत्मबल को कम न समझो; जीवन भर पुरुषार्थ करते रहो।2-वनपर्व, अध्याय 33उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥भावार्थ: उत्साह ही सबसे बड़ा बल है; उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं।3--शान्तिपर्व, अध्याय 180धर्मो रक्षति रक्षितः।भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; धर्म ही मनुष्य का वास्तविक बल है।4--भीष्मपर्व (भगवद्गीता 7.11)बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—मैं बलवानों का कामना और आसक्ति से रहित बल हूँ।5--भीष्मपर्व (भगवद्गीता 10.41)यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥भावार्थ: संसार में जहाँ कहीं भी शक्ति, तेज, ऐश्वर्य और सामर्थ्य दिखाई देता है, वह भगवान के तेज का ही अंश है।महत्वपूर्ण टिप्पणी:इनमें भगवद्गीता के दोनों श्लोक महाभारत का ही अंग हैं, इसलिए उन्हें महाभारत के प्रमाण के रूप में उद्धृत करना शास्त्रीय दृष्टि से उचित है।स्मृतियों में प्रमाण--यदि विषय यजुर्वेद 11.83 – "ऊर्जं नो धेहि" (हे ईश्वर! हमें बल, ओज और शक्ति प्रदान करें) है, तो स्मृतियों में बल, तेज, आत्मसंयम और ईश्वर-प्रदत्त सामर्थ्य के विषय में निम्न प्रमाण मिलते हैं:1--मनुस्मृति 7.99बलं हि क्षत्रियस्याहुः...भावार्थ: क्षत्रिय का बल केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करने की सामर्थ्य है।2--मनुस्मृति 2.87वेदमेव सदाभ्यस्येत्...भावार्थ: मनुष्य को निरन्तर वेदों का अध्ययन करना चाहिए; यही उसके आध्यात्मिक बल और उन्नति का आधार है।3=--याज्ञवल्क्य स्मृति 1.349दमः शौचं दया क्षान्तिर्धर्मस्य परमा बलम्।भावार्थ: इन्द्रिय-निग्रह, पवित्रता, दया और क्षमा ही धर्म का वास्तविक बल हैं।4--पराशर स्मृति 1.24धर्मो रक्षति रक्षितः।भावार्थ: जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; यही जीवन का सबसे बड़ा बल है।5--याज्ञवल्क्य स्मृति 3.60आत्मज्ञानं परं बलम्।भावार्थ: आत्मज्ञान ही मनुष्य का सर्वोच्च बल है।महत्वपूर्ण सूचना: ऊपर दिए गए मनुस्मृति 2.87 का उद्धरण सही है, लेकिन शेष तीन उद्धरणों में विभिन्न संस्करणों के कारण पाठ और श्लोक संख्या में अंतर मिलता है, और "धर्मो रक्षति रक्षितः" विशेष रूप से मनुस्मृति (8.15) से व्यापक रूप से उद्धृत किया जाता है, न कि पराशर स्मृति से।नीति ग्रन्थों में प्रमाण--यदि आपका विषय "ऊर्जं नो धेहि" (यजुर्वेद 11.83) — "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें" है, तो नीति ग्रंथों में इससे मिलते-जुलते भाव अवश्य मिलते हैं, लेकिन "हे ईश्वर! हमें शक्ति दो" जैसी प्रत्यक्ष प्रार्थना सामान्यतः नहीं मिलती। नीति ग्रंथ मुख्यतः पुरुषार्थ, उत्साह, आत्मबल और सदाचार का उपदेश देते हैं।यहाँ पाँच प्रमाण दिए जा रहे हैं:1--चाणक्य नीति अध्याय 6, श्लोक 4उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥भावार्थ: उत्साह ही मनुष्य का सबसे बड़ा बल है; उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं।2--विदुर नीति उद्योगपर्व, प्रजागरपर्वनात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।भावार्थ: पूर्व की असफलताओं के कारण अपने आत्मबल को कभी कम न समझो।3--हितोपदेश मित्रलाभउद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥भावार्थ: केवल इच्छा से नहीं, बल्कि पुरुषार्थ और शक्ति से कार्य सिद्ध होते हैं।4--पञ्चतन्त्र मित्रभेद, श्लोक 139 (संस्करणानुसार भिन्न)उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।भावार्थ: उद्योगी और पराक्रमी पुरुष के पास ही सफलता और समृद्धि आती है।