Raaj ke saat phere - 3 in Hindi Thriller by jaisy singh books and stories PDF | राज़ के सात फेरे - 3

Featured Books
Categories
Share

राज़ के सात फेरे - 3

सात फेरों की रस्म पूरी हो चुकी थी।
अग्नि को साक्षी मानकर रुद्रांश राठौर और अन्विका मल्होत्रा अब दुनिया की नज़रों में पति-पत्नी बन चुके थे।
पूरे हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट गूँज रही थी।
हर चेहरे पर मुस्कान थी।
हर कोई इस शाही शादी का हिस्सा बनकर खुद को सौभाग्यशाली महसूस कर रहा था।
लेकिन...
अगर कोई उनके दिलों के भीतर झाँक सकता...
तो समझ जाता कि इस शादी में प्रेम नहीं...
सिर्फ नफ़रत ने सात फेरे लिए थे।
रुद्रांश और अन्विका एक-दूसरे के पास खड़े जरूर थे...
लेकिन दोनों के बीच पति-पत्नी जैसा कोई रिश्ता नहीं था।
उनके बीच अगर कुछ था...
तो सिर्फ बदला...
और एक-दूसरे को बर्बाद करने की कसम।
इधर शादी की रस्में पूरी होने के बाद मेहमान एक-एक करके नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद देने आने लगे।
देश के बड़े-बड़े उद्योगपति...
राजनीति के दिग्गज...
फिल्मी सितारे...
सब मंच पर पहुँचकर दोनों को बधाई दे रहे थे।
"हैप्पी मैरिड लाइफ..."
"भगवान आप दोनों की जोड़ी सलामत रखे..."
"हमेशा खुश रहो..."
हर कोई मुस्कुराते हुए शुभकामनाएँ दे रहा था।
कोई कीमती हीरों का सेट भेंट कर रहा था...
तो कोई करोड़ों की कीमत वाली पेंटिंग।
किसी ने विदेशी घड़ी उपहार में दी...
तो किसी ने सोने की मूर्ति।
कैमरों की फ्लैश लगातार चमक रही थीं।
मीडिया वाले एक भी पल को अपने कैमरे से छूटने नहीं देना चाहते थे।
दूसरी ओर...
कुसुम मल्होत्रा विदाई की तैयारियों में लगी हुई थीं।
उनकी आँखें बार-बार भर आती थीं...
लेकिन फिर भी वह खुद को संभाल रही थीं।
चंचल भी उनके साथ हर छोटी-बड़ी व्यवस्था देख रही थी।
"आंटी जी..."
चंचल ने धीरे से कहा—
"सब तैयार है।"
"बस विदाई की रस्म बाकी है।"
कुसुम ने हल्का-सा सिर हिलाया।
उनकी नज़र अन्विका पर जाकर ठहर गई।
जिस बेटी को उन्होंने अपनी गोद में खिलाया था...
आज वही किसी और घर की होने जा रही थी।
कुछ ही देर में...
सूरज की हल्की सुनहरी किरणें काँच की ऊँची खिड़कियों से होकर हॉल के भीतर आने लगीं।
पूरी रात चली शादी अब सुबह में बदल चुकी थी।
कई मेहमान विदा लेने लगे थे।
लेकिन मीडिया अब भी वहीं मौजूद थी।
कैमरों के सामने बस एक ही चेहरा था...
रुद्रांश राठौर और अन्विका मल्होत्रा।
उधर...
अन्विका के चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
लेकिन उसके दिल में एक अलग ही खुशी थी।
आख़िर...
जिस मकसद के लिए उसने पिछले एक साल से हर कदम सोचा था...
आज वह पूरा होने जा रहा था।
कुछ ही देर बाद...
वह राठौर मेंशन में होगी।
उसी घर में...
जहाँ जाने के लिए वह पिछले एक साल से इंतज़ार कर रही थी।
वहीं...
कुसुम के मन में खुशी नहीं...
सिर्फ चिंता थी।
उन्हें अपनी बेटी के भविष्य की फिक्र खाए जा रही थी।
आख़िरकार...
विदाई का समय आ गया।
हॉल में अचानक भावुक सन्नाटा छा गया।
कुसुम धीरे-धीरे चलकर अपनी बेटी के सामने पहुँचीं।
बस एक पल...
