रामप्रसाद की आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान। उसने अपने दस साल के बेटे गोविंद को नये स्कूल की यूनिफॉर्म पहनाई। वह यूनिफॉर्म इतनी साफ और महँगी लग रही थी कि रामप्रसाद को अपनी धोती और फटी कमीज़ शर्मिंदा कर रही थी।
"बेटा, आज से तू उसी स्कूल में पढ़ेगा जहाँ साहब लोगों के बच्चे पढ़ते हैं," रामप्रसाद की आवाज़ काँप रही थी।
गोविंद की माँ सरस्वती किचन से बाहर आई। उसके हाथ में एक कटोरी दूध था। "पी ले बेटा। आज तेरा पहला दिन है। अच्छे से पढ़ना।"
गोविंद ने दूध पिया, लेकिन उसकी नज़रें घर की टूटी दीवारों पर टिकी थीं। उसे पता था कि पिता ने यह स्कूल उसके लिए कर्ज़ लेकर दाखिला कराया है। मोहल्ले के सभी लोग कह रहे थे कि रामप्रसाद पागल हो गया है। एक रिक्शा चालाक जो महीने में बमुश्किल पाँच हज़ार कमाता है, वह बेटे को सालाना दो लाख रुपये फीस वाले स्कूल में कैसे पढ़ा सकता है?
"पापा, क्या हम सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ सकते?" गोविंद ने पूछा।
रामप्रसाद ने उसके कंधे पकड़े। "नहीं बेटा। आज के ज़माने में अंग्रेज़ी आनी चाहिए। वहाँ अमीर बच्चे पढ़ते हैं। तू उनके साथ रहेगा तो तेरी ज़बान साफ हो जाएगी। तू बड़ा आदमी बनेगा। हमारी गरीबी दूर हो जाएगी।"
गोविंद चुप हो गया। उसने अपना नया बैग कंधे पर टाँगा और रिक्शे पर बैठा। रामप्रसाद उसे स्कूल छोड़ने गया। रास्ते में गोविंद ने देखा कि पिता की पीठ पसीने से तर थी। रिक्शा खींचते हुए रामप्रसाद की साँसें फूल रही थीं, लेकिन वह मुस्कुरा रहे थे।
"वो देखो," रामप्रसाद ने एक बड़ी इमारत की ओर इशारा किया, "यही है तेरा स्कूल।"
इमारत इतनी बड़ी और सुंदर थी कि गोविंद को अपनी पुरानी स्कूल की एक मंज़िला इमारत याद आ गई। यहाँ तो पाँच मंज़िलें थीं। बगीचे में फव्वारे चल रहे थे। कारों की लाइन लगी थी। बच्चे सूट पहनकर आ रहे थे। किसी के हाथ में आईपैड था, किसी के कंधे पर ब्रांडेड बैग।
गोविंद ने अपना साधारण बैग कसकर पकड़ लिया। उसकी यूनिफॉर्म तो नयी थी, लेकिन जूते पुराने थे। पिता ने नये जूते खरीदने के पैसे नहीं थे।
"जा बेटा," रामप्रसाद ने उसे सिर पर हाथ फेरा, "और हाँ, अंग्रेज़ी में बात करना। हिंदी में कम बोलना।"
पहले दिन ही गोविंद को अपनी जगह पता चल गई। जब टीचर ने क्लास में पूछा, "व्हाट इज़ योर होबी?" तो गोविंद चुप रहा। उसे होबी शब्द का मतलब ही नहीं पता था। बाकी बच्चे बोले जा रहे थे। एक ने कहा, "आई लाइक गोल्फिंग।" दूसरे ने कहा, "आई लव टू ट्रैवल टू पेरिस।"
जब गोविंद की बारी आई, तो उसने हिंदी में कहा, "मुझे क्रिकेट खेलना अच्छा लगता है।"
पूरी क्लास हँस पड़ी। टीचर ने भी मुस्कुराते हुए कहा, "डियर, वी स्पीक इन इंग्लिश हियर।"
गोविंद का चेहरा लाल हो गया। वह ज़मीन में घुसने को चाहता था।
लंच के समय सब अपने डिब्बे खोलते हैं। एक लड़के का डिब्बा इतना बड़ा था कि उसमें तीन तरह के सैंडविच, सलाद, जूस और फल थे। गोविंद के पास रोटी और अचार की दो सूखी रोटियाँ थीं। उसने डिब्बा कसकर बंद कर लिया और बाथरूम में चला गया। वहाँ जाकर उसने रोटी छुपाकर खाई। उसे लगा कि कोई देख लेगा तो मज़ाक उड़ाएगा।
घर लौटकर गोविंद ने माँ से कहा, "माँ, मुझे वहाँ नहीं जाना।"
"क्यों बेटा? क्या हुआ?" सरस्वती ने चिंता से पूछा।
"कुछ नहीं," गोविंद ने सिर झुकाया, "बस अच्छा नहीं लगता।"
रामप्रसाद ने उस रात कर्ज़दारों से बात की। उसने एक और हज़ार रुपये का कर्ज़ लिया ताकि गोविंद का ट्यूशन लगवा सके। "अंग्रेज़ी सीख जाएगा तो सब ठीक हो जाएगा," रामप्रसाद ने सरस्वती से कहा।
हफ़्ते बीतते गए। गोविंद रोज़ सुबह उठता, रिक्शे पर बैठता, और उस बड़े स्कूल में जाता जहाँ वह अपने आप को एक कौए की तरह महसूस करता था जो मोरों के बीच रहने को मजबूर हो। बच्चे उसे "विलेज बॉय" कहते। उसकी हिंदी बोलने पर हँसते। उसके पुराने जूतों पर ताना मारते।
एक दिन स्कूल में डिबेट कॉम्पिटिशन हुआ। विषय था, "इंग्लिश इज़ दी गेटवे टू सक्सेस।" गोविंद को भी हिस्सा लेना था। उसने रात भर अपने ट्यूशन टीचर से स्पीच लिखवाई। सुबह उसने याद की। स्टेज पर गया। सामने सैकड़ों आँखें थीं।
"इंग्लिश इज़ अ वेरी इंपोर्टेंट लैंग्वेज," गोविंद ने शुरुआत की। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "इट इज़ दी लैंग्वेज ऑफ़ दी वर्ल्ड।"
अचानक एक लड़के ने माइक्रोफोन के पास से ताना कसा, "व्हाट इज़ दी मीनिंग ऑफ़ गेटवे?"