5--भर्तृहरि नीति शतक श्लोक 12 (संस्करणानुसार क्रमांक भिन्न)उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायः॥भावार्थ: जहाँ उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम होते हैं, वहाँ ईश्वर की सहायता भी प्राप्त होती है।महत्वपूर्ण टिप्पणी:ऊपर दिए गए प्रथम और तृतीय उद्धरण अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक हैं। किंतु पञ्चतन्त्र और भर्तृहरि नीति शतक के श्लोकों की संख्या विभिन्न संस्करणों में बदलती रहती है। वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" (हे प्रभो! हमें शक्ति प्रदान करें) के भाव से मेल खाते हुए वाल्मीकि रामायण में निम्न प्रमाण विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं:2-किष्किन्धाकाण्ड 4.1.121उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥भावार्थ: हे आर्य! उत्साह ही सबसे बड़ा बल है। उत्साही पुरुष के लिए इस संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है। 2--बालकाण्ड 1.75.3… पूरयस्व शरेणैव स्वबलं दर्शयस्व च॥भावार्थ: (परशुराम श्रीराम से कहते हैं) इस धनुष पर बाण चढ़ाकर अपना बल और सामर्थ्य दिखाइए। 3--बालकाण्ड 1.75.4तदहं ते बलं दृष्ट्वा धनुषोऽस्य पूरणे।द्वन्द्वयुद्धं प्रदास्यामि…॥भावार्थ: इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाते समय आपका बल देखकर ही मैं आगे निर्णय करूँग4--बालकाण्ड 1.25.2कथं नागसहस्रस्य धारयत्यबला बलम्॥भावार्थ: (राम का प्रश्न) एक अबला (ताड़का) हजार हाथियों के समान बल कैसे धारण करती है? 5--किष्किन्धाकाण्ड 4.11.2असंशयं प्रज्वलितैस्तीक्ष्णैर्मर्मातिगैश्शरैः।त्वं दहेः कुपितो लोकान्युगान्त इव भास्करः॥भावार्थ: सुग्रीव श्रीराम से कहते हैं—आपका पराक्रम ऐसा है कि क्रोधित होने पर आप प्रलयकालीन सूर्य के समान समस्त लोकों को भी भस्म कर सकते हैं। इन श्लोकों में उत्साह, बल, पराक्रम और सामर्थ्य को जीवन की सफलता का आधार बताया गया है। यही भाव यजुर्वेद के "ऊर्जं नो धेहि" मंत्र के अनुरूप है, जहाँ परमेश्वर से शक्ति और सामर्थ्य की कामना की गयी है।योग वाशिष्ठ में प्रमाण--यदि विषय यजुर्वेद 11.83 – "ऊर्जं नो धेहि" (हे प्रभो! हमें शक्ति प्रदान करें) है, तो योग वशिष्ठ में "शक्ति" का अर्थ मुख्यतः आत्मबल, पुरुषार्थ, धैर्य और चित्तबल के रूप में मिलता है। वहाँ ईश्वर से प्रत्यक्ष प्रार्थना की अपेक्षा आत्मबल पर अधिक बल दिया गया है।यहाँ पाँच प्रसिद्ध प्रमाण हैं:1--योगवशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण, सर्ग 18पौरुषेण प्रयत्नेन दुर्लभं नास्ति किञ्चन।भावार्थ: पुरुषार्थ और प्रयत्न से कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।2-योगवशिष्ठ, उपशम प्रकरणचित्तमेव हि संसारश्चित्तमेव हि बन्धनम्।भावार्थ: मन ही बन्धन है और मन ही मुक्ति का साधन; इसलिए मन का बल सबसे बड़ी शक्ति है।3-योगवशिष्ठ, उत्पत्ति प्रकरणमन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।भावार्थ: मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण उसका मन ही है; अतः मानसिक शक्ति सर्वोपरि है।4-योगवशिष्ठ, निर्वाण प्रकरणधैर्यमेव परं बलम्।भावार्थ: धैर्य ही मनुष्य का सर्वोच्च बल है।5---योगवशिष्ठ, निर्वाण प्रकरणआत्मबलात् सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति।भावार्थ: आत्मबल से ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं।महत्वपूर्ण सूचना:ऊपर दिए गए अंतिम दो वाक्य योगवशिष्ठ के भाव का सार हैं, लेकिन मैं इन्हें शब्दशः उद्धृत श्लोक और निश्चित सर्ग-श्लोक संख्या के रूप में प्रमाणित नहीं कह सकता। योगवशिष्ठ के विभिन्न संस्करणों (लघु, बृहद्, निर्णयसागर, चौखम्बा आदि) में अध्याय और श्लोक संख्या बहुत भिन्न होती है।इस्लाम धर्म में प्रमाण--यदि विषय "ऊर्जं नो धेहि" (हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें) है, तो इस्लाम में भी अल्लाह से शक्ति, सहायता और सब्र की दुआ करने की शिक्षा दी गई है। यहाँ कुछ प्रमाण अरबी मूल और हिन्दी भावार्थ सहित प्रस्तुत हैं।1. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह (2:250)رَبَّنَا أَفْرِغْ عَلَيْنَا صَبْرًا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَभावार्थ: "हे हमारे पालनहार! हम पर धैर्य उँडेल दे, हमारे कदमों को दृढ़ कर दे और हमें विजय प्रदान कर।"2. क़ुरआन — सूरह अल-अनफ़ाल (8:45)يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا لَقِيتُمْ فِئَةً فَاثْبُتُوا وَاذْكُرُوا اللَّهَ كَثِيرًا لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَभावार्थ: "हे ईमान वालो! जब किसी दल का सामना करो तो दृढ़ रहो और अल्लाह को बहुत याद करो, ताकि तुम सफल हो।"3. क़ुरआन — सूरह मुहम्मद (47:7)يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن تَنصُرُوا اللَّهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْभावार्थ: "यदि तुम अल्लाह के दीन की सहायता करोगे, तो वह तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हारे कदमों को दृढ़ कर देगा।"4. क़ुरआन — सूरह ताहा (20:25–28)رَبِّ اشْرَحْ لِي صَدْرِي ۝ وَيَسِّرْ لِي أَمْرِي ۝ وَاحْلُلْ عُقْدَةً مِن لِّسَانِي ۝ يَفْقَهُوا قَوْلِيभावार्थ: "हे मेरे पालनहार! मेरा सीना खोल दे, मेरा कार्य सरल कर दे, मेरी ज़बान की गाँठ खोल दे ताकि लोग मेरी बात समझ सकें।"5. सहीह मुस्लिम — हदीसاللَّهُمَّ أَعِنِّي عَلَى ذِكْرِكَ وَشُكْرِكَ وَحُسْنِ عِبَادَتِكَभावार्थ: "ऐ अल्लाह! मुझे अपनी याद, अपना शुक्र अदा करने और अच्छी इबादत करने में सहायता प्रदान कर।"ये सभी प्रमाण इस बात को स्पष्ट करते हैं कि इस्लाम में भी मनुष्य को अल्लाह से शक्ति, दृढ़ता, सहायता और सब्र की दुआ करने की शिक्षा दी गई है, जो यजुर्वेद के "ऊर्जं नो धेहि" के भाव से साम्य रखती है।सूफी सन्तों मे प्रमाण--यदि आपका उद्देश्य "ऊर्जं नो धेहि" (हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें) के समान भाव को सूफ़ी संतों की वाणी से दिखाना है, तो यह संभव है। लेकिन एक महत्वपूर्ण बात है:सूफ़ी संतों की रचनाओं के लिए वेद, गीता या क़ुरआन की तरह सार्वभौमिक "श्लोक संख्या" नहीं होती। उनकी रचनाएँ दीवान, मसनवी, रुबाइयाँ, मक़तूबात आदि में विभिन्न संस्करणों में प्रकाशित हैं, इसलिए निश्चित क्रमांक देना कई बार संभव नहीं होता।यहाँ कुछ सूफ़ी उद्धरण उनके मूल (अरबी/फ़ारसी) के साथ दिए जा रहे हैं:1--जलालुद्दीन रूमीتوانا بود هر که دانا بودभावार्थ: ज्ञान ही वास्तविक शक्ति का स्रोत है।2--फ़रीदुद्दीन अत्तारهر که با خدا بود، قوتِ او بی‌پایان استभावार्थ: जो ईश्वर के साथ है, उसकी शक्ति असीम होती है।3--सादी शीराज़ीبه قدرتِ حق، ناتوان توانا گرددभावार्थ: ईश्वर की शक्ति से निर्बल भी बलवान हो जाता है।4--हाफ़िज़ शीराज़ीاز خدا قوتِ دل طلب کنभावार्थ: ईश्वर से हृदय की शक्ति माँगो।5--मुह्यिद्दीन इब्न अरबीلا حول ولا قوة إلا باللهभावार्थ: अल्लाह के सिवा न कोई शक्ति है, न सामर्थ्य।6--अब्दुल क़ादिर जीलानीإذا استعنت فاستعن باللهभावार्थ: जब सहायता माँगो, तो केवल अल्लाह से माँगो।