और अगले ही पल उन्होंने अन्विका को कसकर अपने सीने से लगा लिया।
इतनी कसकर...
मानो उसे कभी खुद से अलग ही न करना चाहती हों।
उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
अन्विका भी कुछ क्षण के लिए बिल्कुल शांत हो गई।
उसने अपनी माँ की पीठ पर धीरे से हाथ फेरा।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—
"मम्मा..."
"डोंट वरी।"
"बस कुछ दिनों की बात है।"
"जिस मकसद के लिए मैंने ये शादी की है..."
"वो पूरा होते ही मैं वापस आपके पास आ जाऊँगी।"
कुसुम ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने बस अपनी बेटी को थोड़ा-सा खुद से अलग किया।
उसके चेहरे को दोनों हथेलियों में थामा।
फिर उसके माथे को चूम लिया।
"अपना ख्याल रखना बेटा..."
उनकी आवाज़ भर्रा गई थी।
अन्विका मुस्कुराई।
"मैं तो अपना ख्याल रख लूँगी मम्मा..."
"लेकिन अब आपको अपना ध्यान रखना है।"
फिर वह थोड़ा झुककर कुसुम के कान के पास फुसफुसाई—
"जब तक मैं वापस आपके पास नहीं आ जाती..."
कुसुम ने उसकी आँखों में देखा।
उनकी पलकों पर आँसू थे...
लेकिन होंठों पर हल्की मुस्कान भी।
उन्होंने बिना कुछ कहे बस उसके गाल को प्यार से सहला दिया।
उसी समय...
चंचल मुस्कुराती हुई उनके पास आई।
"अगर माँ-बेटी की बातें पूरी हो गई हों..."
"तो क्या अब हम चलें?"
उसकी बात सुनकर माहौल थोड़ा हल्का हो गया।
अन्विका ने भी मुस्कुराकर कहा—
"जी दी..."
उधर...
हॉल के दूसरे कोने में...
रुद्रांश और शेखर सोफे पर बैठे हुए थे।
रुद्रांश के हाथ में जूस का ग्लास था।
वह आराम से बैठा था...
लेकिन उसकी नज़र लगातार अन्विका पर ही टिकी हुई थी।
शेखर ने उसकी नज़रें देख लीं।
वह शरारती अंदाज़ में मुस्कुराया।
"लगता है..."
"रुद्रांश राठौर को कोई पसंद आ गया है।"
"तभी तो नज़रें दुल्हन से हट ही नहीं रहीं।"
शेखर की बात सुनकर रुद्रांश हल्का-सा हँस पड़ा।
उसने जूस का एक घूँट लिया।
फिर बिना नज़र हटाए बोला—
"शेखर..."
"तुझे तीन साल पहले वाला नाइट क्लब इंसीडेंट याद है?"
इतना सुनते ही...
शेखर के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
"कैसे भूल सकता हूं मैं भैया?"
"उस रात को..."
"जब पहली बार किसी ने आपकी बेइज़्ज़ती करने की हिम्मत की थी।"
"आप पर रेप का झूठा आरोप लगाया गया था।"
"आपको पुलिस गिरफ्तार करके ले गई थी।"
"अगर मामा जी समय पर नहीं पहुँचते..."
"तो पता नहीं क्या हो जाता।"
उसने गहरी साँस ली।
"लेकिन आज तक मेरी समझ में एक बात नहीं आई।"
"जो इंसान आपकी तरफ उँगली उठाता है..."
"आप उसका हाथ तोड़ देते हैं।"
"उस लड़की ने तो आपकी इज़्ज़त पर वार किया था।"
"फिर भी आपने कभी उसका नाम तक किसी को नहीं बताया।"
"और आज अचानक..."
"आप उसकी बात कर रहे हैं?"
शेखर की बात खत्म हुई।
लेकिन...
रुद्रांश की नज़र अब भी अन्विका पर ही थी।
उसके होंठों पर धीरे-धीरे एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई।
और उसने बेहद शांत...
लेकिन डर पैदा कर देने वाली आवाज़ में कहा—
"क्योंकि..."
"वो लड़की..."
"इस वक्त मेरी आँखों के सामने खड़ी है..."रुद्रांश के मुँह से निकले शब्द सुनते ही...
