Last Chapter in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | लास्ट चैप्टर

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लास्ट चैप्टर

महानगर की फिज़ा में जो अजीब सी घुटन थी, वह राघवन के लिए अब उतनी अनजानी नहीं रही थी। अपनी पहाड़ों की यात्रा के बाद जब वह वापस लौटा, तो शहर उसे पहले जैसा नहीं लगा। या शायद, यह शहर वैसा ही था, बस उसे देखने वाली आँखें अब पूरी तरह बदल चुकी थीं। राघवन का वापस आना कोई विजय का प्रतीक नहीं था, और न ही यह किसी पुरानी दास्तान का सुखद अंत था। यह था एक टूटे हुए इंसान का, अपने ही मलबे के बीच फिर से खड़े होने का एक थका हुआ प्रयास।
उसके घर का दरवाजा जब उसने खोला, तो अंदर की खामोशी में एक ऐसी भारीपन था जिसे महसूस करने के लिए किसी बड़े शोर की ज़रूरत नहीं थी। शालिनी सोफे पर बैठी थी। उसके सामने वाली मेज पर चाय के दो कप रखे थे, जिनमें से एक का धुआं अभी भी हवा में तैर रहा था। शालिनी की नज़रें खिड़की के बाहर किसी काल्पनिक बिंदु पर टिकी थीं। उसने राघवन के आने की आहट सुनी, लेकिन उसने अपना सिर नहीं घुमाया।
"तुम आ गए," उसने धीमी आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में न कोई शिकायत थी, न कोई स्वागत की गर्माहट। यह एक ऐसी आवाज़ थी जिसे हम तब सुनते हैं जब उम्मीदें पूरी तरह मर चुकी होती हैं और बस एक औपचारिकता बाकी रहती है।
राघवन ने अपना सूटकेस एक तरफ रखा और धीरे से सोफे के दूसरे किनारे पर बैठ गया। उसने शालिनी के चेहरे को ध्यान से देखा। उसके चेहरे पर जो रेखाएं थीं, वे शायद उसके अकेलेपन और उस मानसिक प्रताड़ना की गवाही दे रही थीं जो उसने पिछले कुछ दिनों में झेली थी। राघवन को अहसास हुआ कि उसने न केवल खुद को, बल्कि शालिनी को भी उस एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर के चक्रव्यूह में झोंक दिया था।
"शालिनी," उसने कहना शुरू किया, और उसका गला भर आया। "मैं वापस आया हूँ। न कोई बहाना लेकर, न ही कोई सफाई देने के लिए। बस यह बताने के लिए कि मैं जो कुछ भी था, वह मैं नहीं रहना चाहता।"
शालिनी ने धीरे से अपनी नज़रें राघवन की ओर घुमाईं। उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी, जो किसी गहरे समुद्र की तरह शांत थी। "राघवन, तुम वापस आए हो, यह अच्छी बात है। लेकिन क्या तुम्हें वाकई लगता है कि कुछ भी बदल सकता है? हम दोनों अब वे लोग नहीं रहे जो सात साल पहले थे। वो राघवन मर चुका है जिसने सपने देखे थे, और वो शालिनी भी मर चुकी है जिसे तुम्हारे वफादार होने का भ्रम था।"
राघवन चुप रहा। वह जानता था कि शालिनी की हर बात सच थी। आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी यही है—हम रिश्तों को 'मैनेज' तो कर लेते हैं, उन्हें घसीटते हुए आगे भी ले जाते हैं, लेकिन उस विश्वास को वापस नहीं ला सकते जो एक बार टूट जाने पर कांच की तरह बिखर जाता है।
अगले कुछ दिन बहुत ही अजीब और तनावपूर्ण थे। उन्होंने एक-दूसरे के साथ एक ऐसी सीमा रेखा खींच ली थी, जिसे वे न लांघना चाहते थे, न ही उसे मिटाना चाहते थे। सुबह का नाश्ता, दफ्तर की तैयारी, और रात का खाना—सब कुछ एक मशीन की तरह चल रहा था। वे साथ थे, एक छत के नीचे थे, लेकिन वे अब पति-पत्नी नहीं थे। वे थे दो ऐसे यात्री जो एक ही ट्रेन में सवार थे, लेकिन उनकी मंजिलें बिल्कुल अलग थीं।
राघवन ने महसूस किया कि एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर का ज़हर सिर्फ उस पल नहीं मारता जब वह उजागर होता है, बल्कि वह उन अनगिनत पलों में मारता है जो उसके बाद आते हैं। हर खामोशी में एक सवाल था, हर स्पर्श में एक झिझक थी। क्या शालिनी आज भी उसके साथ सो रही है क्योंकि वह उसे चाहती है, या इसलिए कि वह समाज की निगाहों में 'तलाकशुदा' का ठप्पा नहीं लगवाना चाहती?
