fruit of hard work in Hindi Moral Stories by Krishna singh books and stories PDF | मेहनत का फल

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मेहनत का फल

सुमन एक छोटे से गाँव (रामपुरा) में अपने माता पिता और  चार साल के भाई अरुण के साथ रहती थी। सुमन दसवीं कक्षा की विद्यार्थी थी अरुण दूसरी कक्षा में पढ़ता था और दोनों बहन भाई  पढ़ने में बहुत तेज थे।

उसके मां बाप रात दिन मजदूरी करके दोनों भाई बहनों को पढ़ा रहे थे। सुमन का सपना था कि वह डॉक्टर बने।

एक दिन वह खेत पर अपने मां पापा के साथ मवेशियों के लिए चारा काट रही थी। तभी एक अधेड़ उम्र का आदमी एक लाल कार में वहां आया और सुमन के पिता के थप्पड़ जड़ दिया।

वह बोला मेरे पैसे लौटा दे सुमन के पापा ने कहा साहब मैं कुछ दिनों में आपके पैसे लौटा दूंगा मुझे थोड़ा समय दे दो। उस आदमी ने कहा ठीक है में तीन महीने का समय देता हूं अगर मेरे पैसे नहीं लौटाए तो मैं तेरा खेत और घर मेरे नाम करा लूँगा इतना कहकर वो आदमी चला गया।

सुमन ने उसके पापा से पूछा पापा ये आदमी कौन था और किस चीज के पैसे माँग रहा था सुमन के पापा बोले बेटा आज से तीन साल पहले एक दिन तुम्हारी मां की तबियत बहुत बिगड़ गई थी। उस साल सूखा पड़ा था और घर में कुछ भी खाने को नहीं था।

तो मैने इस सेठ से धन उधार लिया था ये वही धन मांगने आया था पर मेरे पास कुछ भी नहीं है अगर इसे पैसे नहीं लौटाए तो ये हमारा खेत छिन लेगा।

सुमन के मां पापा बहुत चिंता में डूब गए। मां बाप को चिंतित देख सुमन को बहुत दुःख हो रहा था। तभी उसे कुछ याद आया।

स्वतंत्रता दिवस के दिन गाँव के सरपंच ने ये घोषणा की थी कि जो भी बालक दसवीं की बोर्ड परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त करेगा उसे 2लाख का ईनाम दिया जाएगा।

अगर जिले में टॉप करेगा तो 5 लाख और पूरे राज्य में टॉप करने पर 10 लाख रुपए दिए जाएंगे।

सुमन की परीक्षा का एक महीना शेष था वह रात दिन मेहनत करने लगी।

उसने एक महीने बाद दसवीं बोर्ड की परीक्षा दी और उसके सभी प्रश्न पत्र अच्छे हुए उसे उम्मीद थी कि वह गाँव में प्रथम आकर दो लाख का ईनाम जीत लेगी और सेठ के पैसे चुका देगी।

फिर उसके मां बाप को खेत नहीं देना पड़ेगा। और वह अपने परिवार को इस दुःख की घड़ी से निकाल लेगी। वह अपने पापा से जाकर बोली पापा आप चिन्ता मत करो ईनाम में ही जीतूंगी।

एक महीने बाद जब परीक्षा का परिणाम आया तो सुमन ने गाँव में ही नहीं बल्कि पूरे राज्य में टॉप किया। उसके माता पिता बहुत खुश थे।

सरपंच ने सुमन को सारे गाँव के सामने सम्मानित किया और उसे दस लाख रुपए का ईनाम दिया।

सुमन के पापा ने दो लाख रूपये सेठ को लौटा दिए।

बचे हुए पैसों से सुमन को बाहर पढ़ने भेज दिया आठ साल बाद सुमन डॉक्टर बनकर घर लौटी।

उसके माता पिता व गाँव के सभी लोगों ने उसका स्वागत किया।

सुमन ने अपनी मेहनत से वो मुकाम हासिल किया जिसकी चर्चा सभी जगह हो रही थी।

सभी लोग सुमन की मेहनत की तारीफ कर रहे थे।