शेखर के हाथ में पकड़ा जूस का गिलास हल्का-सा काँप गया।
उसने अविश्वास भरी नज़रों से पहले रुद्रांश को देखा...
फिर धीरे-धीरे उसकी नज़र अन्विका की ओर घूम गई।
"क्या...?"
उसके मुँह से मुश्किल से इतना ही निकल पाया।
अगले ही पल उसे ज़ोर की खाँसी आने लगी।
वह लगातार खाँसता रहा।
रुद्रांश ने बिना घबराए उसकी पीठ थपथपाई और हँसते हुए बोला—
"अरे... आराम से।"
"अभी से इतनी घबराहट?"
"अभी तो खेल शुरू भी नहीं हुआ है।"
शेखर ने खुद को संभालते हुए रुद्रांश की तरफ देखा।
उसके चेहरे का रंग उड़ चुका था।
"भ... भैया..."
"मतलब..."
"आपने ये शादी..."
"मामा जी की बात मानने के लिए नहीं..."
"बल्कि उससे बदला लेने के लिए की है?"
रुद्रांश की मुस्कान और गहरी हो गई।
उसने आराम से सोफे की बैक पर सिर टिकाया।
फिर बहुत शांत आवाज़ में बोला—
"बदला...?"
उसने हल्का-सा सिर हिलाया।
"नहीं शेखर..."
"बदला तो बहुत छोटा शब्द है।"
उसकी आँखों में एक अजीब-सी ठंडक उतर आई।
"मैंने उससे शादी..."
"उसे बर्बाद करने के लिए की है।"
ये शब्द सुनते ही शेखर के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गई।
वह एकदम खड़ा हो गया।
"भैया... आपका दिमाग तो ठीक है ना?"
"आप जानते भी हैं वो कौन है?"
"वो अन्विका मल्होत्रा है।"
"पूरे एशिया की सबसे ताकतवर बिजनेस वुमन में से एक।"
"और ऊपर से..."
"कुसुम मल्होत्रा की बेटी।"
रुद्रांश भी धीरे से उठकर खड़ा हो गया।
उसने अपनी शेरवानी का कॉलर ठीक किया।
फिर मुस्कुराते हुए बोला—
"अगर वो अन्विका मल्होत्रा है..."
"तो मैं भी रुद्रांश राठौर हूँ।"
"और राठौर..."
"कभी हारना नहीं जानते।"
उसकी आवाज़ में ऐसा आत्मविश्वास था...
कि एक पल के लिए शेखर भी चुप हो गया।
लेकिन उसके मन में डर लगातार बढ़ता जा रहा था।
वह रुद्रांश को अच्छी तरह जानता था।
जिस इंसान को अपने नुकसान की भी परवाह नहीं...
वो सामने वाले के साथ क्या करेगा...
इसकी कल्पना भी डराने वाली थी।
और अगर सामने वाला भी अन्विका मल्होत्रा जैसी जिद्दी और ताकतवर लड़की हो...
तो आने वाला तूफान कितना भयानक होगा...
इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था।
शेखर अभी इन्हीं ख्यालों में खोया हुआ था कि अचानक किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
वह बुरी तरह चौंक गया।
घबराकर जैसे ही पीछे मुड़ा...
तो सामने प्रणव खड़ा था।
उसे इस तरह डरा हुआ देखकर प्रणव हल्का-सा मुस्कुराया।
"क्या हुआ?"
"इतना घबराया हुआ क्यों लग रहा है?"
शेखर कुछ बोल पाता...
उससे पहले ही रुद्रांश आगे बढ़ गया।
वह हँसते हुए बोला—
"कुछ नहीं भैया।"
"मैं बस इसे एक डरावनी कहानी सुना रहा था।"
प्रणव हँस पड़ा।
"तू भी ना..."
"तुझे पता है ना..."
"ये बचपन से कितना डरपोक है।"
फिर उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई।
विदाई की सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं।
उसने रुद्रांश से कहा—
"चलो..."
"अन्विका की विदाई का समय हो गया है।"
"सब लोग हमारा इंतज़ार कर रहे हैं।"
"अब घर चलते हैं।"
"जी भैया।"
रुद्रांश ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया।
और तीनों हॉल के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गए।
कुछ ही देर बाद...