शाम को दफ्तर से लौटकर, राघवन अक्सर अपनी बालकनी में जाकर खड़ा हो जाता। शहर की वह जगमगाती रोशनी, जो कभी उसे एक सुनहरा भविष्य दिखाती थी, अब उसे सिर्फ एक अनंत भीड़ की तरह दिखती थी। उसे याद आया कि कैसे वह मीरा के साथ इन रास्तों पर घूमता था, कैसे वे घंटों कॉफी शॉप में बैठकर बातें करते थे। लेकिन आज, उन यादों का कोई मूल्य नहीं था। उन यादों ने उसे केवल तन्हाई दी थी।
एक दिन, अचानक मीरा का फोन आया। राघवन का दिल एक पल के लिए जैसे ठहर गया। उसने फोन को हाथ में लिया, कांपते हुए।
"हेलो?" उसने कहा।
"राघवन," मीरा की आवाज़ में वही पुरानी खनक थी, पर इस बार उसमें एक अजीब सी कड़वाहट थी। "मैंने सुना तुम वापस आ गए हो। क्या तुम खुश हो?"
राघवन ने शालिनी को दूसरे कमरे में काम करते हुए देखा। वह जानता था कि अगर उसने यहाँ कोई भी गलत कदम उठाया, तो वह फिर से उसी दलदल में गिर जाएगा।
"मैं खुश होने की कोशिश कर रहा हूँ, मीरा," उसने बहुत सावधानी से कहा। "और तुम? तुम अपनी उस नई दुनिया में कैसी हो?"
मीरा हँसी, पर उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं थी। "नई दुनिया? राघवन, इस महानगर में किसी के लिए कोई नई दुनिया नहीं होती। हम सब बस अपनी पुरानी गलतियों को नए तरीके से दोहराते हैं। मैंने तुमसे झूठ कहा था कि मैं कहीं और चली गई हूँ। मैं आज भी उसी शहर में हूँ, बस तुम्हारी पहुँच से दूर।"
राघवन की आँखों के सामने मीरा का चेहरा आ गया। उसके बिखरे बाल, उसकी वह बेपरवाह मुस्कान। उसे लगा कि वह आज भी मीरा को चाहता है। यह एक ऐसा कड़वा सच था जिसे वह खुद से भी छिपा नहीं पा रहा था। लेकिन उसने यह भी समझ लिया था कि मीरा उसके जीवन का वह हिस्सा थी जिसे वह केवल 'ख्वाब' की तरह देख सकता था, 'हकीकत' की तरह नहीं।
"मीरा," उसने कहा, "शायद यह फोन कॉल ही हमारी आखिरी बात है। मैं अपनी जिंदगी को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ। प्लीज, मुझे फिर से उस तरफ मत ले जाओ जहाँ से मैं बड़ी मुश्किल से वापस आया हूँ।"
फोन के उस पार मीरा की सिसकी सुनाई दी। और फिर, बिना किसी शब्द के, उसने फोन काट दिया।
राघवन ने फोन को मेज पर रख दिया। उसके हाथों में कंपन था। शालिनी कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने शायद मीरा की आवाज़ सुनी थी, या शायद वह समझ गई थी कि राघवन किससे बात कर रहा था।
"क्या वह मीरा थी?" शालिनी ने पूछा। उसकी आवाज़ में इस बार गुस्सा नहीं था, सिर्फ एक गहरी थकान थी।
"हाँ," राघवन ने सच्चाई स्वीकार की। वह अब और झूठ नहीं बोलना चाहता था। "वह मीरा थी। और उसने मुझसे आखिरी बार बात की।"
शालिनी धीरे से उसके पास आई और उसके कंधे पर हाथ रखा। वह स्पर्श नहीं था, वह बस एक अहसास था। "राघवन, हम दोनों ने जो खोया है, उसे वापस पाना मुमकिन नहीं है। लेकिन जो हमारे पास बचा है, क्या हम उसे बचा सकते हैं? एक ऐसा रिश्ता, जो प्यार पर नहीं, बल्कि 'सच्चाई' पर आधारित हो? क्या हम बिना किसी मुखौटे के साथ रह सकते हैं?"
