have love in Hindi Short Stories by Deepak sharma books and stories PDF | प्रेम धरो

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प्रेम धरो

 

                 वाराणसी से कोई मिलने आया? अपने अभिवादन के साथ ही उषा पिता से पूछ बैठी । बल्लियों उछल रहे अपने दिल को और संभालना उस के लिए कठिन था।

                “पहले कहीं एकांत में बैठ न लें?” बेटी के भावतरंग से निहाल चंद अछूते रहे। यों भी वैयक्तिक भावप्रवणता को सार्वजनिक बनाने से वह कतराते थे।

                “चलिए, सामने वाले लौन की किसी खाली बैंच पर बैठ लेते हैं,” उषा इधर बेगाने इस शहर में अपनी एम.डी. के अंतर्गत इस के पी.जी. अस्पताल के एनेटमी- शरीर- रचना विज्ञान विभाग से सम्बद्ध थी।वाराणसी शहर से आए अशोक की भांति। उसी विभाग में अशोक की सम्बद्धता उन्हें एक-दूसरे के निकट ले आई थी और अब वे शीघ्र ही विवाह- सूत्र में बंध जाना चाहते थे। इसी उद्देश्य से अशोक ने वाराणसी- निवासी अपने पिता को उषा के कस्बापुर उस के पिता के पास अभी पिछले ही दिन भिजवाया था और उषा को विश्वास था कि दोनों अभिभावकों ने मिलकर उन के विवाह की तिथि निश्चित कर ली थी।

                फरवरी की गुनगुनी धूप में नहा रही एक खाली बैंच पर निहाल चंद बेटी की बगल में अपना स्थान ग्रहण करते ही बोले, “कल अशोक के पिता हमारे घर आए थे….”

                इन पिछले दो वर्षों के दौरान वह अशोक से कई बार मिल चुके थे। बेटी से मिलने वह किसी भी महीने के पहले अथवा दूसरे रविवार इधर आया करते और उस के संग दो- तीन घंटे बिता लेने के बाद उसी दिन लौट भी लेते। कस्बापुर यहां से बहुत दूर नहीं था। सुबह पांच- बीस की पहली बस पकड़ते तो दस बजे यहां। फिर एक- बीस की बस उन्हें संध्या होते ही वापस कस्बापुर पहुंचा दिया करती।

                “घर पर?” उषा घबरा गई, “मगर मैं ने तो उन्हें आप के कालेज का पता दिया था।”

                अपने परिचितों को अपने घर उषा कभी नहीं ले जाना चाहती। प्रारंभिक वर्षों में शय्या- ग्रस्त अपनी मां की बीमारी के कारण और उन की मृत्यु के बाद उचित गृह- प्रबंध के अभाव के कारण। अपने गांव की जिस बूढ़ी बुआ को उस के पिता ने घरदारी का ज़िम्मा सौंप रखा था,उसे आधुनिक रख- रखाव का क-ख-ग भी नहीं मालूम था।

                “हां। घर पर आए और पंजे मार कर चले गए।”

                “कैसे पंजे?” उषा को कंपकंपी छिड़ गई। 

                 “घर में घुसते ही चिल्लाने लगे, भई आप तो बहुत लापरवाह किस्म के आदमी हो। बेटी ब्याहने जा रहे हो और देख नहीं रहे,तुम्हारा गेट मरम्मत मांग रहा है। दीवारें पुताई मांग रही हैं और दरवाज़े- खिड़कियां रोगन…..”

                 “ऐसा कहा उन्होंने?” उषा का दिल बैठने लगा।

                  यह सच था। पुरानी वास्तुकला और दिनातीत संरचना लिए साठ साल पुराना वह मकान मरम्मत ही नहीं मांगता था। नवीकरण भी मांगता था। छब्बीस साल पहले मां जब वहां ब्याह कर आयीं थीं तो उन्हों ने ज़रूर उस की रसोई,स्नानघर व शौचालय का आधुनिकीकरण करवाया था किंतु वह सब निम्निष्ठ स्तर पर ही हो पाया था और फिर वहीं रुक भी गया। शीघ्र ही। कैंसर से उन के घिर जाने के कारण। परिणामस्वरूप घर का प्रगामी काम हमेशा के लिए पिछेल दिया गया था।  उन के स्वास्थ्य- लाभ के लिए किए गए पिता के सभी प्रयास विफल जो रहे थे। और पत्नी को मृत्यु के हाथों खो देने के बाद तो पिता पूरी तरह ही घर के सुधार के प्रति निष्क्रिय हो लिए थे।

                “फिर बैठक में आए तो जनाब उचरे, या तो भाई तुम महाकंजूस हो या फिर हमीं ने गलत सुन रखा था कालेज में पढ़ाने वालों को अच्छा- खासा वेतन मिला करता है….”