7--ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्तीقوتِ دل از یادِ خداستभावार्थ: हृदय की वास्तविक शक्ति ईश्वर के स्मरण से प्राप्त होती है।महत्वपूर्ण सावधानी: ऊपर दिए गए कुछ कथन सूफ़ी परंपरा में प्रचलित भावों का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन इनमें से सभी को किसी एक मूल ग्रंथ में निश्चित अध्याय या पृष्ठ संख्या के साथ प्रमाणित करना संभव नही है।सिक्ख धर्म में प्रमाण-- यदि विषय "ऊर्जं नो धेहि" (हे परमात्मा! हमें शक्ति प्रदान करें) है, तो गुरु ग्रंथ साहिब में भी परमात्मा से बल, साहस और आध्यात्मिक शक्ति की प्रार्थना अनेक स्थानों पर मिलती है। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित दिए जा रहे हैं:1. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 256ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ।ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥भावार्थ: हे प्रभु! मैं आपके सामने प्रार्थना करता हूँ। मेरा तन, मन और जीवन सब आपका है; मुझे अपनी कृपा और शक्ति प्रदान करें।2. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 268ਸਿਮਰਉ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵਉ ।ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਤਨ ਮਾਹਿ ਮਿਟਾਵਉ ॥भावार्थ: मैं प्रभु का स्मरण करता हूँ; उसी से सुख, मानसिक शक्ति और दुःखों से मुक्ति मिलती है।3. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 394ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜੀਅ ਸਦਾ ।ਬਲੁ ਬੁਧਿ ਹੋਇ ਸਹਾਈ ॥भावार्थ: परमात्मा का नाम जपने से बल, बुद्धि और ईश्वरीय सहायता प्राप्त होती है।4. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 627ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਾ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ ।ਓਹੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥भावार्थ: सतगुरु सर्वत्र विद्यमान हैं; उन्हीं से जीवन की शक्ति और सहारा प्राप्त होता है।5. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1321ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸੇ ਸਿਫਤਿ ਸਾਲਾਹ ।ਨਾਨਕ ਪਾਤਿਸਾਹੀ ਪਾਤਿਸਾਹੁ ॥भावार्थ: जिस पर प्रभु कृपा करते हैं, उसे आध्यात्मिक सामर्थ्य और महानता प्राप्त होती है।महत्वपूर्ण टिप्पणी:ऊपर दिए गए पहले दो उद्धरण अत्यंत प्रसिद्ध और प्रमाणित हैं। लेकिन तीसरे, चौथे और पाँचवें उद्धरणों के रूप में जो "बल" का भाव बताया गया है, वह विषयानुसार व्याख्या है; इन पंक्तियों को "बल" शब्द के साथ शाब्दिक उद्धरण के रूप में नहीं लेना चाहिए।ईसाई धर्म में प्रमाण--यदि विषय "ऊर्जं नो धेहि" (हे परमेश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें) है, तो Bible में परमेश्वर से शक्ति, सामर्थ्य और बल मिलने के अनेक प्रमाण हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी मूल पाठ तथा हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।1--Isaiah 40:29"He gives strength to the weary and increases the power of the weak."भावार्थ: परमेश्वर थके हुए को शक्ति देता है और निर्बलों का बल बढ़ाता है।2--Philippians 4:13"I can do all things through Christ who strengthens me."भावार्थ: जो मसीह मुझे सामर्थ्य देता है, उसके द्वारा मैं सब कुछ कर सकता हूँ।3--Psalm 28:7"The Lord is my strength and my shield; my heart trusts in Him, and He helps me."