The Masked Confrontation in Hindi Love Stories by Ritu kumari books and stories PDF | प्यार का जाल - 6

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प्यार का जाल - 6

फोन की स्क्रीन पर चमकते हुए रिया के नाम को देखकर आरव की उंगलियाँ एक पल के लिए जम सी गईं। उसके सीने में गुस्से, दर्द और धोखे का ऐसा बवंडर उठ रहा था, जिसे संभालना नामुमकिन सा लग रहा था। लेकिन उसने खुद पर काबू पाया, अपनी कांपती सांसों को स्थिर किया और ग्रीन बटन को स्लाइड करके फोन कान से लगाया।
"आरव... हेलो, आरव?" दूसरी तरफ से रिया की वही जानी-पहचानी, सुरीली और मासूम आवाज़ गूंजी।
आरव ने अपने लहजे को पूरी तरह सामान्य रखते हुए कहा, "हाँ रिया, कहाँ हो तुम? कल रात से तुम्हारा फोन स्विच ऑफ आ रहा था। मैं बहुत परेशान हो गया था।"
"आई एम सो सॉरी, आरव! दरअसल कल अचानक मेरी मौसी की तबीयत बहुत खराब हो गई थी, मुझे इमरजेंसी में कानपुर भागना पड़ा। मेरा फोन भी बंद हो गया था और चार्जर मैं जल्दबाज़ी में घर पर ही भूल गई थी," रिया ने इतनी सहजता से झूठ बोला कि अगर आरव के पास वे सबूत न होते, तो वह उसकी हर बात पर आँख बंद करके यकीन कर लेता।
आरव के होठों पर एक कड़वी मुस्कान आ गई। "ओह, कोई बात नहीं। अब कैसी हैं मौसी?"
"अब वो ठीक हैं। आरव, क्या हम आज शाम को उसी कैफे में मिल सकते हैं? मुझे तुमसे बहुत ज़रूरी बात करनी है," रिया ने कहा।
"हाँ बिल्कुल, मैं शाम छह बजे तुम्हारा इंतज़ार करूँगा," आरव ने बिना देर किए जवाब दिया।
फोन कटते ही आरव के चेहरे के हाव-भाव कठोर हो गए। उसे समझ आ गया था कि रिया अब उस चोरी किए गए डेटा का इस्तेमाल करने या आरव से कुछ और अहम जानकारी निकालने के लिए आ रही है। आरव ने तुरंत अपने लैपटॉप पर आईटी सिक्योरिटी टीम के दोस्त को कॉल किया और अपने सर्वर लॉग्स का बैकअप तैयार करवाया। उसने ठान लिया था कि वह रिया के जाल में फँसने का नाटक जारी रखेगा ताकि वह इस साज़िश की आखिरी कड़ी तक पहुँच सके।
शाम के छह बजे, आरव उसी कैफे के कोने वाली मेज़ पर बैठा था। मौसम बिल्कुल वैसा ही था—बाहर हल्की बारिश और ठंडी हवा। थोड़ी देर बाद कैफे का दरवाज़ा खुला और रिया अंदर आई। उसने हल्के नीले रंग का सूट पहना था और उसके चेहरे पर हमेशा की तरह वही मासूम मुस्कान थी। वह आरव की मेज़ के पास आई और सामने बैठ गई।
"आई एम रियली सॉरी आरव, तुम्हें कल बहुत इंतज़ार करना पड़ा," रिया ने आरव का हाथ पकड़ते हुए कहा।
उसके स्पर्श से आरव के पूरे जिस्म में एक सिहरन दौड़ गई, लेकिन इस बार वह प्यार की सिहरन नहीं, बल्कि धोखे की आग थी। आरव ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और रिया की आँखों में आँखें डालकर देखा।
"रिया, क्या तुम वाकई कानपुर गई थी? या फिर लखनऊ के ही किसी फाइव-स्टार होटल में विक्रम मेहरा के साथ अपनी अगली चाल प्लान कर रही थी?" आरव ने बेहद शांत लेकिन बर्फ़ की तरह ठंडी आवाज़ में पूछा।
यह सुनते ही रिया के चेहरे की रंगत उड़ गई। उसके होठों की मुस्कान गायब हो गई और आँखों में एक गहरे सन्नाटे और खौफ ने जगह ले ली। कैफे का पूरा माहौल अचानक जम सा गया था।
"आरव... तुम यह क्या कह रहे हो? विक्रम मेहरा कौन है?" रिया ने हकलाते हुए खुद को संभालने की कोशिश की।
आरव ने बिना कोई शब्द कहे अपना फोन निकाला और वही तस्वीर रिया की तरफ बढ़ा दी, जिसमें वह विक्रम मेहरा के साथ खड़ी थी। तस्वीर देखते ही रिया की सांसें थम गईं। उसके चेहरे पर पड़ा मासूमियत का नकाब अब पूरी तरह से उतर चुका था।