विदाई की रस्में शुरू हुईं।
पूरा माहौल भावुक हो चुका था।
कई महिलाओं की आँखें नम थीं।
कुसुम मल्होत्रा अपनी बेटी को बार-बार देख रही थीं।
हर माँ की तरह...
वो भी अपनी बेटी को विदा करने की हिम्मत जुटा रही थीं।
आखिरकार...
सारी रस्में पूरी हुईं।
बैंक्वेट के बाहर सफेद रंग की बेहद आलीशान कार खड़ी थी।
कार को सफेद और लाल फूलों से इतनी खूबसूरती से सजाया गया था कि वह किसी शाही बग्घी जैसी लग रही थी।
सुरक्षा के लिए आगे और पीछे कई लग्जरी एसयूवी खड़ी थीं।
राठौर परिवार का पूरा काफिला तैयार था।
रुद्रांश ने बिना कुछ कहे कार का दरवाज़ा खोला।
अन्विका अंदर जाकर बैठ गई।
उसके बाद रुद्रांश भी उसके बगल में बैठ गया।
आगे ड्राइवर की सीट पर ड्राइवर था...
और उसके साथ वाली सीट पर शेखर बैठ गया।
दूसरी कार में प्रणव और चंचल बैठ चुके थे।
यशवर्धन राठौर कुछ समय पहले ही अपने सुरक्षा दल के साथ राठौर मेंशन के लिए निकल चुके थे।
कुछ ही क्षणों बाद...
पूरे काफिले की गाड़ियाँ एक-एक करके मुंबई की सड़कों पर दौड़ने लगीं।
उधर...
बैंक्वेट के बाहर खड़ी कुसुम मल्होत्रा नम आँखों से उन गाड़ियों को दूर जाते हुए देख रही थीं।
जब तक आखिरी गाड़ी उनकी नज़रों से ओझल नहीं हुई...
वो वहीं खड़ी रहीं।
फिर उन्होंने आसमान की ओर देखा।
उनकी आँखों से एक आँसू ढुलक पड़ा।
"हे भगवान..."
"मैं बस यही प्रार्थना करती हूँ..."
"इन दोनों के बीच जो भी गलतफहमियाँ हैं..."
"उन्हें समय रहते दूर कर देना।"
"मैं एक माँ हूँ..."
"मैं कभी नहीं चाहूँगी कि मेरी बेटी का घर उजड़ जाए।"
उन्होंने गहरी साँस ली।
"आज वो मेरी कोई बात सुनने को तैयार नहीं थी।"
"अब सब कुछ..."
"मैं समय और भगवान पर छोड़ती हूँ।"
उन्होंने अपने आँसू पोंछे ही थे...
कि पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज़ आई—
"मैम..."
उन्होंने पलटकर देखा।
सामने उनकी असिस्टेंट प्रिया खड़ी थी।
प्रिया मुस्कुराते हुए बोली—
"अब हमें भी चलना चाहिए।"
"अन्विका मैम ने मुझे सख्त हिदायत दी है..."
"अगर मैंने आपका ठीक से ध्यान नहीं रखा..."
"तो वापस आकर सबसे पहले मेरी ही क्लास लगाएंगी।"
प्रिया का डरा हुआ चेहरा देखकर...
कुसुम के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
"पागल लड़की..."
उन्होंने स्नेह से कहा।
फिर दोनों अपनी कार की ओर बढ़ गईं।
उधर...
रुद्रांश की कार मुंबई की चौड़ी सड़कों पर तेज़ रफ्तार से दौड़ रही थी।
सुबह का समय था।
सूरज पूरी तरह निकल चुका था।
सड़क पर वाहनों की आवाजाही भी बढ़ने लगी थी।
कार के अंदर...
अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी।
रुद्रांश आराम से सीट पर टिककर अपने मोबाइल में व्यस्त था।
मानो उसके लिए अभी-अभी हुई शादी की कोई अहमियत ही न हो।
आगे बैठा शेखर बार-बार रियर व्यू मिरर से रुद्रांश को देख रहा था।
उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
"अगर भैया सच में बदला लेने निकले हैं..."
"और उधर अन्विका भी किसी से हार नहीं मानती..."
"तो आखिर होगा क्या?"