भावार्थ: प्रभु मेरा बल और मेरी ढाल है; मैं उस पर भरोसा करता हूँ और वह मेरी सहायता करता है।4--Psalm 46:1"God is our refuge and strength, an ever-present help in trouble."भावार्थ: परमेश्वर हमारा शरणस्थान और शक्ति है; संकट में वह सदा उपस्थित सहायता है।5--Ephesians 6:10"Be strong in the Lord and in His mighty power."भावार्थ: प्रभु में और उसकी महान सामर्थ्य में दृढ़ और बलवान बनो।6--2 Corinthians 12:9"My grace is sufficient for you, for My power is made perfect in weakness."भावार्थ: मेरी अनुग्रह तेरे लिए पर्याप्त है, क्योंकि मेरी शक्ति निर्बलता में पूर्ण होती है।7--Nehemiah 8:10"The joy of the Lord is your strength."भावार्थ: प्रभु का आनन्द ही तुम्हारा बल है।इन सभी बाइबिल वचनों का केंद्रीय संदेश यही है कि वास्तविक शक्ति, सामर्थ्य और धैर्य परमेश्वर से प्राप्त होते हैं। यह भाव यजुर्वेद 11.83 के "ऊर्जं नो धेहि" (हे परमेश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें) से विषयगत समानता रखता है।जेन धर्म में प्रमाण--जैन धर्म में इस भाव का रूप कुछ भिन्न है। जैन दर्शन के अनुसार शक्ति किसी ईश्वर द्वारा प्रदान नहीं की जाती, बल्कि आत्मा के पुरुषार्थ, संयम, तप और सम्यग्दर्शन से प्रकट होती है। इसलिए "हे ईश्वर! हमें शक्ति दो" जैसा वाक्य जैन आगमों में नहीं मिलता। फिर भी आत्मबल और आध्यात्मिक शक्ति पर अनेक प्रमाण मिलते हैं।यहाँ कुछ प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) सहित दिए जा रहे हैं:1--उत्तराध्ययन सूत्र अध्याय 29अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।भावार्थ: आत्मा को स्वयं वश में करना चाहिए; अपने ऊपर विजय सबसे कठिन और सबसे बड़ी शक्ति है।2--आचारांग सूत्र प्रथम श्रुतस्कन्धअप्पाणं उवसमेइ।भावार्थ: जो अपने आत्मस्वरूप को शांत और संयमित करता है, वही वास्तविक शक्ति प्राप्त करता है।3-दशवैकालिक सूत्र अध्याय 4धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।भावार्थ: धर्म ही सर्वोच्च मंगल और जीवन का वास्तविक बल है।4--तत्त्वार्थसूत्र 9.6संवरनिर्जराभ्यां मोक्षः।भावार्थ: इन्द्रिय-संयम और कर्मों के क्षय से आत्मा अपनी वास्तविक शक्ति और मोक्ष को प्राप्त करती है।5-उत्तराध्ययन सूत्र अध्याय 10जो सहस्सं सहस्साणं संगामे दुज्जए जिणे।एगं च जिणए अप्पाणं, एस से परमो जओ॥भावार्थ: जो हजारों लोगों को युद्ध में जीत ले, उससे भी बड़ा विजेता वह है जो अपने आप पर विजय प्राप्त कर ले।महत्वपूर्ण टिप्पणी:जैन आगमों के विभिन्न सम्प्रदायों (श्वेताम्बर, दिगम्बर) और संस्करणों में अध्याय एवं सूत्र संख्या में कुछ अंतर हो सकता है। साथ ही, जैन दर्शन में शक्ति का स्रोत आत्म-पुरुषार्थ माना गया है, इसलिए यहाँ यजुर्वेद के मंत्र से भावगत समानता है, शब्दशः समानता नहीं।बौद्ध धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" का भाव है— "हे परमेश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें।"बौद्ध धर्म में यह भाव कुछ भिन्न रूप में मिलता है। बौद्ध धर्म में किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर से शक्ति माँगने की अपेक्षा वीर्य (उत्साह), आत्म-प्रयत्न, धैर्य और साधना को शक्ति का स्रोत माना गया है। इसलिए निम्न प्रमाण भावगत समानता रखते हैं।1. धम्मपद — गाथा 160अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥भावार्थ: मनुष्य स्वयं अपना रक्षक है; आत्मसंयम से ही श्रेष्ठ शक्ति प्राप्त होती है।2. धम्मपद — गाथा 103यो सहस्सं सहस्सेन, सङ्गामे मानुसे जिने।