गोविंद ठिठक गया। उसे गेटवे का मतलब नहीं पता था। उसने जो याद किया था, वह भूल गया। पूरी सभागार में हँसी गूँज उठी। गोविंद स्टेज से उतरा और सीधे बाथरूम में गया। वहाँ उसने आईने में देखा। आँखें लाल थीं। उसने खुद से पूछा, "मैं कौन हूँ?"
उस दिन घर लौटकर गोविंद ने पिता को देखा। रामप्रसाद रिक्शा साफ़ कर रहे थे। उनके हाथ में छाले थे। गोविंद ने कहा, "पापा, मैं वहाँ नहीं पढ़ूँगा।"
रामप्रसाद ने क्रोध से कहा, "क्या बकवास कर रहा है? इतने पैसे लगे हैं। कर्ज़ लिया है। तू नहीं पढ़ेगा तो कौन पढ़ेगा?"
गोविंद ने पिता के हाथ पकड़े। "पापा, आप रोज़ सोलह सोलह घंटे रिक्शा चलाते हैं। माँ रोज़ दो घरों में झाड़ू पोछा करती है। और मैं? मैं वहाँ अपने आप को कौवा महसूस करता हूँ जो मोरों के बीच बैठा हो। वे मेरी हिंदी पर हँसते हैं। मेरे पुराने जूतों पर हँसते हैं। मेरी रोटी अचार पर हँसते हैं।"
रामप्रसाद चुप हो गए। उनकी आँखें नम हो गईं।
गोविंद ने कहा, "पापा, शिक्षा का मतलब यह नहीं है कि मैं अंग्रेज़ी बोलूँ और अमीर बन जाऊँ। शिक्षा का मतलब है कि मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकूँ। मैं अपनी मेहनत से कुछ बन सकूँ। मुझे वहाँ नहीं, यहाँ पास के सरकारी स्कूल में भेज दो। वहाँ मैं अपने जैसे बच्चों के बीच रहूँगा। मैं हिंदी में सोचूँगा, हिंदी में बोलूँगा, और अपनी मेहनत से आगे बढ़ूँगा।"
सरस्वती आई और गोविंद को गले लगा लिया। "मेरा बेटा समझदार हो गया है।"
रामप्रसाद ने सिर झुकाया। "मैंने सोचा था कि अंग्रेज़ी स्कूल तुझे अमीर बना देगा। लेकिन तू सही कह रहा है। अमीरी यहाँ है," उन्होंने अपना सीना ठोका, "दिल में, मेहनत में।"
अगले दिन रामप्रसाद ने स्कूल से गोविंद का नाम कटवा लिया। कुछ पैसे वापस मिले। उसने एक हज़ार रुपये का कर्ज़ उतारा। बाकी पैसों से गोविंद को नये जूते और किताबें खरीदकर दीं।
गोविंद सरकारी स्कूल में गया। वहाँ उसने पाया कि टीचर हिंदी में पढ़ाते हैं। बच्चे उसकी तरह साधारण घरों से आते हैं। लेकिन गोविंद ने एक बात ठान ली। वह रोज़ सुबह चार बजे उठेगा। दो घंटे अंग्रेज़ी की किताब पढ़ेगा। फिर स्कूल जाएगा। शाम को रिक्शा साफ़ करने पिता की मदद करेगा। रात को पढ़ेगा।
साल बीतते गए। गोविंद दसवीं में स्कूल टॉपर रहा। बारहवीं में ज़िले में दूसरा स्थान आया। उसे एक अच्छे कॉलेज में स्कॉलरशिप मिली। उसने इंजीनियरिंग की। नौकरी लगी। पहली तनख्वाह आई तो गोविंद ने पिता के हाथ में पैसे रखे।
"पापा, यह मेहनत की कमाई है। अंग्रेज़ी स्कूल की नहीं।"
रामप्रसाद रो पड़े। "मैंने तुझे कर्ज़ में डुबो दिया था। तूने मुझे समझाया। तूने मेरी गलती सुधारी।"
गोविंद ने कहा, "पापा, आपने जो किया, प्यार से किया। लेकिन प्यार कभी कर्ज़ नहीं लेता। प्यार मेहनत लेता है। और मेहनत से ही असली शिक्षा मिलती है।"
उस रात रामप्रसाद ने अपना रिक्शा एक कोने में खड़ा किया और गोविंद के कंधे पर सिर रखकर सो गया। गोविंद ने देखा कि पिता के चेहरे पर पहली बार वह सुकून था जो कर्ज़ के बोझ तले दब गया था। बाहर चाँद चमक रहा था। और गोविंद समझ गया कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी पढ़ाई यह है कि इंसान अपनी पहचान न खोए। अपनी मिट्टी से जुड़ा रहे। और अपनी मेहनत से आगे बढ़े।