अध्याय 10: जागने के बाद
“इस बार तुम्हें खुद को बचाना है।”
अंगद उस दूसरे अंगद को देखता रहा।
बारिश उसके चेहरे पर पड़ रही थी।
प्लेटफ़ॉर्म खाली था।
सिर्फ तीन लोग थे—
अंगद।
मीरा।
और वह दूसरा अंगद।
ट्रेन के भीतर।
घड़ी की सुई—
11:52
पर अटकी हुई थी।
अंगद ने काँपती आवाज़ में पूछा—
“तुम कौन हो?”
दूसरा अंगद मुस्कुराया।
“जिसे तुम पिछले दस साल से बनने की कोशिश कर रहे हो।”
“क्या मतलब?”
“तुम्हें याद है तुमने उस रात क्या माँगा था?”
अंगद चुप।
अचानक उसके दिमाग में एक दृश्य चमका।
दस साल पहले।
बारिश।
वही स्टेशन।
वही ट्रेन।
लेकिन इस बार याद साफ थी।
वह मीरा के साथ बैठा था।
मीरा रो रही थी।
“तुम्हें हर चीज़ जीतनी क्यों होती है, अंगद?”
“क्योंकि हारने का वक्त नहीं है।”
“और अगर किसी दिन तुम्हें चुनना पड़ा?”
“क्या?”
मीरा ने उसकी तरफ देखा था।
“मुझे… या तुम्हारी ज़िंदगी?”
अंगद ने हँसकर उसका हाथ पकड़ा था।
“तुम्हें पता है मैं क्या चुनूँगा।”
दृश्य टूट गया।
अंगद की आँखों से आँसू निकल आए।
“मीरा…”
मीरा उसके सामने खड़ी थी।
“अब याद आया?”
अंगद ने सिर हिलाया।
“हम… पहले से एक-दूसरे को जानते थे।”
“हाँ।”
“हम उस रात भाग नहीं रहे थे।”
“नहीं।”
“हम किसी से मिलने जा रहे थे।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“अब आखिरी हिस्सा भी याद करो।”
अंगद ने आँखें बंद कर लीं।
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दस साल पहले
ट्रेन तेज़ रफ्तार से जा रही थी।
अंगद और मीरा आखिरी डिब्बे में बैठे थे।
मीरा के हाथ में एक छोटी-सी फाइल थी।
“अगर ये सच है,” अंगद ने कहा था, “तो ये सिर्फ हमारे बारे में नहीं है।”
“मुझे पता है।”
“तुम डर रही हो?”
मीरा ने मुस्कुराकर कहा—
“बहुत।”
“फिर भी आई?”
“क्योंकि तुम अकेले जा रहे थे।”
अंगद ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“कुछ नहीं होगा।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम हमेशा यही कहते हो।”
फिर ट्रेन अचानक झटके से हिली।
लाइट चली गई।
और अगले कुछ सेकंड में…
सब कुछ बदल गया।
अंगद को याद आया—
वो दुर्घटना सामान्य नहीं थी।
ट्रेन पटरी से उतरने वाली थी।
मीरा ने उसे धक्का दिया था।
अंगद गिरा।
मीरा खुद दरवाज़े की तरफ चली गई।
उसने उसे बचाने की कोशिश की थी।
फिर—
धड़ाम!
अंधेरा।
काँच।
लोहे की आवाज़।
और आखिरी चीज़ जो अंगद ने देखी थी—
मीरा का हाथ।
उसका हाथ पकड़ते हुए।
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अंगद ने आँखें खोलीं।
वह फिर प्लेटफ़ॉर्म पर था।
दूसरा अंगद अब उसके सामने खड़ा था।
“अब समझे?”
अंगद ने पूछा—
“मैंने उसे बचाया था?”
दूसरे अंगद ने सिर हिलाया।
“तुमने कोशिश की थी।”
“फिर?”
“तुम दोनों बच गए।”
अंगद की आँखें मीरा पर टिक गईं।
“तो हम दोनों कोमा में कैसे?”
मीरा ने पहली बार जवाब दिया—
“क्योंकि तुम्हारे शरीर बच गए थे…”
वह रुकी।
“लेकिन उस रात तुम्हारा दिमाग मेरे साथ वहीं रह गया।”
अंगद ने उसकी तरफ देखा।
“और तुम?”
मीरा मुस्कुराई।
उस मुस्कान में दस साल का दर्द था।
“मेरा भी।”
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अचानक प्लेटफ़ॉर्म हिलने लगा।
रेल की पटरियाँ काँपने लगीं।
दूर से ट्रेन की हेडलाइट दिखाई दी।
मीरा पीछे हट गई।
“अब तुम्हें जाना होगा।”
“कहाँ?”
“जहाँ तुम दस साल से जाने से डर रहे हो।”
“और तुम?”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
अंगद समझ गया।
“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊँगा।”
मीरा की आँखें भर आईं।
“इस बार तुम्हें जाना ही होगा।”
“नहीं।”
“अंगद…”
“नहीं!”