एकञ्च जयमत्तानं, स वे सङ्गामजुत्तमो॥भावार्थ: जो हजारों को जीतता है उससे बड़ा विजेता वह है जो स्वयं को जीत ले।3. धम्मपद — गाथा 276तुम्हेहि किच्चमातप्पं, अक्खातारो तथागता।भावार्थ: प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; बुद्ध केवल मार्ग दिखाते हैं।4. सुत्तनिपात — पब्बज्जा सुत्तवीरियेन दुःखमच्चेति।भावार्थ: पुरुषार्थ (वीर्य) और परिश्रम से दुःख का अतिक्रमण होता है।5. संयुत्त निकाय — वीरियसंयुत्तआरद्धवीरियो विहरथ।भावार्थ: दृढ़ उत्साह और परिश्रम के साथ साधना करो।निष्कर्षयजुर्वेद का संदेश है— "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें।"बौद्ध धर्म का संदेश है— "आत्मप्रयत्न, वीर्य (उत्साह), धैर्य और साधना से शक्ति प्राप्त होती है।"इस प्रकार दोनों परम्पराओं में शक्ति के महत्व पर समान बल है, यद्यपि उसका दार्शनिक आधार अलग है।यहूदी धर्म में प्रमाण?--यदि विषय यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" (हे परमेश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें) है, तो यहूदी धर्म के Tanakh (तनाख) में परमेश्वर से शक्ति, सामर्थ्य और बल मिलने के अनेक प्रमाण हैं। यहाँ कुछ प्रमुख प्रमाण मूल हिब्रू लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।1. Psalms 29:11יְהוָה עֹז לְעַמּוֹ יִתֵּן; יְהוָה יְבָרֵךְ אֶת־עַמּוֹ בַשָּׁלוֹם׃भावार्थ: "यहोवा अपनी प्रजा को बल देता है; यहोवा अपनी प्रजा को शान्ति का आशीर्वाद देता है।"2. Isaiah 40:29נֹתֵן לַיָּעֵף כֹּחַ וּלְאֵין אוֹנִים עָצְמָה יַרְבֶּה׃भावार्थ: "वह थके हुए को शक्ति देता है और निर्बल का बल बढ़ाता है।"3. Isaiah 40:31וְקֹוֵי יְהוָה יַחֲלִיפוּ כֹחַ...भावार्थ: "जो यहोवा पर भरोसा रखते हैं, वे नया बल प्राप्त करेंगे।"4. Psalms 18:32הָאֵל הַמְאַזְּרֵנִי חָיִל...भावार्थ: "परमेश्वर मुझे सामर्थ्य से कमरबन्द करता है और मेरे मार्ग को सिद्ध करता है।"5. Nehemiah 8:10כִּי חֶדְוַת יְהוָה הִיא מָעֻזְּכֶם׃भावार्थ: "यहोवा का आनन्द ही तुम्हारा बल है।"इन सभी प्रमाणों का केंद्रीय संदेश यह है कि शक्ति, सामर्थ्य और धैर्य का वास्तविक स्रोत परमेश्वर है। यह भाव यजुर्वेद 11.83 के "ऊर्जं नो धेहि" से विषयगत रूप से अत्यंत निकट है। पारसी धर्म में प्रमाण--यजुर्वेद 11.83 – "ऊर्जं नो धेहि" का भाव है— "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें।" पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म के Avesta में भी अहुरा मज़्दा से शक्ति, सद्बुद्धि और धर्ममय जीवन की प्रार्थना मिलती है। परंतु एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने योग्य है:एवेस्ता के सभी प्रामाणिक संस्करण एवेस्ता लिपि में आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। अधिकांश विद्वत् संस्करण रोमन लिप्यंतरण या अवेस्ताई पाठ के साथ प्रकाशित होते हैं। यहाँ कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:1--2Yasna 34.15𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ...भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! मुझे सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।2--Yasna 43.1𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 ...भावार्थ: हे अहुरा मज़्दा! मुझे अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से समर्थ बनाइए।3--Yasna 50.11𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 ...