                “ऐसा कहा उन्हों ने?”

                “इस पर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं ने कहा, आप के बेटे ने आप को यहां निहुराई- हेतु भेजा है या अपने लिए मेरी बेटी का हाथ मांगने?” 

                “फिर?”

                “इस पर उन्हों ने दूसरा पंजा निकाल लिया, पहले आप की औकात आंकी जाएगी फिर आप की बेटी के बारे में विचार किया जाएगा।”

                 “फिर?” उषा की व्यग्रता अपनी प्रकाष्ठा पर पहुंच ली। अशोक उसे बता चुका था उस के पिता उधर वाराणसी के नामी वकीलों की एक लंबी वंशावली से संबध रखते थे और हाल ही में अपने पुश्तैनी मकान को छोड़कर अपने लिए तैयार करवाए गए एक नए आवासीय क्षेत्र के एक विशाल, आधुनिक बंगले में खिसके थे।

                “फिर क्या?” निहाल चंद का स्वर तीता हो लिया, “उस अपमान और निरादर पर मैं ताली तो पीटता नहीं। मैं ने भी खरी-खरी सुना दी, औकात आंकनी है तो मेरी बेटी की पढ़ाई और योग्यता की औकात आंकिए। जो आप के बेटे के बराबर बैठती है। उन्नीस नहीं बैठती।”

               “आप भूल गए?” उषा का गला रुंधने लगा, “अशोक मुझे अच्छा लगता है। मैं उस से शादी करना चाहती हूं। उसी से शादी करूंगी।”

                “मगर बिट्टो,” निहाल चंद ने बेटी की पीठ घेर ली, “अशोक और उस के पिता का सही होना भी तो बहुत ज़रूरी है। वज़न करने के उन के बाट- तराज़ू सही होने भी बहुत ज़रूरी हैं। लड़की के पिता के घर की दीनता या अस्तव्यस्तता को लड़की की पढ़ाई और योग्यता से गड्डमड्ड कर के उस का मूल्यांकन करना सही है क्या?”

                “लेकिन दुनिया तो आप की तरह नहीं सोचती। आप की तरह नहीं चलती!” उषा ने पिता की बांह अपनी पीठ से अलग झटक दी।

                “सोचना तो मुझे है!” निहाल चंद ने बेटी का कंधा थाम लिया, “सोचना तो तुम्हें है। गलत सोचवालों  की गलत दुनिया में हमें दाखिल होना है या अपनी अलग और सही दुनिया में बने रहना है? उन लोगों की ठसक देख कर अपने हाथों के तोते उड़ जाने देने हैं या फिर उन्हें अपनी मूठ में सहेजे रखने हैं?”

               उषा ठिठक गई। एक्एक। पिता द्वारा थमाए गए वे जाने- पहचाने तोते उस के हाथों से छूट गए थे क्या? अशोक द्वारा उस के हाथों की दिशा में छोड़े गए लव- बर्ड्स को स्थान देने हेतु? न केवल हाथों ही में, बल्कि अशोक ने तो उस के जन्मदिन पर उसे लव- बर्ड्स का एक जोड़ा भी भेंटस्वरूप दे रखा था,यह बताते हुए कि ‘लव-बर्ड्स’ नाम से पहचाए जाने वाले पक्षी तोते ही के परिवार से होते हैं। और यदि किसी जोड़े में से एक की मृत्यु हो जाती है तो दूसरा जन शोक में अपने प्राण त्याग देता है। 

                निस्संदेह वे बाकी तोतों की तुलना में छोटे आकार के थे और कम बोलते थे। मगर पिंजरे में रखे जाने पर सट कर बैठते थे। इन लव बर्ड्स की चोंच तोतों ही की भांति अंकुशाकार थी। गर्दन छोटी मगर सिर बड़ा था और वे अपने मज़बूत पैरों की दो उंगलियां आगे की दिशा में नोक निकाले रखते थे और बाकी तोतों की भांति अच्छी नकल उतार लेते थे और उन के सामने जो कोई जो भी बोले, वे वही रट पकड़ लेते थे।