राघवन ने शालिनी की ओर देखा। उसकी आँखों में आंसू थे। यह पहली बार था जब उसने शालिनी को एक 'पत्नी' के रूप में नहीं, बल्कि एक 'इंसान' के रूप में देखा था।
"हाँ," उसने कहा। "हम रह सकते हैं।"
उसी रात, उन्होंने एक ऐसा समझौता किया जो कागजों पर नहीं, बल्कि उनके दिलों पर लिखा गया था। वे अब एक-दूसरे से कोई उम्मीद नहीं रखेंगे। वे अब एक-दूसरे को 'बदलने' की कोशिश नहीं करेंगे। वे बस साथ रहेंगे, और उस 'सच्चाई' का सम्मान करेंगे जिसे उन्होंने इन कठिन रास्तों पर चलकर पाया था।
एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर की वह आग, जिसने उनके पूरे जीवन को झुलसा दिया था, अब बुझ चुकी थी। लेकिन उस आग के पीछे जो राख बची थी, उसने उन्हें वह 'तत्व' दे दिया था जिससे वे फिर से अपना अस्तित्व बना सकते थे।
अगले कुछ महीने बहुत ही शांत बीते। उन्होंने कभी भी उस विषय पर बात नहीं की। वे कभी भी पुरानी यादों को कुरेदने नहीं बैठे। बस एक खामोश समझदारी के साथ, वे अपने जीवन को आगे बढ़ाते रहे। राघवन अब दफ्तर में अपना पूरा ध्यान लगाता, और घर आकर शालिनी के साथ बस कुछ जरूरी बातें करता। वे अब दो अजनबी थे जो एक ही घर को साझा कर रहे थे। लेकिन यह 'अजनबीपन' अब उन्हें परेशान नहीं करता था। यह अजनबीपन ही उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा थी।
उन्हें समझ आ गया था कि आधुनिक जीवन में, कई बार 'अजनबियों' की तरह साथ रहना ही सबसे बड़ी 'आत्मीयता' होती है। क्योंकि जब आप एक-दूसरे से कुछ नहीं मांगते, तो आप एक-दूसरे को सब कुछ देने के लिए आज़ाद होते हैं।
एक साल बाद, राघवन ने अपनी डायरी का आखिरी पन्ना खोला। उसने लिखा— 'ख्वाबगाह ढह चुकी है। राख ठंडी हो गई है। हम अब घर नहीं बना रहे हैं, हम बस एक-दूसरे के साथ चल रहे हैं। यह सफर सुंदर नहीं है, लेकिन यह सच्चा है। और शायद यही काफी है।'
उसने डायरी बंद कर दी। वह शालिनी के साथ सोफे पर बैठा था। बाहर बारिश हो रही थी। खिड़की के कांच पर बारिश की बूंदें ऐसे गिर रही थीं जैसे वे किसी पुरानी कहानी को मिटा रही हों। राघवन ने शालिनी का हाथ पकड़ा। शालिनी ने उसे नहीं छोड़ा। वे दोनों बस चुपचाप बैठे रहे।
एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर का वह खेल, वह पागलपन, वह जुनून—सब कुछ पीछे छूट चुका था। उनके सामने अब एक लंबी, नीरस, लेकिन सच्ची जिंदगी थी। और शायद, एक इंसान के लिए बस इतना ही काफी होता है।
वह रात गहरी थी, और शहर अब पूरी तरह सो चुका था। लेकिन राघवन और शालिनी जगे हुए थे। वे जगे हुए थे अपनी उस नई सच्चाई के साथ, जिसे उन्होंने इतनी मुश्किलों के बाद पाया था। उन्होंने समझ लिया था कि एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर सिर्फ एक गलती नहीं थी, वह उनके जीवन का एक ऐसा मोड़ था जिसे पार किए बिना वे कभी अपनी असलियत तक नहीं पहुँच सकते थे।
अब न कोई शिकायत थी, न ही कोई मलाल। बस एक स्वीकार्यता थी। और उस स्वीकार्यता के साथ ही, उनके जीवन का सबसे लंबा और कठिन अध्याय समाप्त हुआ था।

(समाप्त)