subject state in Hindi Short Stories by Deepak sharma books and stories PDF | अधीन राज्य

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अधीन राज्य

 

                 इस मकान को उषा अपना अधीन राज्य मान कर चलती है और हम परिवार वालों को अपनी प्रजा।

                बेशक उस के परिवार में मैं एक बाहरी व्यक्ति की हैसियत से आया था। दफ़्तर में उस का जूनियर बन कर और मकान में उस का किराएदार ।

                यह संयोग ही था कि जिस समय कस्बापुर के एक निजी संस्थान में मेरी पहली नियुक्ति हुई थी, उषा के मकान के वे दो कमरे खाली थे जिन्हें अपने पिता के देहांत के समय से वह पिछले सोलह वर्षों से किराए पर चढ़ाती रही थी।

               उस संस्थान में उस ने नौकरी भी पिता की असामयिक मृत्यु के उपलक्ष्य में पाई थी। भाई उस का कोई था नहीं और छोटी बहन के नाम पर इक्कीस वर्षीया जो जीव थी, वह प्रकृति की अवमानी का एक नमूना थी : चिक्कन गोरी त्वचा, घने लंबे बालों और विशाल, चमकदार आंखों वाली उस लड़की के हाथ,पैर और होंठ सब टेढ़े थे। न वह ठीक से चल पाती थी। न ठीक से बोल पाती थी। और न ही अपने हाथ में कोई चीज़ ठीक से पकड़ पाती थी। ऐसे में उषा ही मकान की मालकिन बनी बैठी थी।

 

              अपने किराएदार उषा हमेशा अपने दफ़्तर ही के जूनियर सदस्यों में से चुना करती थी,ताकि किराए का भुगतान उसे समय पर मिलता रहे।

               मुझे अपना किराएदार बनाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं रही थी। हां, उस ने एक शर्त ज़रूर मेरे सामने रखी थी, मुझे अगले तीन माह के अंदर शादी ज़रूर करनी पड़ेगी क्योंकि अभी तक उस के वे कमरे केवल विवाहित जोड़ों ही को दिए गए थे, अविवाहित लड़कों को नहीं।

               मैं ने ‘हां’ मे अपना सिर हिला ज़रूर दिया था किंतु मैं जानता था वह असंभव था। उनतीस वर्ष की अपनी उस उम्र में मैं न केवल सम्पत्तिविहीन ही था बल्कि लड़कियों के मामले में अनुभवविहीन भी। तिस पर मेरी शादी की फ़िक्र करने वाला कोई नहीं था। मां का देहांत बहुत पहले हो चुका था और पिता अपने दिन का दो-तिहाई भाग अपनी क्लर्की में बिताया करते और एक- तिहाई भाग अपने नए चार बेटे- बेटियों और उन की मां से उलझने में।और अपनी दसवीं कक्षा के बाद की अपनी पूरी पढ़ाई भी मैं ने छिटपुट नौकरियों के बूते ही पर की थी। अपनी सौतेली मां की इस घोषणा के तहत, तुम्हारा खर्चा अब हम से न उठेगा।

               उषा के मकान में मेरे निवास के दूसरे सप्ताह की एक संध्या थी जब मेरे कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से भड़भड़ाया गया। उस समय मैं बाज़ार से मंगवाए गए टिफ़िन में से अस्वादिष्ट व नीरस भोजन अनिच्छा से चबा रहा था। हड़बड़ा कर मैं ने वह टिफ़िन बंद कर दिया और जूठे हाथों से दरवाज़ा जा खोला था।

               “क्या हुआ, मैडम?” बाहर उषा खड़ी थी।बड़ी घबराई हुई।

                मकान पर भी मैं उसे ‘मैडम’ ही बुलाया करता। दफ़्तर वाली औपचारिकता बनाए रखने हेतु। पिता के बाद के उन सोलह वर्षों में क्रमशः उषा अपने विभाग के श्रेणीकरण व क्रम- निर्धारण के कई सोपान चढ़ चुकी थी और पदक्रम में मुझ से बहुत आगे थी।

               “अम्मा गुसलखाना में गिर पड़ीं हैं और उठ नहीं पा रहीं। उन्हें उठाने में मुझे तुम्हारी मदद चाहिए….”