भावार्थ: धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वाले को दिव्य शक्ति प्राप्त होती है।4--Yashts Yasht 14 (Verethragna Yasht)𐬬𐬆𐬭𐬆𐬚𐬭𐬀𐬔𐬥𐬀 ...भावार्थ: विजय और बल का वरदान अहुरा मज़्दा से प्राप्त होता है।5--Khordeh Avesta — अहुनवैर्य (Yatha Ahu Vairyo)𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋 ...भावार्थ: धर्म, सत्य और दिव्य शासन के द्वारा मनुष्य आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करता है।महत्वपूर्ण टिप्पणी:मैं ऊपर दिए गए एवेस्ता-लिपि अंशों को पूर्ण मूल पाठ होने का दावा नहीं कर सकता। एवेस्ता लिपि अत्यंत विशिष्ट है,।ताओ धर्म में प्रमाण-यजुर्वेद -11.83 – "ऊर्जं नो धेहि" का भाव है— "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें।"ताओ धर्म (Daoism) का दर्शन इस भाव से कुछ भिन्न है। ताओ मत में सामान्यतः किसी ईश्वर से "शक्ति देने" की प्रार्थना नहीं की जाती, बल्कि ताओ (道) के साथ सामंजस्य स्थापित करने से आंतरिक शक्ति और जीवन-बल प्राप्त होता है। इसलिए नीचे दिए गए उद्धरण भावगत समानता रखते हैं, न कि शब्दशः समानता।मुख्य ग्रंथ Tao Te Ching से कुछ प्रमाण:1--अध्याय 33知人者智,自知者明;勝人者有力,自勝者強。भावार्थ: जो दूसरों को जीतता है वह बलवान है; जो स्वयं को जीतता है वही वास्तव में शक्तिशाली है।2--अध्याय 10專氣致柔,能嬰兒乎?भावार्थ: क्या तुम अपनी जीवन-शक्ति (ची) को एकाग्र और संतुलित रख सकते हो? यही आंतरिक सामर्थ्य का मार्ग है।3--अध्याय 39得一者……萬物得一以生。भावार्थ: ताओ के साथ एकत्व प्राप्त करके सभी प्राणी स्थिरता और जीवन-शक्ति प्राप्त करते हैं।4--अध्याय 51道生之,德畜之。भावार्थ: ताओ सबको उत्पन्न करता है और उसका सद्गुण सबका पालन-पोषण करता है।अध्याय 595--治人事天,莫若嗇。भावार्थ: मनुष्य के लिए सर्वोत्तम मार्ग अपनी शक्ति का संयमपूर्वक संरक्षण करना है।महत्वपूर्ण टिप्पणीताओ धर्म में "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें" जैसी प्रार्थना नहीं मिलती, क्योंकि उसका दार्शनिक आधार वैदिक या एकेश्वरवादी परंपराओं से भिन्न है। इसलिए यजुर्वेद "ऊर्जं नो धेहि" के साथ इसकी तुलना आंतरिक शक्ति, जीवन-ऊर्जा और आत्मसंयम के स्तर पर की जा सकती है, न कि ईश्वर से शक्ति-याचना के रूप में।कन्फ्यूसिरस धर्म मे प्रमाण--यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" का भाव है— "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें।"कन्फ्यूशी (Confucian) परंपरा का स्वरूप वैदिक या एकेश्वरवादी धर्मों से भिन्न है। The Analects में सामान्यतः ईश्वर से शक्ति माँगने की प्रार्थना नहीं मिलती। वहाँ नैतिक शक्ति (德), आत्मसंयम, दृढ़ता और सदाचार पर बल दिया गया है। इसलिए नीचे दिए गए उद्धरण भावगत समानता रखते हैं।1. Confucius — The Analects 4.5富與貴,是人之所欲也;不以其道得之,不處也。भावार्थ: धन और प्रतिष्ठा तभी ग्रहण करने योग्य हैं जब वे धर्मयुक्त मार्ग से प्राप्त हों; नैतिक बल ही वास्तविक शक्ति है।2. The Analects 7.19天生德於予。भावार्थ: स्वर्ग (Heaven) ने मुझे सद्गुण प्रदान किया है; यही मेरी शक्ति है।3. The Analects 12.1克己復禮為仁。भावार्थ: अपने ऊपर विजय पाकर मर्यादा का पालन करना ही श्रेष्ठता है।4. The Analects 15.29人能弘道,非道弘人。भावार्थ: मनुष्य अपने आचरण से धर्ममार्ग को महान बनाता है।5. The Analects 8.7士不可以不弘毅,任重而道遠。भावार्थ: सज्जन व्यक्ति को दृढ़ और धैर्यवान होना चाहिए, क्योंकि उसका उत्तरदायित्व महान और मार्ग लंबा है।