                 जीवन के उस मदकाल में पच्चीस- वर्षीया उषा लव- बर्ड्स ही को थामे रखना चाहती थी। वास्तविकता के साथ-साथ प्रतीकात्मक रूप में भी। 

                 कर्णगोचर उन लव- बर्ड्स के अनुनाद का सम्मोहन पिता के पुराने चरागाह के आरक्षित क्षेत्र के वाक्- यंत्र से उत्पादित स्वरित वाक पर हावी हो गया और वह दोहरा उठी, “अशोक मुझे अच्छा लगता है। मैं उस से शादी करना चाहती हूं। उसी से शादी करूंगी। मैं भी उसे अच्छी लगती हूं। वह भी मुझी से शादी करेगा। वह अपने पिता की लीक पर नहीं। आप उस से यह सुन भी लें। मैं अभी उस का मोबाइल मिलाती हूं….”

                 उषा का मोबाइल उस के पर्स में था। इधर बैंच पर बैठते समय उस ने उसे अपने पैरों के पास लौन ही पर धर दिया था।

                 उसे उठाने के लिए वह नीचे झुकी। किंतु उसे उठा न सकी। प्रबल उस मनोवेग की अवस्था में वह बैंच से नीचे गिर पड़ी थी। आगे की ओर। अपने हाथों के बल। चटक- चटक।

                 फैली हुई उस की एक बांह की एक हड्डी चरक गई थी और वह दर्द से चीख उठी : “बा….”

                 पिता के लिए वह ‘बा’ संबोधन का प्रयोग किया करती,जब भी उसे उन से झगड़ा निपटाना होता।

 

                 “यह कौल्ज़ फ़्रैक्चर है,” एक्सरे की रिपोर्ट देख कर इन्सटीटयूट के हड्डी- विशेषज्ञ ने कहा, “गिरते समय अपने शरीर को अपने हाथों की टेक देने के कारण उषा की दाहिनी बांह चटक गई है और उस की अगली हड्डी टूट गई है। रेडियस नाम की।”

                 “रेडियस?” निहाल चंद ने हैरानी जतलाई। 

                  “हमारी बांह की अगली तरफ़ दो हड्डियां होती हैं। एक रेडियस और दूसरी अल्ना,”  हड्डी- विशेषज्ञ ने पूरी व्याख्या दी, “और हाथ को बांह से जोड़ने वाली कलाई में छोटी- छोटी आठ हड्डियां होती हैं जिन्हें कार्पल बोन्ज़ कहते हैं। उषा की सभी कार्पल बोन्ज़ तो बच गईं हैं। लेकिन कलाई वाले जोड़ से लगभग दो या फिर अढ़ाई सेंटीमीटर ऊपर वाले स्थल पर रेडियस तड़की है….”

                 “फ़्रैक्चर गंभीर तो नहीं?” निहाल चंद गंभीर हो लिए। 

                 “नहीं, आप चिंता मत करिए।  रेडियस के टूटे खंड हम अभी जोड़ देंगे। उषा को दर्द ज़्यादा है, इसीलिए हड्डी की सीध मिलाते समय इसे हम बेहोशी की अवस्था में रखेंगे। फिर पलस्तर बंध जाएगा। रिजिड पलस्तर कास्ट। खूब कड़ा पलस्तर।” 

                “और वह पलस्तर उतरेगा कब?”

                “समझिए तीन महीनों में उषा का यह हाथ पूरी तरह संभल जाएगा….”

                यहां यह बताना ज़रूरी है कि उन तीन महीनों में उषा का हाथ ही नहीं संभला। उस का दिल भी संभल गया। अपने प्रति अशोक का मंदोत्साह देख कर।

                अचरज नहीं, जो अशोक से भेंटस्वरूप पाए लव- बर्ड्स कहलाए जाने वाले उन दो छोटे तोतों को उस ने पिंजरे से आज़ाद करने में तनिक विलंब नहीं किया था।

                 प्रेम की अदनवाटिका से तदनंतर पूरी तरह से बाहर हो लेने हेतु। जहां वह पिछले दो वर्षों से अशोक के संग उन लव-बर्ड्स की चहचहाहट अपने कानों में, अपने दिल में भरती रही थी। हाथों- हाथ।