               “जी,मैडम….”

                उधर गुसलखाने में अम्मा की हूक के संग उषा की बहन,छुटकी,हिचकियां ले रही थी।

                उषा और मैं अम्मा को उठाने के लिए एक साथ झुके थे। अम्मा के मोटापे और स्थूलता के आयतन व परिमाण का आभास मुझे तब हुआ जब मेरी सांस फूलने लगी।

                “पड़ोस के नर्सिंग होम से वैन अभी पहुंच रही है।उधर तुम्हें मेरे साथ चलना पड़ेगा। छुटकी यहीं रहेगी….”

                “जी,मैडम….”

                नर्सिंग होम की एक्सरे रिपोर्ट से मालूम हुआ अम्मा के बांए कूल्हे की हड्डी दरक गई थी। उपचार के अंतर्गत आंशिक हिप रिप्लेसमेंट हो जाने के उपरांत अब उनका शय्याग्रस्त बने रहना अनिवार्य हो गया। 

                तदनंतर, सात कमरों वाले उषा के उस मकान के कई बंद दरवाज़े मेरे लिए खोल दिए गए। 

               सब से पहले खुलने वाला वह दरवाज़ा था जो हमारी सांझी दीवार के दांए- बांए पड़ता था और जिस पर पिछले सोलह वर्षों से लगातार एक ताला पड़ा रहा था।

               और उस का ताला इसलिए खोला गया था क्योंकि उसे घेर रही खाने की मेज़, कुर्सियों और बर्तनों की आलमारी का स्थान अब अम्मा की शय्या को दिया जाना था। ताकि अपनी शय्या से वह मुझे जब भी पुकारें, मैं उन की ओर लपक सकूं। अपनी सेवा- टहल उन्हें उपलब्ध कराने। 

               जिस की भागेदारी मैं ने स्वेच्छा से प्रस्तावित की थी।अपने लोभ से प्रेरित हो कर। जिस के लिए बेशक बना- बनाया तैयार वह सुस्वादु भोजन भी उत्तरदायी रहा था जो अम्मा के आग्रह पर उन की रसोई से तीनों समय मुझे परोसा व पहुंचाया जाने लगा था। किंतु उस लोभ को ठोस आधार दिया था छुटकी ने। उसकी उत्सुकता ने। और अम्मा की प्रतीति ने।

               तभी एक ओर जहां चपल व अनवस्थ छुटकी के चित्त का लाभ उठाकर उस के प्रेम- व्यवहार को मैं अपने काम- बाण से प्रेम- विहार में बदल देने में सफल हो गया था वहीं दूसरी ओर अम्मा की सेवा- शूषूर्षा में यथासाध्य अपना पूरा उद्योग देकर मैं उषा के मन में भी अपनी उपयोगिता की गहरी छाप जमाने लगा था।

               परिणाम, अपनी टिकान के तीसरे माह का किराया जैसे ही मैं ने उषा के हाथ में रखना चाहा, उस ने मुझे अम्मा के कमरे की ओर प्रवर्तित कर दिया।

               “यह रुपया तुम अपने पास रखो,”

मेरा हाथ पकड़ कर वह बोलीं, “और उषा से ब्याह कर कर लो….”

                उषा का ऊंचा पद, तिस पर दफ़्तर में उस का अपने सहकर्मियों व अनुचरों के संग कार्यन्याय के अनुसार उपयुक्त व्यवहार और फिर यह बड़ा पुश्तैनी मकान जिसे उस के दादा ने अच्छे समय में बनवाया था— ऐसे में मेरे लोभ की बाहें लंबी क्यों न हो लेतीं?

               “आप ने मैडम से पूछ लिया?”