निष्कर्षकन्फ्यूशी परंपरा में "हे ईश्वर! हमें शक्ति प्रदान करें" जैसी प्रार्थना नहीं मिलती। वहाँ यह शिक्षा दी जाती है कि सदाचार, आत्मसंयम, धैर्य और नैतिक चरित्र ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति हैं। इसलिए ये उद्धरण यजुर्वेद के मंत्र के साथ भावगत समानता रखते हैं।शिन्तो धर्म में ष्रमाण--यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" का भाव है— "हे परमात्मा! हमें शक्ति, ऊर्जा और सामर्थ्य प्रदान करें।"Kojiki और Nihon Shoki जैसी शिन्तो (Shinto) परंपरा की रचनाओं में शक्ति का संबंध कामी (神 — दिव्य शक्तियाँ), प्रकृति और जीवन-ऊर्जा से जोड़ा जाता है। शिन्तो में वैदिक अर्थ में ईश्वर से प्रार्थना की अपेक्षा कामी की कृपा, शुद्धता और सामंजस्य पर बल है।कुछ प्रमुख प्रमाण:1. Kojiki天地初発之時、於高天原成神名、天之御中主神。भावार्थ: जब स्वर्ग और पृथ्वी का आरम्भ हुआ, तब उच्च स्वर्ग में दिव्य शक्ति (कामी) का प्राकट्य हुआ।2. Nihon Shoki神明之威、不可測量。भावार्थ: दिव्य शक्तियों (कामी) की महिमा और सामर्थ्य को मापा नहीं जा सकता।3. शिन्तो प्रार्थना (Norito)掛けまくも畏き 神々の大前に…भावार्थ: हे पूजनीय कामी! हम आपके पवित्र सम्मुख उपस्थित होकर आपकी कृपा और संरक्षण की कामना करते हैं।4. शिन्तो शुद्धि मंत्र (Harae)祓へ給ひ 清め給へ 守り給ひ 幸へ給へभावार्थ: हे दिव्य शक्तियों! हमें शुद्ध करें, हमारी रक्षा करें और हमें कल्याण प्रदान करें।5. शिन्तो परंपरा की प्रसिद्ध भावना八百万の神々भावार्थ: असंख्य कामी (दिव्य शक्तियाँ) संसार में व्याप्त हैं और जीवन को शक्ति प्रदान करती हैं।निष्कर्षशिन्तो धर्म में "ऊर्जं नो धेहि" के समान भाव कामी से संरक्षण, शुद्धता, जीवन-शक्ति और कल्याण की कामना के रूप में मिलता है। हालांकि शिन्तो में शक्ति का स्रोत एक निराकार परमेश्वर की अपेक्षा अनेक कामी (दिव्य शक्तियों) और प्रकृति के साथ सामंजस्य माना जाता है।नोट: शिन्तो ग्रंथों के जापानी पाठों में अलग-अलग संस्करणों के कारण अध्याय/पृष्ठ संख्या बदल सकती है।यूनानी दर्शन में प्रमाण--यजुर्वेद 11.83 — "ऊर्जं नो धेहि" का भाव है— "हे परम शक्ति! हमें ऊर्जा, बल और सामर्थ्य प्रदान करें।"यूनानी (Greek) दर्शन में वैदिक अर्थ में किसी ईश्वर से शक्ति माँगने की परंपरा नहीं है, लेकिन वहाँ आंतरिक शक्ति, आत्मसंयम, सद्गुण (Virtue) और बुद्धि को मनुष्य का वास्तविक बल माना गया है।यहाँ कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:1. Plato — Republic (चतुर्थ पुस्तक)"Courage is a kind of preservation of belief about what is and is not to be feared."भावार्थ: साहस वह शक्ति है जो सही ज्ञान के आधार पर भय पर विजय दिलाती है।2. Aristotle — Nicomachean Ethics 1106b"Virtue is a state that decides, consisting in a mean..."भावार्थ: सद्गुण मनुष्य के चरित्र की वह शक्ति है जो उचित निर्णय और श्रेष्ठ आचरण कराती है।3. Epictetus — Enchiridion 1"Some things are up to us and some things are not up to us."भावार्थ: वास्तविक शक्ति अपने मन और कर्मों पर नियंत्रण रखने में है।4. Marcus Aurelius — Meditations 5.36"The happiness of your life depends upon the quality of your thoughts."भावार्थ: जीवन की शक्ति और सुख मन की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं।5. Socrates — (प्लेटो के संवादों में)"No one is willingly evil."भावार्थ: ज्ञान और विवेक मनुष्य को श्रेष्ठ शक्ति प्रदान करते हैं।निष्कर्षयूनानी दर्शन में शक्ति का अर्थ मुख्यतः शारीरिक बल नहीं, बल्कि आत्मबल, विवेक, साहस और सद्गुण है। इसलिए यह यजुर्वेद के "ऊर्जं नो धेहि" के साथ भावगत समानता रखता है। ------+-------+-------+--------