उसका दिल बार-बार अनहोनी का संकेत दे रहा था।
लेकिन...
वो चाहकर भी किसी से कुछ नहीं कह सकता था।
पीछे...
खिड़की के पास बैठी अन्विका लगातार बाहर देख रही थी।
मुंबई की सड़कें...
ऊँची-ऊँची इमारतें...
भागती हुई दुनिया...
सब उसकी आँखों के सामने से गुजर रहे थे।
लेकिन उसका मन कहीं और था।
बार-बार उसकी माँ की कही बात उसके कानों में गूँज रही थी—
"कल..."
"तुम रुद्रांश को खुद के करीब आने से कैसे रोकोगी?"
बस यही एक सवाल...
उसके भीतर डर बनकर बैठ गया था।
वो राठौर परिवार का सामना कर सकती थी...
अपने दुश्मनों से लड़ सकती थी...
लेकिन...
सुहागरात...
उसके बारे में सोचते ही उसके हाथ अनजाने में भींच गए।
"मैं क्या करूँगी...?"
"कैसे खुद को उससे दूर रखूँगी...?"
वह इन्हीं सवालों में उलझी हुई थी...
कि तभी...
चीईईं...
कार ने अचानक तेज़ ब्रेक लगाया।
अन्विका का शरीर झटके से आगे की ओर झुक गया।
उसने तुरंत सामने की सीट पकड़कर खुद को संभाला।
कुछ पल तक उसे समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है।
उसने घबराकर सिर उठाया...
और जैसे ही उसकी नज़र कार के सामने पड़ी...
उसके चेहरे के भाव एक पल में बदल गए...
उसकी आँखें फैल गईं...
और दिल की धड़कन जैसे थम-सी गई...
आख़िर ऐसा क्या था...
जिसे देखकर पहली बार अन्विका के चेहरे का रंग उड़ गया था...?

🌙 Chapter ending lines:
आखिर तीन साल पहले नाइट क्लब में ऐसा क्या हुआ था... जिसने रुद्रांश को अन्विका से इतनी नफ़रत करने पर मजबूर कर दिया?
क्या सच में अन्विका ने रुद्रांश पर झूठा आरोप लगाया था... या उस रात का सच कुछ और ही था?
आखिर कार के सामने ऐसा क्या आ गया... जिसे देखकर पहली बार अन्विका के चेहरे का रंग उड़ गया?
और... जिन दो लोगों ने एक-दूसरे की ज़िंदगी को नरक बनाने की कसम खाई है... क्या वक्त उनकी नफ़रत को और गहरा करेगा... या इसी नफ़रत के बीच जन्म लेगी एक ऐसी मोहब्बत... जिसकी कल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी?
जानने के लिए पढ़ते रहिए... "राज़ के सात फेरे"

To Be Continued...


❤️ Dear Lovely Readers ❤️
उम्मीद है आपको "राज़ के सात फेरे" का यह अध्याय पसंद आया होगा।
अब कहानी एक ऐसे मोड़ पर पहुँच चुकी है जहाँ हर नए अध्याय के साथ एक नया राज़ सामने आएगा। आखिर तीन साल पहले नाइट क्लब में क्या हुआ था? क्या सच वही है जो दिखाई दे रहा है, या इसके पीछे कोई और बड़ा रहस्य छिपा है?
अगर आपको यह अध्याय पसंद आया हो तो कृपया इसे ❤️ Like ज़रूर करें।
💬 Comment करके बताइए—
आपके अनुसार उस रात आखिर क्या हुआ होगा?
क्या रुद्रांश सही है या अन्विका?
आपकी थ्योरी जानने का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहेगा।
⭐ अपनी Review देना बिल्कुल मत भूलिए, क्योंकि आपके Review और सुझाव मुझे और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा देते हैं।
📌 कहानी को Follow ज़रूर करें ताकि आने वाला कोई भी रोमांचक अध्याय आपसे छूट न जाए।
📢 और अगर आपको लगता है कि यह कहानी दूसरों को भी पसंद आएगी, तो इसे अपने दोस्तों के साथ Share करना मत भूलिए।
मिलते हैं अगले अध्याय में...
एक नए राज़ और एक नए धमाके के साथ।
ढेर सारा प्यार ❤️