               “जानती हूं वह तुम से आठ- नौ साल बड़ी है। मनमाने ढंग से रहती है। लेकिन फिर भी देख लेना, वह तुम्हारे लिए अच्छी पत्नी साबित होगी।”

                “लेकिन मैडम मुझ जैसे जूनियर से ब्याह करने के लिए मान जांएगी क्या?” उस प्रस्ताव को मैं ने सुदृढ़ कर लेना चाहा।

               “उसे मनाने का ज़िम्मा मेरा रहेगा,” अम्मा हंस पड़ीं।

               अगले ही दिन पड़ोस के पंडित जी हमारे विवाह का मुहूर्त तय करने के लिए अम्मा के कमरे में बुला लिए गए। 

               उन्हों ने आगामी सप्ताह का रविवार निश्चित कर दिया।

               दबी ज़ुबान से अम्मा ने एक बार ज़रूर मुझे अपने परिवारजन को निमंत्रण देने का सुझाव दिया, किंतु उषा ने टाल दिया, “नहीं, कोई ज़रूरत नहीं।”

               और मैं ने उषा की ‘नहीं’ में अपनी ‘नहीं’ जोड़ दी।

                उषा ने मुझे अपने दफ़्तर में भी इस विवाह का उल्लेख करने के लिए मना कर दिया, “अम्मा की बीमारी के चलते हम अपने विवाह को केवल धर्मविधि तक ही सीमित रखेंगे।”

                वह धर्मविधि भी उस समय मुझे किसी राज्यभिषेक से कम नहीं मालूम दे रही थी। कहां सुना था मैं ने, हर दूल्हा एक राजा होता है? और मैं राजा बनने जा रहा था। दफ़्तर में न सही, मगर घर में तो अब उषा का स्थान मुझे मिलने वाला था।

 

                हमारे विवाह की वह पूर्व- संध्या थी जब उषा मेरे कमरे में सहसा चली आई।       अपने आचरण के विपरीत। 

               गंभीर मुद्रा लिए। अपने कठोरतम स्वर में मुझे आदेश देने , “कल तुम्हारा विवाह छुटकी से होगा। मुझ से नहीं।”

              “क्यों?” मैं सकपकाया था।

              “छुटकी गर्भवती है और उस की संतान का वैध होना बहुत ज़रूरी है।”

              “क्या…या…या?????” मुझे काठ मार गया था।

               “उस से विवाह नहीं करोगे तो तुम्हें बलात्कारी घोषित कर के जेल भिजवा दिया जाएगा।”

               उषा ने अपना निर्णय कह सुनाया था।

 

               टूट रहे मेरे दम में दम लाया मेरे पहले बेटे का जन्म। 

               जो मेरी आशंका के विपरीत छुटकी की भांति प्रकृति की अवमानी का नहीं, प्रकृति की दक्षता का उदाहरण था : पूर्णतः स्वस्थ व हृष्ट- पुष्ट। 

               उषा ही ने छुटकी की प्रसूति की पूरी ज़िम्मेदारी निभाई । उसे कस्बापुर के सर्वोत्तम चिकित्सक व स्वास्थ्यकर सेवाएं उपलब्ध करवा कर। 

               छुटकी की अगली दो प्रसूतियां भी उसी उत्साह व तत्परता से उषा ने निष्पादित कीं और प्रकृति ने भी अपनी दक्षता दुहरा दी।

 

               दुहराव यदि लापता रहा तो मेरे प्रति उषा के बरताव में।

               छुटकी और मेरे विवाह को छः वर्ष हो चले हैं किंतु हमारे विवाह की पूर्वसंध्या के बाद ही से उषा ने न कभी मेरी ओर सीधे देखा है और न कभी मुझ से सीधे मुंह बात की है।

                हां, पूर्णाधिकार से मेरे लिए उस के आदेश ज़रूर जारी होते रहते हैं।

                दफ़्तर में भी और घर में भी।

                बल्कि पूर्णाधिकार का तो वह अम्मा,छुटकी और मेरे तीनों बेटों के संग भी उपभोग करती है। अम्मा और छुटकी को अपनी सरपरस्ती की आड़ दे कर और मेरे बेटों को कभी आमोद-प्रमोद द्वारा तो कभी क्रीड़ा- कौतुक द्वारा तो कभी दुलार- फटकार द्वारा।

                हम सभी को अपने खूंटे से बंधे रखने हेतु। 

                 अपनी प्रजा बनाए रखने के निमित्त।