Jis Jivan me tum the in Hindi Classic Stories by SHREYA INDUSHREE books and stories PDF | जिस जीवन में तुम थे - 9

Featured Books
Categories
Share

जिस जीवन में तुम थे - 9

उस रात वह सो नहीं पाया।अजीब बेचैनी थी।जैसे हृदय किसी ऐसी बात को पहले से जानता हो जिसे बुद्धि अभी स्वीकार नहीं करना चाहती।

सुबह चार बजे उसका फ़ोन बजा।अस्पताल से कॉल थी।और उसके बाद की कुछ बातें उसे जीवन भर धुँधली ही याद रहीं।
सड़क....अँधेरा......तेज़ चलती गाड़ी.....खाली गलियारा....और फिर...एक शांत कमरा। क्या कुछ नहीं देखा था उसने.... क्या कुछ नहीं सहा था?

फ़ोन कट चुका था।लेकिन समर अब भी उसे कान से लगाए बैठा था।जैसे उम्मीद कर रहा हो कि अभी दूसरी तरफ़ से कोई आवाज़ आएगी।"माफ़ कीजिए... ग़लती हो गई थी। वह ठीक है।"

मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ।वह मशीन की तरह उठा। शर्ट उल्टी पहन ली। चाबियाँ कई बार हाथ से छूटीं। बाहर अभी रात और सुबह के बीच का वह उदास समय था, जब शहर साँस तो लेता है, मगर बोलता नहीं।

पूरे रास्ते उसने एक भी बार रेड लाइट नहीं देखी। उसे बस अस्पताल तक पहुँचना था।या शायद...उस सच तक, जिससे वह भाग रहा था।अस्पताल का गलियारा असामान्य रूप से शांत था।नर्सों की धीमी चाल...दीवार पर टिक-टिक करती घड़ी...दूर कहीं किसी मशीन की लगातार आती बीप...
और इन सबके बीच समर की धड़कनें, जो किसी अनजाने भय से लड़ रही थीं।

एक डॉक्टर उसके सामने आकर रुक गया।उसने कुछ कहा।
शायद... "हम पूरी कोशिश कर चुके..."शायद... "हमें अफ़सोस है..."या शायद कुछ और...समर को कुछ सुनाई ही नहीं दिया।

उसके कानों में बस एक अजीब-सी खामोशी भर गई।कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।वह धीरे-धीरे भीतर गया।अन्विता खिड़की के पास वाले बिस्तर पर थी।चेहरे पर वैसी ही शांति...
जैसी किसी लंबी थकान के बाद गहरी नींद में सोए हुए व्यक्ति के चेहरे पर होती है।समर के होंठ काँपे....."अन्विता..."
आवाज़ निकली...

मगर जवाब नहीं आया।वह कुछ कदम और आगे बढ़ा।
उसने काँपते हाथों से उसके बालों की एक बिखरी लट कान के पीछे कर दी।"देखो... मैं आ गया हूँ..."वह मुस्कुराने की कोशिश कर रहा था।

"उठो न... तुम तो कहती थीं कि मैं देर करूँ तो डाँटोगी..."कमरा बिल्कुल चुप था।इतना चुप...कि उसकी अपनी साँसें भी उसे पराई लग रही थीं।वह उसके पास घुटनों के बल बैठ गया।धीरे से उसका हाथ अपने हाथों में लिया।

बर्फ़...इतना ठंडा...कि समर की पूरी देह काँप उठी।उसने उस हथेली को अपने गाल से लगा लिया।"तुम्हारे हाथ तो हमेशा गर्म रहते थे..."पहली बार उसकी आवाज़ टूट गई।

"इतनी जल्दी कैसे बदल गईं तुम...?"और फिर...वह रोया नहीं।आँसू भी शायद उस दुःख के सामने छोटे पड़ गए थे।
वह बस उसे देखता रहा...जैसे आँखें हटाईं तो वह सचमुच चली जाएगी।

खिड़की के बाहर अमलतास का पेड़ पीले फूलों से लदा था।
हवा चलती...तो फूल एक-एक करके ज़मीन पर गिरते।
समर को अचानक उसकी हँसी याद आई"जब कभी किसी पुराने पेड़ के नीचे धूप गिरती देखो... कुछ देर वहाँ बैठ जाना। वहाँ दिल हल्का हो जाता है।"

उसने धीरे से अन्विता के माथे को चूमा।"मैं बैठूँगा..."उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी धीमी थी।"हर साल...हर मौसम...
जब तक साँसें चलेंगी...मैं उस पेड़ के नीचे बैठूँगा...क्योंकि तुमने वहीं मेरा इंतज़ार रखने को कहा था।"

उसने उसकी उँगलियाँ आख़िरी बार अपने हाथों में कसकर थाम लीं।फिर पहली बार उसकी आँखों से आँसू नहीं...एक सिसकी निकली।ऐसी सिसकी...जो किसी एक इंसान के जाने की नहीं थी।

वह उस पूरी दुनिया के बिखर जाने की आवाज़ थी...जो उसने अन्विता के साथ मिलकर अपने भीतर बसाई थी।उस दिन समर ने जाना,मृत्यु किसी इंसान को नहीं ले जाती...वह उसके साथ हमारी पूरी एक दुनिया भी अपने साथ ले जाती है।

और पीछे छोड़ जाती है...एक ऐसा प्रेम...जिसका कोई अंत नहीं होता,बस...जिसका पता हमेशा के लिए खो जाता है।
उसने धीरे से उसका हाथ अपने हाथों में लिया।वह हाथ जो अब ठंडा होने लगा था।और उसे समझ आया,मृत्यु का अर्थ किसी का चले जाना नहीं है।मृत्यु का अर्थ है,दुनिया का वैसी न रह जाना जैसी वह उसके रहते थी।

जहाँ सब कुछ स्थिर था,असामान्य रूप से स्थिर।अन्विता खिड़की के पास वाले बिस्तर पर थी।ऐसा लग रहा था जैसे वह सो रही हो।जैसे अभी आँखें खोलेगी।और कहेगी,"तुम आ गए।"

लेकिन इस बार वह नहीं बोली।क्योंकि कुछ यात्राएँ ऐसी होती हैं जिनसे कोई लौटकर नहीं आता।समर उसके पास बैठ गया।बहुत देर तक,किसी ने उसे नहीं रोका।क्योंकि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि कुछ विदाइयाँ निजी होती हैं।

खिड़की के बाहर अमलतास खिला हुआ था।पीले फूल हवा में हिल रहे थे।और समर को अचानक वह पंक्ति फिर याद आई,"जब कभी किसी पुराने पेड़ के नीचे धूप गिरती देखो,तो कुछ क्षण वहाँ बैठ जाना।"उसने आँखें बंद कर लीं।

और उसने मन ही मन फिर से कहा,"मैं बैठूँगा।जीवन भर बैठूँगा।"उस दिन कोई शोर नहीं था।कोई नाटकीयता नहीं.....केवल एक गहरा, असहनीय खालीपन था। एक वादा जो उसने अन्विता से किया था, एक प्रण जो उसने खुद से किया था।

क्योंकि प्रेम समाप्त नहीं हुआ था।जिस व्यक्ति से प्रेम था...वह चला गया था।और यही दुख का सबसे कठिन रूप है।जब प्रेम बचा रह जाए...लेकिन उसका पता खो जाए।