वह उसका हाथ पकड़ने दौड़ा।
लेकिन इस बार मीरा पीछे नहीं हटी।
उसने उसका हाथ पकड़ लिया।
पहली बार सच में।
गर्म।
काँपता हुआ।
“अगर तुम जाग गए…”
मीरा ने कहा,
“तो मुझे याद रखना।”
अंगद की आँखों से आँसू बहने लगे।
“और अगर तुम नहीं जागीं?”
मीरा ने हल्की मुस्कान दी।
“तो फिर शायद… अगली ट्रेन में मिलेंगे।”
ट्रेन उनके सामने आकर रुकी।
दरवाज़ा खुला।
अंदर अंधेरा था।
अंगद ने आखिरी बार मीरा को देखा।
फिर ट्रेन में कदम रखा।
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बीप…
एक आवाज़।
बहुत दूर से।
बीप…
दूसरी।
बीप…
तीसरी।
अंगद ने आँखें खोलने की कोशिश की।
कुछ दिखाई नहीं दिया।
सिर्फ सफेद रोशनी।
किसी ने कहा—
“अंगद?”
उसने आँखें खोल दीं।
ऊपर सफेद छत थी।
नाक में ऑक्सीजन की नली।
हाथ में सुई।
मशीनें।
लोग।
एक डॉक्टर उसके ऊपर झुका हुआ था।
“अंगद… मेरी आवाज़ सुन सकते हो?”
उसने बोलने की कोशिश की।
गला सूखा था।
बस एक शब्द निकला—
“मी…”
डॉक्टर झुक गया।
“क्या?”
अंगद ने पूरी ताकत से कहा—
“मीरा…”
डॉक्टर ने नर्स की तरफ देखा।
फिर अंगद की तरफ।
“तुम्हें उसका नाम कैसे पता?”
अंगद ने कुछ नहीं कहा।
उसकी आँखें धीरे-धीरे बंद हो गईं।
दस साल।
एक लंबी नींद।
और फिर…
वह जाग चुका था।
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कुछ घंटे बाद।
कमरे में शांति थी।
अंगद अब होश में था।
डॉक्टर उसके पास बैठे थे।
“तुम्हें पता है कितने साल हुए?”
अंगद ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
डॉक्टर ने धीमे से कहा—
“दस साल।”
अंगद ने खिड़की के बाहर देखा।
दुनिया बदल चुकी थी।
लेकिन उसके लिए…
बस एक रात गुज़री थी।
“मेरे परिवार को बुलाइए।”
डॉक्टर ने सिर हिलाया।
फिर अंगद की नजर कमरे के दूसरे हिस्से पर गई।
वहाँ एक और बिस्तर था।
परदा लगा हुआ था।
मॉनिटर की धीमी आवाज़ आ रही थी।
बीप… बीप… बीप…
अंगद ने पूछा—
“वहाँ कौन है?”
डॉक्टर कुछ पल चुप रहे।
“एक मरीज।”
“कौन?”
डॉक्टर ने परदा थोड़ा हटाया।
अंगद की साँस रुक गई।
वही चेहरा।
वही बाल।
वही शांति।
मीरा।
वह अब भी कोमा में थी।
अंगद की आँखों से आँसू निकल आए।
उसने बिस्तर से उठने की कोशिश की।
“धीरे!”
नर्स ने उसे रोका।
लेकिन अंगद ने मीरा से नजर नहीं हटाई।
दस साल से वह उसे अपने सपनों में देख रहा था।
और अब…
वह सच में उसके सामने थी।
अंगद ने काँपते हुए हाथ आगे बढ़ाया।
लेकिन मीरा तक पहुँचने से पहले ही—
उसकी उँगली हिली।
बहुत हल्की।
अंगद जम गया।
उसने डॉक्टर की तरफ देखा।
“आपने देखा?”
डॉक्टर ने कहा—
“क्या?”
अंगद ने मीरा की तरफ देखा।
उसकी उँगली फिर हिली।
टक।
अंगद के होंठ काँपे।
“मीरा…”
टक।
दो बार।
टक।
तीन बार।
अंगद की आँखों में आँसू आ गए।
उसे अचानक ट्रेन याद आई।
प्लेटफ़ॉर्म।
बारिश।
और मीरा की आखिरी बात—
“अगर तुम जाग गए… तो मुझे याद रखना।”
अंगद धीरे से मुस्कुराया।
“मैं जाग गया हूँ।”
कुछ सेकंड तक कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।
फिर—
मीरा की बंद आँखों के नीचे हल्की-सी हरकत हुई।
और उसके होंठों पर…
बहुत हल्की मुस्कान आई।
मॉनिटर सामान्य चलता रहा।
बीप… बीप… बीप…
अंगद उसे देखता रहा।
फिर उसकी नजर खिड़की पर गई।
बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी।
और अस्पताल की पार्किंग के पीछे…
दूर रेलवे लाइन पर एक ट्रेन गुज़र रही थी।
धड़… धड़… धड़…
अंगद ने उसे देखा।
फिर मीरा को।
और उसके मन में एक आखिरी सवाल आया—
क्या दस साल तक वे दोनों एक-दूसरे के सपनों में थे…
या फिर कोई ऐसी जगह थी, जहाँ समय और वास्तविकता के बीच दोनों सचमुच मिलते रहे थे?
इस सवाल का जवाब…
शायद मीरा के जागने के बाद ही मिलेगा।